कड़वी सच्चाई

अलमारी से कपड़े निकालकर तेज़ी से सूटकेस में ठूंसती हुई नीता के हाथ कांप रहे थे। उसकी आँखों से लगातार बहते गर्म आंसू उसके गालों को भिगो रहे थे, लेकिन इस वक्त उसे अपने आंसू पोंछने की भी फुर्सत नहीं थी। कुछ ही मिनटों पहले उसे अपनी माँ का फोन आया था कि उसके पिता, रामप्रसाद जी को अचानक लकवा मार गया है और उन्हें गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया है। नीता का इकलौता भाई, सुशांत, अपनी कंपनी के एक अहम प्रोजेक्ट के सिलसिले में पिछले दो सालों से जर्मनी में था और वीज़ा व फ्लाइट की दिक्कतों के कारण उसका तुरंत लौट पाना लगभग असंभव था।

कमरे के दरवाज़े पर उसका पति, सुधीर, माथे पर असंतोष की गहरी सिलवटें लिए खड़ा था। सुधीर ने एक लंबी और झुंझलाहट भरी गहरी सांस छोड़ते हुए कहा, “नीता, तुम इतनी रात को इस तरह पागलों की तरह कैसे जा सकती हो? बाहर मौसम देखा है? और फिर, परसों हमारे घर में दिवाली की बड़ी पूजा है। माँ ने कितने सारे रिश्तेदारों को निमंत्रण दे रखा है। तुम घर की बड़ी बहू हो, तुम्हारी गैरमौजूदगी में सब क्या सोचेंगे? घर का सारा काम कौन संभालेगा? सुशांत को फोन कर दो, वो जर्मनी से कुछ पैसे भेज देगा और हम अस्पताल में कोई अच्छी सी फुल-टाइम केयरटेकर या नर्स रखवा देंगे। आखिर भाई है वो, कुछ तो फर्ज़ निभाएगा।”

सूटकेस की ज़िप बंद करते हुए नीता के हाथ अचानक ठिठक गए। वह पलटी और सुधीर की आँखों में सीधा देखते हुए एक ठंडी लेकिन चुभने वाली आवाज़ में बोली, “सुधीर, मेरे पिता इस वक्त अस्पताल के आईसीयू में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। मेरी माँ अस्पताल के गलियारे में अकेली बैठकर रो रही है। उन्हें इस वक्त मेरे पैसों या किसी अनजान केयरटेकर की नहीं, मेरी ज़रूरत है। क्या कोई नर्स मेरी तरह उनके माथे पर हाथ रखकर उन्हें सुकून दे सकती है? क्या वो नर्स उन्हें वो हौसला दे सकती है जो एक औलाद के पास होने से मिलता है? जब मुझे बचपन में टाइफाइड हुआ था, तो मेरे पिता ने तीन रातें बिना पलक झपकाए मेरे सिरहाने बैठकर बिताई थीं। आज जब उन्हें मेरी ज़रूरत है, तो मैं उन्हें एक नर्स के भरोसे कैसे छोड़ दूँ?”

तभी पीछे से नीता की सास, कावेरी देवी, कमरे में दाखिल हुईं। उन्होंने अपने बेटे का पक्ष लेते हुए थोड़े कड़क लहज़े में कहा, “बहू, सुधीर कोई गलत बात तो नहीं कह रहा है। बेटियां शादी के बाद पराए घर की हो जाती हैं, उनका असली घर उनका ससुराल ही होता है। मायके के दुख-सुख में शामिल होना ठीक है, लेकिन अपने ससुराल की ज़िम्मेदारियां छोड़कर मायके में जाकर बैठ जाना कौन सा समझदारी का काम है? तुम्हारे पिता का बेटा है तो सही, वो अपना फर्ज़ निभाएगा। और अगर वो किसी वजह से नहीं आ सकता, तो इसमें हमारे परिवार का क्या दोष है? हमारा घर और हमारे त्योहार तुम्हारी वजह से क्यों डिस्टर्ब हों?”

नीता ने अपना सूटकेस हाथ में लिया और बहुत ही शांत, सम्मानजनक लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “माँ जी, जब मैं इस घर में ब्याह कर आई थी, तो आपने मुझसे कहा था कि आज से ये मेरा अपना घर है और आप दोनों मेरे माता-पिता हैं। मैंने आपकी हर बात को सिर आँखों पर रखा, आपकी हर तकलीफ में रात-रात भर जागकर आपकी सेवा की, क्योंकि वो मेरा फर्ज़ था और मैंने आपको दिल से अपनाया था। लेकिन क्या मेरे उस घर के प्रति मेरे सारे फर्ज़ खत्म हो गए, जहाँ मैंने जन्म लिया? क्या कन्यादान का मतलब सच में यह होता है कि एक लड़की अपने जन्म देने वाले माता-पिता के लिए हमेशा के लिए अनाथ हो जाए?”

सुधीर ने अपना बचाव करते हुए कहा, “तुम बात का बतंगड़ बना रही हो नीता। मैं तुम्हें जाने से रोक नहीं रहा हूँ, लेकिन अभी समय बिल्कुल सही नहीं है। तुम कल सुबह आराम से चली जाना। और वैसे भी, शादी के बाद एक लड़की की पहली प्राथमिकता उसका पति और उसका ससुराल होता है। दुनिया का यही दस्तूर है।”

“यही दस्तूर तो सबसे बड़ी विडंबना है सुधीर,” नीता की आवाज़ में एक गहरा दर्द और एक अनकही शिकायत साफ झलक रही थी। “आप मुझसे उम्मीद करते हैं कि मैं आपके माता-पिता को अपना मानूं, उनकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ख्याल रखूं, जो कि बिल्कुल सही है और मैं करती भी हूँ। लेकिन जब बात मेरे माता-पिता की आती है, तो आप ‘नर्स रख लो’ या ‘भाई को देखने दो’ कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। मेरे पिता ने मुझे और सुशांत को एक जैसी परवरिश दी, एक जैसी शिक्षा दी। उन्होंने कभी ये नहीं सोचा कि मैं लड़की हूँ तो मुझ पर कम खर्च करें या मुझे कम प्यार दें। तो आज जब बुढ़ापे और बीमारी में उन्हें मेरी ज़रूरत है, तो मैं ‘मैं तो लड़की हूँ’ कहकर पीछे कैसे हट जाऊं? क्या जिन घरों में बेटे नहीं होते या दूर होते हैं, वहाँ क्या माता-पिता को उनके हाल पर तिल-तिल मरने के लिए छोड़ दिया जाता है?”

नीता दरवाज़े की तरफ बढ़ी और सुधीर की तरफ मुड़कर आखिरी बार बोली, “देखिये सुधीर, मुझे आपसे इस वक्त बहस करने का कोई शौक नहीं है। मेरे पापा और माँ को मेरी ज़रूरत है। मेरा भाई वहाँ नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मेरे माता-पिता बेसहारा हैं। मैं जा रही हूँ, क्योंकि मैं सिर्फ आपकी पत्नी या इस घर की बहू ही नहीं हूँ, मैं किसी की बेटी भी हूँ। एक बेटी का फर्ज़ किसी भी बेटे से कम नहीं होता।” और इतना कहकर नीता उस तूफानी रात में अपना फर्ज़ निभाने निकल पड़ी।

प्रिय पाठकगण, यह सिर्फ नीता की कहानी नहीं है, यह हमारे समाज की एक बहुत बड़ी और कड़वी सच्चाई है। जब एक लड़की शादी करके दूसरे घर जाती है, तो उससे यह कठोर उम्मीद की जाती है कि वह अपने मायके का मोह छोड़ दे। बहुओं से ढेरों अपेक्षाएं होती हैं, और वे उन्हें अपनी पूरी क्षमता से खुशी-खुशी निभाती भी हैं। लेकिन क्या कभी किसी ससुराल वाले ने या पति ने अपनी पत्नी के दिल को टटोल कर देखा है कि उसके मन में अपने बूढ़े माता-पिता के लिए कितनी फिक्र और तड़प होती है?

यकीन मानिए, अगर एक पति अपनी पत्नी के माता-पिता को अपना समझकर सिर्फ एक फोन करके उनका हालचाल पूछ ले, तो वही पत्नी दुगने उत्साह और असीम प्रेम से अपने ससुराल को संवारेगी। हर औलाद, चाहे वह बेटा हो या बेटी, का यह समान हक और सर्वोपरि फर्ज़ है कि वह अपने बूढ़े माता-पिता की सेवा करे। हमें ‘लड़का’ और ‘लड़की’ के इस खोखले और स्वार्थी भेदभाव से बाहर निकलना ही होगा।

आपके इस विषय पर क्या विचार हैं? क्या शादी के बाद बेटियों का अपने माता-पिता के प्रति फर्ज़ सचमुच खत्म हो जाता है? क्या ससुराल वालों को बहू के मायके के प्रति भी संवेदनशील नहीं होना चाहिए? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।

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