आरुषि के लिए जैसे वक्त ठहर सा गया था। कमरे में मद्धिम उजाला था और वह चुपचाप अपनी हथेलियों की लकीरों को घूरती हुई बैठी थी।
तभी दरवाजे की कुंडी झटके से बजी और उसकी बचपन की सहेली नैना बिना किसी औपचारिक इजाजत के भीतर दाखिल हो गई। उसके चेहरे पर रोज की तरह वही जिद्दी मुस्कान थी, जो आरुषि के आंसुओं को पोंछने के लिए हमेशा ढाल बन जाती थी।
“अरे ओ मेरी दार्शनिक देवी! कब तक इस चारदीवारी में बंद रहकर खिड़की के सरियों को गिनोगी? चलो, उठो भी अब!” नैना ने उसका हाथ पकड़कर खींचते हुए कहा।
आरुषि ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, उसकी आवाज में थकान और बेरुखी थी, “नैना, तुझे कितनी बार कहा है कि मुझे कहीं नहीं जाना। मुझे अकेला छोड़ दे। बाहर जाकर भी मैं क्या करूंगी?”
“बिल्कुल नहीं छोडूंगी! आज तो तुझे मेरे साथ सदर बाजार तक चलना ही होगा। मेरे चचेरे भाई रोहन ने वहां एक नई बुटीक और हैंडलूम की दुकान खोली है। कल ही उसका फोन आया था कि दीदी, कुछ पारंपरिक कढ़ाई वाले कुर्ते आए हैं, एक बार देख लो और दुकान की बोहनी भी करा दो। नया काम शुरू किया है उसने, चलोगी तो उसका हौसला बढ़ेगा। और वैसे भी, तू अपनी सहेली की खातिर इतना भी नहीं कर सकती?”
नैना की इतनी मनुहार और जिद के आगे हमेशा की तरह आरुषि की खामोशी हार गई। उसने एक गहरे नीले रंग का सादा दुपट्टा अपने कुर्ते पर डाला और बेमन से बोली, “चल रही हूं, पर मेरी एक शर्त है। जो लेना है जल्दी लेना, मुझे बाजार की भीड़ और शोर में बिल्कुल नहीं रुकना।”
“मंजूर है सरकार! बस तू घर की देहरी तो पार कर,” नैना ने राहत की सांस लेते हुए कहा।
पिछले डेढ़ साल से आरुषि की जिंदगी जैसे किसी वीरान रेगिस्तान की तरह हो गई थी। वह आरुषि, जिसकी खिलखिलाहट से पूरा मोहल्ला गूंज उठता था, अब घंटों तक बिना पलक झपकाए दीवारों को तकती रहती थी। उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा नासूर उसका अपना ही फैसला बन गया था। वह खुद को अपने छोटे भाई देवांश की मौत का जिम्मेदार मानती थी।
देवांश मर्चेंट नेवी में सब-लेफ्टिनेंट के पद पर तैनात था। आरुषि की सगाई तय हो चुकी थी और शादी दिसंबर में होनी थी। लेकिन आरुषि ने बचपन की तरह फोन पर बचकानी जिद पकड़ ली थी कि ‘तू जब तक राखी पर घर नहीं आएगा, तब तक मैं शादी के किसी जोड़े को हाथ नहीं लगाऊंगी।’ देवांश अपनी दीदी की कोई बात कभी टाल नहीं पाता था। उसने मुश्किल हालातों के बीच आपातकालीन छुट्टी ली और पोर्ट से घर लौटने के लिए निकला। रास्ते में तेज आंधी और भारी भूस्खलन की चपेट में उसकी गाड़ी गहरी खाई में समा गई।
जब देवांश लौटा, तो वह अपनी प्यारी दीदी के लिए लाया हुआ उपहार नहीं दे सका, बल्कि तिरंगे और कफन में लिपटा उसका बेजान जिस्म घर पहुंचा था। उस मंजर ने आरुषि की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। त्रासदी यहीं खत्म नहीं हुई। रूढ़िवादी और संकीर्ण सोच वाले ससुराल पक्ष ने शादी से ठीक एक हफ्ते पहले रिश्ता यह कहकर तोड़ दिया कि ‘जिस लड़की के कदम घर में पड़ते ही सगा भाई चल बसा, वह हमारे खानदान के लिए कुलच्छणी साबित होगी।’
एक तरफ भाई के बिछड़ने का असहनीय सदमा और दूसरी तरफ समाज का वह तीखा ताना—आरुषि का वजूद बिखर चुका था। उसकी विधवा मां कल्याणी देवी खुद अंदर से टूट चुकी थीं। पति पहले ही नहीं रहे थे, बेटा देश और समंदर की सेवा करते हुए असमय विदा हो गया, और अब जवान बेटी की यह हालत। कल्याणी देवी रोज भगवान के आगे हाथ जोड़कर यही मनाती थीं कि उनकी बेटी के चेहरे पर एक बार फिर पहले जैसी हंसी लौट आए।
ऐसे अंधेरे दौर में नैना ही थी जो आरुषि के इर्द-गिर्द साए की तरह मौजूद रहती थी। वह हर रोज कोई न कोई बहाना बनाकर उसे घर से बाहर निकालने की कोशिश करती। कभी मंदिर, कभी पार्क, तो कभी किसी बहाने से बाजार। दोनों की दोस्ती स्कूल के दिनों से थी, जहां एक का सुख दूसरे का आनंद और एक का दर्द दूसरे की तड़प बन जाता था।
सदर बाजार की संकरी गलियों में त्योहारों की गहमागहमी शुरू हो चुकी थी। रक्षाबंधन का पर्व सिर पर था, इसलिए हर तरफ रंग-बिरंगे स्टॉल सजे हुए थे। नैना आरुषि का हाथ मजबूती से थामे भीड़ से बचाते हुए एक सजी-धजी दुकान के सामने रुकी। दुकान के बोर्ड पर लिखा था—’हस्तशिल्प और परिधान।’
काउंटर पर रोहन का दोस्त समर खड़ा था। समर और रोहन ने मिलकर यह नई शुरुआत की थी। समर की उम्र लगभग देवांश जितनी ही रही होगी—चेहरे पर सादगी, आंखों में कुछ नया कर गुजरने की चमक और व्यवहार में गजब का ठहराव।
जैसे ही नैना ने दुकान में कदम रखा, समर ने हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए स्वागत किया, “अरे दीदी, प्रणाम! रोहन अभी बैंक के काम से गया है, पर उसने कहा था कि आप आने वाली हैं। आइए, बैठिए। क्या दिखाऊं आपको?”
नैना ने मुस्कुराकर कहा, “समर, बधाई हो नई दुकान की। पहले तो दो अच्छे चिकनकारी के कुर्ते दिखा दो और हां, कुछ सूती दुपट्टे भी।”
समर तेजी से अलमारियों से कपड़े निकालकर दिखाने लगा। वह कपड़ों की बनावट और रंगों के बारे में बहुत प्यार से समझा रहा था। नैना सामान देखने में व्यस्त हो गई, जबकि आरुषि चुपचाप काउंटर के कोने पर नजरें झुकाए बैठी थी। उसकी आंखें शून्य में ताक रही थीं।
सामान पैक करते हुए समर ने अचानक कहा, “दीदी, हमने इस बार राजस्थान और गुजरात के कारीगरों से खास रेशमी धागों वाली राखियां मंगवाई हैं। एकदम शुद्ध रेशम और चंदन की खुशबू वाली। बाजार में ऐसी डिजाइन कहीं नहीं मिलेगी। आप भी देख लीजिए, भाई के लिए पसंद कर लीजिए।”
नैना के माथे पर अचानक पसीने की बूंदें छलक आईं। उसने घबराकर अपनी नजरें उठाईं और समर को चुप रहने का इशारा करते हुए धीमे स्वर में बोली, “नहीं समर, रहने दो। हमें राखी नहीं चाहिए। तुम बस बिल बना दो।”
लेकिन समर अपनी नई दुकान के उत्साह में इतना मग्न था कि वह नैना की आंखों की घबराहट को भांप नहीं पाया। उसने काउंटर के नीचे से एक बेहद खूबसूरत मखमली डिब्बी निकाली और आरुषि के सामने रखते हुए बहुत आत्मीयता से बोला, “दीदी, एक बार आप तो देख लीजिए। यह वाली देखिए, इसमें बीच में बारीक चांदी के तारों से ‘वीर’ गढ़ा हुआ है। जब यह आपके भाई की कलाई पर सजेगी, तो वह सच में बहुत खुश हो जाएंगे। बहन का प्यार तो सबसे अनमोल होता है न!”
‘कलाई’ और ‘भाई’—ये दो शब्द जैसे ही आरुषि के कानों में पड़े, उसके भीतर एक भयंकर भूकंप सा आया। उसकी आंखों के सामने देवांश की वह अंतिम तस्वीर कौंध गई, जब अस्पताल के ठंडे कमरे में उसने अपने भाई की बेजान कलाई को छूकर रोते हुए कहा था कि ‘तू राखी बंधवाने क्यों नहीं आया रे?’
आरुषि का सांस लेना दूभर होने लगा। उसका पूरा शरीर कांप उठा। उसने अपनी दोनों हथेलियों से कसकर अपने कान दबा लिए ताकि कोई दूसरा शब्द उसके भीतर न उतर सके। उसकी सूनी आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। बिना कुछ कहे, बिना नैना की तरफ देखे, वह बदहवास होकर दुकान के बाहर भागी और तेज कदमों से घर की दिशा में चल पड़ी।
समर एकदम सन्न रह गया। उसके हाथ में वह मखमली डिब्बी वैसे ही धरी रह गई। उसने सहमते हुए नैना की ओर देखा, उसकी आवाज लड़खड़ा रही थी, “दीदी… मुझसे कोई गलती हो गई क्या? मैंने तो सिर्फ राखी देखने को कहा था… वो ऐसे रोते हुए क्यों चली गईं?”
नैना की आंखों से भी आंसू छलक पड़े। उसने एक गहरा दर्द भरा सांस लिया और भारी आवाज में बोली, “तुम्हारी कोई गलती नहीं है समर। गलती मेरी है, जो मैं उसे यहां खींच लाई। जिस भाई की कलाई पर राखी बांधने की तुम बात कर रहे थे, वह भाई अब इस दुनिया में नहीं है।”
समर की आंखें फटी की फटी रह गईं, “क्या हुआ था उनके साथ?”
नैना ने आंसुओं को पोंछते हुए बताया, “आरुषि का इकलौता छोटा भाई था देवांश। बिल्कुल तुम्हारी ही उम्र का। नेवी में था। आरुषि ने अपनी शादी से पहले आखिरी बार राखी बंधवाने के लिए उससे घर आने की जिद की थी। भाई अपनी बहन की खातिर आ रहा था, पर रास्ते में हादसे का शिकार हो गया। वह लौटा, पर कफन में। तब से आरुषि ने हंसना छोड़ दिया। वह खुद को भाई की मौत का कसूरवार मानती है। ऊपर से जिस घर में उसकी डोली उठने वाली थी, उन्होंने उसे मनहूस कहकर रिश्ता तोड़ दिया। तब से ‘राखी’ और ‘भाई’ शब्द उसके कलेजे पर तीर की तरह चुभते हैं।”
इतना कहकर नैना ने जल्दी से सामान के पैसे काउंटर पर रखे और तेजी से आरुषि के पीछे भागी ताकि उसे अकेले में कुछ अनहोनी न हो जाए।
दुकान में अकेला खड़ा समर उस मखमली डिब्बी को देख रहा था। उसके दिल में एक अजीब सी टीस उठी। उसे लगा कि अनजाने में ही सही, उसने एक दुखी बहन के सबसे गहरे जख्म को कुरेद दिया था। वह देर तक उसी जगह गुमसुम खड़ा रहा।
दो दिन बाद रक्षाबंधन का पावन दिन आया। पूरे शहर में एक उत्सव का माहौल था। बहनें नई साड़ियां पहनकर, थालियां सजाए अपने भाइयों के घरों की ओर जा रही थीं। लेकिन कल्याणी देवी के घर में मातम जैसा सन्नाटा पसरा था।
आरुषि ने सुबह से अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर रखा था। वह जमीन पर बैठी देवांश की वर्दी की एक पुरानी तस्वीर को सीने से लगाए सुबक रही थी। मां कल्याणी देवी बाहर चौखट पर बैठी बेबसी के आंसू बहा रही थीं। उन्होंने कितनी बार दरवाजा खटखटाया, “बेटी आरुषि, दरवाजा खोल दे। खुद को इस तरह सजा मत दे। जो चला गया, वह तेरी यह हालत देखकर ऊपर भी तड़प रहा होगा।” लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आई।
कल्याणी देवी ने कांपते हाथों से फोन उठाया और नैना को बुलाया। नैना भी कुछ ही देर में दौड़ी चली आई। दोनों मिलकर दरवाजा पीटने लगीं, पर आरुषि ने कोई उत्तर नहीं दिया।
तभी मुख्य दरवाजे पर किसी ने हल्की दस्तक दी। कल्याणी देवी ने पल्लू से अपनी आंखें पोंछीं और लड़खड़ाते कदमों से जाकर दरवाजा खोला।
सामने समर खड़ा था। उसके कुर्ते की आस्तीनें मुड़ी हुई थीं, बाल बिखरे थे और चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता और संकोच था। उसके हाथ में एक छोटी सी रेशमी थैली थी।
कल्याणी देवी ने उसे पहचानते हुए अचरज से पूछा, “बेटा, तुम कौन हो? यहां किससे मिलना है?”
समर ने अत्यंत आदर से सिर झुकाया और बोला, “मां जी, मैं सदर बाजार वाली दुकान से आया हूं। दीदी उस दिन दुकान पर अपनी एक अमानत भूल आई थीं। बस वही लौटाने आया हूं।”
कल्याणी देवी ने खिड़की की ओर मुंह करके भारी मन से पुकारा, “आरुषि, देख बेटा, दुकान से कोई लड़का आया है। कह रहा है तू कुछ भूल आई थी। खोल दे दरवाजा।”
शायद ‘अमानत’ शब्द सुनकर या मां की लगातार गुहार देखकर, अंदर से कुंडी खुलने की हल्की सी आवाज आई। आरुषि ने दरवाजा आधा खोला। उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था, आंखें सूजी हुई थीं और होंठ सूखे थे।
उसने रूखी और टूटी आवाज में कहा, “मैंने तो वहां कुछ खरीदा ही नहीं था। फिर मैं क्या भूल आई? मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं है, तुम वापस जाओ।”
समर एक कदम आगे बढ़ा। उसने अपने कांपते हाथों से उस रेशमी थैली में से वही ‘वीर’ लिखी हुई रेशमी राखी निकाली।
आरुषि जैसे ही उस राखी को देखकर फिर से पीछे हटने लगी, समर ने अपनी दाईं कलाई उसके आगे फैला दी। उसकी आंखों में आंसुओं की एक पतली लकीर उतर आई थी।
समर ने बेहद रुंधे हुए गले से कहा, “दीदी, उस दिन अनजाने में मैंने आपके दिल को जो चोट पहुंचाई, उसके लिए मैं जिंदगी भर शर्मिंदा रहूंगा। लेकिन आज जब पूरी दुनिया में बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र की दुआ मांग रही हैं, तो क्या इस अभागे भाई की कलाई सूनी ही रहेगी? मेरा इस शहर में कोई परिवार नहीं है दीदी, मां-बाप गांव में हैं और मेरी कोई सगी बहन नहीं है। अगर आपका भाई सरहद पर या समंदर में नहीं लौट सका, तो क्या वह अपने पीछे अपनी इस बहन को हमेशा के लिए बेसहारा रोने के लिए छोड़ गया है? क्या आप अपने इस छोटे भाई की कलाई पर यह धागा नहीं बांधेंगी?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। आरुषि की नजरें समर की खुली कलाई और उसकी भीगी आंखों पर टिक गईं। उसे उस अनजान लड़के के चेहरे में एक पल के लिए देवांश का वही भोलापन, वही मनुहार और वही अपनापन नजर आया जो कभी उसके आंगन की जान हुआ करता था।
आरुषि के हाथ अपने आप उठे। उसकी बरसों से जमी हुई बर्फ जैसे पिघलने लगी। वह फूट-फूट कर रो पड़ी, लेकिन इस बार का रोना घुटन का नहीं, बल्कि मन के सारे बोझ के बह जाने का था।
उसने कांपते हाथों से वह रेशमी धागा उठाया और समर की कलाई पर बांध दिया। कल्याणी देवी ने रोते हुए दोनों के सिर पर हाथ रख दिया और बोलीं, “हे ईश्वर! तूने आज मेरे बेटे देवांश का रूप भेजकर मेरी बच्ची की उजड़ी दुनिया में फिर से प्राण फूंक दिए।”
नैना ने तुरंत पूजा की थाली लाकर आरुषि के हाथों में थमा दी। आरुषि ने समर के माथे पर कुमकुम और अक्षत का तिलक लगाया और मिठाई का एक छोटा सा टुकड़ा उसके मुंह में डाला। समर ने झुककर आरुषि के पैर छुए और बोला, “दीदी, जिंदगी जब तक रहेगी, आपका यह भाई हर सुख-दुख में आपके साथ एक ढाल बनकर खड़ा रहेगा। अब आपको कभी उदास होने की जरूरत नहीं है।”
उस दिन उस घर की चौखट से सिर्फ एक त्योहार नहीं गुजरा था, बल्कि रिश्तों की एक नई इबारत लिखी गई थी। खून के रिश्ते भले ही कुदरत बनाती है, लेकिन संवेदना और आत्मीयता से जुड़े रिश्ते कभी-कभी आत्मा के घावों को हमेशा के लिए भर देते हैं। आरुषि के चेहरे पर डेढ़ साल बाद जो हल्की सी मुस्कान लौटी थी, वह इस बात की गवाही दे रही थी कि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा हो, उम्मीद का एक सच्चा धागा नई सुबह लेकर ही आता है।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि खून के रिश्तों से बढ़कर इंसानियत और आत्मीयता के रिश्ते होते हैं जो टूटे हुए दिलों को दोबारा जोड़ सकते हैं? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका
डॉ. अनुपमा श्रीवास्तवा
मुजफ्फरपुर, बिहार