राघव के इस पवित्र और निष्कलंक त्याग को देखकर वहां खड़े हर एक शख्स का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। समर के पिता समान ताऊ जी आगे बढ़े और उन्होंने राघव को सीने से लगा लिया। रिश्तेदारों ने एक सुर में इस रिश्ते को अपनी मूक सहमति और आशीर्वाद दिया। इसके बाद पूरे राजकीय सम्मान के साथ समर का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। राघव ने अपने हाथों से समर की चिता को मुखाग्नि दी, मानों उसने अपने भीतर के हर स्वार्थ को भी उसी अग्नि में हमेशा के लिए होम कर दिया हो।
राघव अपने घर के बरामदे में बैठा फाइलों को समेट ही रहा था कि अचानक ड्राइंग रूम से उसकी छोटी बहन पलक की कांपती हुई चीख गूंज उठी। राघव भैया, जल्दी बाहर आओ, टीवी पर देखो क्या दिखा रहे हैं। पलक की आवाज में घबराहट और आंसुओं का मिलाजुला कंपन था। राघव के हाथ से कलम छूटकर फर्श पर गिर पड़ी। वह तेजी से कमरे के भीतर लपका। टीवी स्क्रीन की लाल पट्टी पर चमकते अक्षर किसी खंजर की तरह उसकी आंखों में उतर गए—कश्मीर की बर्फीली घाटी में उग्रवादियों से लोहा लेते हुए भारतीय सेना के कैप्टन समर वर्मा देश के लिए बलिदान हो गए।
उस एक पल में मानों पूरा कमरा घूमने लगा। राघव के पैरों तले की जमीन खिसक गई और कानों में लगातार एक तीखी सी सनसनाहट गूंजने लगी। समर… उसका सबसे अज़ीज़ दोस्त, उसका साया, उसका भाई। केवल सात महीने ही तो बीते थे जब समर छुट्टी पर आया था। चेहरे पर गजब का नूर और आंखों में आने वाले कल के हसीन सपने सजाए वह राघव के गले लगकर पागलों की तरह हंस रहा था। उसने मोहल्ले के एक-एक घर में दौड़कर अपने हाथों से काजू की कतली बांटी थी और सीना तानकर कहा था कि वह पिता बनने वाला है। अपनी गर्भवती पत्नी तन्वी के बालों को सहलाते हुए उसने जाने से पहले वचन दिया था कि जब नन्हा मेहमान इस दुनिया में कदम रखेगा, तो वह खुद सामने खड़ा होकर उसे अपनी बाहों में उठाएगा।
बचपन की गलियों से लेकर कॉलेज के हर मोड़ तक, राघव और समर के बीच कोई पर्दा नहीं था। दोनों अलग-अलग माताओं की कोख से जरूर जन्मे थे, मगर उनका रिश्ता खून के रिश्तों से भी कहीं अधिक गाढ़ा था। पूरे शहर में मिसाल दी जाती थी कि अगर यारी देखनी हो तो राघव और समर की देखो। पर अब यादों के समंदर में डूबने का वक्त बिल्कुल नहीं था। राघव को याद आया कि समर के घर में सिर्फ उसकी बुजुर्ग मां कल्याणी देवी और आठ महीने के गर्भ से जूझ रही तन्वी अकेली हैं।
राघव ने बिना एक पल गंवाए अपनी गाड़ी निकाली और समर के घर की ओर दौड़ पड़ा। मोहल्ले के मुहाने पर ही सन्नाटा पसरा था और दरवाजे पर लोगों का भारी हुजूम जमा हो चुका था। आंगन में कदम रखते ही जो मंजर दिखा, उसने राघव के कलेजे को छलनी कर दिया। कल्याणी देवी छाती पीट-पीटकर रो रही थीं। बुढ़ापे की इकलौती लाठी इस बेरहमी से टूट जाएगी, यह उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। सफेद पड़ चुके चेहरे और बिखरे बालों के साथ तन्वी बदहवास हालत में फर्श पर बैठी दीवारों को घूर रही थी। जैसे ही तन्वी की नजर राघव पर पड़ी, उसका बांध टूट गया। वह बेतहाशा चीखती हुई आगे बढ़ी, अपनी हरी चूड़ियां पत्थर की चौखट पर दे मारीं और फिर एक भारी हिचकी के साथ बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी।
राघव ने दौड़कर तन्वी का सिर अपनी गोद में थामा और आवाज लगाकर पड़ोसियों की मदद से उसे सोफे पर लिटाया। तुरंत मोहल्ले के जाने-माने डॉक्टर को बुलवाया गया। डॉक्टर ने तन्वी की नब्ज जांची और घबराते हुए कहा कि सदमा इतना गहरा है कि गर्भ में पल रहे शिशु की धड़कनें गिरने लगी हैं और प्रसव पीड़ा समय से पहले ही शुरू हो चुकी है। बिना एक भी पल गंवाए तन्वी को पास के जीवनरेखा अस्पताल ले जाया गया।
अस्पताल के आपातकालीन कक्ष की तेज सफेद बत्तियां और मशीनों की लगातार बीप दिल की घड़कनों को और बढ़ा रही थीं। वरिष्ठ सर्जन बाहर आए और उनके चेहरे पर भारी तनाव था। उन्होंने राघव को एक तरफ ले जाकर दो टूक शब्दों में कहा कि मरीज की हालत बहुत नाजुक है, सामान्य प्रसव मुमकिन नहीं है, फौरन बड़ा ऑपरेशन करना होगा। डॉक्टर ने कागजातों की फाइल आगे बढ़ाते हुए कहा कि कानूनी तौर पर इस आपात स्थिति में पति या किसी बहुत करीबी अभिभावक के हस्ताक्षर तुरंत चाहिए, वरना जच्चा और बच्चा दोनों की जान खतरे में पड़ सकती है।
राघव के हाथ कांप गए। समर अब इस दुनिया में नहीं था, मां कल्याणी देवी खुद सदमे से बेसुध आईसीयू के बाहर बैठी थीं। अगर कागजों पर दस्तखत के लिए औपचारिकताएं तलाशी जातीं, तो शायद आने वाले कुछ ही मिनटों में सब कुछ तबाह हो जाता। राघव ने अपनी आंखें बंद कीं। बंद पलकों के पीछे उसे समर की खिलखिलाती हुई सूरत दिखाई दी, जो कह रही थी कि मेरे परिवार को संभालना यार। राघव ने गहरी सांस ली, पेन उठाया और खुद को अभिभावक के तौर पर दर्ज करते हुए दस्तखत कर दिए।
लगभग डेढ़ घंटे के भयानक इंतजार के बाद ऑपरेशन थिएटर का लाल बल्ब बुझा। बाहर आई नर्स की गोद में एक नन्ही सी कली लिपटी हुई थी। उस नन्हीं जान के रोने की आवाज ने अस्पताल के उस उदास गलियारे में नई जिंदगी की खुशबू घोल दी। बच्ची बिल्कुल अपने पिता समर की प्रतिछाया लग रही थी। कल्याणी देवी ने कांपते हाथों से अपनी पोती का माथा चूमा और राघव के दोनों हाथ पकड़कर फफक पड़ीं कि अगर आज वह न होता, तो शायद यह वंश यहीं खत्म हो जाता।
जब तन्वी को होश आया, तो मां ने रोते हुए उसे सारी बात बताई कि कैसे राघव ने वक्त पर ढाल बनकर दोनों की सांसें बचा लीं। तन्वी ने पलंग से ही हाथ जोड़ लिए। उसकी आंखों से बहते आंसुओं में कृतज्ञता का समंदर उमड़ रहा था। राघव ने झुककर तन्वी के सिर पर बड़े भाई जैसा हाथ रखा और कहा कि समर कहीं नहीं गया, वह इस बच्ची की मुस्कान में हमेशा जिंदा रहेगा।
अगले दिन सुबह होते ही समर का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर शहर पहुंचा। पूरी फिजा भारत माता की जय और कैप्टन समर अमर रहे के नारों से गूंज उठी। सेना के जवानों ने मातमी धुन बजाकर सलामी दी। राघव ने अपने कांपते कंधों पर अपने यार की अर्थी उठाई। श्मशान घाट पर रिश्तेदारों, सेना के अधिकारियों और शहर भर के लोगों का सैलाब उमड़ा हुआ था। हर कोई उस मासूम बच्ची और बेसहारा विधवा तन्वी को देखकर आंसू बहा रहा था। समाज के कुछ लोग फुसफुसाने लगे थे कि अब इस अभागन का क्या होगा, इतनी कम उम्र में पूरी जिंदगी कैसे कटेगी, समाज के ताने इस औरत को जीने नहीं देंगे।
राघव समर के ताबूत के पास घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपने दोस्त के माथे पर हाथ रखा और बेहद शांत आवाज में कहा कि समर, हमने हर सुख-दुख साथ बांटा है, आज से तेरी यह अधूरी जिम्मेदारी भी मेरी हुई। तूने सरहद पर अपनी जान देकर वतन का मान रखा, मैं इस दहलीज पर तेरी इज्जत का मान रखूंगा। राघव खड़ा हुआ। उसने अपनी जेब से एक छोटा सा धारदार चाकू निकाला और बिना किसी हिचक के अपनी अनामिका उंगली पर एक गहरा चीरा लगा दिया। उंगली से लाल लहू की बूंदें फूट पड़ीं।
वहां मौजूद लोगों की सांसें थम गईं। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, राघव ने आगे बढ़कर तन्वी के सिर पर रखी चादर को थोड़ा पीछे किया और अपनी उंगली के खून से उसकी मांग में एक लाल लकीर खींच दी। श्मशान घाट के सन्नाटे में मानों बिजली कौंध गई। रिश्तेदारों की आंखें फटी रह गईं, बुजुर्ग सन्न रह गए।
तन्वी कांप उठी। राघव ने अपनी भीगी आंखों से तन्वी की ओर देखा और हाथ जोड़कर बेहद साफ और बुलंद आवाज में कहा, भाभी, मुझे अपना गुनहगार मत समझना। आज इस भरी सभा में और समर के सामने मैं यह ऐलान करता हूं कि यह रिश्ता केवल एक सामाजिक सुरक्षा का कवच है, दैहिक नहीं। यह मांग मैंने किसी अधिकार के लिए नहीं, बल्कि समर की अमानत को समाज की गिद्ध नजरों से बचाने के लिए भरी है। आप कल भी समर की थीं, आज भी समर की हैं और ताउम्र उसी की अर्धांगिनी रहेंगी। मेरा घर, मेरी दौलत और मेरा हर कतरा आपकी और इस नन्ही गुड़िया की हिफाजत के लिए हाजिर रहेगा, पर मैं हमेशा आपका वही देवर और इस बच्ची का ताऊ बनकर रहूंगा।
राघव के इस पवित्र और निष्कलंक त्याग को देखकर वहां खड़े हर एक शख्स का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। समर के पिता समान ताऊ जी आगे बढ़े और उन्होंने राघव को सीने से लगा लिया। रिश्तेदारों ने एक सुर में इस रिश्ते को अपनी मूक सहमति और आशीर्वाद दिया। इसके बाद पूरे राजकीय सम्मान के साथ समर का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। राघव ने अपने हाथों से समर की चिता को मुखाग्नि दी, मानों उसने अपने भीतर के हर स्वार्थ को भी उसी अग्नि में हमेशा के लिए होम कर दिया हो।
दिन बीतते गए और समय के मरहम ने जख्मों को भरना शुरू किया। राघव ने अपनी कही एक-एक बात को पत्थर की लकीर साबित किया। उसने जबलपुर की मुख्य सड़क के किनारे वाले हिस्से में तन्वी के नाम से एक सुंदर बुटीक और लाइब्रेरी शुरू करवाई, ताकि वह आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सके और अपने पैरों पर खड़ी रहे। नन्ही नव्या अब घुटनों के बल चलने लगी थी। जब भी वह राघव को दफ्तर से लौटते देखती, अपनी तोतली जुबान में ताऊ-ताऊ कहकर दौड़ पड़ती।
कल्याणी देवी के चेहरे पर अब निराशा की जगह एक संतोष भरी चमक लौट आई थी। उन्होंने देखा कि समाज के जिन नियमों को लोग अक्सर पाखंड की चादर बना लेते हैं, राघव ने उसी समाज के बीच एक स्त्री के आत्मसम्मान और अपने दोस्त के वचन की ऐसी अनूठी मिसाल कायम कर दी थी, जिसे देखकर हर कोई नतमस्तक हो जाता। तन्वी ने भी अपने भीतर की पीड़ा को शक्ति में बदल दिया था। वह जानती थी कि उसके सिर पर जो सिंदूर सजा है, वह किसी साधारण बंधन का नहीं, बल्कि त्याग, निष्ठा और सच्ची इंसानियत की वह ढाल है, जिसने उसके परिवार को बिखरने से बचा लिया। जब शाम को घर के आंगन में नव्या की हंसी गूंजती, तो दूर दीवार पर टंगी समर की तस्वीर के होंठों पर भी एक निश्चल मुस्कान खिल उठती थी।
दोस्तों, क्या आज के दौर में जब रिश्ते छोटी-छोटी बातों पर टूट जाते हैं, राघव जैसा निस्वार्थ त्याग और दोस्ती का ऐसा अटूट फर्ज निभाना हर किसी के बस की बात है? विशाल दिल वाले राघव के इस ऐतिहासिक फैसले पर आपकी क्या राय है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका :भावना ठाकर ‘भावु’ बेंगलोर