रेत का महल

 मोहिनी की आँखों में अब आँसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी तीखी ज्वाला थी जो किसी भी पाखंडी को जलाकर भस्म कर सकती थी। उसने अपने होंठों पर एक कड़वी मुस्कान लाई और बहुत ही शांत, पर बर्फ जैसी ठंडी आवाज में कहा, “हाँ कैप्टन मानवेंद्र, मैं ही हूँ। मैं तुम्हें जन्मदिन का सरप्राइज देने आई थी, लेकिन किस्मत देखिए कि असली सरप्राइज मुझे मिल गया। अगर अपनी इस हँसती-खेलती पारिवारिक दुनिया का तमाशा नहीं देखना चाहते, तो आज के बाद अपनी यह गंदी और घिनौनी शक्ल मुझे कभी मत दिखाना।”

कच्ची नालियों से उठती सड़ांध और तंग गलियों के शोर के बीच खड़ा वह छोटा सा दो कमरों का मकान मोहिनी के लिए किसी कैदखाने से कम नहीं था। पिता रामसेवक एक स्थानीय कपड़ा मिल में साधारण दरबान की नौकरी करते थे, जिनकी पूरी जिंदगी सायरन की आवाज़ पर आते-जाते बीत गई थी। माँ जानकी देवी मोहल्ले के संपन्न घरों में सुबह-शाम झाड़ू-पोंछा करके दो वक्त के चूल्हे का इंतज़ाम करती थीं। परिवार में मोहिनी सबसे बड़ी थी, और उसके पीछे दो छोटे भाई-बहन थे जिनकी पढ़ाई की किताबें भी आधी अधूरी ही जुटा पाती थीं।

गरीबी के इस स्याह पर्दे के पीछे प्रकृति ने मोहिनी को बला का रूप दिया था। तीखे नैन-नक्श, छरहरा बदन और कजरारी आँखें जब भी मोहल्ले के नुक्कड़ से गुजरतीं, तो साइकिलों की घंटी बजना बंद हो जाती थी। आवारा लड़कों की फब्तियाँ और सीटी की आवाज़ें शुरुआत में तो मोहिनी के भीतर आग लगा देती थीं, लेकिन समय के साथ वह इन सबकी आदी हो गई। उसे लगने लगा कि उसका यह रूप इस धूल-धूसरित कस्बे में सड़ने के लिए नहीं बना है। पिता की खाँसती हुई लाचारी और माँ की फटी हुई साड़ियाँ देखकर उसके मन में एक ही ख़याल बार-बार कौंधता कि अगर वह यहीं रही, तो किसी शराबी मजदूर या चपरासी के पल्ले बाँध दी जाएगी और उसकी पूरी जवानी चूल्हा फूंकते हुए बीत जाएगी।

उसी कस्बे के पास रहने वाला मयंक अक्सर रंगीन कपड़े पहनकर आता था। मयंक गुड़गांव की एक कॉल सेंटर कंपनी में काम करता था और जब भी छुट्टी पर घर लौटता, तो शहर की चौड़ी सड़कों, मॉल और क्लबों की बातें बढ़ा-चढ़ाकर सुनाता। मोहिनी की खूबसूरती पर मयंक की नज़र पहले से थी। धीरे-धीरे बातों का सिलसिला बढ़ा और मोहिनी को मयंक में अपने उस दलदल से निकलने की सीढ़ी दिखने लगी। मयंक ने एक दिन उसका हाथ थामकर कहा, “मोहिनी, तुम इस कस्बे के लिए नहीं बनी हो। मेरे साथ चलो, हम शहर में शादी कर लेंगे। वहाँ तुम कोई अच्छा सा कोर्स कर लेना, कोई बढ़िया काम ढूँढ लेना। हम अपनी अलग दुनिया बसाएँगे।”

मोहिनी के सपनों को जैसे पंख लग गए। एक सर्द रात, जब पूरा घर गहरी नींद में सोया था, उसने माँ के बक्से में रखे बचत के चंद हज़ार रुपये चुराए और चुपचाप घर की देहरी लांघ गई। उसने पीछे मुड़कर उन बूढ़े माँ-बाप के आँसुओं के बारे में नहीं सोचा जो सुबह उठकर समाज के तानों से बिखरने वाले थे।

शुरुआत में गुड़गांव की ऊँची इमारतें और मयंक का साथ किसी परियों की कहानी जैसा लगा। लेकिन हकीकत की जमीन बहुत सख्त होती है। महीने भर के भीतर ही कमरे का किराया, राशन और बाहर खाने-पीने के खर्चों ने मयंक की जेब खाली कर दी। जब जेब का पैसा खत्म हुआ, तो वह तथाकथित प्यार भी हवा होने लगा। दोनों के बीच रोज-रोज की चिकचिक शुरू हो गई। मयंक अक्सर झल्लाने लगा कि मोहिनी का खर्च उठाना उसके बस की बात नहीं है।

मोहिनी को समझ आ गया कि इस शहर में टिके रहने के लिए पैसों की सबसे ज्यादा जरूरत है। एक शाम मयंक उसे अपने एक परिचित हर्षित से मिलवाने ले गया। हर्षित एक उभरती हुई डिजिटल मीडिया और कास्टिंग एजेंसी चलाता था। उसने जब मोहिनी को देखा, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक दौड़ गई। उसने मोहिनी की तारीफों के पुल बाँध दिए और उसे छोटे-मोटे विज्ञापनों में साइड रोल और मॉडलिंग के असाइनमेंट दिलाने का वादा किया। हर्षित की चिकनी-चुपड़ी बातें और उसके ठाठ-बाट मोहिनी को अपनी ओर खींचने लगे। मोहिनी को लगा कि मयंक की हैसियत बहुत छोटी है और हर्षित उसे बड़े मुकाम तक ले जा सकता है। एक दिन जब मयंक अपने बीमार माता-पिता से मिलने कस्बे गया, तो मोहिनी ने बिना किसी हिचकिचाहट के मयंक का घर छोड़ दिया और हर्षित के साथ सपनों की नगरी मुंबई के लिए ट्रेन पकड़ ली।

मुंबई की चमक-दमक ने मोहिनी की आँखें चौंधिया दीं। हर्षित उसे अंधेरी के एक छोटे से फ्लैट में ले गया। हर्षित मोहिनी के रूप और आकर्षण को भुनाना जानता था। वह उसे अलग-अलग प्रोडक्शन हाउस में ले जाता, जहाँ मोहिनी को अपनी गरिमा और आत्मसम्मान से कई छोटे-बड़े समझौते करने पड़ते थे। काम पाने की भूख में मोहिनी उन समझौतों को ‘कैरियर की सीढ़ी’ समझकर स्वीकार करती चली गई।

उसी दौरान एक फैशन मैगज़ीन के दफ्तर में उसकी मुलाकात विक्रांत से हुई। विक्रांत एक जाने-माने सेलिब्रिटी फोटोग्राफर थे, जिनकी पहुँच फिल्म इंडस्ट्री के बड़े निर्देशकों तक थी। विक्रांत ने मोहिनी से कहा, “तुम गलत हाथों में हो। हर्षित तुम्हें सिर्फ छोटे विज्ञापनों में खपा देगा। मेरे साथ आओ, मैं तुम्हारा हाई-प्रोफाइल पोर्टफोलियो बनाऊँगा और तुम्हें सीधे मुख्यधारा के फैशन जगत में उतारूँगा।” मोहिनी ने एक पल भी नहीं गंवाया; उसने हर्षित का हाथ झटका और विक्रांत के लग्जरी अपार्टमेंट में अपनी जगह बना ली।

विक्रांत के कैमरे ने मोहिनी के हुस्न को नया तराश दिया। बड़े-बड़े बिलबोर्ड्स और फैशन वीक के रैंप पर अब मोहिनी का नाम चमकने लगा था। वह अब एक साधारण कस्बे की लड़की नहीं, बल्कि ग्लैमर जगत की जानी-मानी मॉडल बन चुकी थी। महँगी गाड़ियाँ, डिज़ाइनर कपड़े और पपराज़ी की चमक उसके इर्द-गिर्द घूमने लगी। लेकिन इस शोहरत के बीच, जब रात को शराब और संगीत का नशा उतरता, तो मोहिनी का अकेलापन उसे डराने लगता। वह विक्रांत से एक स्थिर रिश्ते और शादी की बात करने लगी।

एक दिन जब उसने शादी का प्रस्ताव रखा, तो विक्रांत ने सिगरेट का धुआँ उड़ाते हुए हिकारत से हँसकर कहा, “शादी? मोहिनी, तुम होश में तो हो? अपने कैरियर के इतने बड़े मुकाम पर पहुँचकर घरेलू औरत बनने का भूत कहाँ से सवार हो गया? जैसा चल रहा है चलने दो, फालतू के पचड़ों में पड़ने की जरूरत नहीं है।” विक्रांत के इस ठंडे जवाब ने मोहिनी के अंदर एक गहरा जख्म छोड़ दिया।

उसी दौरान एक बहुत बड़े ज्वैलरी ब्रांड के मेगा कैंपेन का मुख्य चेहरा बनने का मौका मोहिनी को मिला। इस ब्रांड के मालिक थे हर्षवर्धन। हर्षवर्धन चालीस पार कर चुके एक बेहद रईस और प्रभावशाली व्यापारी थे। वे शादीशुदा थे और बाल-बच्चेदार थे, लेकिन मोहिनी की खूबसूरती ने उन्हें पूरी तरह अपने वश में कर लिया। हर्षवर्धन ने मोहिनी को वर्ली के सी-फेसिंग टॉवर में एक आलीशान चार कमरों का पेंटहाउस खरीदकर दे दिया। नौकर-चाकर, महँगे गहने और बैंक बैलेंस की कोई कमी नहीं रही। मोहिनी ने सोचा कि शायद यही उसकी मंजिल है। उसने विक्रांत को भी अलविदा कह दिया और हर्षवर्धन की छत्रछाया में आ गई। हर्षवर्धन मोहिनी की हर भौतिक जरूरत पूरी करते थे, लेकिन जब भी समाज में नाम या शादी की बात आती, वे साफ कह देते कि वे अपने परिवार और प्रतिष्ठा को कभी दांव पर नहीं लगाएंगे। मोहिनी समझ चुकी थी कि वह केवल एक सुनहरी पिंजरे की चिड़िया बनकर रह गई है।

कुछ महीनों बाद एक इंटरनेशनल कॉस्मेटिक ब्रांड के ग्लोबल शूट के सिलसिले में मोहिनी को बैंकॉक जाना पड़ा। उस इंटरनेशनल फ्लाइट का कैप्टन मानवेंद्र था। मानवेंद्र देखने में बेहद शालीन, पढ़ा-लिखा और सुलझा हुआ इंसान लगता था। उड़ान के दौरान उसने मोहिनी को पहचाना और बड़ी शालीनता से बात की। बैंकॉक के पाँच सितारा होटल में भी जब मोहिनी रुकी, तो मानवेंद्र से उसकी दोबारा मुलाकात लॉबी में हुई। मानवेंद्र ने मोहिनी के अकेलेपन को अपनी मीठी बातों और सहानुभूति से घेर लिया। मोहिनी, जो भावनात्मक रूप से बुरी तरह टूटी हुई थी, मानवेंद्र की बातों में आ गई।

मानवेंद्र ने उसे भरोसा दिलाया कि वह उससे सच्चा प्यार करता है और उसे इस खोखली दुनिया से निकालकर एक सम्मानजनक जिंदगी देना चाहता है। बैंकॉक के एक पुराने मंदिर में दोनों ने एक-दूसरे को माला पहनाकर शादी कर ली।

शादी के तुरंत बाद मानवेंद्र ने अपनी असली चाल चली। उसने कहा, “मोहिनी, अभी इस शादी को पूरी तरह गुप्त रखना होगा। अगर हर्षवर्धन को पता चला तो वह अपने रसूख से तुम्हारा कैरियर और मेरी नौकरी दोनों बर्बाद कर देगा। सही वक्त आने पर हम सब कुछ सार्वजनिक करेंगे।” मोहिनी ने उसकी बात मान ली। जब मोहिनी ने झिझकते हुए पूछा कि क्या उसे हर्षवर्धन के साथ रहने में आपत्ति नहीं होगी, तो मानवेंद्र ने बेहद चालाकी से कहा, “मुझे तुम पर पूरा भरोसा है, यह सब बस दिखावे का खेल है।” मोहिनी समझ नहीं पाई कि दोनों मर्द केवल अपनी-अपनी हवस और स्वार्थ के लिए उसे एक खिलौना समझ रहे थे।

दिन बीतते रहे। मोहिनी जब भी मानवेंद्र से रिश्ते को आधिकारिक करने या अपने परिवार से मिलवाने की ज़िद करती, वह कोई न कोई नया बहाना बनाकर बात टाल देता। एक शाम मानवेंद्र का जन्मदिन था। मोहिनी ने सोचा कि वह बिना बताए उसके शहर वाले फ्लैट पर जाकर उसे एक खूबसूरत सरप्राइज देगी। उसने एक महँगा तोहफा खरीदा और अपनी कार से मानवेंद्र के पते पर पहुँच गई।

अपार्टमेंट के बाहर लाइटें जल रही थीं और भीतर से हँसी-मजाक का शोर आ रहा था। मोहिनी ने आहिस्ता से दरवाजा धकेला। अंदर का दृश्य देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

हॉल के बीचों-बीच मानवेंद्र अपनी सजी-धजी पत्नी और छह साल के बेटे के साथ खड़ा था। उसके बूढ़े माता-पिता पास खड़े होकर तालियाँ बजा रहे थे और मानवेंद्र अपनी पत्नी के हाथ से केक खाकर उसे प्यार से गले लगा रहा था। मोहिनी का पूरा वजूद सुन्न पड़ गया। उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। वह किसी तरह खुद को संभालते हुए गैलरी के खंभे की ओट में खड़ी हो गई।

तभी बालकनी के पास मानवेंद्र अपने एक करीबी दोस्त समीर के साथ सिगरेट पीते हुए बात करने आया।

समीर ने हँसते हुए पूछा, “भाई, वो तेरी मॉडल मोहिनी का क्या हुआ? वो तो तेरे पीछे पागल थी।”

मानवेंद्र ने धुएँ का छल्ला उड़ाते हुए घिनौनी हँसी के साथ कहा, “अरे यार, ऐसी लड़कियाँ सिर्फ टाइमपास के लिए होती हैं। दो-चार मीठी बातें बोलो, थोड़ा इमोशनल ड्रामा करो और मजे लो। इनसे घर थोड़ी बसाया जाता है!”

समीर ने चौंक कर कहा, “पर तूने तो कहा था कि तूने बैंकॉक के मंदिर में उससे शादी की थी?”

मानवेंद्र ने ठहाका लगाया, “शादी? कैसी शादी भाई! एक अनजान विदेशी मंदिर में बिना किसी कानूनी गवाह या रजिस्ट्रेशन के माला पहना दी तो क्या शादी हो गई? उसका कोई वजूद नहीं है। वो तो बस एक खूबसूरत समझौता थी, जो अब खत्म होने की कगार पर है।”

मोहिनी के सीने में वर्षों से दबा हुआ सारा संयम एक झटके में टूट गया। वह दबे पाँव पीछे नहीं हटी, बल्कि उसने अपने आँसुओं को अपनी पलकों के भीतर ही पी लिया और पूरे स्वाभिमान के साथ उस हॉल के उजाले में निकलकर दोनों के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई।

मानवेंद्र की आँखों में जैसे खौफ उतर आया। उसके हाथ से सिगरेट की राख गिर गई। उसका चेहरा फक पड़ गया। “मो… मोहिनी? तुम… यहाँ?”

मोहिनी की आँखों में अब आँसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी तीखी ज्वाला थी जो किसी भी पाखंडी को जलाकर भस्म कर सकती थी। उसने अपने होंठों पर एक कड़वी मुस्कान लाई और बहुत ही शांत, पर बर्फ जैसी ठंडी आवाज में कहा, “हाँ कैप्टन मानवेंद्र, मैं ही हूँ। मैं तुम्हें जन्मदिन का सरप्राइज देने आई थी, लेकिन किस्मत देखिए कि असली सरप्राइज मुझे मिल गया। अगर अपनी इस हँसती-खेलती पारिवारिक दुनिया का तमाशा नहीं देखना चाहते, तो आज के बाद अपनी यह गंदी और घिनौनी शक्ल मुझे कभी मत दिखाना।”

इतना कहकर मोहिनी ने एक पल भी वहाँ गँवाए बिना अपनी एड़ी घुमाई और लिफ्ट की तरफ बढ़ गई।

उस रात जब वह अपने सी-फेसिंग पेंटहाउस के आलीशान बेडरूम में पहुँची, तो उसने आईने में खुद को देखा। हीरों के हार, महँगी सिल्क की गाउन और चेहरे पर लगा गाढ़ा मेकअप… लेकिन उस आईने में उसे वह मासूम मोहिनी कहीं नजर नहीं आई जो कभी अपने छोटे से कस्बे की छत पर तारों को देखकर एक साफ-सुथरे जीवन के सपने बुनती थी। उसने अपनी पूरी जवानी दूसरों की हवस का खिलौना बनकर और समझौते करते हुए गँवा दी थी। हर मोड़ पर उसे लगा कि अगला इंसान उसे सहारा देगा, लेकिन हर किसी ने केवल उसके जिस्म और रूप की बोली लगाई थी।

उस रात मोहिनी फूट-फूट कर रोई, लेकिन वह रोना उसकी कमजोरी का नहीं, बल्कि उसके भीतर के पुराने समझौते वाले जीवन के अंत का था। उसने उसी रात अपनी तकदीर का फैसला खुद करने की ठान ली।

अगले एक महीने के भीतर मोहिनी ने अपनी जिंदगी का रुख पूरी तरह बदल दिया। उसने अपने जितने भी पेंडिंग प्रोजेक्ट्स और विज्ञापन शूट्स थे, उन्हें दिन-रात एक करके पूरा किया। उसने वर्ली का वह फ्लैट, महँगी गाड़ियाँ और सारा फिजूल सामान बेचकर अपनी सारी पूँजी समेटी और बैंक खातों को सुरक्षित किया। हर्षवर्धन ने उसे रोकने की कोशिश की, धमकियाँ भी दीं, लेकिन मोहिनी ने साफ कह दिया कि अब वह किसी की दासी बनकर नहीं जिएगी।

और फिर एक शांत रात, बिना किसी को खबर किए, बिना किसी सोशल मीडिया पोस्ट के, उसने उस चकाचौंध से भरी मायानगरी को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

मोहिनी ने पहाड़ों की तलहटी में बसे एक शांत और खूबसूरत शहर में एक छोटा सा, लेकिन खुला और हवादार बगीचे वाला मकान खरीदा। उसने बरसों बाद अपने कांपते हाथों से अपने पिता का पुराना फोन नंबर मिलाया।

फोन की घंटी बजी। उधर से पिता की वही पुरानी, कमजोर और खाँसती हुई आवाज आई, “हलो… कौन?”

मोहिनी का गला रुंध गया। वह अपने घुटनों के बल बैठ गई और सिसकते हुए बोली, “बाबूजी… मैं आपकी अभागन मोहिनी हूँ… क्या आप अपनी इस भटकी हुई बेटी को माफ कर सकते हैं?”

फोन के उस पार कुछ पलों का गहरा सन्नाटा छा गया। फिर एक बूढ़े बाप के रोने की आवाज आई, “बिटिया… तू कहाँ चली गई थी? तेरी माँ की आँखें तो तेरे इंतज़ार में पथरा गईं। हमने तो सोचा था तू इस दुनिया में…”

“बाबूजी, मैं लौट आई हूँ। अब मुझे कहीं नहीं जाना,” मोहिनी ने आँसुओं के बीच कहा।

हफ्ते भर के भीतर मोहिनी ने अपने पूरे परिवार को उस बदहाल कस्बे से अपने पास नए शहर में बुला लिया। जब माँ ने अपनी छाती से मोहिनी को लगाया, तो बरसों का मैल और कड़वाहट एक ही पल में धुल गई। पिता ने जब कांपते हाथों से उसके सिर पर आशीर्वाद रखा, तो मोहिनी को महसूस हुआ कि असली दौलत और शोहरत तो यही है, जिसे वह बाहर की दुनिया के अंधेरों में तलाश रही थी।

मोहिनी ने अपनी सारी पूँजी को अपने परिवार के भविष्य के निर्माण में लगा दिया। उसने अपने दोनों छोटे भाइयों को शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में दाखिला दिलाया और उनकी पढ़ाई पूरी करवाकर उन्हें एक सुरक्षित और सम्मानित नौकरी दिलवाई। अपनी छोटी बहन का विवाह एक बहुत ही भले, संस्कारी और सुलझे हुए परिवार में पूरे सम्मान के साथ किया।

उसने खुद ग्लैमर की दुनिया से हमेशा के लिए नाता तोड़ लिया और शहर के एक अनाथालय और महिला आश्रय गृह के साथ मिलकर काम करना शुरू किया, जहाँ वह उन लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करती थी जो किसी धोखे या मजबूरी का शिकार हो चुकी थीं।

आज जब सुबह की पहली सुनहरी धूप उसके आँगन के तुलसी के चौबारे पर पड़ती है, और माँ रसोई से चाय की महक के साथ उसे पुकारती है, तो मोहिनी गहरी सांस लेती है। उसके चेहरे पर अब किसी महँगे कॉस्मेटिक की चमक नहीं थी, बल्कि आत्मसम्मान और आत्मशांति का वह नूर था जिसे दुनिया की कोई दौलत नहीं खरीद सकती। उसने साबित कर दिया था कि जिंदगी में भटक जाना गलती हो सकती है, लेकिन अपने आत्मसम्मान को पहचानकर सही राह पर लौट आना ही इंसान का सबसे बड़ा साहस होता है।

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