जीवन की डोर

 मयंक ने प्रज्ञा के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उसकी आँखों से कृतज्ञता के आँसू बह निकले। उसने रुंधे गले से कहा, “नहीं मेरी छोटी, शास्त्रों में रक्षा का जो भी अर्थ लिखा हो, लेकिन मेरी असली रक्षक तो तू है। सदियों से दुनिया कहती आई है कि भाई बहन की रक्षा करता है, लेकिन तूने तो मुझे यमराज के दरवाज़े से खींचकर नई ज़िंदगी दी है। तूने सिर्फ मुझे अपना एक अंग नहीं दिया, बल्कि इस पूरे परिवार को उजड़ने से बचा लिया। आज से यह रक्षा सूत्र तेरी कलाई पर सजेगा, क्योंकि जब तक मेरी नस-नस में तेरा दिया हुआ जीवन दौड़ रहा है, तब तक मेरी हर साँस तेरी हिफ़ाज़त के लिए समर्पित है।”

सुबह के नौ बजते ही घर के सारे काम समेटकर जब रोहन अपने दफ्तर और बच्चे अपने स्कूल चले जाते, तो प्रज्ञा का हाथ खुद-ब-खुद मोबाइल की ओर बढ़ जाता। वह सबसे पहले अपने बड़े भाई मयंक को फोन मिलाती। उनकी आवाज़ सुनकर दिनभर का चैन मानो उसी एक पल में सिमट आता था। फिर तुरंत भाभी शालिनी को फोन लगाती। रोज़ की वही हिदायतें, वही पुरानी चिंताएँ—”भाभी, भैया ने सुबह का काढ़ा पिया कि नहीं? लंच में उबली हुई सब्ज़ियों के साथ हरी चटनी दी है न? तेल-मसाला बिल्कुल मत दीजिएगा और हाँ, दोपहर की दो गोलियाँ खाने के ठीक बीस मिनट बाद खिलानी हैं।”

शालिनी भाभी फोन के उस पार से खिलखिलाकर हँस पड़तीं, “अरे मेरी प्यारी प्रज्ञा, सांस तो ले लो! मुझे अच्छी तरह याद है। तुम्हारे भैया मेरे भी जीवनसाथी हैं, उनका ख्याल मुझसे बेहतर कौन रखेगा? तुम इतनी दूर बैठकर रोज़ वही रट लगाती हो, खुद की सेहत का भी कुछ ध्यान रखती हो या नहीं?”

प्रज्ञा संकोच से मुस्करा देती और कहती, “भाभी, भैया मेरी जान हैं। जब तक दिन में दो बार उनकी खैरियत न पूछ लूँ, मुझे निवाला हलक से नीचे नहीं उतरता।” भाभी के प्यार भरे दिलासे के बाद ही वह फोन रखती और अपने बाकी काम में जुटती।

उधर शहर के पुराने चौक में अपनी छोटी-सी घड़ियों की मरम्मत और बिक्री की दुकान पर मयंक दोपहर के करीब तीन बजे खाना खाने बैठा। आज ग्राहकों की कुछ ज्यादा ही भीड़ थी, इसलिए लंच का डिब्बा खोलने में देर हो गई थी। वह पहला कौर मुँह में डालने ही वाला था कि सामने खड़े एक लड़के ने आवाज़ दी, “मयंक भैया, भैया दूज और राखी के उपहार वाली कोई अच्छी सी घड़ी दिखाइए न। अगले हफ्ते त्योहार है, अपनी दीदी को देना है।”

मयंक ने डिब्बा किनारे रखा, चश्मा ठीक किया और काउंटर के शीशे के भीतर से एक सुंदर, नक्काशीदार कलाई घड़ी निकालकर उस लड़के के सामने रख दी। लड़का घड़ी पसंद करके चला गया, लेकिन मयंक वहीं अपनी पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठा का बैठा रह गया। उसकी आँखें शून्य में तैरने लगीं। रक्षाबंधन, भैया दूज, भाई-बहन का अटूट नाता… ये शब्द जब भी उसके कानों में पड़ते, उसके दिल में सिर्फ एक ही चेहरा उभरता—प्रज्ञा।

उसकी नटखट, ज़िद्दी और बचकानी हरकतों वाली छोटी बहन। बचपन में जब माँ प्रज्ञा के लिए दूध की मलाई या कोई नया खिलौना अलग रख देती थीं, तो मयंक चिढ़ जाया करता था। वह सोचता था कि सारी लाड़-दुलार तो इस छोटी को ही मिलती है, यह कभी संजीदा होगी भी या उम्र भर यूँ ही मनमानी करेगी? शादी होकर जब वह दूसरे घर गई, तब भी मयंक को लगता था कि वह अब भी वही नादान गुड़िया है। लेकिन आज जब वह अपनी छाती पर हाथ रखकर साँसें गिनता, तो उसे अपने उन पुराने विचारों पर गहरी आत्मग्लानि होती। उसे क्या पता था कि वही चंचल गुड़िया एक दिन पूरे परिवार की ढाल बनकर खड़ी हो जाएगी और अपने खून से उसके बुझते हुए जीवन में दोबारा प्राण फूँक देगी।

आज मयंक जो इस दुकान पर बैठा अपनी उँगलियों से घड़ियों की सुइयाँ ठीक कर रहा था, वह दरअसल प्रज्ञा की ही बदौलत था। बात करीब पाँच साल पुरानी थी। मयंक को लगातार थकान, पैरों में भारीपन और साँस फूलने की शिकायत रहने लगी थी। उसने पहले तो काम का तनाव समझकर बात टाल दी, लेकिन जब शरीर में दर्द असहनीय हो गया, तो वह पटना के बड़े अस्पताल में जाँच कराने पहुँचा। डॉक्टरों ने कुछ शुरुआती परीक्षण किए और चेहरे पर गहरी चिंता लेकर उन्हें तुरंत दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जाने की सलाह दी।

मयंक अपनी पत्नी शालिनी के साथ दिल्ली पहुँचा। एम्स की ठंडी और उदास गलियारों में हफ़्तों भटकने के बाद जो रिपोर्ट आई, उसने पूरे परिवार के पैरों तले ज़मीन खिसका दी। डॉक्टर ने साफ़ कह दिया था कि मयंक की दोनों किडनियाँ अस्सी प्रतिशत से अधिक काम करना बंद कर चुकी हैं। क्रोनिक रीनल फेलियर।

यह खबर घर में किसी बिजली की तरह गिरी। बूढ़े पिता लाठी टेककर कोने में बैठ गए और माँ की आँखों के आँसू सूखने का नाम नहीं ले रहे थे। घर का इकलौता कमाने वाला बेटा, दो छोटे-छोटे बच्चे और सामने घोर अंधकार। हर महीने दिल्ली के चक्कर, महँगी दवाइयाँ, डायलिसिस की दर्दनाक प्रक्रिया और लगातार घटता हुआ वज़न। मयंक का चेहरा पीला पड़ गया था और आँखों के नीचे काले गड्ढे बन गए थे।

एक दिन जब डॉक्टर ने दो टूक शब्दों में कहा कि डायलिसिस अब सिर्फ वक्त खींचने का ज़रिया है, अगर जान बचानी है तो किडनी प्रत्यारोपण ही एकमात्र रास्ता है, तो मयंक पूरी तरह टूट गया। उस ऑपरेशन और उसके बाद की देखरेख का खर्च कई लाख रुपये था। किसी अनजान डोनर का मिलना नामुमकिन सा था और अगर मिलता भी, तो कानूनी अड़चनों और भारी खर्च के आगे मयंक का साधारण घड़ियों का कारोबार तिनके की तरह बिखर जाता।

उस रात मयंक ने अपने कमरे में अकेले बैठकर ईश्वर से बहुत झगड़ा किया। उसने मन ही मन कहा कि हे भगवान, तूने यह जानलेवा और खर्चीली बीमारी मुझ जैसे गरीब इंसान को ही क्यों दी? अगर मैं चला गया, तो इन मासूम बच्चों और बूढ़े माँ-बाप का क्या होगा?

परिवार में रिश्तेदार तो बहुत थे। बड़े चाचा, मामा, चचेरे भाई-बहन—सब सांत्वना देने आते, चाय पीते, अफसोस जताते और यह कहकर निकल जाते कि “ईश्वर सब ठीक करेगा।” कोई भी आर्थिक या शारीरिक रूप से आगे आने को तैयार नहीं था। ऐसे मुश्किल वक्त में अगर कोई साए की तरह साथ खड़ा था, तो वह सिर्फ प्रज्ञा थी।

प्रज्ञा की अपनी ज़िंदगी भी कोई फूलों की सेज नहीं थी। उसके पति रोहन स्वभाव से बेहद सख्त, तुनकमिज़ाज और हर बात में हिसाब माँगने वाले व्यक्ति थे। लेकिन प्रज्ञा ने अपने भाई के लिए दिन-रात एक कर दिया था। उसने कभी किसी मंदिर की चौखट नहीं छोड़ी, कभी किसी दरगाह पर धागा बाँधना नहीं भूला। जो लड़की बचपन में सुई चुभने पर पूरा घर सिर पर उठा लेती थी, वह भाई की लंबी उम्र के लिए नंगे पाँव व्रत रखने लगी थी।

इतना ही नहीं, जब मयंक के शुरुआती इलाज के लिए पैसों का भारी संकट खड़ा हुआ, तो प्रज्ञा ने बिना किसी को बताए अपनी अलमारी से वह पोटली निकाल ली, जिसमें उसने सालों से पाई-पाई जोड़कर सोने का हार और कंगन बनवाने के लिए ढाई लाख रुपये सहेजे थे। वह पैसे उसने चुपचाप लाकर भाभी की हथेली पर रख दिए। जब मयंक को यह पता चला, तो उसने रोते हुए कहा था, “प्रज्ञा, ये तेरी बरसों की मेहनत है। तूने अपने सपनों का गला घोंटकर मुझे पैसे क्यों दिए? मैं यह नहीं ले सकता।”

उस दिन प्रज्ञा भाई के सीने से लगकर फूट-फूट कर रोई थी। उसने मयंक के आँसू पोंछते हुए कहा था, “भैया, आप हैं तो मेरे सारे सपने हैं। अगर मेरा भाई ही नहीं रहेगा, तो मैं इन सोने के कंगन को पहनकर किसे दिखाऊँगी? आप बस हिम्मत मत हारिए, मैं आपको कुछ नहीं होने दूँगी।”

मयंक बेबसी से अपनी बहन को देखता रहा। उसे अपनी लाचारी पर रोना आ रहा था कि जो बहन हमेशा उससे कुछ न कुछ माँगती थी, आज वही अपना सब कुछ न्योछावर करने पर तुली थी।

लेकिन असली इम्तिहान तो अभी बाकी था। दिल्ली से खबर आई कि मयंक के लिए कोई उपयुक्त मैच नहीं मिल रहा है और समय तेज़ी से हाथ से फिसल रहा है। मयंक की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। एक शाम प्रज्ञा मायके आई। उसने अपने बीमार भाई का उतरा हुआ चेहरा देखा, बालकनी में बैठी बेबस भाभी को देखा और चुपचाप अपनी आँखों की नमी छुपाते हुए वापस ससुराल लौट गई।

तीन दिन बाद सुबह-सुबह प्रज्ञा का फोन आया। उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी स्थिरता और दृढ़ता थी। उसने सीधे मयंक से बात की, “भैया, मैंने अपना ब्लड ग्रुप और सारे टेस्ट करवा लिए हैं। हमारा मैच बिल्कुल परफेक्ट है। मैं आपको अपनी एक किडनी दूँगी।”

यह सुनते ही मयंक के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। घर में कोहराम मच गया। बूढ़े पिता ने डांटते हुए कहा, “पागल हो गई है क्या प्रज्ञा? तू एक औरत है, तेरा अपना परिवार है, दो छोटे बच्चे हैं। कल को तुझे कुछ हो गया तो? तेरे ससुराल वाले कभी नहीं मानेंगे।”

मयंक ने कांपती आवाज़ में कहा, “बहू, मैं मर जाऊँगा लेकिन अपनी ज़िंदगी के लिए तेरी बलि नहीं लूँगा। यह पागलपन बंद कर।”

लेकिन प्रज्ञा टस से मस नहीं हुई। उसने शांति से कहा, “बाबूजी, यह मेरा अंतिम फैसला है। मैं अपने जीते-जी अपने भैया को तिल-तिल कर मरते नहीं देख सकती। एक किडनी से भी इंसान पूरी ज़िंदगी स्वस्थ जी सकता है, डॉक्टरों ने मुझे सब समझा दिया है।”

सबसे बड़ा सवाल था रोहन का। एक ऐसा इंसान जो छोटी-छोटी बातों पर नाराज़ हो जाता था, वह अपनी पत्नी को इतना बड़ा अंगदान कैसे करने देता? लेकिन प्रज्ञा ने उस कठिन चट्टान को भी पिघला दिया। उसने रोहन के सामने हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाई और साफ कह दिया कि यदि आज उसके भाई को कुछ हो गया, तो वह जीते जी एक लाश बन जाएगी। प्रज्ञा की सच्ची ममता और अडिग संकल्प के आगे रोहन का गुस्सा भी आखिरकार पिघल गया।

सर्दियों की शुरुआत थी, जब पूरा परिवार दिल्ली एम्स के उस बड़े ऑपरेशन थियेटर के बाहर जमा था। कानूनी दस्तावेज़, शपथ पत्र और मेडिकल बोर्ड की मंज़ूरी की लंबी औपचारिकताएँ पूरी हो चुकी थीं। स्ट्रेचर पर ले जाते समय प्रज्ञा ने मयंक का हाथ कसकर पकड़ा और मुस्कराते हुए कहा, “भैया, डरिएगा मत। हम दोनों बिल्कुल ठीक होकर लौटेंगे।”

कई घंटों तक चले उस जटिल ऑपरेशन के बाद जब सर्जन बाहर आए, तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी। ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा था। मयंक के शरीर ने अपनी बहन के उस अनमोल उपहार को पूरी तरह स्वीकार कर लिया था।

अस्पताल में करीब डेढ़ महीने की सघन देखभाल और रिकवरी के बाद, दोनों भाई-बहन नए साल के पहले हफ्ते में घर वापस लौटे। उस दिन मुहल्ले में ऐसा माहौल था मानो मयंक को नया जीवन मिला हो। घर के आँगन में उत्सव जैसा वातावरण था। प्रज्ञा जब अपनी ससुराल जाने लगी, तो माँ ने उसके पैर छूने की कोशिश की, जिसे प्रज्ञा ने तड़पकर रोक लिया और माँ के गले लग गई।

समय का पहिया घूमता रहा और मयंक की सेहत धीरे-धीरे पूरी तरह पटरी पर आ गई। वह फिर से अपनी दुकान संभालने लगा था।

और आज, भैया दूज का पावन पर्व था।

सुबह से ही घर में धूप-दीप की सुगंध फैली हुई थी। प्रज्ञा अपने बच्चों के साथ मायके पहुँची थी। उसने स्नान करके पीले रंग की सुंदर साड़ी पहनी और मयंक को आँगन में लकड़ी की चौकी पर बिठाया। मयंक के माथे पर रोली और अक्षत का तिलक लगाया, आरती उतारी और मिठाई का टुकड़ा उसके मुँह में दिया।

जैसे ही प्रज्ञा ने परंपरा के अनुसार भाई की आरती की थाली नीचे रखी, मयंक ने अपनी जेब से एक सुंदर, रेशमी रक्षा सूत्र निकाला। इससे पहले कि प्रज्ञा कुछ समझ पाती, मयंक ने उसका हाथ थामा और वह पवित्र धागा अपनी छोटी बहन की कलाई पर बाँध दिया।

प्रज्ञा स्तब्ध रह गई। उसकी आँखें भर आईं, “भैया, यह क्या कर रहे हैं? रक्षा सूत्र तो बहन भाई को बाँधती है ताकि भाई उसकी रक्षा कर सके।”

मयंक ने प्रज्ञा के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उसकी आँखों से कृतज्ञता के आँसू बह निकले। उसने रुंधे गले से कहा, “नहीं मेरी छोटी, शास्त्रों में रक्षा का जो भी अर्थ लिखा हो, लेकिन मेरी असली रक्षक तो तू है। सदियों से दुनिया कहती आई है कि भाई बहन की रक्षा करता है, लेकिन तूने तो मुझे यमराज के दरवाज़े से खींचकर नई ज़िंदगी दी है। तूने सिर्फ मुझे अपना एक अंग नहीं दिया, बल्कि इस पूरे परिवार को उजड़ने से बचा लिया। आज से यह रक्षा सूत्र तेरी कलाई पर सजेगा, क्योंकि जब तक मेरी नस-नस में तेरा दिया हुआ जीवन दौड़ रहा है, तब तक मेरी हर साँस तेरी हिफ़ाज़त के लिए समर्पित है।”

पूरा कमरा मौन हो गया। पिता की आँखें गीली थीं और माँ आँचल से अपने आँसू पोंछ रही थीं। तभी शालिनी भाभी प्लेट में गर्मागर्म मालपुआ और कचौड़ियाँ लेकर आईं और हँसते हुए माहौल को हल्का किया, “बस-बस, अगर दोनों भाई-बहन का यह भावुक मिलन पूरा हो गया हो, तो नाश्ते की मेज़ पर चलें? बच्चे कब से अपनी बुआ के हाथ से मीठा खाने का इंतज़ार कर रहे हैं।”

सबके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान खिल उठी। आँगन में धूप बिखर चुकी थी और भाई-बहन का वह रिश्ता खून के एक-एक कतरे से और भी अमर हो चुका था।

एक बहन का प्यार और उसका समर्पण किसी भी स्वार्थ से परे होता है। संकट की घड़ी में जब अपने भी पीछे हट जाते हैं, तब रिश्तों की असली डोर ही इंसान को थामती है। क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा रिश्ता है जिसने बिना किसी शर्त के आपका साथ निभाया हो? अपनी राय हमें ज़रूर बताएं।

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मूल लेखिका :डॉ उर्मिला शर्मा

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