तकदीर की लकीरें

दोनों बच्चे बड़े ही संस्कारी और होनहार निकले। रागिनी ने उन्हें कभी यह अहसास तक नहीं होने दिया कि वे उसकी कोख से नहीं जन्मे हैं। उसने उन्हें सिर्फ पाला नहीं, बल्कि अपने संस्कारों से सींचा। बिटिया, जिसका नाम उन्होंने अन्या रखा, उसने कानून की पढ़ाई पूरी की और पिछले साल ही पटियाला के एक बहुत ही प्रतिष्ठित और संभ्रांत परिवार में उसका विवाह हुआ। दामाद जी उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और ससुराल वाले अन्या को पलकों पर बिठाकर रखते हैं।

 आज हमारे घर एक ऐसा मेहमान आने वाला था, जिसका इंतजार मेरी रूह ने पूरे पैंतालीस बरस किया था। मेरी सबसे प्यारी बचपन की सखी रागिनी आज अपने भरे-पूरे परिवार के साथ हमारे घर तशरीफ ला रही थी।

हमारी दोस्ती की शुरुआत जालंधर के एक सरकारी कन्या विद्यालय की छठी कक्षा से हुई थी। स्कूल के लंबे बरामदे, टिफिन से पराठे चुराकर खाना, खेल की घंटी में एक-दूसरे की चोट पर आंसू बहाना और बारहवीं तक आते-आते हर सुख-दुख का साझीदार बन जाना—यह सब इतनी तेजी से बीता कि वक्त का अहसास ही नहीं हुआ। लड़कियों की जिंदगी में सहेलियां तो कई आती-जाती हैं, लेकिन कोई एक ऐसी जरूर होती है जिसके सामने दिल की हर बात बिना किसी हिचक के रखी जा सके। रागिनी मेरे लिए वही एक शख्स थी।

मगर तकदीर की अपनी योजनाएं होती हैं। बारहवीं की परीक्षा खत्म होते ही मेरे पिता का तबादला अंबाला हो गया। उन दिनों न मोबाइल फोन की घंटी बजती थी, न ही इंटरनेट का जाल था। चिट्ठियों का दौर था। पहले-पहल हर महीने एक-दो खत आते-जाते रहे। हम दोनों अपनी नई जिंदगी, कॉलेज के प्रोफेसरों और सहेलियों के किस्से लिखते। फिर धीरे-धीरे कॉलेज की पढ़ाई, गृहस्थी की जिम्मेदारियां और वक्त की धूल ने उन चिट्ठियों के पतों को धुंधला कर दिया। खतों का सिलसिला टूटा तो ऐसा लगा जैसे अतीत का एक खूबसूरत पन्ना हमेशा के लिए मुड़ गया हो। इंसान की फितरत ही ऐसी होती है, वह नए माहौल को अपनाते-अपनाते पुराने रिश्तों को यादों के किसी संदूक में बंद करके रख देता है।

लगभग चार दशक का लंबा अरसा गुजर गया। समय का पहिया घूमा और डिजिटल युग आ गया। एक दिन मेरी बहू ने मेरा सोशल मीडिया अकाउंट बनाया। स्क्रॉल करते-करते अचानक एक जानी-पहचानी मुस्कान वाली तस्वीर मेरी नजरों के सामने ठिठक गई। नाम लिखा था—रागिनी मेहता। झुर्रियों और उम्र के बदलाव के बावजूद उन आंखों की मासूमियत वही थी जो स्कूल के दिनों में हुआ करती थी। मैंने बिना एक पल गंवाए संदेश भेजा। उधर से भी तुरंत जवाब आया। पैंतालीस साल की खामोशी आंसुओं और ठहाकों के साथ फोन कॉल पर बह निकली।

शुरू-शुरू में बातें औपचारिक रहीं, क्योंकि इतने लंबे समय में इंसान का रंग-रूप, स्वभाव, जीवनशैली सब कुछ बदल जाता है। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते, औपचारिकता की बर्फ पिघलती गई और बचपन का वही अपनापन फिर से खिल उठा। अब हम घंटों बातें करतीं, अपने-अपने जीवन के हर मोड़ को एक-दूसरे के सामने खोलकर रख देतीं।

बातों के इसी सिलसिले में जब मैंने रागिनी से उसके परिवार और बच्चों के बारे में पूछा, तो फोन की दूसरी तरफ एक गहरा सन्नाटा पसर गया। उस सन्नाटे में सदियों का दर्द छिपा था। रागिनी ने भारी आवाज में अपनी आपबीती सुनाई। शादी के बाद लगभग पंद्रह सालों तक उसने और उसके पति विनीत ने हर मंदिर, हर दरगाह और हर बड़े अस्पताल के चक्कर काटे। देश के नामी डॉक्टरों से इलाज करवाया, अनगिनत दवाइयां खाईं, लेकिन उसकी सूनी गोद में कोई किलकारी नहीं गूंजी।

भारतीय समाज में आज भी संतानहीनता का दंश किसी अभिशाप से कम नहीं माना जाता। हर तीज-त्योहार पर रिश्तेदारों के ताने, शादी-ब्याह में औरतों की तिरछी निगाहें और घर के खाली कमरों का सन्नाटा रागिनी को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा था। आखिरकार, जब सारे इलाज बेअसर साबित हुए, तो परिवार में विचार-विमर्श हुआ कि अब इलाज के पीछे समय और पैसा गंवाने के बजाय किसी बच्चे को गोद ले लिया जाए।

रागिनी की ससुराल रोहतक के एक बड़े और रूढ़िवादी संयुक्त परिवार की थी। सास-ससुर और खानदान के बुजुर्गों ने साफ कह दिया कि अगर बच्चा गोद लेना ही है, तो वह खानदान के अपने ही खून का होना चाहिए। गैर का खून वे अपने आंगन में नहीं पालेंगे। संयोग ऐसा बना कि उन्हीं दिनों रागिनी की छोटी देवरानी मोहिनी गर्भवती थी। मोहिनी के पास पहले से एक तीन साल का बेटा था। घर के बड़े-बुजुर्गों ने बैठकर फैसला सुनाया कि इस बार छोटी बहू के गर्भ से जो भी संतान जन्म लेगी, वह बड़ी बहू यानी रागिनी की सूनी गोद में डाल दी जाएगी। देवर और देवरानी ने भी सबके सामने सिर हिलाकर अपनी सहमति दे दी थी।

रागिनी के मन में मातृत्व की उम्मीद का दीया जल उठा। वह दिन-रात देवरानी की सेवा करती, उसके खान-पान का ध्यान रखती, मानों वह बच्चा उसी के गर्भ में पल रहा हो। नौ महीने पूरे हुए और देवरानी ने एक सुंदर, स्वस्थ बेटे को जन्म दिया। बच्चे का चांद सा मुखड़ा देखते ही माहौल बदल गया। देवर और देवरानी का मन डोल गया। जिस बच्चे को देने का वादा उन्होंने पूरे खानदान के सामने किया था, अब उसे सीने से चिपकाए बैठे थे। जब बात आगे बढ़ी, तो देवरानी ने रोना-धोना शुरू कर दिया और देवर ने दो टूक कह दिया कि अपने जिगर के टुकड़े को जीते-जी किसी और को नहीं सौंप सकते।

हमारे समाज की विडंबना ही यही है कि लड़के की चाहत में लोग अपने वादों से भी मुकर जाते हैं। अगर देवरानी के यहां कोई कन्या जन्म लेती, तो शायद वे खुशी-खुशी उसे रागिनी को सौंप देते, लेकिन कुलदीपक का मोह कोई छोड़ न सका। रागिनी और विनीत ने किसी से कोई झगड़ा नहीं किया। उन्होंने चुपचाप अपने कदम पीछे खींच लिए। वे समझ गए थे कि जब अपने ही खून में ममता का मोल लग जाए, तो फिर वहां कोई हक नहीं जताया जा सकता।

इसके बाद विनीत ने अपनी पत्नी की आंखों के आंसू पोंछते हुए कहा कि अगर ससुराल से नहीं, तो हम तुम्हारे मायके की तरफ से किसी रिश्तेदार का बच्चा अपना लेते हैं। सास-ससुर इस बात से कतई खुश नहीं थे, लेकिन रागिनी के गिरते मानसिक स्वास्थ्य को देखते हुए वे बेमन से राजी हो गए। लेकिन तकदीर का सितम देखिए, मायके वालों ने भी अपनी मजबूरियों का ढिंढोरा पीट दिया। किसी ने कहा कि समाज क्या कहेगा, तो किसी ने अपनी आर्थिक स्थिति का रोना रो दिया। उन दिनों विनीत का कपड़ा व्यापार भी भारी मंदी से गुजर रहा था। जब जेब हल्की हो और हालात बिगड़े हों, तो अपने भी परायों से बदतर व्यवहार करने लगते हैं।

चारों तरफ से नकारे जाने के बाद रागिनी गहरे अवसाद के गर्त में गिरती चली गई। नींद की गोलियां, रक्तचाप की दवाइयां और सिरदर्द उसके दैनिक जीवन का हिस्सा बन गए। ऐसा लगने लगा था कि अब यह जिंदगी बस एक अंतहीन अंधेरे रास्ते पर घिसटती रहेगी।

मगर कहते हैं न कि जहां इंसान के सारे रास्ते बंद होते हैं, वहां से कुदरत अपना करिश्मा शुरू करती है। एक दिन रागिनी की एक पुरानी परिचित का फोन आया, जो चंडीगढ़ के एक बड़े सामाजिक संस्थान से जुड़ी थी। उसने बेहद भावुक होकर बताया कि कालका के पास पहाड़ी रास्ते पर एक भयानक सड़क दुर्घटना में एक भले परिवार के पति-पत्नी दोनों की असमय मृत्यु हो गई है। उनके पीछे दो मासूम फूल छूट गए हैं—साढ़े तीन साल का एक नन्हा बेटा और महज दस महीने की एक दूधमुंही बेटी। बच्चों के दादा-दादी और नाना-नानी बेहद वृद्ध, लाचार और आर्थिक रूप से कमजोर हैं। वे किसी भी सूरत में इन दोनों भाई-बहन को अलग नहीं करना चाहते। उनकी बस एक ही अंतिम इच्छा है कि कोई ऐसा नेक दिल दंपत्ति मिल जाए जो दोनों बच्चों को एक साथ अपना ले, ताकि इन मासूमों का संसार न उजड़े।

उस परिचित ने रागिनी से कहा, “बहन, मुझे तुम्हारी सूनी गोद और नेकनीयती का ख्याल आया। अगर तुम और विनीत भाई साहब तैयार हों, तो मैं उनसे बात करूं?”

यह सुनते ही रागिनी के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। उस समय चैत्र नवरात्र का पावन पर्व चल रहा था और रागिनी मां भगवती की अखंड ज्योति जलाकर रो-रोकर प्रार्थना किया करती थी। उसे लगा जैसे साक्षात जगदंबा ने उसके आंसुओं का मोल चुका दिया हो। रागिनी ने फौरन विनीत को दुकान से घर बुलाया। दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में देखा और बिना एक पल गंवाए चंडीगढ़ के लिए निकल पड़े।

वहां पहुंचकर जब उन्होंने उन वृद्ध बुजुर्गों और उन दो अनाथ बच्चों को देखा, तो रागिनी का दिल मोम की तरह पिघल गया। नन्हीं बच्ची अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से रागिनी को देखकर किलकारी मार उठी और नन्हे बेटे ने अपनी तोतली जुबान में विनीत की उंगली पकड़ ली। कागजी औपचारिकताएं, कानूनी प्रक्रियाएं और अदालती नियम पूरे किए गए। जिस दिन वे दोनों बच्चे रागिनी के घर की दहलीज पर आए, उस दिन मानों पूरे घर की नकारात्मकता धुल गई।

रागिनी की सूनी बगिया में एक साथ दो-दो फूल खिल गए थे। मातृत्व के उस असीम सुख ने रागिनी की सारी बीमारियां, सारा अवसाद चुटकियों में गायब कर दिया। अब उसके पास रोने का समय ही नहीं था। वह दिन-रात उन बच्चों की परवरिश में रम गई। विनीत के रुके हुए व्यापार में भी जैसे बरकत की बारिश होने लगी।

दोनों बच्चे बड़े ही संस्कारी और होनहार निकले। रागिनी ने उन्हें कभी यह अहसास तक नहीं होने दिया कि वे उसकी कोख से नहीं जन्मे हैं। उसने उन्हें सिर्फ पाला नहीं, बल्कि अपने संस्कारों से सींचा। बिटिया, जिसका नाम उन्होंने अन्या रखा, उसने कानून की पढ़ाई पूरी की और पिछले साल ही पटियाला के एक बहुत ही प्रतिष्ठित और संभ्रांत परिवार में उसका विवाह हुआ। दामाद जी उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और ससुराल वाले अन्या को पलकों पर बिठाकर रखते हैं।

और बेटा समर, उसने बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री हासिल की और अपने पिता के छोटे से कारोबार को अपनी मेहनत और आधुनिक सोच से एक बहुमंजिला टेक्सटाइल फर्म में बदल दिया। समर जितना अपनी मां का सम्मान करता है, उतना शायद सगे बेटे भी नहीं करते।

आज वही रागिनी अपने उसी लाडले बेटे समर और पति विनीत के साथ मेरे दरवाजे पर खड़ी थी।

घंटी बजी और मैंने दौड़कर दरवाजा खोला। सामने रागिनी खड़ी थी—चेहरे पर गजब का तेज, आंखों में असीम शांति और होंठों पर वही भोली मुस्कान। उसके पीछे छह फीट का लंबा, शालीन और संस्कारी नौजवान समर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़े खड़ा था। मैंने रागिनी को गले से लगा लिया। हम दोनों की आंखों से पैंतालीस सालों की दूरी आंसुओं के रास्ते बह निकली।

“शैलजा! देख, यह है मेरा बेटा समर,” रागिनी ने बड़े गर्व से उसका कंधा थपथपाते हुए कहा। समर ने तुरंत झुककर मेरे और रमेश जी के चरण स्पर्श किए। उसके आचरण में जो विनम्रता थी, उसने पहली ही नजर में मेरा दिल जीत लिया।

ड्राइंग रूम में बातों का दौर चला। हंसी-ठिठोली के बीच मेरी छोटी ननद की बेटी, अवनि, चाय और नाश्ते की ट्रे लेकर भीतर आई। अवनि बेहद सौम्य, उच्च शिक्षित और घरेलू संस्कारों से परिपूर्ण लड़की है। मैंने ही रागिनी को फोन पर अवनि के बारे में बताया था और आज यह मुलाकात उसी रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए रखी गई थी।

समर और अवनि ने एक-दूसरे से सादगी से बातचीत की। दोनों के चेहरों की रजामंदी साफ दिखाई दे रही थी। रागिनी ने अवनि का हाथ अपने हाथ में लिया और अपनी सोने की चूड़ी उसके हाथ में पहनाते हुए मुझसे कहा, “शैलजा, आज मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सपना पूरा हो रहा है। मेरी सहेली की भांजी अब मेरे घर की लक्ष्मी बनेगी।”

उस वक्त रागिनी के चेहरे पर जो गौरव और संतोष का भाव था, उसे देखकर मेरी आत्मा तृप्त हो गई। मेरे मन में बार-बार यही विचार आ रहा था कि विधाता की लीला कितनी अद्भुत है। जिस समाज ने, जिन सगे रिश्तों ने सूनी गोद देखकर मुंह फेर लिया था, आज उन्हीं रिश्तों के सामने रागिनी का सिर सबसे ऊंचा था। इंसान खून के रिश्तों को ही सब कुछ समझ बैठता है, मगर सच तो यह है कि प्रेम, त्याग और कर्तव्य से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता। जब तकदीर किसी का इम्तिहान लेती है, तो अंत में उसकी झोली ऐसे भरती है कि सारा जमाना देखता रह जाता है। कब अपने पराए हो जाएं और कब कोई अनजान अपनी औलाद से भी बढ़कर सहारा बन जाए, यह सिर्फ और सिर्फ वही ईश्वर जानता है।

दोस्तों, आज के समाज में जहां लोग खून के रिश्तों के नाम पर बेटियों और अनाथ बच्चों से मुंह मोड़ लेते हैं, वहीं रागिनी और विनीत का यह कदम क्या हर निसंतान और रूढ़िवादी सोच वाले इंसान के लिए एक प्रेरणादायक सबक नहीं है? क्या ममता सचमुच कोख की मोहताज होती है या दिल की? इस दिल को छू लेने वाली सच्चाई पर अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : कुसुम अग्रवाल,

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