“वकील बाबू, आपने जो मसौदा तैयार किया है, उसे कल दोपहर ठीक बारह बजे लेकर आइएगा। मैं किसी भी तरह का विलंब नहीं चाहती। मेरी तबीयत का कोई ठिकाना नहीं और मैं जीते-जी यह सब कुछ निपटा देना चाहती हूँ।”
दूसरी तरफ से वकील श्रीकांत जी की आवाज़ उभरी, जिसमें साफ़ तौर पर हिचकिचाहट और संकोच घुला था, “कल्याणी जी, कानूनी तौर पर तो आप स्वतंत्र हैं, मगर क्या आपने एक बार फिर ठंडे दिमाग से सोच लिया है? जो कागज़ात मैंने आपके निर्देश पर तैयार किए हैं, उसके मुताबिक पुश्तैनी कोठी, बाज़ार की दुकानें और बैंक के तमाम फिक्स्ड डिपॉजिट… सब कुछ सिर्फ और सिर्फ आपके छोटे बेटे देवेश के नाम जा रहा है। इस पूरी वसीयत में बड़े बेटे जयंत का नाम तक दर्ज नहीं है। उसे आपने एक फूटी कौड़ी भी नहीं दी है।”
कल्याणी देवी के होंठ खिंच गए। उनके माथे की लकीरें गहरी हो गईं। एक कटुता उनके चेहरे पर साफ़ तैर गई। उन्होंने बेहद तीखे और दो टूक स्वर में कहा, “वकील साहब, मैंने आपको अपनी कानूनी सलाह और दस्तावेज़ तैयार करने के लिए नियुक्त किया है, मेरे पारिवारिक मामलों में पंचायत करने के लिए नहीं। मुझे क्या फैसला लेना है, यह तय करना आपका काम नहीं है। आप सिर्फ कल समय पर कागज़ात लेकर आइए, दस्तख़त मुझे करने हैं।”
इतना कहकर उन्होंने सामने वाले का उत्तर सुने बिना ही लाल बटन दबाकर फोन काट दिया। फोन को तकिए के पास पटकते हुए कल्याणी देवी ने एक गहरी सांस ली। कमरा शांत था, मगर उनके भीतर विचारों का एक भीषण चक्रवात चल रहा था।
अतीत की परतें किसी पुरानी किताब की तरह उनके ज़हन में फड़फड़ाने लगीं। पच्चीस साल पहले जब वे इस घर में ब्याह कर आई थीं, तो उनकी गोद सूनी नहीं थी। पति हरीश जी विधुर थे और पहली पत्नी के गुज़र जाने के बाद उनके आंगन में चार साल का एक नन्हा बालक जयंत खेलता था। मायके वालों ने तब कल्याणी को खूब समझाया था कि सौतेले बेटे की माँ बनना कांटों का ताज पहनने जैसा है, दुनिया कभी तुम्हें सगी नहीं कहेगी। पर कल्याणी ने उस मासूम बच्चे को देखकर अपने सीने से लगा लिया था। फिर दो साल बाद उनकी अपनी कोख से देवेश का जन्म हुआ।
सालों तक कल्याणी ने कभी किसी को यह अहसास नहीं होने दिया कि जयंत उनकी कोख से नहीं जन्मा है। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, समाज के ताने और आस-पड़ोस की औरतों की बातें ज़हर बनकर उनके कानों में घुलती रहीं। “अरे, जयंत बड़ा हो रहा है, कहीं ऐसा न हो कि अपने पिता की सारी दौलत पर वही कब्ज़ा कर ले और तुम्हारे देवेश के हाथ खाली रह जाएं।” पिछले साल हरीश जी के अचानक दिल का दौरा पड़ने से हुए निधन के बाद यह डर कल्याणी के मन में एक वटवृक्ष बन गया। उन्हें लगा कि देवेश अभी सीधा-सादा है, पढ़ाई पूरी कर रहा है, जबकि जयंत ने पारिवारिक कारोबार संभाल लिया है। अगर संपत्ति का बंटवारा नहीं हुआ, तो जयंत अपने हिस्से से ज़्यादा छीन लेगा और उनके अपने बेटे का भविष्य असुरक्षित हो जाएगा। इसी डर, इनसिक्योरिटी और ममता के अंधे मोह ने आज कल्याणी को उस मोड़ पर ला खड़ा किया था जहाँ वे अपने ही हाथों एक दीवार खड़ी करने जा रही थीं।
अगले दिन दोपहर के ठीक बारह बजे दरवाज़े की घंटी बजी। कल्याणी देवी ने खुद उठकर दरवाज़ा खोला। सामने वकील श्रीकांत जी एक भारी चमड़े के ब्रीफकेस के साथ खड़े थे। उनके चेहरे पर एक गंभीर संजीदगी थी।
“आइए वकील साहब, बैठिए,” कल्याणी देवी ने उन्हें बैठक में सोफे की तरफ इशारा करते हुए कहा। पंखे की धीमी घरघराहट के बीच श्रीकांत जी ने ब्रीफकेस से नीले रंग की फाइल निकाली और मेज़ पर रख दी।
“कागज़ात पूरी तरह तैयार हैं कल्याणी जी। आपके हस्ताक्षर होते ही और दो गवाहों के दस्तख़त के बाद यह वसीयत कानूनी रूप ले लेगी,” वकील साहब ने चश्मा ठीक करते हुए कहा।
कल्याणी देवी ने फाइल को देखा। दिल के किसी कोने में एक हल्की सी टीस उठी, मगर उन्होंने अपने चेहरे के भावों को कड़ा कर लिया। “मैं बस दो मिनट में आती हूँ। देवेश को भी बुला लूँ, ताकि वह भी देख ले कि सब कुछ उसके हक में सुरक्षित हो चुका है।”
कल्याणी देवी बैठक से निकलकर भीतर के गलियारे की तरफ बढ़ गईं। देवेश का कमरा पीछे की तरफ था। वे तेज़ी से कदमों से आगे बढ़ रही थीं, मगर जब वे देवेश के कमरे के बाहर पहुँचीं, तो दरवाज़ा आधा खुला हुआ था। अंदर से दोनों भाइयों की बातचीत की आवाज़ें आ रही थीं। कल्याणी ने दस्तक देने के लिए हाथ उठाया ही था कि भीतर से आती आवाज़ ने उनके पैरों में मानो ज़ंजीरें बांध दीं।
कमरे के अंदर जयंत और देवेश आमने-सामने बैठे थे।
जयंत की शांत, गंभीर और धीर आवाज़ गूंज रही थी, “छोटे, तू बेवजह अपना खून क्यों जला रहा है? माँ जो भी कर रही हैं, हमें उनके फैसले पर सवाल उठाने का कोई हक़ नहीं है। वे इस घर की मुखिया हैं। उन्होंने ज़िंदगी की धूप-छाँव हमसे कहीं ज़्यादा देखी है। वो जो तय करेंगी, वो हमारे भले के लिए ही होगा। तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, इन कागज़ी पचड़ों में मत पड़।”
तभी देवेश की रुंधी हुई और नाराज़गी भरी आवाज़ उभरी। देवेश कह रहा था, “भैया, आप इतने सीधे क्यों बनते हैं? आप सब कुछ समझकर भी अनजान क्यों बन रहे हैं? मुझे सब पता चल चुका है कि आज वकील साहब किसलिए आए हैं। माँ सारी जायदाद, यह पुश्तैनी मकान, दुकानें सब मेरे नाम कर रही हैं। आपको बेदखल किया जा रहा है भैया! और यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि… क्योंकि आप उनकी सगी औलाद नहीं हैं। वो आपकी सौतेली माँ हैं ना, इसलिए खून का फर्क आज सामने आ गया!”
देवेश का यह वाक्य किसी खंजर की तरह कल्याणी देवी के सीने में जा धंसा। उनके पैरों तले ज़मीन खिसकने लगी। वे दरवाज़े की चौखट का सहारा लेकर वहीं खड़ी रह गईं।
लेकिन उसके बाद जो आवाज़ अंदर से आई, उसने वातावरण का तापमान ही बदल दिया।
“चुप रह छोटे!” जयंत की आवाज़ में पहली बार एक ऐसी सख्ती थी, जो देवेश को चुप कराने के लिए काफी थी। पर अगले ही पल वह सख्ती पिघलकर असीम स्नेह में बदल गई।
जयंत ने देवेश के कंधे पर हाथ रखा और बेहद भावुक होकर कहा, “खबरदार जो आज के बाद अपनी ज़बान से वो शब्द निकाला! सौतेली? माँ कभी सौतेली होती है क्या रे? माँ तो बस माँ होती है—परमेश्वर का दूसरा रूप। तू तो तब बहुत छोटा था, तुझे कुछ याद भी नहीं होगा। जब मुझे सात साल की उम्र में भयानक टाइफाइड हुआ था, डॉक्टर ने भी कह दिया था कि रात बहुत भारी है, तब यह माँ ही थी जो पूरी-पूरी रात मेरे सिरहाने बैठकर गीली पट्टियां बदलती रही थी। उनकी आँखों से बहते आंसू मेरे माथे पर गिरते थे। अपने कान्हा के आगे उन्होंने हफ़्तों अन्न का दाना नहीं छुआ था, सिर्फ मेरी ज़िंदगी की भीख मांगती रही थीं।”
जयंत की आवाज़ भर्रा गई थी, वह कुछ पल रुका और फिर बोला, “पिताजी कई बार मुझे डांट देते थे, पर माँ हमेशा उनके आगे ढाल बनकर खड़ी हो जाती थी। सर्दियों में जब मुझे सुबह स्कूल जाना होता था, तो वो मेरे जागने से पहले उठकर पानी गरम करती थीं, चुपके से मेरे पराठों में मक्खन की एक एक्स्ट्रा परत लगा देती थीं ताकि मुझे कमज़ोरी न लगे। अगर आज वो मुझे अपनी संपत्ति में से एक ईंट भी न दें, तो क्या मेरा उनका रिश्ता खत्म हो जाएगा? उनसे जो प्यार, जो दुलार और जो संस्कार मुझे मिले हैं, क्या वो किसी दौलत से कम हैं? और सबसे बड़ी बात छोटे… मेरी असली दौलत तो तू है और मेरी माँ हैं। अगर तुम दोनों मेरे साथ हो, तो मैं सड़क पर भी खुश रहूँगा। मुझे इस ज़मीन-जायदाद का क्या करना है? तू तो मेरा छोटा भाई है, मेरा कलेजा है। माँ अगर सब कुछ तुझे दे रही हैं, तो वो मेरे ही पास तो है।”
देवेश फूट-फूट कर रोने लगा और उसने जयंत को गले से लगा लिया, “भैया… मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं माँ से जाकर कहूँगा कि मुझे यह सब कुछ नहीं चाहिए।”
“पागल मत बन। माँ जो करेंगी, हम सिर झुकाकर स्वीकार करेंगे। माँ का फैसला कभी गलत नहीं हो सकता,” जयंत ने छोटे भाई की पीठ थपथपाते हुए कहा।
दरवाज़े के बाहर खड़ी कल्याणी देवी की आँखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। उनके हाथ कांप रहे थे और कलेजे में जैसे कोई भारी पत्थर टूटकर गिर गया था। वे अपने दोनों हाथों से अपना मुंह दबाए चुपचाप पीछे की ओर हट गईं ताकि उनकी सिसकियों की आवाज़ बेटों तक न पहुँचे।
वे बैठक की ओर लौटने लगीं, मगर हर कदम के साथ उनका रोम-रोम पश्चाताप की आग में जल रहा था।
‘हे ईश्वर! मैं यह क्या करने जा रही थी?’ उनके अंतर्मन से एक चीख उठी। ‘मैं ममता के नाम पर कितना बड़ा पाप करने जा रही थी? जिस बच्चे ने मुझे अपनी सगी माँ से बढ़कर पूजा, जिसने दुनिया के तानों के बीच हमेशा मेरे आंचल को अपना आसमान समझा, मैं उसी के हिस्से का उजाला छीनकर अपने स्वार्थ के अंधेरे में फेंकने जा रही थी? ममता कभी इतनी संकीर्ण कैसे हो सकती है? जो सबको बाँट दे, वो माँ कैसी? माँ तो वो होती है जो अपने सीने से लगाकर हर घाव भर देती है, न कि अपने ही बच्चों के बीच दरार खींच दे।’
कल्याणी देवी बैठक में पहुँचीं। उनकी आँखें लाल थीं, चेहरे पर आंसुओं के निशान थे, मगर उनका झुका हुआ मस्तक अब एक अजीब से आत्मबोध से चमक रहा था।
श्रीकांत जी ने उन्हें देखकर चौंकते हुए पूछा, “क्या हुआ कल्याणी जी? आपकी तबीयत तो ठीक है ना? आप रो क्यों रही हैं?”
कल्याणी देवी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं। वे मेज़ के पास आईं और बिना एक पल गंवाए, उन्होंने मेज़ पर रखी उस नीली फाइल को उठाया।
वकील साहब कुछ समझ पाते, इससे पहले ही कल्याणी देवी ने उस वसीयत के कागज़ात को बीच से पकड़ा और दो टुकड़ों में फाड़ दिया। फिर चार टुकड़े किए और उन्हें मेज़ पर रख दिया।
श्रीकांत जी हक्के-बक्के रह गए। वे अपनी कुर्सी से खड़े हो गए, “यह… यह आप क्या कर रही हैं कल्याणी जी? हफ़्तों की मेहनत से यह दस्तावेज़ तैयार हुआ था!”
कल्याणी देवी की आवाज़ में अब न तो कोई सख्ती थी और न कोई डर। उसमें केवल एक माँ की अगाध, पवित्र गरिमा थी।
उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “वकील साहब, मुझे क्षमा कीजिएगा कि मैंने आपका समय व्यर्थ किया। मगर यह कागज़ मेरी ममता का नहीं, मेरे डर और स्वार्थ का दस्तावेज़ था। मैं एक बहुत बड़ा अनर्थ करने जा रही थी। भगवान ने समय रहते मेरी आँखों से अज्ञान की पट्टी हटा दी।”
उन्होंने गहरी सांस ली और सीधे खड़े होकर कहा, “आप अभी इसी वक्त एक नया वसीयतनामा तैयार कीजिए। उस वसीयत में लिखिए कि हरीश जी की छोड़ी हुई इस पूरी संपत्ति, इस मकान, दुकानों और बैंक खातों पर मेरे दोनों बेटों—जयंत और देवेश का बिल्कुल बराबर-बराबर पचास-पचास प्रतिशत का अधिकार होगा। और जब तक मैं जीवित हूँ, यह घर मेरे दोनों बेटों का साझा मंदिर रहेगा।”
श्रीकांत जी की आँखों में प्रशंसा और आदर के भाव उभर आए। उन्होंने मुस्कुराते हुए सिर झुकाया, “कल्याणी जी, आज आपने साबित कर दिया कि माँ का दिल किसी अदालत या वसीयत का मोहताज नहीं होता। मैं आज ही नया मसौदा तैयार करवाता हूँ।”
तभी कदमों की आवाज़ सुनकर कल्याणी देवी ने मुड़कर देखा। दरवाज़े पर जयंत और देवेश दोनों खड़े थे। शायद कागज़ फटने की आवाज़ सुनकर वे बाहर आ गए थे। जयंत की आँखों में अपनी माँ के लिए अथाह श्रद्धा तैर रही थी।
कल्याणी देवी आगे बढ़ीं और उन्होंने बिना कुछ कहे अपने दोनों हाथ फैला दिए। जयंत दौड़कर उनके सीने से लग गया। कल्याणी देवी ने उसका सिर अपने आंचल में छुपा लिया और उसके माथे को चूमते हुए सिसक पड़ीं, “मुझे माफ़ कर दे मेरे बच्चे… मुझे माफ़ कर दे। माँ कभी-कभी अंधी हो जाती है, मगर उसकी ममता कभी झूठी नहीं हो सकती। तू मेरा बड़ा बेटा है, मेरी पहली पहचान है।”
देवेश भी आगे बढ़कर दोनों से लिपट गया। उस पुराने मकान के दालान में अब कोई सन्नाटा नहीं था, बल्कि प्रेम और विश्वास की एक ऐसी धूप खिल चुकी थी, जिसे दुनिया का कोई बंटवारा कभी बुझा नहीं सकता था।
रिश्ते कभी खून के मोहताज नहीं होते, वे तो सिर्फ उस निस्वार्थ प्रेम और अपनेपन की डोर से बंधे होते हैं जिसे दिल से निभाया जाता है। कल्याणी देवी ने तो समय रहते अपनी भूल सुधार ली और परिवार को बिखरने से बचा लिया। क्या आपके आस-पास भी आपने कभी ऐसा निस्वार्थ रिश्ता या माँ का ऐसा पवित्र रूप देखा है जो सारे भेदों से परे हो? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ ज़रूर साझा करें।
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