पहले एक बेटी हूँ

 प्रियांशी ने मुस्कुराते हुए अपनी सास के आंसुओं को अपने आंचल से पोंछा और बोली, “मां जी, उन पुरानी बातों को याद करके आज का दिन क्यों खराब करना? परिवार का मतलब क्या होता है? परिवार वही होता है जहां सुख में भले ही लोग अपनी-अपनी दुनिया में मस्त रहें, लेकिन दुख की घड़ी में सब एक दीवार बनकर खड़े हो जाएं। मैं मानती हूं कि दीदी और मेरे बीच कुछ कड़वाहट रही है, हमारी सोच नहीं मिलती थी। लेकिन जब घर की बेटी और दामाद पर इतनी बड़ी विपत्ति आई हो, तो क्या हम अपनी पुरानी रंजिशें पालकर बैठ जाते? अगर हम अपनों के आंसुओं को देखकर भी मुंह फेर लेते, तो बाबूजी के दिए संस्कारों का क्या होता?”

रसोई से हाथ में गर्म अदरक की चाय का कुल्हड़ और कुछ बिस्कुट लिए उनकी बहू प्रियांशी बाहर आई। उसने बड़े सलीके से चाय की प्याली पास रखी छोटी मेज पर रखी और चेहरे पर सहज मुस्कान लाते हुए बोली, “मां जी, घर के बाकी कमरों का जाला और रंग-रोगन तो लगभग पूरा हो गया है। मैं सोच रही थी कि छत से सटा हुआ वह पुराना बक्सा वाला कमरा भी खाली करवा लूं। वहां बरसों से बंद पड़े संदूक और गैर-जरूरी चीजें रखी हैं। अगर आप कहें, तो उन्हें हटाकर वहां आरव के लिए एक छोटा सा पढ़ाई का कोना बना दूं? अब वह दसवीं में आ गया है, तो उसे शांत जगह की जरूरत पड़ती है।”

देवकी जी ने बहुत ही धीमे स्वर में गर्दन हिलाई और नजरें झुकाए हुए बोलीं, “बहू, अब घर की गृहस्थी तुम ही संभालती हो। तुम्हें जो सही लगे, वैसा ही कर लो। मुझसे क्या पूछना…”

उनकी इस आवाज में न तो पहले जैसी खनक थी और न ही वह अधिकार जो कभी उनके हर शब्द में झलकता था। प्रियांशी ने महसूस किया कि मां जी की यह बेरुखी कोई सामान्य चुप्पी नहीं थी, बल्कि भीतर ही भीतर कोई भारी बोझ उन्हें घुन की तरह खाए जा रहा था। प्रियांशी कुछ पल वहीं ठिठकी रही, फिर चुपचाप अंदर चली गई।

देवकी जी के मिजाज में आए इस भारी बदलाव का गवाह यह पूरा घर था। उनके स्वर्गीय पति हरिशंकर जी एक प्रतिष्ठित सरकारी बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनके रहते इस घर की फिजा ही अलग थी। समाज में मान-सम्मान, हरिशंकर जी का बड़ा पद और आर्थिक संपन्नता—इन सबने देवकी जी के स्वभाव में एक अजीब सा दंभ और कठोर ठसक भर दी थी। वह घर की सर्वेसर्वा थीं। उनकी मर्जी के बिना घर का पत्ता तक नहीं हिल सकता था। सास बनने के बाद भी उन्होंने प्रियांशी के साथ हमेशा एक सख्त और कड़क रवैया बनाए रखा।

घर में जब भी कोई मनमुटाव या खींचतान होती, तो उसकी जड़ हमेशा देवकी जी की शादीशुदा बेटी मोनिका ही होती थी। मोनिका उम्र में प्रियांशी से थोड़ी ही बड़ी थी। अपने मायके में उसका जब भी आना होता, तो पूरा घर उसके इर्द-गिर्द घूमने लगता था। देवकी जी अपनी बेटी के हर फैसले, हर मांग और हर जिद पर आंखें मूंदकर सही की मुहर लगा देती थीं। गलती चाहे मोनिका की कितनी भी बड़ी क्यों न हो, देवकी जी हमेशा अपनी बहू प्रियांशी को ही कटघरे में खड़ा कर देती थीं।

उस दौर में हरिशंकर जी अक्सर अपनी पत्नी को एकांत में समझाया करते थे, “देवकी, ममता अच्छी चीज है, लेकिन अंधा पक्षपात जहर बन जाता है। तुम अपनी बेटी को खुश करने के चक्कर में बहू के आत्मसम्मान को कुचल रही हो। ऐसा करके तुम बेटी और बहू के बीच एक ऐसी खाई खोद रही हो जो कल को शायद कभी न भर पाए। याद रखो, हम दोनों जब इस दुनिया में नहीं रहेंगे, तब बेटी का असली मायका उसका भाई और भाभी ही होंगे। अगर तुम आज बहू का दिल दुखाओगी, तो कल कहीं ऐसा न हो कि बेटी के लिए मायके की चौखट ही पराई हो जाए।”

उस वक्त अपने पति की बात सुनकर देवकी जी अपनी नाक सिकोड़ लेती थीं और बड़े गर्व से जवाब देती थीं, “आप भी कैसी बातें करते हैं! मेरी बेटी का मायका कैसे छूट जाएगा? मेरा बेटा मयंक अपनी बहन पर जान छिड़कता है। वह कभी अपनी बहन का हाथ नहीं छोड़ेगा। और वैसे भी, मुझे किसी के रहमो-करम की जरूरत नहीं है।”

सच्चाई यह थी कि मोनिका की शादी ग्वालियर के एक रसूखदार और व्यापारी घराने में हुई थी। उसके पति का ऑटोमोबाइल पार्ट्स का अच्छा-खासा कारोबार था। ससुराल में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। लेकिन मोनिका की आदत थी कि वह अपनी देवरानी और जेठानी के सामने खुद को सबसे श्रेष्ठ और लाडली साबित करने के लिए मायके से हमेशा महंगे उपहारों, गहनों और कपड़ों की मांग करती रहती थी। उसे यह दिखाने में बहुत सुख मिलता था कि मायके वाले उस पर कितना न्योछावर होते हैं।

प्रियांशी के ब्याह कर आने के बाद भी मोनिका का यह स्वभाव बिल्कुल नहीं बदला, बल्कि अब उसके भीतर एक अजीब सी ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा पैदा हो गई थी। प्रियांशी के लिए मायके से या ससुराल में जो भी नया सामान, साड़ी या गहना आता, मोनिका उस पर अपनी नजरें गड़ा देती। बातों-बातों में वह ऐसा माहौल बना देती कि वह चीज उसे ही मिल जाए। शुरुआत में तो प्रियांशी ने पारिवारिक शांति और सास के मान-सम्मान की खातिर समझौता किया। वह अपनी नापसंद चीजों को चुपचाप अनदेखा कर देती थी।

लेकिन पानी तब सिर से ऊपर गुजर गया जब मयंक अपनी पहली एनिवर्सरी पर प्रियांशी के लिए एक खूबसूरत कश्मीरी पश्मीना शॉल और सोने की हल्की सी चेन लेकर आया। मोनिका उसी शाम मायके आई हुई थी। उसने जैसे ही वह उपहार देखा, तुरंत मुंह बनाकर बोली, “अरे वाह भैया! भाभी के लिए इतना कीमती शॉल? मेरी ससुराल में अगले हफ्ते एक बहुत बड़ी शादी है, अगर यह शॉल मैं ओढ़कर जाऊं तो सब देखते रह जाएंगे। मम्मी, मैं इसे ले जाऊं न?”

देवकी जी ने बिना सोचे-समझे तुरंत कह दिया, “हां-हां, ले जा बेटी। तेरी भाभी के पास तो बहुत चीजें हैं, तू पहन लेगी तो कौन सी कयामत आ जाएगी।”

उस दिन पहली बार प्रियांशी ने खुलकर अपनी असहमति जताई। उसने बेहद शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा था, “मां जी, दीदी घर की बेटी हैं, वह यहां के किसी भी सामान पर अपना हक जताएं, मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन जो उपहार मयंक जी ने खास तौर पर मेरे लिए खरीदा है, वह मेरी निजी भावना से जुड़ा है। मैं इसे किसी के साथ साझा नहीं करूंगी।”

बस, उसी दिन से प्रियांशी और मोनिका के बीच एक शीतयुद्ध छिड़ गया था। मोनिका जब भी मायके आती, जानबूझकर ऐसे हालात पैदा करती जिससे प्रियांशी को नीचा देखना पड़े। छोटी-छोटी बातों पर तमाशे होते, और हर तमाशे के अंत में देवकी जी अपनी बेटी की ढाल बनकर खड़ी हो जातीं और बहू को ताने देतीं कि वह दिल की बहुत छोटी है।

वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। दो साल पहले अचानक दिल का दौरा पड़ने से हरिशंकर जी का साया परिवार के सिर से उठ गया। उस दुखद घटना ने पूरे घर को हिलाकर रख दिया। हरिशंकर जी के जाने के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी मयंक और प्रियांशी के कंधों पर आ गई। मयंक ने एक निजी कंपनी में अपनी नौकरी के साथ-साथ परिवार को बखूबी संभाला। हरिशंकर जी की जो मासिक पेंशन आती थी, देवकी जी उसका एक बड़ा हिस्सा चुपके से मोनिका और उसके बच्चों की छोटी-मोटी जरूरतों पर खर्च कर दिया करती थीं। अब वह खुलकर प्रियांशी से यह नहीं कह पाती थीं कि मयंक से कहकर मोनिका के लिए यह सामान मंगवा दो, क्योंकि उनके भीतर का वह पुराना रौब पति के जाने के साथ ही काफी हद तक टूट चुका था।

इधर पिछले छह महीनों से देवकी जी के चेहरे पर जो उदासी थी, वह अब एक भयानक बेचैनी में बदल चुकी थी। असल में, मोनिका के ससुराल में एक बहुत बड़ा संकट आ खड़ा हुआ था। उसके पति के साझेदार ने व्यापार में बहुत बड़ा धोखा किया था, जिसके चलते उनका करोड़ों का नुकसान हो गया और व्यापार ठप होने की कगार पर पहुंच गया। देनदार हर दिन घर के चक्कर लगा रहे थे। मोनिका के पति की आर्थिक हालत इतनी बिगड़ गई कि गाड़ी और दुकान तक गिरवी रखने की नौबत आ गई।

जब विपत्ति आई, तो मोनिका के उस घमंडी व्यवहार का फल भी सामने आ गया। उसने अपने ससुराल में कभी देवरानी और जेठानी के साथ अपनापन नहीं रखा था, हमेशा खुद को मायके के पैसों की धौंस दिखाकर बड़ा साबित करती रही थी। नतीजा यह हुआ कि इस मुश्किल घड़ी में उसकी देवरानी और जेठानी ने साफ कह दिया कि यह उनका निजी नुकसान है और वे कोई मदद नहीं करेंगी। ससुराल वालों ने भी अपने हाथ पीछे खींच लिए।

मोनिका रो-रोकर अपनी मां को फोन करती थी। देवकी जी की ममता बेटी की इस बर्बादी को देखकर लहूलुहान हो रही थी। वह जानती थीं कि मयंक और प्रियांशी ने पिछले कुछ वर्षों में समझदारी से बचत करके एक अच्छी-खासी रकम बैंक में जमा की है ताकि वे अपना भविष्य सुरक्षित कर सकें। देवकी जी दिल से चाहती थीं कि मयंक अपनी बहन की मदद के लिए आगे आए और उस डूबते परिवार को सहारा दे।

लेकिन देवकी जी के कदम अपनी ही पुरानी बातों की बेड़ियों में जकड़े हुए थे। उन्हें रह-रहकर वह दिन याद आ रहा था जब हरिशंकर जी के देहांत के कुछ महीनों बाद किसी बात पर उन्होंने प्रियांशी को कड़वे शब्दों में ताना मारा था, “तुम मुझे क्या अहसास कराओगी? मैं अपनी बेटी को जो कुछ भी देती हूं, अपने पति के हक के पैसे से देती हूं। मुझे न तो अपने बेटे की कमाई की जरूरत है और न ही कभी तुम्हारी मदद की भीख मांगने आऊंगी। समझी तुम!”

वे शब्द आज शीशे की तरह देवकी जी की आंखों के सामने तैर रहे थे। किस मुंह से वह बहू के सामने जाकर कहें कि मेरी बेटी का घर उजड़ रहा है, उसे बचा लो? उनका आत्मसम्मान और किया गया पश्चाताप उन्हें अंदर ही अंदर घोंट रहा था। वे दिन-रात अपने कमरे में आंसू बहातीं, खाना-पीना छोड़ दिया था और खुद को दुनिया की सबसे असहाय मां समझ रही थीं।

दीपावली का पावन पर्व नजदीक आ रहा था। धनतेरस का दिन था। पूरे घर में दीपकों की कतारें सज रही थीं। आंगन में रंगोली बनाई गई थी। शाम ढलते ही प्रियांशी नए पारंपरिक परिधान पहनकर पूजा की थाली तैयार करने लगी। घर में अगरबत्तियों और कपूर की सुगंध फैली हुई थी।

देवकी जी अपने कमरे के कोने में अंधेरे में बैठी थीं। तभी प्रियांशी ने कमरे में कदम रखा और बहुत ही आदर से कहा, “मां जी, पूजा का शुभ मुहूर्त हो गया है। पंडित जी तो नहीं आए हैं, लेकिन मयंक जी ने सारी तैयारी कर ली है। आपके बिना तो धनतेरस की लक्ष्मी पूजा शुरू नहीं हो सकती। चलिए, बाहर सब आपका इंतजार कर रहे हैं।”

देवकी जी ने एक बेबस नजर अपनी बहू पर डाली, अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और भारी मन से उठकर पूजा घर की तरफ चल पड़ीं। उन्हें लग रहा था कि इस बार की दिवाली उनके जीवन की सबसे अंधियारी दिवाली होगी।

लेकिन जैसे ही देवकी जी ने पूजा कक्ष के दरवाजे पर कदम रखा, उनके पैर वहीं जमीन पर जम गए। उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं।

पूजा के आसन के पास मयंक के साथ उनकी बेटी मोनिका और दामाद सुमित सिर झुकाए हाथ जोड़े बैठे थे। मोनिका के चेहरे पर वह पुराना अहंकार नहीं था, बल्कि आंखों में पश्चाताप के गहरे आंसू थे। सुमित का चेहरा भी संकोच और कृतज्ञता से भरा हुआ था।

“मोनिका… सुमित? तुम दोनों यहां इस वक्त?” देवकी जी की जुबान से बमुश्किल शब्द निकले। उन्हें लगा कि शायद वह कोई सपना देख रही हैं।

मोनिका दौड़कर अपनी मां के सीने से लिपट गई और फूट-फूट कर रोने लगी, “हां मम्मी… अगर आज भैया और भाभी नहीं होते, तो शायद हम सड़क पर आ जाते। हमारे सिर पर छत भी नहीं बचती।”

देवकी जी ने अविश्वास भरी नजरों से मयंक और फिर प्रियांशी की ओर देखा। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

प्रियांशी आगे बढ़ी और उसने देवकी जी के कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में थाम लिया। उसने बहुत ही मृदु और स्नेह भरे स्वर में कहा, “मां जी, आप क्या सोच रही थीं कि आपके चेहरे की उदासी और आंखों का दर्द मुझे दिखाई नहीं दे रहा था? मैं बहू बाद में हूं, इस घर की सदस्य पहले हूं। मुझे सब पता चल गया था कि जीजा जी के व्यापार पर कितना बड़ा संकट आया है और दीदी कितने मानसिक तनाव से गुजर रही हैं।”

देवकी जी की आंखें भर आईं, उन्होंने कांपती आवाज में कहा, “लेकिन प्रियांशी… मोनिका ने तो हमेशा तुम्हारे साथ… और मैंने भी कभी तुम्हारे साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया। मैंने तो तुम्हें इतने कड़वे ताने दिए थे कि मुझे कभी तुम्हारी मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी। फिर तुम…”

प्रियांशी ने मुस्कुराते हुए अपनी सास के आंसुओं को अपने आंचल से पोंछा और बोली, “मां जी, उन पुरानी बातों को याद करके आज का दिन क्यों खराब करना? परिवार का मतलब क्या होता है? परिवार वही होता है जहां सुख में भले ही लोग अपनी-अपनी दुनिया में मस्त रहें, लेकिन दुख की घड़ी में सब एक दीवार बनकर खड़े हो जाएं। मैं मानती हूं कि दीदी और मेरे बीच कुछ कड़वाहट रही है, हमारी सोच नहीं मिलती थी। लेकिन जब घर की बेटी और दामाद पर इतनी बड़ी विपत्ति आई हो, तो क्या हम अपनी पुरानी रंजिशें पालकर बैठ जाते? अगर हम अपनों के आंसुओं को देखकर भी मुंह फेर लेते, तो बाबूजी के दिए संस्कारों का क्या होता?”

मयंक ने आगे आकर अपनी मां के कंधे पर हाथ रखा और बोला, “हां मां, प्रियांशी ने ही मुझे समझाया कि हमारी जो जमा पूंजी थी, वह हमने जीजा जी के कर्ज को चुकाने के लिए दे दी है। हमने बैंक से बात करके उनका गिरवी रखा सामान भी छुड़वा लिया है। जीजा जी बहुत मेहनती हैं, यह बुरा वक्त था जो गुजर गया। अब यह फिर से अपना काम नए सिरे से शुरू करेंगे।”

दामाद सुमित ने हाथ जोड़कर कहा, “मां जी, आज अगर प्रियांशी भाभी और मयंक ने हमें सहारा न दिया होता, तो हमारे अपने रिश्तेदारों ने तो हमारा साथ छोड़ ही दिया था। भाभी ने जो बड़प्पन दिखाया है, उसने मेरी आंखें खोल दी हैं।”

मोनिका घुटनों के बल प्रियांशी के सामने बैठ गई और उसके हाथ पकड़कर रोने लगी, “भाभी, मुझे माफ कर दो। मैंने हमेशा तुम्हारे साथ मुकाबला किया, तुम्हारे हक की चीजों पर अपना अधिकार जमाया, तुम्हें हमेशा दुख पहुंचाया। मुझे अपने उस घमंड पर आज बहुत शर्मिंदगी हो रही है। तुमने मुझे पराया नहीं समझा, बल्कि एक सगी बहन से भी बढ़कर मेरा घर बचा लिया।”

प्रियांशी ने तुरंत मोनिका को उठाकर गले से लगा लिया, “दीदी, पुरानी बातों को यहीं छोड़ दीजिए। आज धनतेरस है, आज हमारे घर की सबसे बड़ी लक्ष्मी यानी हमारे परिवार का प्रेम और एकता वापस लौटी है। जब घर के लोग एक साथ मुस्कुराते हैं, तभी असली रोशनी होती है।”

देवकी जी यह सब देख रही थीं। उनके दिल से वह भारी बोझ, वह अपराधबोध का तूफान पूरी तरह बह गया था। उनके घमंड का पर्दा पूरी तरह गिर चुका था और उसकी जगह बहू के लिए असीम सम्मान और प्यार ने ले ली थी। उन्होंने दोनों हाथ फैलाकर प्रियांशी को अपने सीने से लगा लिया। आज पहली बार उन्होंने प्रियांशी को बहू के रूप में नहीं, बल्कि अपनी सबसे समझदार और बड़ी बेटी के रूप में महसूस किया था।

उस शाम जब पूजा घर में आरती की थाली घूमी और शंख की ध्वनि गूंजी, तो उस घर का कोना-कोना सिर्फ दीयों की लौ से नहीं, बल्कि रिश्तों की पवित्र मिठास और अपनत्व के उजाले से जगमगा उठा था। हरिशंकर जी की तस्वीर पर टंगे फूलों के हार से जैसे एक संतुष्टि भरी मुस्कान इस पूरे परिवार पर बरस रही थी।

दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि एक समझदार और बड़े दिल वाली बहू किसी भी बिखरते हुए परिवार को टूटने से बचा सकती है और मुश्किल वक्त में बदले की भावना रखने के बजाय दिया गया सहारा ही असली बड़प्पन होता है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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