कलंक

 अपने फ्लैट की बालकनी में खड़ी सुनैना चाय का कप थामे दूर सड़क पर जलती-बुझती बत्तियों को देख रही थी। तभी ड्रॉइंग रूम में रखे उसके फोन की स्क्रीन चमक उठी और उसकी रिंगटोन बजने लगी। स्क्रीन पर उसकी बचपन की सहेली वंदना का नाम चमक रहा था।

सुनैना और वंदना का साथ महज दो पड़ोसियों या सहेलियों का नहीं था। बचपन में मुरैना की एक ही गली में गुड़िया-गुड्डे के खेल से शुरू हुआ यह रिश्ता कॉलेज के गलियारों से गुजरते हुए आज तक बदस्तूर कायम था। संयोग ही था कि दोनों का विवाह भी ग्वालियर के एक ही इलाके में हुआ था। घर आधे घंटे की दूरी पर थे, और दोनों के पति—अखिलेश और आलोक—भी आपस में भाइयों जैसा स्नेह रखते थे। अक्सर सप्ताहांत पर चारों का मिलना-जुलना आम बात थी।

सुनैना ने तुरंत कॉल उठाया, “हां वंदना, कहो! आज तो बड़ी जल्दी फुर्सत मिल गई तुम्हें?”

लेकिन दूसरी तरफ से आने वाली आवाज में हमेशा जैसी चहक नहीं थी। वंदना की आवाज में एक अजीब सी भारीपन और रुंधा हुआ स्वर था, “सुनैना… क्या अखिलेश जी घर पर हैं? मुझे अभी तुमसे मिलना है। क्या मैं आ सकती हूं?”

सुनैना का माथा ठनका। उसने तुरंत पूछा, “अरे वंदना, सब ठीक तो है? तुम्हारी आवाज इतनी बुझी हुई क्यों लग रही है? क्या आलोक से कोई बहस हो गई? तू जानती है ना, वो थोड़े जल्दबाज हैं लेकिन दिल के बुरे नहीं हैं। तू चिंता मत कर, अभी आजा।”

“नहीं सुनैना, घर की कोई बात नहीं है। बस… मन बहुत बेचैन है। मैं अभी निकल रही हूं, पहुंचकर बात करती हूं,” वंदना ने रुआंसे स्वर में कहा और फोन काट दिया।

आधे घंटे के भीतर दरवाजे की घंटी बजी। सुनैना ने दरवाजा खोला तो देखा वंदना सामने खड़ी थी, पर बिल्कुल अकेली। चेहरे का रंग उड़ा हुआ, आंखें सूजी हुई थीं।

अखिलेश जो हॉल में बैठकर लैपटॉप पर काम कर रहे थे, वंदना को अकेले देखकर थोड़ा चौंके, “अरे वंदना जी, आलोक भाई कहां रह गए? वो साथ नहीं आए?”

वंदना ने जबरन चेहरे पर फीकी मुस्कान लाते हुए कहा, “नहीं भाई साहब, आज मेरा मन केवल सुनैना के साथ बैठकर पुरानी बातें बांटने का था। इसलिए उन्हें घर पर ही छोड़ आई।”

अखिलेश समझदार इंसान थे। उन्होंने सुनैना की आंखों में तैरती चिंता को देखा और तुरंत अपनी फाइलें समेटते हुए बोले, “अरे बिल्कुल, आप दोनों बचपन की सहेलियां आराम से बातें कीजिए। मुझे भी ऑफिस के कुछ बिल निपटाने के लिए मार्केट जाना था। मैं एक-दो घंटे में लौटता हूं।”

अखिलेश के बाहर जाते ही सुनैना ने दरवाजा बंद किया और वंदना को सोफे पर बैठाते हुए उसके हाथ थाम लिए, “अब बता वंदना, हुआ क्या है? तेरी आंखें बता रही हैं कि तू पिछले कई घंटों से रो रही है।”

वंदना ने अपने पर्स की ज़िप खोली और कांपते हाथों से एक अखबार की तह की हुई कटिंग निकालकर सुनैना के हाथों में रख दी।

“पहले यह पढ़ सुनैना,” वंदना की आवाज में दर्द छलक उठा।

सुनैना ने अखबार के उस टुकड़े पर नजर दौड़ाई। खबर मेरठ की एक विशेष अदालत की थी:

(अदालत ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में पति और ससुराल पक्ष पर दहेज उत्पीड़न और जेठ पर अश्लील छेड़छाड़ का झूठा मुकदमा दायर करने वाली महिला को दोषी करार देते हुए छह महीने के सश्रम कारावास और दो लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। अदालत ने अपनी सख्त टिप्पणी में कहा था कि कानून को प्रतिशोध और ब्लैकमेलिंग का हथियार बनाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।)

खबर पढ़ते ही सुनैना का हाथ वहीं कांप गया। उसके दिमाग के किसी बंद तहखाने का ताला झटके से खुला और बरसों पुरानी धूल जमी यादें सैलाब की तरह बाहर आ गईं। दोनों सहेलियां एक झटके में आठ साल पीछे चली गईं।

मुरैना का वह पुराना शांत मोहल्ला, जहां उनके घर के ठीक सामने एक सफेद रंग का दोमंजिला मकान हुआ करता था। उस घर में रहने वाले डॉक्टर विमलेश जी का परिवार पूरे इलाके में अपनी तहजीब, शराफत और सेवा भाव के लिए जाना जाता था। हर किसी के दुख-दर्द में खड़े रहने वाले उस परिवार का छोटा बेटा था—तन्मय।

तन्मय, जिसकी उम्र उस वक्त महज बीस वर्ष थी। बीएससी कंप्यूटर साइंस के दूसरे वर्ष का छात्र। चेहरे पर हरदम एक मासूम मुस्कान, बात करने में इतना संकोची कि नजरें उठाकर बात तक नहीं करता था। मोहल्ले के किसी भी बुजुर्ग को दवा लानी हो, किसी बच्चे को गणित का सवाल समझ न आए या किसी को अस्पताल की जरूरत पड़े, तन्मय सबसे आगे दौड़ता था। सुनैना और वंदना को वह हमेशा ‘बड़ी दीदी’ कहकर पुकारता था और त्योहारों पर सबसे पहले उनके पांव छूकर आशीर्वाद लेता था।

उस हंसते-खेलते खुशहाल परिवार पर ग्रहण तब लगा, जब डॉक्टर विमलेश के बड़े बेटे के लिए एक अमीर और बेहद आधुनिक परिवार की लड़की से रिश्ता तय हुआ। शादी के कुछ ही महीनों बाद घर में कलह के बीज बोए जाने लगे। वह बड़े बेटे को लेकर परिवार से अलग शहर में बसना चाहती थी, जबकि बुजुर्ग मां-बाप को छोटे बेटे के साथ छोड़ना बड़े बेटे को मंजूर नहीं था। बात बढ़ते-बढ़ते इतनी बिगड़ गई कि उसने पूरे परिवार को सबक सिखाने की ठान ली।

एक दिन अचानक पुलिस की तीन गाड़ियां मोहल्ले में सायरन बजाती हुई रुकीं। उस बहू ने न सिर्फ अपने पति और सास-ससुर पर जानलेवा दहेज उत्पीड़न का केस दर्ज कराया, बल्कि अपनी रंजिश की आग में उस बीस साल के मासूम तन्मय को भी झोंक दिया। उसने तन्मय पर छेड़छाड़ और मर्यादा भंग करने के इतने घिनौने और काल्पनिक आरोप लगाए कि सुनकर पूरे मोहल्ले के रोंगटे खड़े हो गए।

पुलिस बिना किसी जांच के पूरे परिवार को घसीटते हुए ले गई। डॉक्टर विमलेश जी की बरसों की कमाई हुई इज्जत एक ही झटके में तार-तार हो गई। वकीलों के चक्कर, समाज की चुभती नजरें और कानूनी दांव-पेंच में ऐसा चक्रव्यूह बना कि तमाम दलीलों के बावजूद उस दौर में तन्मय की जमानत तक खारिज हो गई। वह मासूम लड़का, जिसने कभी किसी को तेज आवाज में जवाब तक नहीं दिया था, उसे महीनों तक जेल की कालकोठरी में बंद रहना पड़ा।

जेल की सलाखों ने तन्मय के शरीर को ही नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को बुरी तरह लहूलुहान कर दिया था। जब छह महीने बाद किसी तरह उसकी जमानत हुई, तो घर लौटने वाला वह पुराना तन्मय नहीं था। वह एक जिंदा लाश बन चुका था। उसके चेहरे की मुस्कान हमेशा के लिए छिन चुकी थी। वह दिन-रात कमरे के अंधेरे कोने में बैठा रहता, अपने ही हाथों को घूरता और अगर कोई उससे बात करने की कोशिश करता तो वह कांपने लगता था। समाज के तानों और झूठे कलंक के इस भारी बोझ को वह ज्यादा दिन बर्दाश्त नहीं कर पाया।

एक मनहूस सुबह खबर आई कि तन्मय ने अपनी छत के पंखे से लटककर अपनी जान दे दी थी। सुसाइड नोट में उसने सिर्फ इतना लिखा था—”बाबूजी, मैंने कुछ नहीं किया था। मैं निर्दोष हूं, पर यह समाज मुझे जीने नहीं देगा।”

उस घटना के बाद वह परिवार पूरी तरह बिखर गया। डॉक्टर विमलेश जी ने रातों-रात अपना पुश्तैनी घर औने-पौने दामों में बेच दिया और उस शहर को हमेशा के लिए छोड़कर चले गए। किसी को नहीं पता चला कि वे कहां गए, किस हाल में हैं या जिंदा भी हैं या नहीं।

“सुनैना… जबसे मैंने यह अखबार की कटिंग देखी है, मेरे कानों में तन्मय की वही आवाज गूंज रही है—’दीदी, मैंने कुछ नहीं किया था’,” वंदना फूट-फूट कर रोने लगी। “सोच, एक औरत के झूठे अहंकार और बदले की आग ने एक 20 साल के मेधावी बच्चे की जिंदगी लील ली। क्या किसी कानून ने उस वक्त उस लड़के की मासूमियत को देखने की कोशिश की थी?”

सुनैना की आंखों से भी आंसुओं की धार बह निकली। उसने अखबार की कटिंग को मेज पर रखा और एक लंबी सांस ली।

“सच कह रही है वंदना,” सुनैना ने भारी मन से कहा, “अपराध चाहे किसी भी रूप में हो, विनाशकारी होता है। जिस तरह किसी निर्दोष स्त्री के साथ हुई दरिंदगी उसकी आत्मा को तोड़ देती है, ठीक उसी तरह किसी पुरुष पर लगा झूठा और घिनौना लांछन उसकी पूरी पहचान, उसके आत्मसम्मान और उसके जीने के हक को खत्म कर देता है। हमारा समाज अक्सर यह भूल जाता है कि एक बेटे, एक भाई की भी अपनी गरिमा होती है। जब कानून का दुरुपयोग हथियार की तरह किया जाता है, तो सिर्फ एक व्यक्ति नहीं मरता, बल्कि इंसाफ पर से लोगों का भरोसा मर जाता है।”

दोनों सहेलियां काफी देर तक उस दर्द को अपने सीने में दबाए बैठी रहीं। आंसू बहते रहे, और पुरानी यादें घावों की तरह टीसती रहीं।

तभी बाहर कार के रुकने की आवाज आई। कुछ ही देर में अखिलेश और वंदना के पति आलोक दोनों साथ में हंसते हुए कमरे में दाखिल हुए। आलोक के हाथ में गरम समोसे और जलेबियों का पैकेट था।

“अरे भाई, तुम दोनों बचपन की यादों में इतनी खो गईं कि चाय भी ठंडी हो गई?” आलोक ने हंसते हुए माहौल को हल्का करने की कोशिश की।

लेकिन दोनों औरतों के सूजे हुए चेहरे और मेज पर पड़ी अखबार की कटिंग देखकर दोनों पुरुष भी गंभीर हो गए। अखिलेश ने आगे बढ़कर अखबार का टुकड़ा उठाया और पढ़ा। उनके चेहरे पर भी उदासी की गहरी रेखाएं खिंच गईं।

“मुझे पता है तुम दोनों क्या सोच रही हो,” अखिलेश ने बहुत धीमे से कहा, “तन्मय… उस बच्चे के साथ जो हुआ, वह इस समाज का सबसे काला सच था।”

आलोक ने एक गहरी सांस ली और वंदना के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “वंदना, तुम दोनों जिस दर्द को आज फिर से जी रही हो, वह स्वाभाविक है। लेकिन तुम्हें एक बात बताऊं? आज का यह फैसला भले ही देर से आया हो, पर यह इस बात का सबूत है कि अब अंधेरा छंटने लगा है। हमारी अदालतें अब यह समझने लगी हैं कि कानून का मतलब सिर्फ एकतरफा सुरक्षा नहीं, बल्कि निष्पक्ष न्याय है। अगर किसी दोषी को सजा मिलना जरूरी है, तो झूठे आरोप लगाकर किसी बेगुनाह की जिंदगी तबाह करने वालों को भी सलाखों के पीछे भेजना उतना ही जरूरी है।”

सुनैना ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “लेकिन आलोक भाई, जो चला गया वह तो वापस नहीं आ सकता न? तन्मय तो लौटकर नहीं आएगा। उसके मां-बाप का क्या हुआ होगा?”

तभी आलोक के चेहरे पर एक धीमा सा, सुकून भरा भाव उभरा। उसने अपनी जेब से फोन निकाला और एक पुरानी संपर्क सूची तलाशने लगा।

“शायद यह बात मैंने तुम लोगों को पहले कभी नहीं बताई,” आलोक ने शांत स्वर में कहा, “तन्मय के जाने के तीन साल बाद, जब मैं एक बार जबलपुर के पास एक सामाजिक संस्था के काम से गया था, तो वहां मेरी मुलाकात डॉक्टर विमलेश जी से हुई थी।”

वंदना और सुनैना दोनों चौंककर सीधी बैठ गईं, “क्या? अंकल जी? वो कहां हैं? वो ठीक तो हैं?”

आलोक ने सिर हिलाया, “हां। वो दोनों उस दर्द से कभी पूरी तरह उबर तो नहीं पाए, लेकिन उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया। विमलेश जी और उनकी पत्नी ने नर्मदा के किनारे एक छोटा सा अनाथालय और मुफ्त कोचिंग सेंटर शुरू किया है, जिसका नाम उन्होंने रखा है—’तन्मय स्मृति सदन’। वहां वे उन गरीब और अनाथ बच्चों को पढ़ाते हैं जो तन्मय की तरह अपनी पढ़ाई के सपने पूरे करना चाहते हैं। विमलेश जी ने मुझसे एक बात कही थी—’बेटा, मेरे बच्चे की जिंदगी एक झूठ ने छीन ली, लेकिन अगर मैं भी टूटकर मर गया, तो जीत उस झूठ की होगी। मैं अपने बेटे की याद को आंसुओं में नहीं, बल्कि सैकड़ों बच्चों की मुस्कान में जिंदा रखूंगा।'”

यह सुनते ही कमरे का भारी माहौल अचानक एक नई रोशनी से भर गया। सुनैना और वंदना की आंखों में जो आंसू थे, वे अब केवल दुख के नहीं, बल्कि एक असीम आदर और सुकून के थे।

“ईश्वर सचमुच महान है,” वंदना ने हाथ जोड़ते हुए कहा, “उन्होंने उस बेगुनाह की याद को मरने नहीं दिया। जहां से एक जिंदगी छीनी गई थी, वहीं से उन्होंने सैकड़ों जिंदगियों को रास्ता दिखा दिया।”

अखिलेश ने मेज पर रखी उस अखबार की कटिंग को दोबारा उठाया और कहा, “और आज का यह अदालती फैसला भी उसी सच की जीत का एक छोटा सा कदम है। हमें इस फैसले को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहिए, ताकि कोई भी इंसान कानून को किसी निर्दोष के जीवन के साथ खिलवाड़ करने का जरिया न समझे। समाज में जागरूकता ही ऐसे अपराधों को रोक सकती है।”

चारों ने मिलकर तुरंत उस अदालती फैसले को अपने-अपने सोशल मीडिया हैंडल्स और परिजनों के समूहों में साझा किया, साथ ही यह संदेश भी लिखा कि न्याय की तराजू दोनों पक्षों के लिए बराबर होनी चाहिए—न किसी बेकसूर को सजा मिले, और न किसी झूठे षड्यंत्रकारी को माफी।

शाम की उदासी अब एक दृढ़ संकल्प में बदल चुकी थी। सुनैना ने उठकर गरम चाय बनाई। चारों ने मिलकर चाय पी और यह तय किया कि वे जल्द ही जबलपुर जाकर डॉक्टर विमलेश जी के उस आश्रम में बच्चों की मदद के लिए कुछ समय जरूर बिताएंगे।

रात गहरा चुकी थी जब वंदना और आलोक अपने घर के लिए विदा हुए। बालकनी में खड़े होकर सुनैना ने आसमान के टिमटिमाते तारों की ओर देखा। उसे लगा जैसे उन तारों में से एक तारा तन्मय का भी है, जो आज उस अदालती फैसले और अपने माता-पिता के सेवा संकल्प को देखकर मुस्कुरा रहा था। अंधेरा चाहे कितना भी घना और क्रूर क्यों न हो, सत्य और उम्मीद की एक किरण हमेशा जीवन को नई दिशा दिखाने की ताकत रखती है।

दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि कानून का दुरुपयोग करके किसी निर्दोष पर झूठा लांछन लगाना हत्या से भी बड़ा अपराध है, और ऐसे मामलों में समान रूप से कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए? अपने विचार कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

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