लेकिन आज सुमित वह पुराना, डरा हुआ और संकोची इंसान नहीं था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून और दृढ़ता थी।
सुमित ने आगे बढ़कर विनम्रता से हाथ जोड़े और बेहद शांत लेकिन मज़बूत आवाज़ में कहा, “भैया, आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने हमें वापस इस बड़े घर में बुलाने के लायक समझा। लेकिन मैं आपका यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता।”
विकास की आँखें गुस्से से चौड़ी हो गईं, “क्या बक रहे हो तुम? तुम्हारी भलाई के लिए कह रहे हैं।”
सुमित ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “भैया, अगर उस दिन आपने हमें घर से अलग ना किया होता, हमें हमारी हैसियत का ताना ना मारा होता, तो शायद हम ज़िन्दगी भर उस घुटन और हीन भावना में जीते रहते। आपके उस फैसले ने मेरी पत्नी को अपनी असली ताकत पहचानने का मौका दिया।
शहर के सबसे पॉश इलाके में खड़ा ‘शांति निकेतन’ नाम का वो आलीशान बंगला बाहर से जितना भव्य दिखता था, अंदर से रिश्तों की गर्माहट उतनी ही खोखली हो चुकी थी। इस घर में मीनल के कदम पड़े ही थे कि उसे समझ में आ गया कि यहाँ इंसान की कद्र उसके बैंक बैलेंस से होती है। मीनल के पति, सुमित, एक छोटे से स्कूल में मामूली वेतन पर गणित के शिक्षक थे। सुमित स्वभाव से बेहद शांत, ईमानदार और संकोची व्यक्ति थे। वहीं उनके दो बड़े भाई, विकास और संजय, शहर के जाने-माने लोग थे। विकास एक बड़ा ठेकेदार था और संजय का अपना एक बड़ा अस्पताल था।
मीनल एक मध्यवर्गीय परिवार से आई थी, जहाँ प्यार और सम्मान को पैसों से ऊपर रखा जाता था। लेकिन ससुराल में कदम रखते ही उसे अपनी हैसियत का अंदाज़ा करा दिया गया। जेठानियों के महंगे कपड़े, गहने और उनकी किटी पार्टियों की चर्चाओं के बीच मीनल की सूती साड़ियाँ और सादगी हमेशा मज़ाक का विषय बन जाती। घर के डाइनिंग टेबल पर भी जब चर्चा होती, तो विकास और संजय अपने लाखों के टर्नओवर की बातें करते, जबकि सुमित चुपचाप अपनी प्लेट में नज़रें गड़ाए खाना खाता रहता। सुमित के चेहरे पर तैरती वो हीन भावना मीनल से बर्दाश्त नहीं होती थी।
कुछ ही महीनों में घर का माहौल और दमघोंटू होने लगा। जेठानियों ने साफ़ तौर पर कहना शुरू कर दिया, “महंगाई का ज़माना है, नौकर-चाकर, बिजली का बिल, राशन… सब कुछ का खर्च हम ही क्यों उठाएं? जो जितना कमाता है, उसे उस हिसाब से रहना चाहिए।” मीनल इन तानों को सुनकर भी अनसुना कर देती। वह सुबह से लेकर रात तक घर के कामों में जुटी रहती। रसोई संभालना, कपड़े, साफ़-सफाई, सब कुछ वह अपने ज़िम्मे ले लेती ताकि कोई सुमित पर यह ताना न कस सके कि वे लोग मुफ्त की रोटियां तोड़ रहे हैं। लेकिन पैसे का गुरूर ऐसा होता है कि वह इंसान की आँखों पर पट्टी बाँध देता है। मीनल की मेहनत किसी को नज़र नहीं आती थी, नज़र आती थी तो बस सुमित की कमज़ोर आमदनी।
एक शाम, जब घर के मुखिया, यानी सुमित के पिता दीनानाथ जी और माँ कौशल्या देवी हॉल में बैठे थे, तभी विकास और संजय ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिसने बुज़ुर्गों के दिलों पर आरी चला दी। विकास ने बेरुखी से कहा, “बाबूजी, अब हमसे इस घर का साझा खर्च नहीं उठाया जाता। सुमित की कमाई ऊँट के मुँह में जीरा है। बेहतर होगा कि घर का बँटवारा कर दिया जाए।” दीनानाथ जी और कौशल्या देवी की आँखों में आँसू आ गए। जिस परिवार को उन्होंने खून-पसीने से सींचा था, आज वह उनकी आँखों के सामने बिखर रहा था। लेकिन दौलत के नशे में चूर बेटों ने एक न सुनी।
बँटवारा हुआ और जैसा कि अक्सर होता है, कमज़ोर को ही किनारे धकेला जाता है। सुमित और मीनल के हिस्से में बंगले के पीछे का वो पुराना हिस्सा आया, जिसे कभी स्टोर रूम की तरह इस्तेमाल किया जाता था। वहाँ बस दो छोटे कमरे और एक पिछवाड़ा था, जिसकी दीवार सड़क की तरफ खुलती थी। बुज़ुर्ग माता-पिता मुख्य बंगले में ही रहे, लेकिन बँटवारे के दर्द ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था। मीनल ने बिना कोई शिकायत किए अपने छोटे से हिस्से को ही अपना स्वर्ग मान लिया। उसने अपने मायके से मिले थोड़े-बहुत सामान और अपनी सूझबूझ से उन दो कमरों को बहुत ही सलीके से सजा लिया।
शुरुआत में तो दोनों बड़े बेटों के घर से माता-पिता के लिए वक़्त पर खाना आ जाता था, लेकिन धीरे-धीरे उनकी व्यस्तता और जेठानियों की बेरुखी हावी होने लगी। कभी बाबूजी की सुबह की चाय छूट जाती, तो कभी कौशल्या देवी को रात के खाने के लिए इंतज़ार करना पड़ता। मीनल अपने छोटे से आँगन से यह सब देखती तो उसका दिल तड़प उठता। एक दिन उसने देखा कि दोपहर के तीन बज गए हैं और माँ जी भूखी बैठी हैं, क्योंकि जेठानी जी किटी पार्टी में गई थीं और नौकरों ने खाना नहीं दिया। उसी दिन मीनल ने ठान लिया कि अब से माँ और बाबूजी का खाना और देखभाल उसी के ज़िम्मे होगा।
सुमित की तनख्वाह से दो लोगों का गुज़ारा ही मुश्किल से होता था, अब माता-पिता की दवाइयों और अच्छे खान-पान का खर्च भी जुड़ गया। सुमित अंदर ही अंदर घुटने लगा। एक रात उसने भारी मन से मीनल से कहा, “मीनल, मैं बहुत अभागा हूँ। ना तुम्हें कोई सुख दे पा रहा हूँ और ना ही माँ-बाबूजी की ज़रूरतें पूरी कर पा रहा हूँ।” मीनल ने सुमित के हाथ अपने हाथों में लिए और मुस्कुराकर कहा, “आप चिंता क्यों करते हैं? जब नीयत साफ़ हो और इरादे मज़बूत हों, तो ईश्वर कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकालता है। मैं हूँ ना आपके साथ।”
मीनल के दिमाग में कुछ दिनों से एक विचार चल रहा था। उनके हिस्से का जो पिछवाड़ा था, उसकी दीवार शहर की एक व्यस्त सड़क की तरफ खुलती थी, जहाँ से रोज़ाना सैकड़ों छात्र और दफ्तर जाने वाले लोग गुज़रते थे। मीनल के हाथों में अन्नपूर्णा का वास था। जो भी उसके हाथ का खाना खाता, उंगलियाँ चाटता रह जाता। उसने अपने पुराने बर्तन निकाले, थोड़े से पैसे बचाकर बाज़ार से कुछ ज़रूरी मसाले और राशन लाया। उसने एक सादे से लकड़ी के बोर्ड पर अपने हाथों से सुंदर अक्षरों में लिखा— “अन्नपूर्णा टिफिन एवं थाली” और उसे पीछे वाले दरवाज़े के बाहर टाँग दिया।
अगली सुबह, मीनल ने भगवान की पूजा की, माँ-बाबूजी का आशीर्वाद लिया और अपनी छोटी सी रसोई में गैस जला दी। उसने ताज़ी रोटियां, दाल में घी का तड़का और खुशबूदार सब्ज़ी बनाई। वह दरवाज़े के पास एक छोटी सी मेज़ और कुर्सियां लगाकर बैठ गई। सुमित स्कूल जा चुका था। शुरुआत के तीन घंटे तक कोई नहीं आया। मीनल का दिल धक-धक कर रहा था। उसे लगा कि शायद उसका यह फैसला गलत था। निराशा उसे घेरने लगी थी, लेकिन तभी पास के हॉस्टल से दो लड़के वहाँ आए। उन्होंने बोर्ड देखा और हिचकिचाते हुए पूछा, “आंटी, क्या यहाँ खाना मिलेगा? घर जैसा?”
मीनल की आँखों में चमक आ गई। उसने तुरंत कहा, “हाँ बेटा, बिल्कुल तुम्हारी माँ के हाथ जैसा।” मीनल ने उन्हें गरमा-गरम खाना परोसा। लड़कों ने पहला निवाला खाया और उनकी आँखें ख़ुशी से चमक उठीं। “आंटी, ऐसा खाना तो हमने महीनों से नहीं खाया। बिल्कुल घर की याद आ गई!” खाना खाने के बाद जब उन्होंने मीनल के हाथों में पैसे रखे, तो उस छोटी सी रकम ने मीनल के भीतर स्वाभिमान और आत्मविश्वास का एक बड़ा पहाड़ खड़ा कर दिया।
उन दो लड़कों ने जाकर अपने दोस्तों को बताया और अगले ही दिन मीनल की रसोई के बाहर सात-आठ लड़कों की भीड़ खड़ी थी। मीनल की सादगी, खाने का लाजवाब स्वाद और उसके परोसने के स्नेहपूर्ण तरीके ने जादू कर दिया। देखते ही देखते “अन्नपूर्णा टिफिन” उस इलाके में मशहूर हो गया। छात्र, बैंक कर्मचारी और राहगीर वहाँ घर के शुद्ध खाने के लिए आने लगे। आमदनी बढ़ने लगी। सुमित जब स्कूल से लौटता, तो वह भी मीनल की मदद करने लगा। वह बाज़ार से सब्ज़ियां ले आता, हिसाब-किताब रखता और टिफिन पहुँचाने का काम भी खुशी-खुशी करने लगा। सुमित के चेहरे की वो हीन भावना अब एक चमकते हुए गर्व में बदल चुकी थी।
मीनल ने उन पैसों से अपने घर की मरम्मत करवाई, माँ-बाबूजी के लिए एक आरामदायक कुर्सी खरीदी और उनके हर शौक को पूरा करने लगी। दीनानाथ जी और कौशल्या देवी अब अपना ज़्यादातर समय मीनल के उसी छोटे से आँगन में बिताते। वहाँ पैसों की चमक तो नहीं थी, लेकिन सुकून और ठहाकों की कोई कमी नहीं थी।
लेकिन यह ख़ुशी मुख्य बंगले में रहने वाले विकास और संजय को रास नहीं आई। जब उनके रुतबे वाले दोस्तों ने उन्हें बताया कि उनकी छोटी बहू घर के पीछे ढाबा चला रही है, तो दोनों भाइयों का झूठा अहंकार जाग उठा। उन्हें लगा कि इससे समाज में उनकी इज़्ज़त मिट्टी में मिल रही है।
एक रविवार को, विकास और संजय ने सुमित और मीनल को मुख्य बंगले में बुलाया। वहाँ जेठानियां भी मुँह फुलाए बैठी थीं। विकास ने कड़क आवाज़ में कहा, “सुमित, यह क्या तमाशा लगा रखा है तुम दोनों ने? हमारे जैसे प्रतिष्ठित परिवार की बहू सड़क पर लोगों को खाना खिलाएगी? शहर भर में हमारी नाक कट रही है। तुम कल ही वह दुकान बंद कर दो। अगर पैसों की इतनी ही किल्लत है, तो हम तुम्हें हर महीने कुछ रक़म दे दिया करेंगे, लेकिन यह सड़क छाप काम तुरंत बंद होना चाहिए।”
संजय ने भी हामी भरते हुए कहा, “हाँ सुमित, आख़िर हम एक ही परिवार हैं। यह बँटवारे की दीवार हम गिरा देते हैं। तुम लोग वापस इसी घर में हमारे साथ रहने लगो। आख़िर हमारा खून हो तुम।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। मीनल ने सुमित की तरफ देखा। उसे लगा कि शायद सुमित बड़े भाइयों के दबाव में आ जाएगा। लेकिन आज सुमित वह पुराना, डरा हुआ और संकोची इंसान नहीं था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून और दृढ़ता थी।
सुमित ने आगे बढ़कर विनम्रता से हाथ जोड़े और बेहद शांत लेकिन मज़बूत आवाज़ में कहा, “भैया, आप लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने हमें वापस इस बड़े घर में बुलाने के लायक समझा। लेकिन मैं आपका यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता।”
विकास की आँखें गुस्से से चौड़ी हो गईं, “क्या बक रहे हो तुम? तुम्हारी भलाई के लिए कह रहे हैं।”
सुमित ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “भैया, अगर उस दिन आपने हमें घर से अलग ना किया होता, हमें हमारी हैसियत का ताना ना मारा होता, तो शायद हम ज़िन्दगी भर उस घुटन और हीन भावना में जीते रहते। आपके उस फैसले ने मेरी पत्नी को अपनी असली ताकत पहचानने का मौका दिया। आज मीनल जो काम कर रही है, वह कोई ‘सड़क छाप’ काम नहीं है, वह अन्न दान है, मेहनत की कमाई है। उसने मुझे सिखाया है कि इज़्ज़त पैसों से नहीं, अपने पसीने की कमाई से आती है। आज हमारे पास शायद आपके जितनी दौलत न हो, लेकिन रात को नींद बहुत गहरी आती है। हम अपने उस छोटे से घर में बहुत खुश हैं और हम अपना स्वाभिमान किसी चंद रुपयों की खैरात के बदले नहीं बेचेंगे।”
सुमित की इन बातों ने कमरे में मौजूद हर शख्स की बोलती बंद कर दी। विकास और संजय शर्मिंदगी से नज़रें चुराने लगे। दीनानाथ जी की आँखों में आज अपने छोटे बेटे के लिए अपार गर्व था। सुमित ने प्यार से मीनल का हाथ पकड़ा और दोनों पूरे स्वाभिमान और सम्मान के साथ अपने उस छोटे से, लेकिन खुशियों से भरे घर की ओर लौट चले, जहाँ उनके मेहनत की खुशबू महक रही थी।
क्या आपने भी अपनी ज़िंदगी में कभी ऐसा महसूस किया है जहाँ अपनों ने ही आपका साथ छोड़ दिया हो, लेकिन आपने अपनी हिम्मत से एक नई राह बनाई हो? क्या सुमित और मीनल का यह कदम सही था? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ।
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लेखिका : पुष्पा खंडेलवाल