रात के करीब दो बज रहे थे। पूरा घर गहरी नींद में डूबा था, लेकिन स्वाति की आँखों से नींद कोसों दूर थी। तभी उसके फोन की स्क्रीन रोशन हुई। स्क्रीन पर ‘माँ’ का नाम झिलमिला रहा था। इतनी रात गए माँ का फोन आना किसी अनहोनी का संकेत था। कांपते हाथों से स्वाति ने फोन उठाया। दूसरी तरफ से माँ की रुंधी हुई और घबराई हुई आवाज आई, “स्वाति… तेरे पापा… उन्हें अचानक दिल का दौरा पड़ा है। पड़ोसियों की मदद से सिटी अस्पताल लेकर आई हूँ। डॉक्टर कह रहे हैं हालत बहुत नाजुक है… मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा बेटा, मैं बिल्कुल अकेली पड़ गई हूँ।”
माँ की आवाज सुनकर स्वाति के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह एक पल भी बर्बाद किए बिना उठी और अपनी अलमारी से एक छोटा बैग निकालकर उसमें जल्दी-जल्दी अपने कुछ कपड़े ठूंसने लगी। अलमारी के दरवाजे की आवाज से उसके पति विकास की नींद खुल गई।
“ये आधी रात को क्या ड्रामा लगा रखा है? कहाँ जाने की तैयारी हो रही है?” विकास ने झुंझलाते हुए करवट बदलते हुए पूछा।
स्वाति ने रुंधे गले से जवाब दिया, “विकास, पापा को हार्ट अटैक आया है। माँ अस्पताल में अकेली हैं। मेरा इकलौता भाई तो विदेश में है, उसे आने में दो दिन लग जाएंगे। मुझे अभी उनके पास जाना होगा।”
विकास ने उठकर बत्ती जलाई और बड़ी ही बेरुखी से कहा, “तो इसमें इतनी हाय-तौबा मचाने की क्या जरूरत है? सुबह चले जाना। और वैसे भी, अब तुम इस घर की बहू हो। मायके में क्या हो रहा है, इसकी जिम्मेदारी तुम्हारी नहीं है। कल सुबह तुम्हारे पापा के अकाउंट में मैं कुछ पैसे ट्रांसफर कर दूँगा। वहाँ पड़ोसी हैं न, वो संभाल लेंगे। तुम्हें वहाँ जाकर दिन-रात एक करने की जरूरत नहीं है।”
तभी बाहर से आहट सुनकर स्वाति की जेठानी, रश्मि भी दरवाजे पर आ खड़ी हुई। जेठानी ने अपने चिर-परिचित व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “अरे देवरानी जी, अगर शादी के बाद भी मायके का इतना ही मोह था, तो फिर शादी ही क्यों की? हमारे परिवार का भी कोई रुतबा है। घर की बहुएं ऐसे आधी रात को बैग उठाकर मायके भागें, ये हमारे यहाँ नहीं चलता।”
स्वाति को अपनी जेठानी की बातों से ज्यादा विकास की खामोशी और सहमति पर अचंभा हो रहा था। उसने विकास की आँखों में देखा और पूछा, “विकास, मेरे पापा जिंदगी और मौत से लड़ रहे हैं। मेरी माँ उस अस्पताल की सीढ़ियों पर अकेली बैठी रो रही होगी। और तुम पैसों का अहसान जता कर मुझे मेरा फर्ज निभाने से रोक रहे हो?”
विकास का पुरुषवादी अहंकार जाग उठा। उसने उंगली दिखाते हुए चेतावनी भरे स्वर में कहा, “देखो स्वाति, अगर तुमने आज इस घर की दहलीज पार की, तो याद रखना, मेरे घर के दरवाजे तुम्हारे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। मैं भी देखता हूँ, मेरे पैसों और मेरे नाम के बिना तुम कब तक वहाँ मायके में टिकती हो। मुझे पता है, चार दिन में अस्पताल के बिल देखकर रोती हुई मेरे पास ही वापस आओगी।”
विकास की इस बात ने स्वाति के अंदर की उस सहमी हुई लड़की को हमेशा के लिए मार दिया। उसकी आँखों के आंसू सूख गए और उनकी जगह एक दृढ़ संकल्प ने ले ली।
स्वाति ने अपना बैग उठाया और विकास की आँखों में आँखें डालकर बड़े ही शांत लेकिन मजबूत स्वर में कहा, “मुझे रोने की नौबत कभी नहीं आएगी विकास। मेरे माता-पिता ने मुझे सिर्फ घर के काम करना और एक आज्ञाकारी पत्नी बनना नहीं सिखाया है। उन्होंने मुझे पढ़ा-लिखा कर इतना काबिल बनाया है कि मैं अपना और उनका पेट भर सकूं। जिस रिश्ते में मुझे अपनी जन्म देने वाले पिता को मरने के लिए छोड़ देना पड़े, वो रिश्ता मेरे लिए एक बेड़ी से ज्यादा कुछ नहीं है।”
यह कहकर स्वाति ने बिना पीछे मुड़े उस घर की दहलीज पार कर ली। रात के उस सन्नाटे में सड़क पर चलते हुए उसे डर नहीं लग रहा था, बल्कि उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह सदियों पुरानी किसी कैद से आजाद हो गई हो। आज वह सिर्फ एक ‘पराया धन’ या ‘बेटी’ नहीं थी, आज वह अपने बूढ़े माँ-बाप का वह ‘बेटा’ बन गई थी, जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी।
सीधे अस्पताल पहुँचकर स्वाति ने देखा कि उसकी माँ आईसीयू के बाहर एक बेंच पर निढाल बैठी रो रही थीं। स्वाति को देखते ही माँ उससे लिपट गईं। “विकास कहाँ है बेटा? क्या वो नहीं आया? उसे ऐतराज तो नहीं हुआ तेरे इतनी रात को आने पर?” माँ ने घबराहट में पूछा।
स्वाति ने अपने सारे दर्द और अपनी टूटी हुई शादी का सच अपने होंठों के पीछे छिपा लिया। उसने माँ के आँसू पोंछते हुए कहा, “माँ, तुम चिंता मत करो। विकास ने ही तो मुझे जिद करके भेजा है। उसने कहा कि इस वक्त पापा को मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है। तुम बस पापा की फिक्र करो, बाकी सब मैं संभाल लूँगी।”
यह सुनकर माँ को बड़ा सुकून मिला। अगले दिन सुबह डॉक्टरों ने बताया कि पापा के दिल की सर्जरी करनी पड़ेगी और इसके लिए एक बड़ी रकम की जरूरत होगी। स्वाति जानती थी कि उसके माता-पिता के पास इतनी बचत नहीं है।
लेकिन स्वाति हार मानने वालों में से नहीं थी। शादी से पहले वह डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए पारिवारिक कहानियों की स्क्रिप्ट लिखती थी और अपनी आवाज में मार्मिक कहानियों के वॉइसओवर किया करती थी। शादी के बाद ससुराल वालों के तानों की वजह से उसने अपना वो काम छोड़ दिया था। लेकिन आज, उसी कला ने उसका हाथ थामा।
उसने अस्पताल के वेटिंग रूम को ही अपना ऑफिस बना लिया। उसने अपना लैपटॉप खोला और अपने पुराने क्लाइंट्स से संपर्क किया। पापा के आईसीयू में होने के दौरान, जब भी उसे थोड़ा वक्त मिलता, वह वेटिंग रूम के एक शांत कोने में बैठकर सुविचार और कहानियों के वॉइसओवर रिकॉर्ड करती और रात-रात भर जागकर स्क्रिप्ट लिखती। उसकी मेहनत रंग लाई। कुछ ही दिनों में उसे एडवांस पैसे मिलने लगे।
सर्जरी सफल रही। करीब बीस दिन बाद जब पापा को अस्पताल से छुट्टी मिली, तब तक स्वाति ने अपनी मेहनत की कमाई से अस्पताल का सारा बिल चुका दिया था। यही नहीं, उसने एक अच्छी डिजिटल मीडिया कंपनी में कंटेंट क्रिएटर की फुल-टाइम नौकरी भी पक्की कर ली थी।
घर लौटने के कुछ दिन बाद, जब पापा की तबीयत में सुधार होने लगा, तो स्वाति ने महसूस किया कि अब सच बताने का वक्त आ गया है। एक शाम जब माँ और पापा चाय पी रहे थे, तब स्वाति ने उन्हें विकास की दी हुई धमकी और अपने घर छोड़ने की पूरी सच्चाई बता दी। उसने यह भी बताया कि अस्पताल का खर्च विकास ने नहीं, बल्कि उसने खुद अपनी मेहनत से उठाया है।
यह सुनकर पापा के हाथ से चाय का कप छलक गया। उनकी आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने भरे गले से कहा, “मेरी वजह से तेरा घर उजड़ गया बेटा। समाज क्या कहेगा कि एक बाप ने अपनी बेटी का घर बसाने की जगह उसे अपने पास बिठा लिया? तू कल ही विकास के पास लौट जा। उससे माफी मांग ले। हम अपना ध्यान खुद रख लेंगे। एक औरत का असली घर उसका ससुराल ही होता है।”
स्वाति उठी और उसने अपने पिता के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—आत्मसम्मान की चमक।
“पापा,” स्वाति ने बहुत ही प्यार और दृढ़ता से कहा, “क्या समाज ने कभी यह नियम बनाया है कि एक बेटे को शादी के बाद अपने माँ-बाप को बेसहारा छोड़ देना चाहिए? नहीं ना? तो फिर ये नियम सिर्फ बेटियों के लिए क्यों? मैंने वह घर सिर्फ आपके इलाज के लिए नहीं छोड़ा पापा, मैंने वह घर अपने आत्मसम्मान के लिए छोड़ा है। जो इंसान मेरी भावनाओं की, मेरे अस्तित्व की कद्र नहीं कर सकता, उसके साथ पूरी जिंदगी बिताना किसी नरक से कम नहीं है। मेरी शिक्षा, मेरी काबिलियत किस काम की अगर मैं अपनी ही जन्मदात्री माँ के आँसू न पोंछ सकूं?”
स्वाति ने गहरी साँस ली और आगे कहा, “आप समाज की चिंता मत कीजिए पापा। समाज हमारे बिल भरने नहीं आता। आज से आप यह सोचना छोड़ दीजिए कि आपके पास बेटा नहीं है। मैं आपकी बेटी भी हूँ और आपका बेटा भी। अब मैं यहीं रहूँगी, आपके पास, और अपने दम पर इस घर को चलाऊंगी। मुझे किसी के एहसानों के तले दबकर अपनी जिंदगी नहीं जीनी।”
पापा ने रोते हुए अपनी बेटी को गले लगा लिया। माँ भी फूट-फूट कर रो पड़ीं, लेकिन आज उन आंसुओं में दुख नहीं, बल्कि अपनी बेटी पर एक असीम गर्व था। स्वाति ने सच में दिखा दिया था कि बेटियां कभी ‘पराया धन’ नहीं होतीं, बल्कि वो तो वह अनमोल धरोहर होती हैं जो हर मुश्किल में अपने परिवार की ढाल बन जाती हैं। आज स्वाति एक बेटी की कैद से आज़ाद होकर, सही मायनों में एक इंसान बन गई थी, जिसे अपने फैसले खुद लेने का हक था।
दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या स्वाति का अपनी शादी और एक घमंडी पति के झूठे रुतबे से ज्यादा अपने आत्मसम्मान और अपने माता-पिता को चुनना सही फैसला था?
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लेखिका : इंदिरा गर्ग