“मुझे माफ़ कर दीजियेगा बाबूजी,” राधिका का गला बुरी तरह रुंध चुका था। “मुझे पता है, मेरा चेहरा देखकर हर कोई ऐसे ही डर जाता है। मैं यहां से चली जाती हूँ।”
वह पीछे मुड़ने लगी, लेकिन उसका दर्द आंसुओं और शब्दों के रूप में बह निकला। वह बिना उनकी तरफ देखे, रुंधे हुए गले से बोलती चली गई, “मैं थक गई हूँ बाबूजी… दर-दर की ठोकरें खाकर थक गई हूँ। मैं कोई अपराधी नहीं हूँ, मैं तो बस एकतरफा प्यार में पागल एक दरिंदे की सनक का शिकार हुई थी। उसने मुझ पर तेज़ाब फेंक कर मेरा चेहरा जला दिया, लेकिन समाज ने अपने तानों और अपनी नफरत से मेरी रूह को जला दिया है। मैं जहां भी नौकरी मांगने जाती हूँ, या कोई दुकान किराए पर लेने जाती हूँ, लोग मुझे धक्के मारकर निकाल देते हैं। कहते हैं कि मेरे इस डरावने चेहरे को देखकर उनके ग्राहक भाग जाएंगे।”
शहर के एक शांत और पुराने मोहल्ले में रिटायर्ड पोस्टमास्टर दीनानाथ जी अपनी पत्नी कौशल्या के साथ रहते थे। उनके दोनों बच्चे अपने-अपने परिवारों के साथ विदेश में बस चुके थे। घर बहुत बड़ा था, लेकिन उसमें रहने वाले केवल दो बूढ़े लोग। घर के बाहरी हिस्से में एक बड़ा सा कमरा था, जिसे दीनानाथ जी ने कभी अपने एक छोटे से पुस्तकालय के रूप में बनवाया था। लेकिन बढ़ती उम्र और अकेलेपन के कारण वह कमरा अब अक्सर बंद ही रहता था। एक दिन दोनों ने तय किया कि क्यों न इस खाली पड़े कमरे को किराए पर दे दिया जाए। इससे न केवल घर में थोड़ी चहल-पहल बनी रहेगी, बल्कि किसी जरूरतमंद को एक अच्छी जगह भी मिल जाएगी और हर महीने कुछ बंधी हुई आमदनी भी हो जाएगी, जिसे वे किसी अनाथालय में दान कर सकेंगे।
किराए का बोर्ड बाहर लटकते ही कई लोग पूछताछ के लिए आने लगे। कोई वहां मोटर गैरेज खोलना चाहता था, तो कोई फास्ट-फूड का ठेला लगाना चाहता था। एक प्रॉपर्टी डीलर तो वहां वीडियो गेम पार्लर खोलने की जिद पर अड़ा था। लेकिन दीनानाथ जी और कौशल्या जी को शांति पसंद थी। वे चाहते थे कि कोई ऐसा काम वहां हो जिससे मोहल्ले का माहौल न बिगड़े। काफी दिनों तक बात नहीं बनी और वह कमरा वैसा का वैसा ही खाली पड़ा रहा।
अगस्त का महीना था और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। एक दोपहर जब दीनानाथ जी बरामदे में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे और कौशल्या जी उनके लिए चाय ला रही थीं, तभी लोहे के मुख्य द्वार पर किसी ने संकोच के साथ दस्तक दी।
दीनानाथ जी ने चश्मा खिसका कर देखा, तो गेट पर एक छरहरी सी लड़की खड़ी थी। उम्र यही कोई पच्चीस-छब्बीस साल रही होगी। उसने एक सादे रंग का सूती सलवार-सूट पहना हुआ था और अपने सिर और चेहरे के आधे हिस्से को एक बड़े से दुपट्टे से बहुत ही सावधानी से ढक रखा था। उसके हाथ में एक पुराना सा फाइल फोल्डर था, जिसे वह घबराहट में अपनी छाती से लगाए हुए थी।
“अंदर आ जाओ बेटा, बारिश हो रही है,” दीनानाथ जी ने अपनी स्वाभाविक वात्सल्य भरी आवाज़ में कहा।
लड़की धीरे-धीरे कदमों से बरामदे में आई। कौशल्या जी भी वहीं कुर्सी पर बैठ गईं। लड़की ने बहुत ही अदब से दोनों को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। उसकी आंखें ज़मीन की तरफ झुकी हुई थीं।
“जी, मैंने बाहर ‘किराए के लिए खाली है’ का बोर्ड देखा था। मैं उसी सिलसिले में आई हूँ,” लड़की ने बहुत ही धीमी और मीठी आवाज़ में कहा।
कौशल्या जी को उस लड़की का संकोच और सादगी बहुत भली लगी। उन्होंने पूछा, “क्या नाम है तुम्हारा बेटी? और तुम इस कमरे में क्या काम शुरू करना चाहती हो?”
“मेरा नाम राधिका है, मां जी,” उसने थोड़ा झिझकते हुए कहा। “मैं सिलाई-कढ़ाई और हस्तशिल्प (हैंडीक्राफ्ट) का काम जानती हूँ। मैं यहां एक छोटा सा सिलाई केंद्र और बुटीक खोलना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि मेरे जैसी और भी बेसहारा लड़कियां और औरतें यहां आएं, काम सीखें और अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। मैंने इसके लिए बैंक से एक छोटा सा लोन भी पास करवाया है।”
दीनानाथ जी और कौशल्या जी ने एक-दूसरे की तरफ देखा। उनके चेहरों पर एक संतोषजनक मुस्कान तैर गई। उन्हें बिल्कुल ऐसा ही कोई इंसान चाहिए था।
“यह तो बहुत ही नेक विचार है बेटा,” दीनानाथ जी ने कहा। “हमें तुम्हारा काम और तुम्हारी सोच दोनों बहुत पसंद आए। तुम चाहो तो कल से ही इस कमरे की साफ-सफाई शुरू करवा सकती हो।”
यह सुनकर राधिका की आंखों में चमक आ गई, लेकिन वह चमक बस एक पल के लिए ही थी। अचानक उसकी नज़रें फिर से ज़मीन में गड़ गईं। उसने अपने फाइल फोल्डर को और ज़ोर से भींच लिया।
इसी बीच कौशल्या जी अंदर से उसके लिए चाय ले आईं। जैसे ही राधिका ने चाय का कप लेने के लिए अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए, अचानक उसके कंधे से वह दुपट्टा खिसक कर नीचे गिर गया, जिससे उसने अपना चेहरा छुपा रखा था।
दुपट्टा हटते ही राधिका का पूरा चेहरा सामने आ गया। उसके चेहरे का दाहिना हिस्सा पूरी तरह से झुलसा हुआ था। वह एक भयानक तेज़ाब हमले का शिकार थी। उसकी एक आंख की पलकें गायब थीं और त्वचा बुरी तरह सिकुड़ गई थी।
दीनानाथ जी और कौशल्या जी एक पल के लिए स्तब्ध रह गए। उनके चेहरे पर अचानक आई इस हैरानी को राधिका ने तुरंत भांप लिया। जिस चीज़ का उसे डर था, वही हुआ। उसने कांपते हाथों से चाय का कप वहीं मेज़ पर रख दिया। उसकी आंखों से आंसुओं की धार फूट पड़ी। उसने झटपट अपना दुपट्टा उठाया और फिर से अपना चेहरा ढक लिया।
“मुझे माफ़ कर दीजियेगा बाबूजी,” राधिका का गला बुरी तरह रुंध चुका था। “मुझे पता है, मेरा चेहरा देखकर हर कोई ऐसे ही डर जाता है। मैं यहां से चली जाती हूँ।”
वह पीछे मुड़ने लगी, लेकिन उसका दर्द आंसुओं और शब्दों के रूप में बह निकला। वह बिना उनकी तरफ देखे, रुंधे हुए गले से बोलती चली गई, “मैं थक गई हूँ बाबूजी… दर-दर की ठोकरें खाकर थक गई हूँ। मैं कोई अपराधी नहीं हूँ, मैं तो बस एकतरफा प्यार में पागल एक दरिंदे की सनक का शिकार हुई थी। उसने मुझ पर तेज़ाब फेंक कर मेरा चेहरा जला दिया, लेकिन समाज ने अपने तानों और अपनी नफरत से मेरी रूह को जला दिया है। मैं जहां भी नौकरी मांगने जाती हूँ, या कोई दुकान किराए पर लेने जाती हूँ, लोग मुझे धक्के मारकर निकाल देते हैं। कहते हैं कि मेरे इस डरावने चेहरे को देखकर उनके ग्राहक भाग जाएंगे।”
राधिका फूट-फूट कर रोने लगी। उसने आगे कहा, “हमारा समाज कितना अजीब है न मां जी? गलती किसी और ने की, और सज़ा पूरी ज़िंदगी मुझे मिल रही है। लोग मेरी कला, मेरी मेहनत, मेरे हुनर को नहीं देखते, बस इस जले हुए मांस को देखते हैं। मैं किसी की मोहताज नहीं बनना चाहती, मैं भीख नहीं मांगना चाहती। मैं बस अपने सम्मान और अपने वजूद की तलाश कर रही हूँ… क्या एक इज़्ज़तदार ज़िंदगी जीने का मेरा कोई हक नहीं है?”
बरामदे में एक भारी सन्नाटा छा गया। राधिका की एक-एक बात उन दोनों बुजुर्गों के दिल को किसी तीर की तरह चीर रही थी। राधिका ने अपने आंसू पोंछे और दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाने लगी।
तभी कौशल्या जी अपनी कुर्सी से उठीं और तेज़ी से आगे बढ़कर राधिका का हाथ पकड़ लिया। राधिका ने चौंक कर उन्हें देखा।
कौशल्या जी की अपनी आंखें भी आंसुओं से भीगी हुई थीं। उन्होंने अपने हाथों से राधिका के चेहरे पर पड़ा वह दुपट्टा पूरी तरह से हटा दिया।
“क्यों छुपाती है इस चेहरे को पगलो?” कौशल्या जी ने राधिका के झुलसे हुए गाल पर बहुत ही कोमलता से हाथ फेरते हुए कहा, “बदसूरत तू नहीं है बेटी, बदसूरत तो वह समाज है जिसकी सोच इतनी छोटी है। तेरा चेहरा तो तेरे अदम्य साहस और तेरी लड़ाई की पहचान है।”
दीनानाथ जी भी अपनी जगह से उठकर आ गए। उन्होंने राधिका के हाथ से वह फाइल फोल्डर ले लिया और मुस्कुराते हुए कमरे की चाबी उसके हाथ में रख दी।
“आज से यह कमरा तुम्हारा हुआ, बेटी,” दीनानाथ जी ने कहा। “तुम कल से ही नहीं, बल्कि आज से ही अपना काम शुरू करो। और हां, तुम्हारे बुटीक की सबसे पहली ग्राहक तुम्हारी ये मां जी ही होंगी। इन्हें नए-नए सूट पहनने का बहुत शौक है।”
दीनानाथ जी की इस बात पर राधिका के रोते हुए चेहरे पर एक खूबसूरत सी मुस्कान खिल उठी। उसने झुककर दोनों के पैर छुए। उसे ऐसा लगा जैसे बरसों से घने अंधेरे में भटकने के बाद अचानक उसे एक नई सुबह का सूरज मिल गया हो। दीनानाथ और कौशल्या जी ने उसे एक किराएदार नहीं, बल्कि एक बेटी के रूप में अपना लिया था। और राधिका ने भी उस दिन उस खाली कमरे में सिर्फ अपना बुटीक ही नहीं, बल्कि अपनी खोई हुई पहचान और अपने अस्तित्व की नींव रख दी थी।
क्या आपको नहीं लगता कि समाज को ऐसे लोगों के प्रति अपना नज़रिया बदलना चाहिए और उन्हें दया नहीं, बल्कि समान अवसर और सम्मान देना चाहिए? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।
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लेखिका : सारिका चारु