दो आंगनों की दहलीज

शहर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की सीढ़ियां उतरते हुए अर्चना  के पैर मन से भी ज्यादा भारी हो रहे थे। उसके कपड़ों में अब भी अस्पताल की वो अजीब सी गंध बसी हुई थी—दवाइयों, स्पिरिट और फिनाइल की मिली-जुली गंध। ऑटो में बैठकर पूरे रास्ते वह शून्य में ताकती रही। उसकी आंखों के सामने बार-बार अपनी मां का वह पीला पड़ा चेहरा और आईसीयू मॉनिटर पर चलती वो टेढ़ी-मेढ़ी हरी लकीरें आ रही थीं।

शाम के सात बज चुके थे। जैसे ही अर्चना  ने अपने घर का दरवाजा खोला, सामने सोफे पर उसके पति समीर बैठे हुए थे। टीवी पर न्यूज चैनल चल रहा था और उनके हाथ में मोबाइल था। अर्चना  को देखते ही समीर के माथे पर सिलवटें पड़ गईं।

“अर्चना , यह कोई समय है घर आने का? तुम तो बस मां जी को देखने गई थीं, इतना वक्त लगता है क्या? तुम्हें पता है ना कि मेरी मां के घुटनों में दर्द रहता है, वो किचन में खड़ी नहीं हो सकतीं। दोपहर से सबने ढंग से कुछ नहीं खाया है। कम से कम अपने घर की तो सुध लिया करो, वहीं जाकर बैठ गईं!” समीर की आवाज में नाराजगी और खीझ साफ झलक रही थी।

अर्चना , जो पहले से ही अंदर से टूटी हुई थी, समीर के इन तीखे शब्दों को सह नहीं पाई। उसकी लाल हो चुकी आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उसने दरवाजे की चौखट को कसकर पकड़ लिया और रुंधे हुए गले से किसी तरह खुद को संभालते हुए बोली, “मां की तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ गई थी समीर। उन्हें अचानक माइनर हार्ट अटैक आया था। मैं उन्हें आईसीयू में एडमिट करा कर आ रही हूं। डॉक्टर कह रहे थे कि अगर थोड़ी भी देर हो जाती तो… तो शायद…”

अर्चना  आगे कुछ बोल नहीं पाई और फूट-फूट कर रोने लगी।

यह सुनकर समीर का गुस्सा अचानक हवा हो गया। उसके चेहरे पर एक पल के लिए अपराधबोध की छाया गुजरी। वह सोफे से उठा और अर्चना  के पास आकर बोला, “ओह! मुझे नहीं पता था कि बात इतनी सीरियस है। तुम्हें मुझे फोन कर देना चाहिए था। खैर, तुम शांत हो जाओ। रोने से कुछ नहीं होगा।”

समीर ने अर्चना  के कंधे पर हाथ रखते हुए आगे कहा, “तुम एक काम करो, तुम जाकर नहा लो। अस्पताल से आई हो, इंफेक्शन का डर रहता है। और हां, खाने की चिंता मत करो, मैंने हम दोनों के लिए बाहर से खाना ऑर्डर कर दिया है। बस तुम नहाने के बाद मां जी के लिए दलिया या दो फुलके सेक देना, तुम्हें तो पता है वो बाहर का मसालेदार खाना नहीं खातीं। तुम जल्दी से फ्रेश हो जाओ।”

अर्चना  को समीर की यह बात सुनकर एक अजीब सी तसल्ली मिली। उसे लगा कि चलो, कम से कम समीर ने उसकी परेशानी को समझा और बाहर से खाना मंगवा लिया। एक ऐसी स्थिति में जहां वह शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह निढाल थी, समीर का यह छोटा सा कदम उसे बहुत बड़ी मदद और केयर (परवाह) लग रहा था। यह हमारे समाज की विडंबना ही है कि औरतें पतियों की जरा सी सहूलियत को भी उनका बहुत बड़ा अहसान मान लेती हैं।

अर्चना  बिना कुछ कहे सीधे बाथरूम में चली गई। शावर के नीचे खड़ी अर्चना  के आंसुओं को पानी ने धो तो दिया, लेकिन उसके मन का भारीपन कम नहीं हुआ। नहाने के बाद उसने जल्दी से कपड़े बदले और सीधे किचन में आ गई।

किचन में गैस जलाते हुए अर्चना  का पूरा ध्यान अस्पताल के उस ठंडे बिस्तर पर लेटी अपनी मां की तरफ था। उसकी मां, जिसने जिंदगी भर अकेले ही उसे पाला था। पिता के गुजर जाने के बाद मां ने कभी अर्चना  को किसी चीज की कमी नहीं होने दी। आज वही मां अस्पताल की सफेद चादरों के बीच, नलियों और मशीनों के सहारे जिंदगी की जंग लड़ रही थी।

अर्चना  ने कुकर में दलिया चढ़ाया और आटा गूंथने लगी। आटा गूंथते हुए उसके हाथ यंत्रवत चल रहे थे, लेकिन उसका दिमाग अस्पताल के वार्ड में ही अटका हुआ था। ‘क्या मां को होश आ गया होगा? क्या नर्स ने उन्हें पानी पिलाया होगा? क्या उन्हें मेरी याद आ रही होगी? काश, मैं रात भर वहां रुक पाती… लेकिन फिर सुबह समीर का टिफिन और मां जी का नाश्ता कौन बनाता?’

एक बेटी होने का दर्द और एक बहू होने का फर्ज़, दोनों अर्चना  के सीने में एक साथ किसी आरी की तरह चल रहे थे।

तभी बाहर से समीर की आवाज आई, “अर्चना , मेरा पार्सल आ गया है, तुम मां जी का खाना जल्दी दे दो फिर हम साथ में खाते हैं।”

“बस पांच मिनट समीर,” अर्चना  ने जवाब दिया। उसने जल्दी-जल्दी रोटियां सेंकी। घी लगाकर थाली सजाई और अपनी सास, सुमित्रा जी के कमरे में गई।

सुमित्रा जी बिस्तर पर लेटी हुई टीवी पर कोई धार्मिक सीरियल देख रही थीं। अर्चना  ने उनके सामने छोटी टेबल पर खाना रखा।

“बहुत देर कर दी बहू आज। मेरे तो पेट में चूहे कूद रहे थे,” सुमित्रा जी ने रोटी का टुकड़ा तोड़ते हुए कहा।

“मां जी, मेरी मां को हार्ट अटैक आया था। उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा, इसी में देर हो गई,” अर्चना  ने धीमी आवाज में कहा। उसे लगा शायद सास कुछ सांत्वना के शब्द कहेंगी।

“अरे राम राम! आज-कल तो ये बीमारियां बहुत फैल गई हैं। उम्र भी तो हो गई है तुम्हारी मां की। भगवान सब ठीक करेगा। बहू, जरा दलिये में नमक कम लग रहा है, वो काला नमक की शीशी तो पकड़ा देना,” सुमित्रा जी ने टीवी स्क्रीन से नजरें हटाए बिना बड़ी सहजता से कह दिया।

अर्चना  ने चुपचाप नमक की शीशी आगे बढ़ा दी। एक गहरी सांस ली और कमरे से बाहर आ गई। उसे यह देखकर हैरत नहीं हुई, बस एक गहरी टीस उठी। जब सास के घुटने में दर्द होता है, तो पूरे घर का माहौल ऐसा हो जाता है जैसे कोई बहुत बड़ी विपत्ति आ गई हो, लेकिन उसकी मां आईसीयू में मौत से लड़ रही थी और किसी के लिए यह सिर्फ एक सामान्य सी खबर थी, जिसमें दलिये का नमक ज्यादा महत्वपूर्ण था।

किचन समेट कर जब अर्चना  डाइनिंग टेबल पर आई, तो समीर अपना खाना शुरू कर चुका था। अर्चना  ने भी अपनी प्लेट में थोड़ा सा खाना निकाला, लेकिन उसके गले से एक निवाला भी नीचे नहीं उतर रहा था। हर कौर उसे कांटे की तरह चुभ रहा था। वह बार-बार अपना मोबाइल देख रही थी, इस उम्मीद में कि अस्पताल में रुकी उसकी पड़ोसन आंटी का कोई मैसेज आया हो।

“खा लो अर्चना , ठंडी हो रही है सब्जी। डॉक्टर तो हैं ही वहां देखने के लिए, तुम घर बैठकर क्या कर लोगी? कल सुबह चले जाना एक-दो घंटे के लिए,” समीर ने मोबाइल में देखते हुए बहुत ही कैजुअल तरीके से कहा।

अर्चना  ने सिर्फ सिर हिलाया। वह बहस करने या समझाने की स्थिति में नहीं थी। उसे पता था कि समीर बुरा इंसान नहीं है, लेकिन वह एक ऐसी पितृसत्तात्मक सोच का हिस्सा है, जहां पत्नी के मायके वालों की तकलीफ को हमेशा दोयम दर्जे पर रखा जाता है। समीर ने खाना ऑर्डर करके अपना फर्ज़ निभा दिया था, लेकिन क्या किसी ने अर्चना  के मन के उस तूफान को समझा जो इस वक्त उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था?

खाना खत्म करके अर्चना  ने बर्तन समेटे। रात के ग्यारह बज चुके थे। घर में पूरी तरह सन्नाटा छा गया था। समीर खर्राटे ले रहा था और सुमित्रा जी भी अपने कमरे में सो चुकी थीं। घर के सारे काम निपटाने के बाद, अर्चना  बालकनी में आकर खड़ी हो गई। रात की ठंडी हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी।

उसने अपना मोबाइल खोला। स्क्रीन पर मां की हंसती हुई तस्वीर थी। स्क्रीन को चूमते हुए अर्चना  की आंखों से दो बूंद आंसू टपक कर मोबाइल पर गिर पड़े। वह एक पल के लिए भूल गई थी कि वह किसी की बहू है, किसी की पत्नी है। इस वक्त वह सिर्फ और सिर्फ एक बेटी थी, जो अपनी मां के लिए तड़प रही थी।

उसे याद आया कि जब वह छोटी थी और उसे तेज बुखार आता था, तो उसकी मां पूरी रात उसके सिरहाने बैठकर ठंडे पानी की पट्टियां रखती थी। मां ने कभी अपनी नींद, अपनी भूख की परवाह नहीं की। और आज? आज जब मां को उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी, तो वह यहां इस बालकनी में खड़ी होकर सिर्फ आंसू बहा सकती थी, क्योंकि कल सुबह उठकर उसे फिर से इस घर की मशीन का एक पुर्जा बनना था।

अर्चना  ने आसमान की तरफ देखा, तारे धुंधले नजर आ रहे थे। उसने हाथ जोड़कर आंखें बंद कर लीं, “हे भगवान, मेरी मां को बचा लेना। बस कल सुबह तक वो ठीक रहें, मैं सुबह सबसे पहले उनके पास जाऊंगी।”

रात के इस सन्नाटे में, अर्चना  का वह मौन रुदन शायद किसी को सुनाई नहीं दे रहा था, लेकिन वह हर उस औरत की कहानी बयां कर रहा था, जो अपने मायके और ससुराल के बीच एक ऐसा नाजुक पुल बनकर रह जाती है, जिस पर चलते हुए उसके खुद के जज्बात अक्सर कुचले जाते हैं। एक औरत कितने ही रिश्ते क्यों न निभा ले, लेकिन एक बेटी का हृदय उसके अंदर जीवन की आखिरी सांस तक धड़कता है। और जब उस हृदय पर चोट लगती है, तो दर्द की कोई सीमा नहीं होती। अर्चना  आज उसी असीम दर्द की दहलीज पर खड़ी थी, जहां एक तरफ फर्ज़ था और दूसरी तरफ उसकी अपनी मां की लड़खड़ाती सांसें।


दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या शादी के बाद एक औरत से यह उम्मीद करना सही है कि वह अपने माता-पिता की तकलीफ को भूलकर सिर्फ अपने ससुराल की जिम्मेदारियों में ही उलझी रहे? अर्चना  की इस मनोदशा को लेकर आपके क्या विचार हैं?

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

लेखिका : कमला त्यागी

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