सुधीर अकेला पड़ गया। उसे अपने माता-पिता को जेल जाने से बचाना था। उसने राधिका के वकील से मिन्नतें कीं। सौदा तीस लाख में तय हुआ। सुधीर ने अपनी ज़िंदगी भर की सारी बचत तोड़ दी। अपने प्रोविडेंट फंड के पैसे निकाले। जब उससे भी काम नहीं चला, तो उसने अपने गाँव की वो पुश्तैनी ज़मीन बेच दी, जिसे उसके पिता अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करते थे। तीस लाख रुपये और वो सारे गहने जो उन्होंने राधिका को पहनाए थे, सब उसे सौंप दिए गए। तब जाकर एक ‘म्यूच्यूअल डाइवोर्स’ (आपसी सहमति से तलाक) का कागज़ साइन हुआ और वे एफआईआर से बरी हुए।
शाम के धुंधलके में जब भी शहर की इमारतें रोशन होने लगतीं, ३७ वर्षीय सुधीर के सीने में एक अजीब सी टीस उठने लगती थी। वह एक सरकारी बैंक में अच्छे पद पर कार्यरत था। ज़िन्दगी में किसी चीज़ की कमी नहीं थी, सिवाय एक हमसफ़र के। उसके पिता, श्री दीनानाथ, एक सेवानिवृत्त स्कूल प्रिंसिपल थे, जिनकी ईमानदारी और उसूलों की कसमें पूरा मोहल्ला खाता था। माँ, सुमित्रा देवी, एक बेहद शांत और धार्मिक महिला थीं, जिनका ज़्यादातर समय पूजा-पाठ और अपने इकलौते बेटे की लंबी उम्र की दुआएं मांगने में गुज़रता था। सब कुछ था उस घर में, लेकिन सुधीर की बढ़ती उम्र और उसका कुंवारापन, माता-पिता की आँखों में एक गहरे दुख की तरह बस गया था। सुधीर काम से लौटता, तो घर में वही पुराना सन्नाटा उसका स्वागत करता। माता-पिता बूढ़े हो रहे थे और उनकी सबसे बड़ी चिंता यही थी कि उनके बाद उनके बेटे का क्या होगा। रिश्तेदारों के ताने, पड़ोसियों की चुभने वाली बातें और समाज के सवाल दीनानाथ जी के आत्मसम्मान को छलनी करते जा रहे थे। “बेटा कितना भी कमा ले, लेकिन अगर घर में बहू नहीं, तो वो घर, घर नहीं होता,” यह जुमला सुधीर को हर दिन सुनना पड़ता था। अपने उसी अकेलेपन को दूर करने और माता-पिता के सुकून के लिए, सुधीर ने शादी के लिए हामी भर दी।
तलाश शुरू हुई और एक दूर के रिश्तेदार ने एक लड़की सुझाई। लड़की का नाम राधिका था। वह एक छोटे से कस्बे की रहने वाली थी। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमज़ोर थी। राधिका के पिता का सालों पहले देहांत हो चुका था और उसकी माँ सिलाई-कढ़ाई करके जैसे-तैसे घर चला रही थी। दीनानाथ जी और सुमित्रा देवी को जब इस परिवार के बारे में पता चला, तो उनका दिल पसीज गया। उन्होंने तय किया कि वे इस गरीब की बेटी को अपने घर की लक्ष्मी बनाएंगे। उन्होंने राधिका की माँ से साफ कह दिया कि उन्हें दहेज में एक सुई भी नहीं चाहिए। “हमें बस एक संस्कारी बेटी चाहिए जो हमारे सुधीर का घर बसा सके,” दीनानाथ जी ने हाथ जोड़कर कहा था। सुधीर भी खुश था कि चलो, किसी की ज़िंदगी संवर जाएगी और उसका अपना सूनापन भी दूर हो जाएगा।
शादी का पूरा खर्च सुधीर के परिवार ने उठाया। शहर के एक अच्छे मैरिज हॉल में धूमधाम से शादी हुई। सुमित्रा देवी ने अपनी होने वाली बहू के लिए अपनी पसंद से भारी-भारी गहने और महंगे कपड़े बनवाए थे। जब राधिका विदा होकर उस घर में आई, तो उसे सच में किसी राजकुमारी की तरह रखा गया। सुमित्रा देवी उसे रसोई में जाने तक नहीं देती थीं। “अरे अभी तो नई-नवेली है, आराम करने दो इसे,” वो मुस्कुराकर कहतीं। सुधीर भी अपनी ज़िंदगी के इस नए पड़ाव से बेहद खुश था। उसे लगा कि सालों से उसके भीतर जो एक खालीपन था, वह अब हमेशा के लिए भर गया है। राधिका बहुत मीठा बोलती थी। वह हर बात में ‘जी माँ जी’, ‘जी बाबूजी’ कहती और सुधीर का तो मानो पलकों पर बिठाकर रखती। पंद्रह दिन ऐसे गुज़रे जैसे कोई खूबसूरत सपना हो। घर में हंसी-ठिठोली गूंजने लगी थी। दीनानाथ जी को लगा जैसे उन्होंने जीवन की सबसे बड़ी जंग जीत ली हो।
फिर पग-फेरे की रस्म का दिन आया। राधिका को कुछ दिनों के लिए अपने मायके जाना था। सुधीर उसे खुद अपनी गाड़ी से उसके कस्बे तक छोड़कर आया। राधिका ने जाते हुए उसे गले लगाया और कहा कि वह जल्दी लौट आएगी। सुधीर जब वापस लौटा, तो उसे पहली बार वो घर फिर से खाली-खाली सा लगा, लेकिन इस बार उस खालीपन में एक उम्मीद थी कि कुछ दिनों बाद घर की रौनक वापस आ जाएगी।
एक हफ्ता बीत गया। सुधीर ने जब राधिका को फोन किया, तो उसका नंबर बंद आया। उसकी माँ को फोन किया, तो उन्होंने भी ठीक से बात नहीं की और कुछ बहाने बनाकर फोन काट दिया। सुधीर थोड़ा परेशान हुआ, लेकिन उसने सोचा शायद वहां नेटवर्क की दिक्कत होगी। फिर एक दिन वो हुआ, जिसकी किसी ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी।
दोपहर का वक्त था। दीनानाथ जी बरामदे में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे, तभी उनके घर के सामने पुलिस की एक जीप आकर रुकी। मोहल्ले के लोग बाहर निकल आए। जीप से एक इंस्पेक्टर उतरा, और उसके पीछे-पीछे राधिका, उसकी माँ और एक वकील उतरे। सुधीर उस वक्त बैंक में था। सुमित्रा देवी घबराहट में बाहर आईं। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, इंस्पेक्टर ने कड़कती आवाज़ में कहा, “दीनानाथ जी, आप पर और आपके परिवार पर आपकी बहू ने दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना का केस दर्ज कराया है। थाने चलिए।”
यह सुनते ही दीनानाथ जी के हाथ से अखबार छूट गया। उनका पूरा शरीर कांपने लगा। राधिका, जो कल तक ‘जी बाबूजी’ कहते नहीं थकती थी, आज एक अजनबी और नफरत भरी नज़र से उन्हें देख रही थी। उसने एफआईआर में जो आरोप लगाए थे, वो किसी भी इंसान की रूह कंपा देने वाले थे। उसमें लिखा था कि सुधीर का परिवार उसे भूखा रखता था, ज़मीन पर सुलाता था और दस लाख रुपये नकद व एक बड़ी कार के लिए उसे रोज़ पीटा जाता था। सबसे घिनौना आरोप दीनानाथ जी पर था, जिसमें राधिका ने कहा था कि उसके ससुर की नीयत उस पर खराब थी और वे अकेले में उसके साथ बदसलूकी करने की कोशिश करते थे।
जब सुधीर को बैंक में फोन गया, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह बदहवास भागता हुआ थाने पहुंचा। वहां उसने देखा कि उसके इज़्ज़तदार पिता, जिन्होंने ताउम्र किसी के सामने सिर नहीं झुकाया था, वो एक मुजरिम की तरह सिर झुकाए बैठे थे। उनकी आँखों से आंसू बह रहे थे। सुमित्रा देवी बेसुध सी एक कोने में ज़मीन पर बैठी थीं। सुधीर ने राधिका के सामने हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाया, “तुम ये क्या कर रही हो? हमने तो तुम्हें पलकों पर बिठाया था। हमने तो कोई दहेज नहीं मांगा।” राधिका ने एक ठंडी मुस्कान के साथ अपना चेहरा फेर लिया। उसका वकील आगे आया और उसने सुधीर के कान में फुसफुसाते हुए कहा, “पचास लाख का इंतज़ाम कर लो। आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट कर लेंगे और केस वापस ले लेंगे, वरना तुम सब जेल की हवा खाओगे और तुम्हारे बाप की जो इज़्ज़त है न बाज़ार में, वो कौड़ियों के भाव बिक जाएगी।”
सुधीर को समझ में आ गया कि यह कोई शादी नहीं थी, यह एक सोची-समझी साज़िश थी। एक गरीब और मासूम दिखने वाले परिवार ने उन्हें अपना शिकार बनाया था। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। समाज और कानून की नज़रों में वो एक अपराधी बन चुके थे, क्योंकि हमारे समाज में अक्सर रोती हुई औरत की बात को ही अंतिम सच मान लिया जाता है।
सुधीर की सरकारी नौकरी पर आंच आ गई। पुलिस केस होने की वजह से बैंक ने उसे तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया। जो मोहल्ले वाले कल तक दीनानाथ जी के पैर छूते थे, आज वे पीठ पीछे थूकते थे। “अरे, हमें तो पहले से ही शक था। चुपचाप रहने वाले लोग अंदर से बड़े खोटे होते हैं। बाप-बेटे दोनों ने मिलकर गरीब की बेटी की ज़िंदगी बर्बाद कर दी,” ऐसी बातें सुधीर के घर की दीवारों को भेदकर अंदर आने लगीं।
दीनानाथ जी इस सदमे और कलंक को बर्दाश्त नहीं कर पाए। जिस आरोप को सुनकर ही उन्हें शर्मिंदगी से मर जाने का मन कर रहा था, उसी आरोप के साथ उन्हें रोज़ जीना पड़ रहा था। एक रात उन्हें दिल का भयंकर दौरा पड़ा। अस्पताल में हफ्तों भर्ती रहने के बाद उनकी जान तो बच गई, लेकिन उनके शरीर का आधा हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। उनकी आवाज़ छिन गई। सुमित्रा देवी, जो पहले से ही कमज़ोर थीं, अपने पति की यह हालत देखकर पूरी तरह टूट गईं। वो अब किसी से बात नहीं करती थीं, बस शून्य में घूरती रहती थीं।
सुधीर अकेला पड़ गया। उसे अपने माता-पिता को जेल जाने से बचाना था। उसने राधिका के वकील से मिन्नतें कीं। सौदा तीस लाख में तय हुआ। सुधीर ने अपनी ज़िंदगी भर की सारी बचत तोड़ दी। अपने प्रोविडेंट फंड के पैसे निकाले। जब उससे भी काम नहीं चला, तो उसने अपने गाँव की वो पुश्तैनी ज़मीन बेच दी, जिसे उसके पिता अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करते थे। तीस लाख रुपये और वो सारे गहने जो उन्होंने राधिका को पहनाए थे, सब उसे सौंप दिए गए। तब जाकर एक ‘म्यूच्यूअल डाइवोर्स’ (आपसी सहमति से तलाक) का कागज़ साइन हुआ और वे एफआईआर से बरी हुए।
आज कोर्ट से डाइवोर्स के अंतिम कागज़ात मिल गए थे। कानूनी तौर पर अब सुधीर आज़ाद था। लेकिन क्या सच में वह आज़ाद था?
रात के दस बज रहे हैं। सुधीर अपने उसी घर के उसी कमरे में बैठा है। बाहर सड़क पर कोई चहल-पहल नहीं है। घर के अंदर एक खौफनाक सन्नाटा पसरा हुआ है। दूसरे कमरे से पिता के कराहने की धीमी आवाज़ आ रही है। माँ दवाइयों के नशे में बेसुध सो रही हैं। सुधीर की नौकरी अब तक वापस नहीं मिली है। बाज़ार में उसकी इज़्ज़त नीलाम हो चुकी है। घर से बाहर निकलते ही लोगों की चुभती हुई, सवालिया निगाहें उसके शरीर को छलनी कर देती हैं। कोई सीधे मुंह बात नहीं करता। सब कतराकर निकल जाते हैं।
वह कमरे की खिड़की से बाहर घुप अंधेरे को देख रहा है। उसे अपना वो समय याद आ रहा है, जब वह कुंवारा था। तब भी वह अकेला था। तब भी घर लौटकर उसे एक सूनापन महसूस होता था। लेकिन उस सूनेपन में एक शांति थी। उसमें एक उम्मीद थी। उस अकेलेपन में उसके माता-पिता की हंसी शामिल थी, उनके आशीर्वाद का सुकून था। समाज में सिर उठाकर चलने का गर्व था। और आज? आज जो अकेलापन है, वो उसे अंदर ही अंदर नोच रहा है। यह अकेलापन एक दरिंदे की तरह है, जो रोज़ उसकी छाती पर बैठकर उसकी सांसें छीनता है।
उसके दिमाग में बार-बार बस एक ही सवाल हथौड़े की तरह बज रहा है… क्या वो पुराना वाला अकेलापन ही अच्छा नहीं था? कम से कम उस अकेलेपन में कोई बेगुनाह, बदनामी की सूली पर तो नहीं चढ़ा था। घर बसाने की चाहत ने, उसे ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया था, जहाँ से न वो आगे बढ़ सकता था और न पीछे लौट सकता था। काश… काश उसने उस अकेलेपन से ही समझौता कर लिया होता।
इस कहानी को पढ़ने वाले पाठकों के लिए एक सवाल:
दोस्तों, समाज में जब एक पुरुष या उसके परिवार पर झूठे आरोप लगते हैं, तो बिना सच जाने समाज उन्हें अपराधी क्यों मान लेता है? क्या इस तरह के झूठे मुकदमों और ब्लैकमेलिंग को रोकने के लिए कानूनों में बदलाव नहीं होना चाहिए? सुधीर की जगह अगर आप होते या आपका कोई अपना होता, तो इस परिस्थिति का सामना कैसे करते? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें, आपकी राय बहुत मायने रखती है।
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लेखिका : मंदीरा सहगल