*सिल्क की साड़ी* – तोषिका

मां ये *सिल्क की साड़ी* काफी पुरानी हो गयी है, इसको निकाल दे क्या? माया ने अपनी मां रोहिनी से पूछा। “नहीं बेटा, इसको मैं नहीं निकल सकती।” रोहिनी ने हल्का सा मुस्कुराते हुए बोला।

“लेकिन क्यों मां? आप खुद ही कहती हो ना कि घर में पुराने कपड़े नहीं रखने चाहिए।” माया बोली

उसकी मां बोली हां, पर इस साड़ी से बहुत सारी यादें जुड़ी है।

“कैसी यादें मां?” उत्सुकता में माया बोली।

रोहिनी की यादें उस समय चली गई जब उसकी शादी माया के पिता राजेश से हुई थी।

सब नया नया था और रोहिनी को अकेले डर भी लगता था कि नए घर में वो सब कुछ कैसे संभालेंगी। लेकिन राजेश ने हमेशा उसका साथ दिया।

राजेश की मां रोहिनी को बिल्कुल पसंद नहीं करती थी ना ही उनको अपने बेटे से इतना लगाव था। उनको बस उनका बड़ा बेटा प्यारा था जो इस घर के लिए कमाता था।

रोहिनी आगे कुछ बोले इस से पहले ही माया ने बीच में टोकते हुए कहा “लेकिन पापा भी तो कितनी मेहनत करते है।”

रोहिनी बोली “हां करते है, लेकिन तब इतनी नहीं करते थे”।

अपनी बात उसने आगे बढ़ाते हुए बोला, एक दिन मेरी सास ने मुझे बहुत ताने मारे और बस अपने बड़े बेटे की पत्नी से ही वो प्यार से बात करती थी तो तब उस दिन राजेश को बहुत बुरा लगा और उन्होंने ठान लिया कि वो अब और बेज्जती बर्दाश नहीं कर सकते, तो फिर हमने वो घर छोड़ कर एक किराए का मकान लिया। बड़ा नहीं था छोटा सा था पर फिर भी कभी कोई कमी महसूस नहीं हुई क्योंकि तुम्हारे पापा मेरे साथ थे।

फिर हम बाहर गए थे तो वहां मुझे दुकान में ये साड़ी पसंद आई थी लेकिन पैसे ना होने की वजह से मैने तुम्हारे पापा को कुछ नहीं बोला लेकिन उन्होंने मेरी आंखों की चमक देख ली थी और फिर उनके अंदर और जोश आ गया और उन्होंने खुद का बिजनेस खोलने का सोचा। पहले काफी लोगों ने मना किया, दोस्तों ने साथ छोड़ दिया था।

माया बड़े ध्यान से सुन रही थी और तभी रोहिनी उसके सर पर हल्का सा हाथ फेरते हुए बोलती है “तू बिल्कुल अपने पापा जैसे ही है।”

ऐसा क्यों मां माया ने पूछा। “क्योंकि जब तक तुझे कोई चीज ना मिल जाए तू पीछे नहीं हट ती है।” रोहिनी बोली

अच्छा मां फिर क्या हुआ?

रोहिनी ने बोला फिर क्या था, एक भले आदमी को उनका बिजनेस का प्रस्ताव अच्छा लगा और उन्होंने अपना बिज़नस शुरू करा, धीरे धीरे वो बढ़ने लगा था लेकिन जैसे ही उनके हाथ में सबसे पहले पैसे आए थे उन्होंने अपने लिए कुछ ना लेकर मेरे लिए ये साड़ी ली थी, सिल्क की साड़ी। उनकी खुद की मेहनत की कमाई से और उनकी तरफ से पहला तोहफा था शादी के बाद।

माया बोली “सच्ची मां? पापा कितना खयाल रखते है न हमारा।”

रोहिनी बोली “वो तो है, आज जो भी है वो सब तुम्हारी पापा की मेहनत का ही तो है।”

माया ने फिर बोला “मां, फिर क्या दादी ने आपकी और पापा की कदर समझी?”

नहीं, बेटा उन्होंने नहीं समझी और ये बात आज भी तुम्हारे पापा को खलती है, वो दिखाते नहीं है पर बोलते भी नहीं है। रोहिनी ने बोला।

अपनी बात आगे करती हुई रोहिनी बोली “तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो, अपने पिता का नाम इतना रोशन करो कि उनको कभी भी अपने लिए हुए फैसलों पर कभी भी शक ना करना पड़े।”

माया मुस्कुराई और बोली “जी मां ऐसा ही होगा, आप फिक्र मत कीजिए।”

तभी दरवाजे पर घंटी बजती है, माया बोली मैं खोलती हू दरवाजा, उसने दरवाजा खोला तो देखा राजेश दरवाजे पर खड़ा था, उसने अपने पापा को देखते ही गले लगा लिया और रोहिनी को बोला “मां पापा आ गए है, जल्दी आइए।”

उधर रोहिनी आती है और राजेश को देख कर गले लगती है और माया इन दोनों की फोटो क्लिक करती है और फिर बोला “मां पापा आप बैठे आज मैं अपने पापा के लिए खाना बनाऊँगी।”

वो दोनों माया को किचन में जाते देख हस देते है।

राजेश ने तभी पूछा “आज इसको क्या हो गया है?” रोहिनी मुस्कुराई और बोली “आपने जो मुझे पहली साड़ी तोहफे में दी थी ना तो उसका बताया कि आपने वो कैसे ली थी मेरे लिए, बस तबसे उसने सोच लिया है कि एक दिन वो भी अपने दम पर अपनी मेहनत से कुछ बनकर दिखाएगी”।

राजेश मुस्कुराया और बोला “हमारी बेटी समझदार हो गई है।”

लेखिका

तोषिका

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