अनु ओ अनु अरे कहां है बिटिया अनु की दादी माँ लगातार पुकारे जा रहीं थीं और अनु का कहीं अता-पता नहीं, तभी उसके दादाजी आवाज सुनकर कमरे में प्रवेश करते हुए कहते हैं अरी भाग्यवती “क्यों चिल्ला रही बच्ची पर “? चैन से रहने दे उसे पल दो पल । दादी बोलीं चिल्ला नहीं रही पुकार रही हूँ ।
क्या करू मैं भी,ये अनु थोड़ी देर भी मेरी आँखों से इधर उधर चली जाती मेरा मन घबराने लगता है, बेचैन सी होकर रह जाती हूँ मैं ।
हाँ, हाँ तेरा बस चले तो उसे अपनी नजरों के सामने ही बैठाकर रखे तू तो । आदत डाल ले पराई अमानत है वो, डोली में बैठा विदा करने की घड़ी निकट ही है अब तो, दादाजी निकट बैठते हुए बोले ।
दो दिन बाद बारात आनी इस लड़की की लेकिन न जाने कहां गायब रहती है।
अरे भई वो बेचारी करे भी तो क्या ? दादाजी भरी आवाज में बोले-
“आज उसकी माँ जिन्दा होती तो वो उसी के आगे पीछे डोलती रहती “ ।
अब हम तो ठहरे बुढ़े दादा दादी, पिता को तो अपने बिजनेस से ही फुर्सत नहीं और घर में शाम तक तो मेहमान भी आ जायेंगे। रौनक होगी तो वो फिर घर पर ही नजर आयेंगी। देख भाग्यवती जाकर देख कहीं अपनी माँ की तस्वीर के आगे तो नहीं खड़ी रो रही, जैसा की अक्सर परेशानी में वो करती नजर आती है। घंटों अपनी दिवंगत ‘माँ की तस्वीर के सामने खड़ी आँसू बहाती रहती है।
अरे कैसी बातें करते हो आप ? अनु के दादा जी,
परेशानी कैसी उसको… विवाह हो रहा उसका उसकी पसन्द का लड़का है। खुशी- खुशी स्वीकार किया उसने अच्छा सुशील खाते पीते घर का कितना चाहता है उसको, दोनों की कितनी अच्छी बनती है। यहां कोई जोर-जबरदस्ती थोड़ी हो रही दादी बोली।
अरी समझा कर भाग्यवती.. एक औरत होकर औरत के दिल को नहीं समझ सकती..!
बच्ची है विवाह के मौके पर माँ की याद आना..भला कौन बेटी अपनी माँ को याद न करेगी ऐसे वक्त पर, दादाजी रूआंसी आवाज में बोले।
बहुत बातें होती जो माँ बेटी के बीच ही रहती । कितना मन कर रहा होगा उसका अपनी माँ के लिए। और उसकी माँ का भी तो सपना था बिटिया की शादी। कितने अरमान थे उसके। वो दुल्हन बने अच्छे घर में उसकी शादी हो । आखिर एक बेटी की माँ और इससे ज्यादा चाहती भी क्या है भाग्यवती ?
दादी ने पति की बात पर हामी भरी हां सही कहते हो आखिर मैं क्यों इतनी गहराई से नहीं सोचती ?
देखती हूँ जाकर जरूर बहु के कमरे में ही होगी वो।
दादी दौड़कर ऊपर मंजिल पर दिवंगत बहु के कमरे की तरफ चल पड़ी देखा अनु माँ की तस्वीर के आगे अपनी मां की शादी की ‘सिल्क की साड़ी’ सीने से लगाए रो रही । बार बार एक ही बात कह रही माँ तुम क्यों चली गई ? मुझे तुम्हारी बहुत जरूरत है ‘माँ वापस आ जाओ ‘माँ मेरे पास वापस आ जाओ ।
दादी ने पीछे से उसके कन्धे पर हाथ रखा और अनु के पलटते ही उसे गले से लगा लिया। अनु फुट फुट कर रोने लगी । दादी बोली बिटिया माँ की याद आ रही है क्या ?
आनी भी चाहिए ये समय ही ऐसा है इस समय हर लड़की को अपनी मां की जरूरत होती है। एक मां ही होती है जो बेटी के हर दुख दर्द को समझ सकती है। बिटिया.. ‘माँ की जगह तो कोई नहीं ले सकता। लेकिन अब क्या हो सकता है? हम सब साथ हैं तेरे।
हाँ, दादी बहुत याद आ रही है अनु सिसकियां लेते हुए बोली ये भगवान भी कितना निर्दयी है मेरी माँ को मुझसे छीन लिया। अनु ने रोते रोते दादी के कन्धे पर अपना सर रख दिया ।
नहीं बिटिया ऐसा नहीं कहते जो आया है इस दुनिया में, एक दिन उसको जाना भी होता है। सब जायेंगे बस कोई जल्दी चला जाता है कोई देर से जाता है। जो जितना लिखा कर लाया उतना ही जीता है। यहां इंसान की अपनी कोई मर्जी नहीं चलती। तेरी शादी अच्छे घर में हो ये तेरी माँ का सपना था । कितनी तैयारी कर रखी थी उसने बिटिया जब तू छोटी सी थी न तुझे कभी कभी अपनी ये शादी की सिल्क की साड़ी उड़ाकर कहती देखो अम्मा मेरी नन्ही दुल्हनिया। बहुत अरमान थे उसके तुझे दुल्हन के रूप में देखने के ।
ये सिल्क की साड़ी तेरी माँ मेरी बहु अंजलि को बहुत पसंद थी बेटा वो इसको पहनकर ही हमारे इस घर में दुल्हन बनकर आई थी। बहुत अच्छी और समझदार थी तेरी ‘माँ,.. अंजलि मेरी बहु नहीं बेटी थी वो । रिश्तों को संवारकर समेटकर रखने वाली वो दो साल पहले का मनहूस दिन मैं कैसे भूल सकती हूँ भला..? जब वो ऑफिस से लौटते वक्त सड़क दुर्घटना का शिकार होकर रह गई सब कुछ खत्म हो गया था बिटिया उसके ही साथ, वो तो तू थी जिसको देख देख कर हम जीवित है…!
दादी की आँखें भी आँसूओं से भीग गई उन्होंने अनु को पास ही कुर्सी पर बैठाया पास ही टेबल में रखे गिलास से थोड़ा पानी पिलाया और समझाने लगीं। बिटिया बहु के जाने का सभी को दुख है वो थी ही इतनी अच्छी नेकदिल इंसान, उसके जाने के बाद से तेरे पिता तो भीतर से बहुत टूट गये बिटिया उसको तो बरस तक अपनी सुध-बुध ही नही थी । उसने ने अपने को काम में इतना व्यस्त कर लिया। रात रात भर काम करता इसलिए नहीं कि उसे अधिक पैसे की चाहत है…वो अपने को अधिक से अधिक व्यस्त रखता है ताकि अंजलि की यादें उसका पीछा न करें। बिटिया समय बड़े से बड़े घाव भर देता है।
कुछ पल दादी पोती आपस में बातें शेयर करते रहे। गले लग कर रोते रहे। फिर दोनों ने थोड़ा हल्कापन महसूस किया। दादी बोली चल बेटा बाहर चल मेहमान आने शुरू हो जायेंगे देख तुझे अपनी माँ का सपना पूरा करना है वो तुझे दुल्हन की तरह सजा धजा देखना चाहती थी। आज वो जरूर यहीं कहीं होगी और उसकी आत्मा तुझे दुखी देखकर कैसे खुश रह सकती है भला ? तुझे ये बात ध्यान रखनी चाहिए।
तुझे तो बहुत तैयारी करनी है अच्छा सा मेकअप बिल्कुल वैसा ही जैसा उसने, तेरी माँ ने अपनी शादी में किया। देख उसकी तस्वीर ये शादी के दिन की ही तो है । कितनी प्यारी परी सी लगती है । वैसे भी रंग-रूप में तो तू बिटिया पूरी उसी पर गई है। एकदम हूबहू अपनी माँ पर बिटिया।
अनु ने अपनी आंखों के आंसू पौंछे और माँ की सिल्क की साड़ी अपने शादी के जोड़े के साथ सहेजकर रख दी । फिर दादी से बोली दादी ये मैं अपने साथ ले जाऊंगी । ये साथ होती है तो मुझे लगता है माँ मेरे साथ ही है। इसमें माँ का महक समाई हुई है। मैं इससे एकपल भी अलग नहीं होना चाहती।
तभी दादाजी ने आवाज लगाई मेहमान आये है नीचे आओ दादी ने अनु का हाथ पकड़ा और सीढ़ियां उतर नीचे पहुंच गई ।
शादी के सभी फंक्शन शुरू हो गये दो दिन मेहमानों के बीच कैसे बीत गये पता ही नहीं चला।
आज अनु दुल्हन बनी अपनी माँ के कमरे में खड़ी एकटक अपनी मां की तस्वीर को निहार रही । दादी और अनु की सहेलियों के झुंड कुछ खास रिश्तेदारों के साथ हाथ में जयमाला लिए कमरे में प्रवेश करती है । सबकी नजर जैसे ही अनु पर पडती है सबके मुंह से एक ही शब्द निकलता है अंजलि (अंजलि अनु की माँ का नाम ) अनु शादी के जोड़े के साथ अपनी माँ की सिल्क की साड़ी को बड़े ही खूबसूरत तरीके से लपेटकर दुल्हन रूप में तैयार हुई थी। उसकी सुन्दरता देखते ही बन रही थी । उसकी दादी की आँखों में चमक थी वो दौड़कर अनु को गले लगा लेती है कहते हुए मेरी अंजलि वापस आ गई.. मेरी अंजलि वापस आ गई ..!
अनु कभी दादी को तो कभी आपनी दिवंगत माँ की तस्वीर की तरफ टुकर टुकर निहारने लगती है। आज उसकी आँखों में आँसूओं की धारा नहीं संतुष्टि के भाव उभर हिलौरें मार रहे थे। आज वो अपने भीतर कुछ अलग सा महसूस कर रही जिसको वो शब्दों में बयां नहीं कर सकती थी।
अनु हाथों में जयमाल लिए सबके साथ विवाह मंडप में जाने लगती है एक बार मुड़कर अपनी माँ की वहीं ‘सिल्क की साड़ी’ पहनी हुई तस्वीर की तरफ मुड़ कर देखती है तभी वातावरण में एक सुन्दर सी महक फैल जाती है। अनु को अहसास होता है मानो माँ तस्वीर से निकल कर उसको सीने से लगाए साथ चल रही है, आशीर्वाद देते हुए। मानो कह रही हो बिटिया अनु ये कोई मामूली ‘सिल्क की साड़ी’ नहीं है एक अहसास है जो इन्द्रियों, विचारों से सुख दुख का अनुभव करता है। ये अहसास प्रेम, दर्द खुशी आंतरिक भावनाओं को व्यक्त करने के लिए काफी है।
लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया
“ सिल्क की साड़ी “