जली हुई सिल्क की साड़ी

 हंसता खेलता एक खुशहाल परिवार। परिवार में अर्जुन की मां देविका जी, अर्जुन उसकी पत्नी आरती, 10 वर्षीय बेटा कबीर और 8 वर्षीय बेटी अक्षरा थे। अर्जुन की बहन तपस्या की शादी हो चुकी थी। वह अर्जुन से कुछ साल बड़ी थी।

 परिवार में सभी एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। छोटी-छोटी खुशियों को  भी बहुत अच्छी तरह मानते थे।          गीता वाधवानी 

 कबीर फर्स्ट आया तो पार्टी की गई। अक्षरा को अवार्ड मिला तो खुशियां मनाई गई। अर्जुन और आरती की शादी की सालगिरह धूमधाम से मनाई जाती थी। यहां तक की देविका जी का भी जन्मदिन मनाया जाता था लेकिन घर में ही साधारण तरीके से। सभी लोग उनके चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लेते थे और उनको ढेर सारी बधाइयां देते थे। अर्जुन और आरती उनके लिए उपहार भी लाते थे। शाम को सब मिलकर मंदिर में भगवान के दर्शन करने जाते थे।  इसी तरह हंसी खुशी जीवन चल रहा था।

     आरती के भाई की शादी थी। आरती ने अर्जुन से कहा-” विवेक की शादी है, मुझे शॉपिंग करनी है, इस बार मेरा कांजीवरम सिल्क की साड़ी लेने का बहुत मन है। क्या आप मेरे साथ शॉपिंग करने चलेंगे। ” 

 अर्जुन-” हां हां क्यों नहीं? ” 

 फिर वे लोग शॉपिंग करने गए। आरती ने कांजीवरम सिल्क की दो साड़ियां पसंद की। एक साड़ी हल्के गुलाबी रंग की 30000 की थी और दूसरी फिरोजी कलर की 40000 की थी, आरती को फिरोजी वाली बहुत ज्यादा पसंद थी लेकिन उसका दाम ज्यादा था इसीलिए वह चुप हो गई। 

 अर्जुन उसके मन की बात समझ गया था इसीलिए उसने कहा कि” तुम फिरोजी साड़ी ले लो। पैसों की चिंता मत करो। फिरोजी कलर तुम्हारे ऊपर बहुत अच्छा लगेगा।” 

 शादी में सब लोगों ने आरती की साड़ी की बहुत तारीफ की।आरती बहुत ही खुश थी। सब ने शादी में बहुत एंजॉय किया और हंसी खुशी घर वापस आ गए। आरती उस साड़ी के पीछे बिल्कुल दीवानी हो गई थी। उसे इतनी ज्यादा पसंद थी साड़ी कि उसका बस चले तो रोज ही पहन कर बैठ जाए। बच्चों की छुट्टियां हो गई थी।

 इस बार छुट्टियों में बच्चों का नैनीताल घूमने का मन था। माताजी ने कहा -” ट्रेन की टिकट बुक करवा लो।”  

 लेकिन बच्चे नहीं माने। कहने लगे हम तो कार से ही जाएंगे। तब देविका जी ने कहा-” जैसी तुम्हारी मर्जी” 

 अर्जुन ने कहा-” मां,आप भी अपने कपड़े पैक कर लीजिए। ”      गीता वाधवानी 

 देविका जी ने कहा-” नहीं नहीं, मुझे नहीं जाना, मैं क्या करूंगी जाकर? “

 कबीर-” चलो ना दादी, बहुत मजा आएगा। ” 

 दादी -” बेटा, इस बार तुम सब लोग जाओ, मैं फिर कभी चलूंगी। ” 

 अर्जुन ने कहा-” मां आपको अकेला छोड़कर जाएंगे, तो हमें अच्छा नहीं लगेगा और आपकी चिंता भी रहेगी आप अकेली कैसे रहोगी? ” 

 आरती-” हां मम्मी जी, आप भी साथ चलिए, बहुत मजा आएगा। ” 

 लेकिन देविका जी का बिल्कुल मन नहीं था। तब अर्जुन ने कहा -” अच्छा ठीक है, मैं मासी को फोन कर देता हूं।  वह रह लेंगी  आपके पास। क्यों ठीक है ना मां। ” 

 देविका-” हां यह ठीक रहेगा। दोनों बहनें मिलकर खूब बातें करेंगे और इकट्ठे मंदिर भी जाएंगे। ” 

 अर्जुन ने अपनी मासी को फोन कर दिया। वे चारों अगले दिन अपनी कार से नैनीताल के लिए निकल गए। देविका जी के पास उनकी बहन माला रहने आ गई थी। 

 अर्जुन और उसके परिवार ने नैनीताल में चार दिन तक खूब मस्ती की। खूब घूमें, अपना मनपसंद खाया पिया, हर पल को इंजॉय किया। पांचवें दिन उन लोगों को वापस आना था। अब नैनीताल का बस एक पॉइंट देखना बाकी रह गया था जो की बहुत ऊंचाई पर था। 

 उन लोगों ने वहां पर भी बहुत इंजॉय किया और वापसी के लिए निकलने लगे। 

 आरती और कबीर बाहर खड़े थे और अर्जुन और अक्षरा कार में बैठे थे। अर्जुन गाड़ी को बैक करके घूम रहा था तभी अचानक उसकी गाड़ी का बैलेंस बिगड़ गया और गाड़ी ढलान से खिसकती हुई खाई में जा गिरी।      गीता वाधवानी 

 यह सब कुछ इतना जल्दी हुआ कि किसी को कुछ समझ में नहीं आया और संभलने का मौका भी नहीं मिला। आस-पास कुछ लोग थे। वह दौड़े चले आए लेकिन कोई कुछ नहीं कर सका। 

 लुढ़कती हुई गाड़ी में अर्जुन और अक्षरा दम तोड़ चुके थे। आरती और उसका बेटा कबीर जोर-जोर से चीख रहे थे। यह सब देखकर उनका बहुत बुरा हाल था। वह अपनी असमर्थता पर रो रहे थे। 

 कुछ देर बाद सरकारी मदद पहुंची और अर्जुन और अक्षरा को लाश के रूप में ऊपर लाया गया फिर उनको घर भेजने का इंतजाम किया गया। इतना भयानक मंजर देखकर आरती की दुनिया वहीं थम गई थी। वह ऐसे व्यवहार कर रही थी मानो उसे कुछ याद ही ना हो।       गीता वाधवानी 

 घर पर देविका जी का और माला  और तपस्या का रो रो कर बुरा हाल था। कबीर भी सहमा हुआ था। देविका जी ने बहुत मुश्किल से खुद को संभाला क्योंकि उन्हें आरती की चिंता हो रही थी। 

 कुछ दिन बीत गए लेकिन आरती के लिए समय थम गया था। कभी-कभी वह कहती, ” आज तो कबीर के पापा ने आने में बहुत देर कर दी है” कभी कहती ” आज तो मैंने लौकी बनाई है, पता नहीं कबीर के पापा खाएंगे भी या नहीं, मम्मी जी,कोई और सब्जी बना लूं क्या? ” कभी कहती, ” इनके आते ही, आज मैं इनसे बात करुंगी कि मुझे शॉपिंग पर ले चलो, मुझे सिल्क की साड़ी लेनी है और कभी-कभी वही फिरोजी साड़ी निकालकर पहन लेती और कहती मम्मी जी देखो, इन्होंने मुझे कितनी सुंदर साड़ी दिलाई है। ” 

 कबीर और देविका-” उसे याद दिलाने की कोशिश करते लेकिन सब बेकार” 

 एक बार तपस्या उन लोगों से मिलने आई और अपनी भाभी को फिरोजी साड़ी और मेकअप में देखकर बहुत चिढ गई। उसे लग रहा था की आरती कोई ड्रामा कर रही है। अगले दिन जब आरती ने फिरोजी साड़ी उतार कर रखी तब तपस्या ने उस साड़ी का पल्लू जानबूझकर जला दिया। 

 एक-दो दिन बाद जब आरती फिर से वह साड़ी पहनने लगी तो उसे जला हुआ देखकर वह सदमे में आ गई और बहुत रोने लगी। 

 कहने लगी-” यह तो अपशकुन हो गया। मुझे ऐसा लगता है कि यह किसी ने जानबूझकर किया है। कहीं कबीर के पापा को कुछ हो ना जाए। ” 

 तब तपस्या ने चिल्ला कर कहा -” होश में आओ आरती, अर्जुन तो कब का जा चुका है,। अब तुम ही को सब कुछ संभालना है। “

 आरती जोर-जोर से रोने लगी और कहने लगी-” एक बहन होकर भाई के बारे में इतना बुरा क्यों बोल रही हो? ” 

 और फिर वह बेहोश होकर गिर गई। कुछ घंटे बाद जब उसे होश आया तब वह पूछ रही थी ” मम्मी जी कार खाई में गिर गई थी, , अर्जुन और अक्षरा ठीक तो है ना। कहां है दोनों, दिखाई नहीं दे रहे। ” 

     तब देविका ने उसे सच्चाई बताई। सच्चाई जानकर वह फूट-फूट कर रोने लगी और वर्तमान में वापस आ गई और उस जली हुई सिल्क की साड़ी सीने से लगा लिया। 

 अप्रकाशित स्वरचित गीता वाधवानी दिल्ली 

#सिल्क की साड़ी

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