सपनों की उड़ान और माँ का आँचल

काव्या के लिए यह जवाब किसी वज्रपात से कम नहीं था। उसने रोते हुए अपने पिता को बहुत समझाने की कोशिश की कि वह अपना ख्याल रख सकती है, वहाँ हॉस्टल में रहेगी, लेकिन दीनानाथ जी अपने फैसले पर अडिग थे। उनका प्यार और अपनी बच्ची के प्रति उनकी फिक्र इतनी हावी थी कि वह काव्या के सपनों की उड़ान को देख ही नहीं पा रहे थे। उस रात काव्या बिना खाना खाए अपने कमरे में फूट-फूट कर रोती रही। उसे अपना सपना कांच की तरह टूटकर बिखरता हुआ महसूस हो रहा था।

मास्टर दीनानाथ जी अपने कस्बे चंदनपुर के एक अत्यंत सम्मानित और आदर्शवादी व्यक्ति थे। स्थानीय सरकारी स्कूल में गणित के शिक्षक दीनानाथ जी का जीवन एकदम खुली किताब की तरह था—सादा जीवन और उच्च विचार। उनके अनुशासन और सरल व्यवहार की मिसालें पूरे मोहल्ले में दी जाती थीं। उनके परिवार में उनकी धर्मपत्नी सुमित्रा, बड़ी बेटी काव्या, छोटा बेटा रोहन और सबसे छोटी बेटी मीनाक्षी थे। दीनानाथ जी ने अपने तीनों बच्चों को संस्कारों के साथ-साथ लाड़-प्यार में कोई कमी नहीं रखी थी। काव्या बचपन से ही पढ़ाई में कुशाग्र थी और हर कक्षा में अव्वल आती थी। दीनानाथ जी को अपनी इस होनहार बेटी पर बहुत गर्व था। 

समय अपनी गति से भागता रहा और काव्या ने अपनी स्कूली शिक्षा और ग्रेजुएशन कस्बे के ही कॉलेज से शानदार अंकों के साथ पूरी कर ली। काव्या के मन में एक बहुत बड़ा सपना पल रहा था—उसे देश की सबसे कठिन सिविल सेवा परीक्षा (यूपीएससी) पास करके एक आईएएस अधिकारी बनना था। वह जानती थी कि चंदनपुर जैसे छोटे कस्बे में न तो इस स्तर की कोई कोचिंग उपलब्ध थी और न ही प्रतियोगिता का वह माहौल, जो इस परीक्षा को पास करने के लिए जरूरी होता है। इसके लिए उसे दिल्ली जैसे बड़े शहर में जाना ही था। 

एक शाम, जब पूरा परिवार आंगन में बैठकर चाय पी रहा था, काव्या ने हिम्मत करके अपने पिता के सामने अपनी यह इच्छा रख दी। “पापा, मैं आगे की तैयारी के लिए दिल्ली जाना चाहती हूँ। वहाँ के कोचिंग संस्थान और शिक्षक बहुत अनुभवी हैं, और मुझे मेरे लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उस माहौल की सख्त जरूरत है।” 

काव्या की बात सुनते ही दीनानाथ जी के चेहरे की लकीरें गहरी हो गईं। उनके हाथ में पकड़ा चाय का कप वहीं रुक गया। उन्होंने गहरी सांस ली और अत्यंत चिंतित स्वर में कहा, “बेटी, मुझे तुम्हारी काबलियत पर कोई शक नहीं है। तुम चाहो तो कस्बे में ही रहकर तैयारी कर लो, मैं तुम्हारे लिए दुनिया भर की किताबें मंगा दूँगा। लेकिन दिल्ली? इतने बड़े और अनजान शहर में मैं अपनी फूल सी बच्ची को अकेले कैसे भेज सकता हूँ? रोज अखबारों में बड़े शहरों के जो खौफनाक हालात और अपराध की खबरें मैं पढ़ता हूँ, उन्हें देखकर मेरी रूह कांप जाती है। आज का माहौल बेटियों के लिए बिल्कुल सुरक्षित नहीं है। तुम यहीं रहकर पढ़ाई करो, मैं तुम्हें बाहर अकेले नहीं जाने दूँगा।”

काव्या के लिए यह जवाब किसी वज्रपात से कम नहीं था। उसने रोते हुए अपने पिता को बहुत समझाने की कोशिश की कि वह अपना ख्याल रख सकती है, वहाँ हॉस्टल में रहेगी, लेकिन दीनानाथ जी अपने फैसले पर अडिग थे। उनका प्यार और अपनी बच्ची के प्रति उनकी फिक्र इतनी हावी थी कि वह काव्या के सपनों की उड़ान को देख ही नहीं पा रहे थे। उस रात काव्या बिना खाना खाए अपने कमरे में फूट-फूट कर रोती रही। उसे अपना सपना कांच की तरह टूटकर बिखरता हुआ महसूस हो रहा था।

सुमित्रा जी, जो जीवन भर एक खामोश गृहिणी के रूप में सिर्फ रसोई और घर की जिम्मेदारियां संभालती आई थीं, अपनी बेटी की ये हालत देख नहीं पाईं। एक माँ का दिल दुनिया की हर फिक्र से बड़ा होता है। रात के सन्नाटे में जब दीनानाथ जी करवटें बदल रहे थे, सुमित्रा जी ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने पूरे घर की नींव को हिला दिया। 

अगली सुबह सुमित्रा जी ने दीनानाथ जी के सामने जाकर बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “सुनिए, हमारी बेटी के सपने बहुत बड़े हैं और मैं उन सपनों को आपके डर की बलि नहीं चढ़ने दूँगी। आप कहते हैं ना कि शहर सुरक्षित नहीं है, बच्ची अकेली कैसे रहेगी? तो ठीक है, वह अकेली नहीं रहेगी। मैं उसके साथ दिल्ली जाऊंगी। हम दोनों माँ-बेटी वहाँ एक छोटा सा किराए का कमरा लेकर रह लेंगी। काव्या अपनी कोचिंग जाएगी और मैं उसकी ढाल बनकर उसके साथ रहूँगी। बात सिर्फ दो-तीन साल की ही तो है, मेरी बच्ची का भविष्य संवर जाएगा।”

दीनानाथ जी अवाक रह गए। “सुमित्रा, तुम पागल हो गई हो? तुमने कभी इस कस्बे के बाहर की दुनिया नहीं देखी, तुम दिल्ली जैसे महानगर में कैसे रहोगी? और यहाँ इस भरे-पूरे घर का, रोहन और मीनाक्षी का क्या होगा? मेरे खाने-पीने का क्या होगा?”

सुमित्रा जी ने नम आँखों से मुस्कुराते हुए कहा, “रोहन और मीनाक्षी अब बड़े हो गए हैं, वो घर संभाल लेंगे। और रही बात मेरी, तो एक माँ अपनी औलाद के लिए घने जंगल में भी रह सकती है, दिल्ली तो फिर भी इंसानों का शहर है। अगर आज मैंने अपनी बेटी का साथ नहीं दिया, तो वह जीवन भर यही सोचेगी कि उसका लड़की होना ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी।” 

सुमित्रा जी की ममता और दृढ़ निश्चय के आगे दीनानाथ जी के सारे तर्क हार गए। कुछ ही दिनों में माँ-बेटी चंदनपुर के अपने बड़े और हवादार घर को छोड़कर दिल्ली के एक छोटे से एक कमरे वाले फ्लैट में आ गईं। 

सुमित्रा जी के लिए यह जीवन किसी तपस्या से कम नहीं था। खुले आंगन और बड़े चूल्हे पर खाना बनाने वाली सुमित्रा जी अब एक छोटी सी घुटन भरी रसोई में गैस पर खाना बनाती थीं। शहर की भीड़भाड़, अनजान लोग और दिन भर कमरे की चारदीवारी में बंद रहना उनके लिए एक सजा के समान था। लेकिन जब शाम को काव्या कोचिंग से लौटकर आती और अपनी माँ के गले लगकर दिन भर की पढ़ाई की बातें करती, तो सुमित्रा जी की सारी थकान छूमंतर हो जाती। उन्होंने अपने हिस्से का सारा सुकून अपनी बेटी की किताबों पर न्योछावर कर दिया था। वह सुबह काव्या के उठने से पहले उठकर उसके लिए नाश्ता बनातीं, ताकि काव्या का एक मिनट भी बर्बाद न हो। 

काव्या भी अपनी माँ के इस अकल्पनीय त्याग को समझती थी। उसने दिन-रात एक कर दिया। न कोई त्योहार, न कोई सिनेमा, सिर्फ किताबें और उसका लक्ष्य। 

तीन साल की इस कठिन तपस्या के बाद वह दिन आ ही गया जब यूपीएससी का परिणाम घोषित हुआ। काव्या ने पूरे देश में सातवां स्थान प्राप्त किया था। जब यह खबर चंदनपुर पहुँची, तो दीनानाथ जी की आँखों से आंसुओं की नदियाँ बह निकलीं। वह तुरंत ट्रेन पकड़कर दिल्ली आए। 

छोटे से उस कमरे का दरवाजा खुला तो सामने आईएएस अफसर बन चुकी काव्या खड़ी थी, और पीछे जमीन पर बैठी सुमित्रा जी सब्जी काट रही थीं। दीनानाथ जी ने आगे बढ़कर अपनी पत्नी सुमित्रा के सामने हाथ जोड़ लिए और रुंधे हुए गले से बोले, “सुमित्रा, आज तुमने साबित कर दिया कि एक माँ की ममता दुनिया के किसी भी डर से ज्यादा ताकतवर होती है। अगर तुमने उस दिन अपनी जिद न की होती, तो मेरी बच्ची के ये पंख हमेशा के लिए कट गए होते। तुमने सिर्फ काव्या को नहीं, मुझे भी एक नई सोच दी है।” 

सुमित्रा जी ने अपने पति के हाथ थाम लिए और काव्या अपने माता-पिता के गले लगकर रो पड़ी। उस छोटे से कमरे में आज दुनिया की सबसे बड़ी खुशी समा गई थी। 

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दोस्तों, क्या आपको लगता है कि बच्चों के सपनों को उड़ान देने के लिए माता-पिता को समाज और असुरक्षा के अपने डर से बाहर आना चाहिए? सुमित्रा जी के इस त्याग पर आपके क्या विचार हैं? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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