सर्द रातों की वो खामोश गर्माहट

“हम इतनी रात को इसलिए निकलते हैं,” प्रेरणा ने आँसू पोंछते हुए कहा, “ताकि किसी को ऐसा न लगे कि हम कोई अहसान कर रहे हैं या किसी को दिखावा कर रहे हैं। हम बस चुपचाप उनके ऊपर कंबल डाल देते हैं जो ठंड से सिकुड़े हुए सो रहे होते हैं। जब वो सुबह उठकर उस गर्माहट को महसूस करेंगे, तो उनके दिल से जो दुआ निकलेगी, वो सीधे हमारे अयांश तक पहुँचेगी।”

दिसंबर का महीना अपने शबाब पर था और हाड़ कंपा देने वाली ठंड ने पूरे शहर को अपनी बर्फीली चादर में लपेट लिया था। रात के करीब साढ़े दस बज रहे थे। ठंडी हवाओं के खौफ से पूरी हाउसिंग सोसाइटी में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। लोग अपने-अपने घरों में रजाइयों के अंदर दुबके हुए थे या फिर हीटर के सामने बैठकर टीवी स्क्रीन से चिपके थे। ऐसे में बाहर निकलने की हिम्मत कोई विरला ही कर सकता था। लेकिन रमेश और उनकी पत्नी सुजाता का नियम पक्का था। रात का खाना खाने के बाद करीब आधे घंटे तक सोसाइटी के कंपाउंड में टहलना उनकी बरसों पुरानी आदत थी, जिसे वो इस कड़ाके की सर्दी में भी निभा रहे थे। सुजाता ने अपनी शॉल को कसकर लपेटा हुआ था और रमेश मफलर से कान ढके हुए थे। 

दोनों चुपचाप कदमताल कर रहे थे कि अचानक सुजाता के कदम ठिठक गए। उसकी नजर सोसाइटी के आखिरी छोर पर बनी पार्किंग की तरफ गई। वहां एक गाड़ी खड़ी थी जिसकी डिग्गी की लाइट जल रही थी और दो साए तेजी से कुछ सामान डिग्गी में रख रहे थे। 

“रमेश जी, वो देखिए… इतनी रात गए पार्किंग में कौन है?” सुजाता ने फुसफुसाते हुए कहा। 

रमेश ने भी उस दिशा में देखा। कोहरे की धुंध के बीच भी वो पहचान गए कि वो गाड़ी उनके ब्लॉक में रहने वाले आलोक और प्रेरणा की है। दोनों ने उत्सुकतावश उधर अपने कदम बढ़ा दिए। पास पहुँचकर उन्होंने देखा कि आलोक और प्रेरणा अपनी कार की डिग्गी में कुछ बड़े-बड़े पैकेट, पुराने ऊनी कपड़े, स्वेटर और कई सारे मोटे कंबल करीने से सजा रहे थे। 

“अरे आलोक भाई, प्रेरणा जी! इतनी रात को यह क्या तैयारी चल रही है? इस कड़ाके की ठंड में कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम है क्या?” रमेश ने सहज भाव से पूछा।

अचानक पीछे से आई आवाज सुनकर आलोक और प्रेरणा चौंक गए। उनके चेहरों पर एक पल के लिए ऐसी घबराहट तैर गई जैसे वो कोई चोरी करते हुए पकड़े गए हों। दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और फिर रमेश व सुजाता की ओर पलट कर एक हल्की सी, लेकिन संकोच भरी मुस्कान दी। 

“नहीं रमेश भाईसाब, बाहर तो कहीं नहीं जा रहे… बस ऐसे ही…” आलोक ने बात टालने की कोशिश की। 

लेकिन सुजाता की पारखी नजरों से डिग्गी में रखे कंबलों के ढेर छिप नहीं पाए। “ऐसे ही क्या प्रेरणा जी? इतने सारे कंबल और कपड़े डिग्गी में भर रहे हैं, बात क्या है? कोई परेशानी तो नहीं है?” 

प्रेरणा ने एक गहरी सांस ली। उसने आलोक का हाथ पकड़ा और फिर रमेश की आँखों में देखते हुए बोली, “भाईसाब, हम ये बात किसी को बताना नहीं चाहते थे… पर क्योंकि अब आपने देख ही लिया है, तो मैं बस एक वायदा चाहती हूँ कि आप लोग इस बात का जिक्र सोसाइटी में किसी और से नहीं करेंगे।”

“अरे हाँ-हाँ बहन जी, बिल्कुल नहीं कहेंगे। हमारा वायदा रहा। लेकिन बात क्या है, यह तो बताइए। हमारी जान अटकी जा रही है,” सुजाता ने अपनेपन से कहा।

आलोक ने कार की डिग्गी का दरवाजा थोड़ा नीचे किया और धीमी, भारी आवाज में बोलना शुरू किया, “रमेश भाई, आपको तो पता ही है कि आज से पांच साल पहले हमारा सात साल का बेटा अयांश ब्लड कैंसर की वजह से हमें छोड़कर चला गया था।” इतना कहते ही आलोक का गला रुंध गया। रमेश और सुजाता ने भी दुःख जताते हुए सिर हिलाया। 

“जब अयांश का इलाज शहर के बड़े सरकारी अस्पताल में चल रहा था,” प्रेरणा ने आगे कहा, उसकी आँखों में अतीत का दर्द छलकने लगा था, “तो हम दिन-रात उसी अस्पताल में रहते थे। उस वक्त भी जनवरी की ऐसी ही कड़ाके की ठंड थी। जब हम रात को आईसीयू से बाहर आते थे, तो देखते थे कि अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर, बरामदे में, सीढ़ियों पर… सैकड़ों ऐसे लोग सो रहे होते थे जो दूर-दराज के गांवों से अपने मरीजों का इलाज करवाने आए थे। उनके पास न ढंग के कपड़े होते थे, न ओढ़ने के लिए कंबल। वो लोग बस एक पतली सी चादर या प्लास्टिक की बोरी ओढ़कर ठंडी जमीन पर कांपते रहते थे। कई छोटे बच्चे अपनी माँ से चिपक कर सर्दी से बचने की कोशिश करते थे।” 

प्रेरणा की आँखों से आँसू छलक पड़े थे। सुजाता ने आगे बढ़कर प्रेरणा के कंधे पर हाथ रख दिया। 

आलोक ने बात पूरी करते हुए कहा, “भाईसाब, जब इंसान खुद गहरे दर्द में होता है, तो उसे दूसरों का दर्द बहुत साफ दिखाई देता है। हम अपने बच्चे को तो नहीं बचा पाए, लेकिन उस रात जब हम अयांश का मृत शरीर लेकर अस्पताल से निकले थे, तो हमने देखा कि सर्दी से ठिठुरते उन मजबूर लोगों की आँखों में कितनी बेबसी थी। उसी दिन हमने तय किया था कि हम अयांश की याद को किसी मूर्ति या दिखावे में नहीं बदलेंगे। हम हर साल पूरी सर्दियों में, रात के ग्यारह बजे के बाद निकलते हैं। हम शहर के अलग-अलग सरकारी अस्पतालों के बाहर जाते हैं और उन ठिठुरते हुए तीमारदारों को चुपचाप ये कंबल और ऊनी कपड़े दे आते हैं।”

“हम इतनी रात को इसलिए निकलते हैं,” प्रेरणा ने आँसू पोंछते हुए कहा, “ताकि किसी को ऐसा न लगे कि हम कोई अहसान कर रहे हैं या किसी को दिखावा कर रहे हैं। हम बस चुपचाप उनके ऊपर कंबल डाल देते हैं जो ठंड से सिकुड़े हुए सो रहे होते हैं। जब वो सुबह उठकर उस गर्माहट को महसूस करेंगे, तो उनके दिल से जो दुआ निकलेगी, वो सीधे हमारे अयांश तक पहुँचेगी।”

रमेश और सुजाता अवाक खड़े थे। उनके शरीर पर सर्दी का असर जैसे खत्म हो गया था और अंदर एक अजीब सी गर्मी महसूस हो रही थी। वो गर्मी जो एक सच्चे और निस्वार्थ इंसान को देखकर महसूस होती है। सुजाता की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने बिना कुछ कहे अपने गले से वो गर्म शॉल उतारी जो उसने ओढ़ रखी थी, और उसे डिग्गी में रखे कंबलों के ढेर पर रख दिया। रमेश ने भी तुरंत अपने गले से अपना ऊनी मफलर निकाला और वहां रख दिया। 

“भाईसाब, यह क्या कर रहे हैं आप? आपको ठंड लग जाएगी,” आलोक ने हड़बड़ाते हुए कहा।

“नहीं आलोक,” रमेश ने भरे हुए गले से कहा, “आज जो गर्माहट तुमने हमारे दिलों में भर दी है, उसके आगे दुनिया की कोई भी सर्दी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। तुमने आज हमें सिखा दिया कि सच्चा सुकून बंद दरवाजों के पीछे रजाइयों में नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद की सर्द रात को अपनी इंसानियत से गर्म करने में है। आज से इस सफर में हम भी तुम्हारे साथ हैं।”

चारों की आँखें नम थीं। धुंध और कोहरे से भरी उस सर्द रात में, इंसानियत का सूरज जैसे चुपचाप उदय हो रहा था। उन्होंने गाड़ी के दरवाजे बंद किए और एक ऐसे सफर पर निकल पड़े, जहाँ मंजिल कोई जगह नहीं, बल्कि किसी के चेहरे की वो राहत भरी मुस्कान थी, जो ठिठुरते होठों पर सुबह की पहली किरण के साथ खिलने वाली थी। 

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