घर में आज सुबह कुछ अलग-सी हलचल थी।शब्द कम थे,मुस्कानें ज़्यादा थीं और इशारों में जैसे कोई छोटा-सा राज़ पल रहा था।रोहन और नेहा कभी धीमे स्वर में बातें करते,तो कभी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते।यह सब देखकर सरोज को लग रहा था,कि ज़रूर कोई ऐसी बात है जो उनसे छिपाई जा रही है।
“क्या बात है? तुम दोनों को आज ऑफिस नहीं जाना क्या? सुबह से बस खुसर-फुसर किए जा रहे हो… आखिर माजरा क्या है?”सरोज मुस्कुराते हुए बोली।
रोहन और नेहा ने एक-दूसरे की ओर देखा और बात बदल दी।सरोज समझ गईं कि कुछ तो है,मगर क्या… इसका जवाब उसे अभी नहीं मिलने वाला था।तभी पड़ोसन विमला आ गई और हमेशा की तरह अपनी बहू की शिकायतों का पिटारा खोल बैठीं…मेरी बहु ने तो मेरे बेटे को अपने वश में कर रखा है।मेरी तो वो बात ही नहीं सुनता…वगैरह..वगैरह.!
“देख विमला,सुबह का समय है बच्चों को आफिस जाना है।मुझे उनका टिफिन तैयार करना है,तू दोपहर में आना फिर आराम से बातें करेंगे…ठीक है।”सरोज की बात सुनकर विमला गुस्सा होकर अपने घर चली गई।
“अरे भई कोई हमें भी पूछ लो,चाय मिलेगी या आज बिना चाय के ही रहना पड़ेगा।”रमेश ने सरोज को छेड़ते हुए कहा।
“पापा आज शाम आप और मां फ्री हैं? कोई प्रोग्राम तो नहीं आप दोनों का?”रोहन ने पूछा।
“बेटा हम रिटायर्ड लोग कहाँ जाएंगे?कोई प्रोग्राम नहीं है हमारा।कोई काम था तुम्हें?”
“नहीं पापा कोई काम नहीं था,बस मैंने और नेहा ने आप दोनों के लिए होटल प्लाजा में एक टेबल बुक कराई है…डिनर वहीं करना आप दोनों। और पापा जब आप लोग खाना खा चुकें तो ये मां को दे देना।”रोहन ने चुपके से एक बैग रमेश को पकड़ा दिया।
“पर आज तो कोई स्पेशल दिन नहीं है बेटा,कहीं मैं तुम्हारी माँ का जन्मदिन तो नहीं भूल गया?”रमेश ने धीरे से पूछा।
“नहीं पापा आप कुछ नहीं भूलें हैं,आज 14 फरवरी है यानी वैलेनटाइन डे तो हमने सोचा आप दोनों थोड़ा बाहर जाकर घूमें फिरें तो अच्छा रहेगा।” नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा।
“बेटा ये सब करने की तो तुम लोगो की उम्र है।अब इस उम्र में हम कहाँ ये सब…?”
“पापा ये कोई बात नहीं होती।याद है आपने एक बार कहा था,कि आदमी शरीर से नहीं सोच से बूढ़ा होता है।हम नहीं जानते आप दोनों को आज वहाँ जाना ही होगा।”
“अच्छा ठीक है बाबा…हम चले जाएंगे।अब खुश,चलो भागो दोनों वर्ना ऑफिस के लिए लेट हो जाओगे।”
शाम को रमेश तैयार हो गए और सरोज को भी बिना कुछ बताए तैयार होने को कहा।बार बार पूछने पर भी रमेश ने सरोज को कुछ नहीं बताया तो उसे गुस्सा भी आ रहा था और दूसरी तरफ उत्सुकता भी थी,सो वो भी तैयार हो ही गई।
नेहा ने सरोज और रमेश के लिए कैब बुक कर दी थी।कैब में बैठकर दोनों होटल पहुंच गए और डिनर शुरू किया।
“एक बात तो बताओ आप मुझे यहाँ किस खुशी में लाए हो?आज तो कुछ खास नहीं है?”खाना खाते हुए सरोज ने पूछा।
“आज वैलेंटाइन डे है…बच्चों ने ये प्लान बनाया था तो उनके इस प्रेम को मैं मना नहीं कर सका।
“क्या…रोहन और नेहा ने…अच्छा तो यही खुसर फुसर कर रहे थे दोनों सुबह सुबह।अब समझ आया मुझे।अपना रोहन तो था ही संस्कारी और बहू भी कितनी अच्छी है,जिसने आते ही एक बेटी की कमी पूरी कर दी।अक्सर विमला मुझसे पूछती है,कि हमने रोहन की परवरिश कैसे की जो वो इतना अच्छा बेटा बन सका।पता है मैं उसको यही कहती हूँ,कि बच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं।रोहन और नेहा ने तुम्हें और मुझे अम्मा जी का कितना ध्यान रखते हुए देखा है,और ये बच्चे वही सीख गए।कितना सोचते हैं दोनों हमारे बारे में।हे ईश्वर किसी की नज़र ना लगे हमारे परिवार को।”
“ये लो ये तुम्हारे लिए।”कहकर रमेश ने सरोज को वो बैग पकड़ा दिया जो रोहन ने दिया था।सरोज ने उत्सुकता से बैग खोला और बोली-
“अरे ये तो इतनी महंगी सिल्क की साड़ी है…तुम्हारे पास इतने पैसे कहाँ से…?”
“सरोज,ये मैं नहीं तेरे बेटा लाया हैं।जाते समय मुझे देकर बोला था-‘पापा, आज मेरी तरफ़ से मां को वैलेंटाइन डे का छोटा-सा उपहार दे देना।”
सरोज ने साड़ी को सीने से लगा लिया।उसकी आँखों की नमी बता रही थी, कि यह सिर्फ़ रेशम का एक परिधान नहीं था,बल्कि बेटे-बहू के प्रेम, सम्मान और संस्कारों की अनमोल सौगात थी।
उसी समय विमला की कही बातें उसके कानों में गूँज उठीं।आज उसे फिर विश्वास हो गया,कि बच्चों को संस्कार सिखाए नहीं जाते,उन्हें जीकर दिखाया जाता है।
घर लौटते समय रमेश ने मुस्कुराकर कहा-“देखा सरोज… रेशम की चमक तो समय के साथ फीकी पड़ सकती है,लेकिन रिश्तों में बुने प्रेम और संस्कारों के धागे कभी पुराने नहीं होते।”
सरोज ने साड़ी पर स्नेह से हाथ फेरा और मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया।उसे लगा कि दुनिया की सबसे कीमती सिल्क की साड़ी वही होती है, जिसमें प्रेम,सम्मान और अपनेपन के धागे बुने हों।
कमलेश आहूजा
# “सिल्क की साड़ी ”