संजीवनी

“ये क्या तमाशा लगा रखा है तुम दोनों ने सुबह-सुबह? पूरा मोहल्ला सुन रहा है!” रघुनाथ जी की वो पुरानी कड़क आवाज़ आज महीनों बाद घर में गूंजी थी।

अविनाश और कविता ने एक-दूसरे को देखा और मन ही मन खुश हुए, लेकिन चेहरे पर वही गुस्सा बनाए रखा।

अविनाश ने मुँह बनाते हुए कहा, “देखिए न बाबूजी, मैं इससे अपनी फाइल मांग रहा हूँ और ये मुझे मायके जाने की धमकियाँ दे रही है। इसका तो दिमाग ही खराब हो गया है।”

जब से मालती जी इस दुनिया से गई थीं, रघुनाथ जी ने जैसे खुद को एक खोल में समेट लिया था। वे घंटों अपनी आरामकुर्सी पर बैठे रहते, शून्य में ताकते हुए। न किसी से बात करने की इच्छा, न ही अपनी पसंदीदा किताबों में कोई रुचि। यहाँ तक कि उनके इतने जतन से लगाए गए मोगरे और गुलाब के पौधों में भी अब वो बात नहीं रही थी, क्योंकि उन्हें सींचने वाले हाथों ने हार मान ली थी।

घर के डाइनिंग टेबल पर आज फिर वही चिंता छाई हुई थी।

“अविनाश, बाबूजी ने आज फिर नाश्ते की प्लेट वैसे ही लौटा दी। मैंने उनके पसंद के मूंग के चीले बनाए थे, लेकिन उन्होंने एक निवाला तक नहीं तोड़ा। दूध का गिलास भी वैसे ही रखा है।” बहु कविता की आवाज़ में गहरी चिंता और थकान थी।

अविनाश ने अपने माथे को उंगलियों से सहलाते हुए एक गहरी सांस ली। “समझ नहीं आता कविता, क्या करूँ। डॉक्टर को भी दिखा लिया, सारे टेस्ट नॉर्मल हैं। दवाइयां भी समय पर चल रही हैं। रामदीन को भी लगा रखा है कि वो बाबूजी का हर काम समय पर करे, उन्हें कोई तकलीफ न हो। लेकिन बाबूजी हैं कि बस मौन साधे बैठे हैं। कल रात मैं उनके कमरे में गया था, वो अंधेरे में बैठे बस माँ की तस्वीर को देख रहे थे। मुझे डर लग रहा है कविता… माँ के जाने का सदमा मैं बर्दाश्त कर गया, लेकिन बाबूजी को ऐसे तिल-तिल कर खत्म होते नहीं देख सकता।”

अविनाश की आँखें छलक आईं। उसने अपने पिता को हमेशा एक मजबूत, कड़क और जीवन से भरे इंसान के रूप में देखा था। स्कूल के हेडमास्टर रह चुके रघुनाथ जी के उसूल और उनका रुतबा पूरे मोहल्ले में मशहूर था। घर में उनकी आवाज़ गूँजती थी। लेकिन आज वही आवाज़ कहीं गुम हो गई थी।

उसी शाम, अविनाश के घर उनके पुराने पारिवारिक मित्र और रघुनाथ जी के साथ बरसों तक स्कूल में पढ़ाने वाले शर्मा जी का आना हुआ। शर्मा जी अविनाश को बचपन से जानते थे और मालती जी के निधन के बाद वे अक्सर रघुनाथ जी का हाल-चाल लेने आते रहते थे।

“क्या बात है अविनाश बेटे? बहुत परेशान लग रहे हो?” शर्मा जी ने सोफे पर बैठते हुए पूछा।

अविनाश ने अपनी परेशानी शर्मा जी के सामने रख दी। “अंकल, बाबूजी दिन-ब-दिन कमजोर होते जा रहे हैं। खाना-पीना लगभग छोड़ दिया है। उन्हें बाहर पार्क में ले जाने की कोशिश करता हूँ, तो साफ मना कर देते हैं। हमने उनकी सुख-सुविधा का हर इंतजाम किया है। उनके कमरे में एसी लगवा दिया है, एक नौकर 24 घंटे उनकी सेवा में रहता है। फिर भी वो ठीक क्यों नहीं हो रहे हैं? क्या उन्हें कोई ऐसी बीमारी है जो डॉक्टर पकड़ नहीं पा रहे?”

शर्मा जी ने अविनाश की बात ध्यान से सुनी और एक हल्की सी, उदास मुस्कान उनके चेहरे पर आ गई। उन्होंने चाय का कप टेबल पर रखा और गहरी आवाज़ में बोले, “बेटे, तुमने और कविता ने श्रवण कुमार की तरह अपने पिता की सेवा की है। इसमें कोई शक नहीं कि तुम दोनों बहुत अच्छे बच्चे हो। तुमने उनके शरीर के आराम के लिए सब कुछ किया है, लेकिन तुमने उनकी आत्मा की जरूरत को नहीं समझा।”

अविनाश उलझन में पड़ गया। “आत्मा की जरूरत? मैं समझा नहीं अंकल।”

शर्मा जी ने समझाना शुरू किया, “बेटा, जब मालती भाभी ज़िंदा थीं, तो क्या तुमने कभी रघुनाथ जी को शांति से बैठे देखा था? भाभी उन्हें कभी खाली नहीं बैठने देती थीं। ‘अरे सुनते हो, ज़रा बाजार से ताज़ा धनिया तो ले आना’, ‘देखिए, आपने फिर से गीले तौलिये को बिस्तर पर छोड़ दिया’, ‘आज शाम को मेरे साथ मंदिर चलना है, कोई बहाना नहीं चलेगा।’ याद है तुम्हें ये सब?”

अविनाश और पास ही खड़ी कविता, दोनों के चेहरों पर पुरानी यादों की एक हल्की मुस्कान आ गई। “हाँ अंकल, माँ हमेशा बाबूजी से कुछ न कुछ करवाती रहती थीं और बाबूजी हमेशा चिढ़ते हुए कहते थे कि रिटायरमेंट के बाद भी ये औरत मुझे चैन से जीने नहीं देती।”

शर्मा जी हँसे, “वही तो! वो चिढ़ना, वो नोकझोंक, वो शिकायतें… वही तो तुम्हारे बाबूजी के जीने का टॉनिक था। वो मालती भाभी की डांट नहीं थी, वो उनका अधिकार था, उनका प्यार था जो रघुनाथ जी को ये अहसास दिलाता था कि घर में उनकी जरूरत है। वो इस घर के मुखिया हैं। तुमने क्या किया? तुमने रामदीन को लगाकर बाबूजी को एक ‘मरीज’ बना दिया। उन्हें लगने लगा है कि अब उनकी किसी को जरूरत नहीं है, वे बस एक बोझ हैं जिसकी देखभाल की जा रही है। उनका अकेलापन उन्हें भीतर ही भीतर खा रहा है। उनका इलाज किसी डॉक्टर की दवा में नहीं है अविनाश, उनका इलाज इस घर के शोर में है, उनके उस अधिकार में है जो मालती भाभी के जाने के बाद तुमने अनजाने में उनसे छीन लिया है।”

शर्मा जी की बातों ने अविनाश और कविता के दिमाग के बंद दरवाजे खोल दिए। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया था। वे समझ गए थे कि अत्यधिक देखभाल ने ही उनके पिता को जीवन से काट दिया है।

“तो अब हम क्या करें अंकल?” कविता ने पूछा।

शर्मा जी ने अपनी छड़ी उठाते हुए कहा, “वही करो जो मालती भाभी करती थीं। उन्हें घर के मामलों में शामिल करो। उनसे वो सम्मान और अधिकार वापस मत छीनो जो उनका हमेशा से था। उन्हें ये महसूस कराओ कि ये घर आज भी उनके बिना नहीं चल सकता।”

अगले दिन की सुबह घर का माहौल कुछ बदला-बदला सा था। रघुनाथ जी अपने कमरे में वैसे ही उदास बैठे थे। रामदीन नाश्ते की ट्रे लेकर खड़ा था, लेकिन रघुनाथ जी ने हाथ के इशारे से उसे जाने के लिए कह दिया।

तभी बाहर हॉल से अविनाश की तेज़ आवाज़ आई। “कविता! मैंने तुमसे कितनी बार कहा है कि मेरे ऑफिस की फाइलों को हाथ मत लगाया करो। मेरी वो नीली वाली फाइल कहाँ है? मुझे अभी मीटिंग के लिए निकलना है।”

कविता की आवाज़ भी उतनी ही तेज़ थी। “मैंने कोई फाइल नहीं छुई है। आप खुद ही अपना सामान इधर-उधर रखकर भूल जाते हैं और चिल्लाते मुझ पर हैं। मैं सुबह से किचन में काम करूँ या आपकी चीजें ढूँढती रहूँ?”

“अरे तो घर का काम कौन सा पहाड़ तोड़ना है! मैं बाहर जाकर पैसे कमाता हूँ, तुम कम से कम मेरी चीजें तो संभाल कर रख सकती हो!” अविनाश ने बनावटी गुस्से से कहा।

“अच्छा! तो आपको लगता है मैं घर में बैठकर आराम फरमाती हूँ? कल से आप खुद अपना नाश्ता बनाइयेगा और अपनी फाइलें भी खुद ढूँढिएगा। मैं जा रही हूँ अपने मायके!” कविता ने भी उसी लहज़े में जवाब दिया।

रघुनाथ जी के कमरे तक ये पूरी बहस साफ़ पहुँच रही थी। पहले तो उन्होंने अनसुना करने की कोशिश की, लेकिन जब बात मायके जाने तक पहुँच गई, तो उनसे रहा नहीं गया। उनके माथे पर सिलवटें पड़ गईं। उन्होंने अपनी लाठी उठाई और कांपते कदमों से हॉल में आ गए।

“ये क्या तमाशा लगा रखा है तुम दोनों ने सुबह-सुबह? पूरा मोहल्ला सुन रहा है!” रघुनाथ जी की वो पुरानी कड़क आवाज़ आज महीनों बाद घर में गूंजी थी।

अविनाश और कविता ने एक-दूसरे को देखा और मन ही मन खुश हुए, लेकिन चेहरे पर वही गुस्सा बनाए रखा।

अविनाश ने मुँह बनाते हुए कहा, “देखिए न बाबूजी, मैं इससे अपनी फाइल मांग रहा हूँ और ये मुझे मायके जाने की धमकियाँ दे रही है। इसका तो दिमाग ही खराब हो गया है।”

रघुनाथ जी ने अपनी लाठी ज़मीन पर ठोकते हुए अविनाश को घूरा। “दिमाग उसका नहीं, तुम्हारा खराब हो गया है। एक तो अपनी चीजें खुद संभाल कर नहीं रख सकते, ऊपर से बहु पर चिल्ला रहे हो। भूल गए बचपन में जब तुम अपना स्कूल बैग भूल जाते थे, तो तुम्हारी माँ कैसे तुम्हें ढूँढ कर देती थी? और तुम बहु से ऐसे बात करते हो? माफी मांगो अभी इससे!”

अविनाश ने सिर झुका लिया, “सॉरी बाबूजी।”

कविता ने तुरंत मौके का फायदा उठाया। “बाबूजी, आप ही समझाइए इन्हें। और हाँ बाबूजी, वो बाहर क्यारी में जो गुलाब के पौधे हैं, उनमें कीड़े लग रहे हैं। माली कह रहा था कि उसे समझ नहीं आ रहा कौन सी दवा डालनी है। आप ही चलकर उसे बता दीजिए, वरना सारे पौधे सूख जाएँगे। मैं तो इनके रोज के झगड़ों से परेशान हो गई हूँ।”

रघुनाथ जी का सीना थोड़ा चौड़ा हो गया। उन्हें लगा कि उनके बिना तो इस घर का कोई काम ढंग से हो ही नहीं सकता। “अरे वो माली तो है ही बेवकूफ। उसे क्या पता गुलाब की देखभाल कैसे होती है। मैं खुद जाकर देखता हूँ।”

कविता तुरंत अंदर से नाश्ते की प्लेट ले आई। “पहले आप ये चीला खाइए बाबूजी। कल भी आपने कुछ नहीं खाया था। खाली पेट आप बाहर धूप में नहीं जाएँगे। और हाँ, आज मैं आपको अपने हाथ से खिलाऊँगी, वरना आप आधा छोड़ देते हैं।”

रघुनाथ जी ने एक पल के लिए नाश्ते की प्लेट को देखा और फिर कविता के मुस्कुराते हुए चेहरे को। उन्होंने बिना कुछ कहे अपना मुँह खोल दिया। कविता ने अपने हाथों से उन्हें चीले का पहला निवाला खिलाया।

तभी अविनाश भी पास आकर बैठ गया। “अरे कविता, मुझे भी बहुत भूख लगी है। बाबूजी के साथ मैं भी यहीं नाश्ता करूँगा।”

रघुनाथ जी ने प्लेट से एक टुकड़ा तोड़ा और मुस्कुराते हुए अविनाश के मुँह में डाल दिया। “ले खा ले… बड़ा आया ऑफिस का बॉस बनने वाला। फाइल तो ढूँढनी आती नहीं।”

अविनाश ने भी हँसते हुए वो निवाला खा लिया। तीनों डाइनिंग टेबल पर बैठे थे। महीनों बाद उस घर में फिर से हँसी गूंज रही थी। रघुनाथ जी की आँखों की वो शून्यता अब गायब हो चुकी थी। वहाँ अब जीवन की एक नई चमक थी। उन्हें उनका खोया हुआ वजूद वापस मिल गया था।

अविनाश ने छुपकर शर्मा जी को एक मैसेज टाइप किया- “इलाज काम कर गया अंकल, संजीवनी मिल गई।”

ज़िंदगी में कभी-कभी बुजुर्गों को सिर्फ हमारे सहारे की नहीं, बल्कि इस अहसास की जरूरत होती है कि हमें आज भी उनके सहारे की जरूरत है।

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लेखिका : रीमा साहू

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