“अनन्या, उठो। लगता है नीचे अंकल की तबीयत ज्यादा खराब है,” सिद्धार्थ ने अपनी पत्नी को जगाते हुए कहा।
दोनों दौड़कर नीचे गए। देवकी जी ने रोते हुए दरवाजा खोला। अंदर रमाकांत जी सीने पर हाथ रखे सोफे पर गिरे हुए थे और उन्हें सांस लेने में भयंकर तकलीफ हो रही थी। उनका चेहरा पसीने से भीग गया था।
“बेटा, पता नहीं क्या हो गया है। अचानक सीने में दर्द उठा और अब सांस नहीं आ रही,” देवकी जी बदहवास होकर रो रही थीं।
लखनऊ के एक पुराने और शांत मोहल्ले में पंडित रमाकांत और उनकी पत्नी देवकी जी का एक खूबसूरत दो मंजिला मकान था— ‘स्मृति भवन’। बाहर से देखने पर यह मकान जितना भव्य लगता था, अंदर से उतनी ही गहरी खामोशी इसमें पसरी रहती थी। रमाकांत जी रिटायर्ड सरकारी अधिकारी थे और देवकी जी एक कुशल गृहिणी। उनके दो बच्चे थे— एक बेटा जो बरसों पहले अमेरिका जाकर वहीं बस गया था, और एक बेटी जिसकी शादी दिल्ली में हो गई थी और वह अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों में इतनी उलझी थी कि साल-दो साल में एकाध बार ही चक्कर लगा पाती थी। उम्र के इस ढलान पर इन दोनों बुजुर्गों के पास समय काटने के लिए टीवी के कुछ धारावाहिक, अखबार के पन्ने और अतीत की यादों के सिवा कुछ नहीं था। घर का ऊपरी हिस्सा, जो उन्होंने बहुत शौक से बनवाया था, अब बस धूल फांक रहा था।
एक दिन रमाकांत जी ने तय किया कि ऊपर का हिस्सा किराए पर दे दिया जाए। उनका मकसद पैसों की कमाई नहीं, बल्कि घर में कुछ चहल-पहल और इंसानी आवाजों को वापस लाना था। घर के बाहर ‘टू लेट’ का बोर्ड टंग गया। कई लोग आए, लेकिन किसी न किसी वजह से बात नहीं बनी। किसी को मकान छोटा लगा, तो किसी का व्यवहार रमाकांत जी को पसंद नहीं आया।
फिर एक रविवार की सुबह, सिद्धार्थ और अनन्या उनके दरवाजे पर आए। सिद्धार्थ एक निजी बैंक में मैनेजर था और अनन्या एक स्कूल में शिक्षिका। दोनों की शादी को बमुश्किल एक साल ही हुआ था। सिद्धार्थ का तबादला हाल ही में लखनऊ हुआ था। जब रमाकांत जी ने दरवाजा खोला, तो सामने खड़े इस युवा जोड़े के चेहरे पर एक अजीब सी सादगी और अपनापन था।
“प्रणाम अंकल जी,” सिद्धार्थ ने हाथ जोड़कर कहा, “हमने बाहर किराए का बोर्ड देखा था। हमें एक छोटे परिवार के लिए घर चाहिए था। क्या हम ऊपर का हिस्सा देख सकते हैं?”
रमाकांत जी ने उन्हें अंदर बुलाया। देवकी जी भी रसोई से बाहर आ गईं। अनन्या की सौम्य मुस्कान और बड़ों के प्रति आदर देखकर देवकी जी का मन पहली ही नज़र में पसीज गया। मकान देखने के बाद सिद्धार्थ ने कहा, “अंकल, घर बहुत सुंदर और हवादार है। अगर आपको हम लोग ठीक लगें, तो हम इसे किराए पर लेना चाहेंगे।”
देवकी जी ने रमाकांत जी की तरफ देखा और उनकी आँखों ही आँखों में सहमति हो गई। “बेटा, घर तो ठीक है, बस हम बूढ़े लोग हैं। शोर-शराबा ज्यादा पसंद नहीं,” रमाकांत जी ने एक हल्की सी शर्त रखते हुए कहा।
“आप बिल्कुल फिक्र मत कीजिए अंकल। हम दोनों दिन भर काम पर रहते हैं, और वैसे भी हमें भी शांति ही पसंद है,” अनन्या ने चहकते हुए कहा।
अगले ही हफ्ते सिद्धार्थ और अनन्या का सामान आ गया। उनके आने से जैसे उस निर्जीव पड़े ‘स्मृति भवन’ में जान आ गई। सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते कदमों की आहट, कभी अनन्या की हंसी की आवाज़, तो कभी सिद्धार्थ के गुनगुनाने की धुन— देवकी जी और रमाकांत जी को यह सब बहुत अच्छा लगने लगा। हालांकि, शुरुआत में दोनों परिवारों के बीच एक औपचारिक दूरी बनी रही। दोनों बुजुर्ग अपनी मर्यादा में रहते और सिद्धार्थ-अनन्या भी अपने काम में व्यस्त रहते।
लेकिन यह दूरी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाई। एक शाम, बारिश बहुत तेज हो रही थी। देवकी जी के घुटनों का दर्द मौसम की वजह से उभर आया था और वह सोफे पर बैठी कराह रही थीं। रमाकांत जी रसोई में अपने लिए चाय बनाने की कोशिश कर रहे थे, जो कि उनके लिए एक मुश्किल काम था। तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। रमाकांत जी ने दरवाजा खोला तो देखा अनन्या हाथ में एक ट्रे लिए खड़ी थी, जिसमें गरमा-गरम चाय के दो कप और कुछ पकौड़े रखे थे।
“अंकल, आज बारिश हो रही थी तो मैंने सोचा आपके और आंटी के लिए भी कुछ बना लूँ। आप लोग अकेले चाय कैसे पीते,” अनन्या ने मुस्कुराते हुए कहा।
रमाकांत जी भावुक हो गए। “अरे बेटी, इसकी क्या जरूरत थी? तुम लोग खुद दिन भर के थके हुए आए हो।”
“इसमें कैसी थकान अंकल? आप बस चाय पीकर बताइए कि कैसी बनी है,” कहकर अनन्या अंदर आ गई। उसने देखा कि देवकी जी दर्द से परेशान हैं। उसने तुरंत चाय की ट्रे मेज पर रखी और देवकी जी के पैरों के पास बैठ गई। “आंटी, दर्द बहुत ज्यादा है क्या? मेरे पास एक बहुत अच्छा आयुर्वेदिक तेल है, मेरी माँ भी यही लगाती हैं। मैं अभी लेकर आती हूँ।”
देवकी जी कुछ कह पातीं, उससे पहले ही अनन्या ऊपर गई और तेल लेकर वापस आ गई। उसने अपने हाथों से देवकी जी के घुटनों की मालिश करनी शुरू कर दी। देवकी जी की आँखों से आँसू छलक पड़े। कितने साल हो गए थे जब किसी ने इतने प्यार से उन्हें छुआ था। उनका अपना बेटा जब भी फोन करता, तो बस दो मिनट हाल-चाल पूछकर रख देता था। आज एक अजनबी लड़की उनके पैरों का दर्द कम करने की कोशिश कर रही थी।
“जीती रहो बेटी,” देवकी जी ने अनन्या के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
उस दिन के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। किराएदार और मकान मालिक का रिश्ता अब एक परिवार में बदल चुका था। सिद्धार्थ सुबह ऑफिस जाने से पहले रमाकांत जी के साथ बैठकर अखबार पढ़ता और देश-दुनिया की बातें करता। रविवार के दिन दोनों बैठकर शतरंज खेलते। रमाकांत जी को सिद्धार्थ में अपना बेटा नजर आने लगा था। उधर, अनन्या स्कूल से लौटकर अक्सर देवकी जी के पास बैठ जाती। वह उनसे पुराने जमाने की रेसिपी सीखती, उनके साथ बैठकर सब्जी काटती और अपनी दिन भर की बातें साझा करती। देवकी जी उसे अपनी बेटी की तरह लाड़ करने लगीं।
महीने बीतते गए। सर्दियाँ दस्तक दे चुकी थीं। दिसंबर की एक सर्द रात में, लगभग दो बजे, रमाकांत जी के खांसने की तेज़ आवाज़ से सिद्धार्थ की नींद खुल गई। शुरुआत में उसे लगा कि शायद ठंड की वजह से खांसी उठ रही होगी, लेकिन जब खांसी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी और साथ में देवकी जी की घबराई हुई आवाज़ें आने लगीं, तो सिद्धार्थ तुरंत बिस्तर से उठ खड़ा हुआ।
“अनन्या, उठो। लगता है नीचे अंकल की तबीयत ज्यादा खराब है,” सिद्धार्थ ने अपनी पत्नी को जगाते हुए कहा।
दोनों दौड़कर नीचे गए। देवकी जी ने रोते हुए दरवाजा खोला। अंदर रमाकांत जी सीने पर हाथ रखे सोफे पर गिरे हुए थे और उन्हें सांस लेने में भयंकर तकलीफ हो रही थी। उनका चेहरा पसीने से भीग गया था।
“बेटा, पता नहीं क्या हो गया है। अचानक सीने में दर्द उठा और अब सांस नहीं आ रही,” देवकी जी बदहवास होकर रो रही थीं।
सिद्धार्थ ने एक पल की भी देरी नहीं की। “आंटी, आप घबराइए मत। अनन्या, तुम अंकल का शॉल और आंटी का चश्मा लो, मैं गाड़ी निकालता हूँ। हमें तुरंत अस्पताल जाना होगा।”
सिद्धार्थ ने रमाकांत जी को सहारा देकर उठाया और गाड़ी की पिछली सीट पर लिटाया। अनन्या देवकी जी को ढांढस बंधाती हुई उनके साथ बैठ गई। आधी रात के सन्नाटे को चीरती हुई गाड़ी शहर के सबसे बड़े अस्पताल की तरफ दौड़ रही थी। अस्पताल पहुँचते ही सिद्धार्थ ने स्ट्रेचर का इंतजाम किया और डॉक्टरों को बुलाया। रमाकांत जी को तुरंत आईसीयू में ले जाया गया।
बाहर देवकी जी का रो-रोकर बुरा हाल था। अनन्या उन्हें गले लगाए बैठी थी और लगातार उनकी पीठ सहला रही थी। “कुछ नहीं होगा आंटी, अंकल बिल्कुल ठीक हो जाएंगे। भगवान पर भरोसा रखिए,” अनन्या उन्हें दिलासा दे रही थी, हालांकि उसकी अपनी आँखें भी नम थीं।
सिद्धार्थ डॉक्टरों के पीछे भाग रहा था, दवाइयाँ ला रहा था, फॉर्म भर रहा था और सारे बिल जमा कर रहा था। उसने एक बार भी यह नहीं सोचा कि वह ये सब किसी गैर के लिए कर रहा है। उसे बस इतना पता था कि जिन बुजुर्गों ने उन्हें इतना प्यार दिया है, आज उनकी जान बचाना उसका धर्म है।
करीब दो घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए। “देखिए, उन्हें माइनर हार्ट अटैक आया था। गनीमत है कि आप लोग उन्हें सही समय पर ले आए। अगर आधा घंटा भी और देर हो जाती, तो कुछ भी हो सकता था। अब वे खतरे से बाहर हैं। आप बेटा हैं उनके?” डॉक्टर ने सिद्धार्थ से पूछा।
सिद्धार्थ ने बिना कोई संकोच किए जवाब दिया, “जी डॉक्टर साहब।”
देवकी जी ने यह सुना तो उनकी रुलाई फूट पड़ी। खून का रिश्ता ना होते हुए भी आज सिद्धार्थ ने एक बेटे का फर्ज निभा दिया था।
तीन दिन बाद रमाकांत जी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। सिद्धार्थ और अनन्या उन्हें बड़े प्यार से घर लेकर आए। घर पहुँचकर अनन्या ने उनके कमरे को अच्छे से साफ किया, उनके लिए हल्का दलिया बनाया और उन्हें दवाइयाँ दीं। देवकी जी सिर्फ चुपचाप दोनों को देख रही थीं। उनका मन एक अजीब सी कृतज्ञता और अपराधबोध से भरा हुआ था।
रात को जब सिद्धार्थ रमाकांत जी के पैरों पर कंबल ओढ़ा रहा था, तो रमाकांत जी ने उसका हाथ पकड़ लिया। उनके कांपते हाथों में सिद्धार्थ के लिए असीम प्यार था।
“बेटा, तुमने जो हमारे लिए किया है, उसका कर्ज हम सात जनम में भी नहीं उतार सकते,” रमाकांत जी की आवाज़ भारी हो गई थी।
सिद्धार्थ मुस्कुराया और उनके पास बैठ गया। “अंकल, अपनों के बीच कर्ज नहीं होता, फर्ज होता है। और मैंने सिर्फ अपना फर्ज निभाया है।”
देवकी जी भी वहां आ गईं। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। “बेटा, हम तो सोच रहे थे कि हमारा बुढ़ापा इन खाली दीवारों को ताकते हुए कट जाएगा। हमें लगा था कि हमारे अपने ही हमें भूल गए हैं, तो इस दुनिया में हमारा कौन होगा। लेकिन तुम दोनों ने आकर यह साबित कर दिया कि रिश्ते खून से नहीं, दिल से बनते हैं।”
अनन्या ने देवकी जी के आँसू पोंछते हुए कहा, “आंटी, हम भी तो अपने माता-पिता से दूर यहाँ अकेले ही थे। हमें भी तो इस अनजान शहर में एक परिवार की जरूरत थी। आपने हमें पनाह ही नहीं दी, बल्कि माता-पिता का प्यार भी दिया है।”
रमाकांत जी ने गहरी सांस ली और कहा, “सच कहूँ बेटा, इंसान को उम्र के इस पड़ाव पर आलीशान घर या बहुत सारे पैसों की जरूरत नहीं होती। उसे जरूरत होती है तो बस अपनेपन की, किसी के साथ की, और दो मीठे बोल की। जो सुकून तुम दोनों के होने से मिला है, वह हमें हमारे खुद के बच्चों से भी कभी नहीं मिला।”
उस रात ‘स्मृति भवन’ की खामोशी हमेशा के लिए टूट गई थी। अब वह सिर्फ एक ईंट-पत्थर का मकान नहीं था, बल्कि एक सच्चा घर बन गया था जहाँ खून के नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और संवेदना के रिश्ते सांस ले रहे थे। दूर बैठे असल बच्चों के फोन शायद अभी भी महीनों में एक बार आते थे, लेकिन रमाकांत और देवकी जी को अब उसका इंतजार नहीं था। उनके पास उनका अपना परिवार था— सिद्धार्थ और अनन्या के रूप में, जिन्होंने किराए पर एक मकान लिया था, लेकिन हमेशा के लिए उनके दिल पर कब्ज़ा कर लिया था।
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लेखिका : सीमा श्रीवास्तव