“बाबूजी, यह घर, यह परिवार और मेरी यह पूरी जिंदगी आपकी ही तो बदौलत है। आज अगर मैं कमाने लायक बना हूं, तो यह आपकी तीस साल की तपस्या का फल है। यह पेंशन आपकी मेहनत का सम्मान है, यह आपका अधिकार है। आप इसे अपनी मर्जी से जहां चाहे खर्च करें, जिसे चाहे दें। घर का खर्च चलाना मेरी जिम्मेदारी है, आपका फर्ज नहीं। और आज… आज आपको कहीं पैदल या किसी के सहारे नहीं जाना है। मैंने शहर के सबसे बड़े आई हॉस्पिटल में आज ग्यारह बजे का अपॉइंटमेंट ले लिया है। आज ही आपके सारे टेस्ट होंगे और परसों आपकी आंखों का ऑपरेशन होगा। और हां, इसका एक-एक पैसा आपका यह बेटा अपनी कमाई से भरेगा, क्योंकि यह मेरा फर्ज भी है और मेरा सौभाग्य भी।”
छियासठ वर्षीय हरिशंकर जी अपने चश्मे के मोटे शीशे को कुर्ते के कोने से साफ कर रहे थे। आंखों के आगे एक धुंधला सा पर्दा पिछले कई महीनों से छाने लगा था। मोतियाबिंद का असर अब इतना बढ़ चुका था कि दोपहर की कड़ी धूप में भी चीजें साफ दिखने के बजाय चमकती हुई परछाइयों जैसी नजर आती थीं। डॉक्टर ने कहा था कि जाड़े की शुरुआत में ही ऑपरेशन करवा लें, वरना रोजमर्रा के छोटे-मोटे कामों में भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा। हरिशंकर जी के लिए ‘सहारा’ शब्द हमेशा से एक ऐसी कसक की तरह था, जिसे वे ताउम्र खुद से दूर रखना चाहते थे।
सरकारी सिंचाई विभाग से वरिष्ठ लिपिक के पद से सेवानिवृत्त हुए उन्हें अब पांच साल बीत चुके थे। पैंतीस साल तक उन्होंने अपनी कलम की स्याही और ईमानदारी की बदौलत परिवार की गाड़ी को खींचा था। बेटे मयंक की पढ़ाई-लिखाई, उसकी इंजीनियरिंग की भारी-भरकम फीस और फिर महानगर में उसकी नौकरी लगवाने तक, उन्होंने कभी अपने माथे पर शिकन नहीं आने दी थी। बेटी अंजलि का ब्याह भी उन्होंने अपनी जमा-पूंजी और भविष्य निधि के पैसों से बिना किसी कर्ज के बहुत धूमधाम से किया था। अब वे अपने पैतृक घर में बेटे मयंक, बहू श्वेता और आठ साल के पोते चीकू के साथ रह रहे थे।
घर के बाहर गली के मोड़ पर लगे पीपल के पेड़ के नीचे खड़े होकर हरिशंकर जी अपनी पुरानी साइकिल के पैडल को देख रहे थे। साइकिल की चेन ढीली थी और उनकी आंखों की कमजोरी के कारण अब साइकिल चलाना भी खतरे से खाली नहीं था। तभी पड़ोस के युवा शिक्षक नवीन अपनी बाइक रोकते हुए बोले, “अरे मास्टर साहब, इतनी चिलचिलाती धूप में पैदल कहां चल दिए? आपकी वो पुरानी साइकिल आज निकली नहीं?”
हरिशंकर जी ने अपनी लाठी को जमीन पर टिकाते हुए एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “अरे नवीन बाबू, कुछ नहीं बस आंखों में मोतियाबिंद जरा गहरा गया है। सामने की सड़क पर गाड़ियां धुंधली दिखती हैं, इसलिए रिस्क नहीं लेता। अगले महीने अस्पताल जाकर लेंस डलवाना है। अभी बस चौराहे वाले बैंक तक जा रहा था।”
नवीन ने तुरंत बाइक घुमाते हुए कहा, “आइए चाचा जी, धूप बहुत तेज हो रही है, मैं आपको छोड़ देता हूं। वैसे बैंक में क्या कोई खास काम था?”
बाइक के पीछे बैठते हुए हरिशंकर जी के हाथ जरा कांपे, फिर उन्होंने अपने कुर्ते की जेब को छूते हुए धीरे से कहा, “बस बेटा, इस महीने की पेंशन खाते में आ गई होगी, उसी की निकासी करनी थी। पासबुक भी अपडेट करवानी थी।”
नवीन ने सहज भाव से कहा, “अरे चाचा जी, आप भी न! मयंक भैया तो निजी कंपनी में इतने बड़े पद पर हैं, उनका पैकेज इतना शानदार है, फिर आपको इस उम्र में अपनी पेंशन के चंद रुपयों के लिए बैंक की लाइनों में धक्का खाने की क्या जरूरत है? मयंक भैया तो घर का सारा खर्च आराम से उठा ही लेते होंगे।”
नवीन की इस सीधी और सहज बात पर हरिशंकर जी के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान तैर गई, जिसमें दर्द भी था और जीवन का कड़वा सच भी। उन्होंने कोई लंबा उत्तर नहीं दिया, बस इतना ही फुसफुसाए, “हां बेटा, मयंक कमाता तो अच्छा है, पर अपनी छोटी-मोटी जरूरतों के लिए बार-बार हाथ फैलाना इस उम्र में आत्मा को कचोटता है। किसी के सामने अपनी छोटी सी चाहत के लिए याचक बनकर खड़े होने से बेहतर है कि इंसान अपने बचे-खुचे स्वाभिमान से ही सांस ले।”
बैंक के मुख्य द्वार पर नवीन ने जब उन्हें उतारा, तो हरिशंकर जी ने उसे ढेरों दुआएं दीं। नवीन हाथ हिलाकर चला गया, लेकिन हरिशंकर जी वहीं सीढ़ियों पर एक पल के लिए ठिठक कर खड़े रह गए। उनके मन के भीतर आज सुबह की वो घटना किसी पुरानी चोट की तरह फिर से टीसने लगी थी।
सुबह चाय की मेज पर जब हरिशंकर जी अपने पुराने अखबार के पन्नों को करीने से पलट रहे थे, तभी रसोई से बहू श्वेता की फुसफुसाहट सुनाई दी थी। वह मयंक से कुछ कह रही थी। मयंक हाथ में चाय का कप लिए बाहर आया और औपचारिकता भरे स्वर में बोला, “बाबूजी, आज महीने की पांच तारीख हो गई है। क्या आपके खाते में पेंशन क्रेडिट हो गई? दरअसल चीकू की तिमाही फीस जमा करनी थी और इस महीने मेरी कंपनी का बोनस जरा अटक गया है, तो अगर आपकी पेंशन आ गई हो तो दे दीजिएगा।”
हरिशंकर जी ने अखबार से नजरें हटाकर बेटे के चेहरे को देखा था। मयंक की आंखों में पिता के स्वास्थ्य या उनकी आंखों के ऑपरेशन की कोई चिंता नहीं थी, बल्कि सिर्फ उस तारीख की फिक्र थी जब पेंशन का मैसेज फोन पर आता है। हरिशंकर जी ने अपनी आंखों की धुंध को छुपाते हुए शांत भाव से कहा था, “हां बेटा, मैसेज तो कल शाम ही आया था। आंखों में धुंधलापन होने की वजह से मैं शाम को गाड़ी नहीं निकाल सका। आज दोपहर में जाकर निकाल लाऊंगा।”
हरिशंकर जी को हर महीने महज अठारह हजार रुपये की पेंशन मिलती थी। आज की महंगाई के इस दौर में किसी महानगर या बड़े घराने के लिए शायद अठारह हजार रुपये कोई बहुत बड़ी रकम न हों, लेकिन हरिशंकर जी जैसे एक सेवानिवृत्त बुजुर्ग के लिए यह सिर्फ कागज के नोट नहीं थे, बल्कि उनके आत्मसम्मान की वह दीवार थी जो उन्हें पूरी तरह लाचार होने से बचाए रखती थी।
इस अठारह हजार रुपये का बंटवारा भी उन्होंने अपने मन के तराजू पर बहुत सलीके से कर रखा था। वे हर महीने बारह हजार रुपये सीधे मयंक और श्वेता के हाथ में रख देते थे ताकि घर के राशन, दूध और बिजली के बिल में उनका भी एक योगदान रहे। वे नहीं चाहते थे कि बहू के मन में कभी यह विचार आए कि ससुर मुफ्त की रोटियां तोड़ रहे हैं। बचे हुए छह हजार रुपयों में से तीन हजार रुपये वे अपने बटुए में रखते थे। इस रकम से वे अपनी बीपी और शुगर की दवाइयां लाते थे, हफ्ते में एक बार मोहल्ले के बाजार से ताजी मौसमी सब्जियां और फल खरीद लाते थे और शाम को जब चीकू स्कूल से लौटता था, तो उसकी पसंद की चॉकलेट, रंग-बिरंगी पेंसिलें या कोई छोटी खिलौना गाड़ी लाकर उसकी मुस्कान खरीद लेते थे।
बाकी बचे तीन हजार रुपयों को वे कभी नहीं छूते थे, वे पैसे बैंक खाते में ही पड़े रहते थे। हरिशंकर जी का मानना था कि बुढ़ापा एक ऐसा मौसम है जो कभी भी बीमारी की आंधी लेकर आ सकता है। कल को अगर अस्पताल का मुंह देखना पड़े, कोई गंभीर ऑपरेशन कराना पड़े, तो कम से कम कुछ अपनी पूंजी तो पास हो! जब इंसान के पास अपने पैसे होते हैं, तभी तीमारदारी करने वालों के चेहरों पर झल्लाहट नहीं आती। इसके अलावा, साल में एक या दो बार जब बेटी अंजलि अपने ससुराल से मायके आती थी, तो उसके और उसके बच्चों के हाथ में विदाई के रूप में शगुन के कुछ रुपये रखना हरिशंकर जी के लिए दुनिया का सबसे बड़ा सुकून था। एक पिता चाहे कितना भी बूढ़ा और अशक्त क्यों न हो जाए, अपनी बेटी को खाली हाथ विदा करने की कल्पना मात्र से ही उसकी रीढ़ की हड्डी सिहर उठती है।
पेंशन की यह छोटी सी रकम भले ही परिवार के बड़े खर्चों के सामने बहुत मामूली थी, लेकिन हरिशंकर जी के लिए यह उनके स्वाभिमान का सुरक्षा कवच थी। जिसने पूरी जिंदगी पसीने की कमाई खाई हो, जिसने अपने दम पर गृहस्थी का महल खड़ा किया हो, वह बुढ़ापे में अपनी एक-एक गोली या चाय की पत्ती के लिए अपने ही बच्चों के सामने गिड़गिड़ाए, यह घूंट हरिशंकर जी से पिया नहीं जाता था। पराए की तो बात ही छोड़िए, अपने सगे बेटे की कृपा पर निर्भर होना भी एक स्वाभिमानी इंसान की रूह को छलनी कर देता है।
बैंक के कैश काउंटर से जब उन्होंने बारह हजार रुपये के नए नोट लिए, तो उन्होंने उसे एक लिफाफे में अलग रखा और अपने हिस्से के तीन हजार रुपये अपनी जेब में डाले। बैंक से निकलकर वे धीरे-धीरे कदमों से घर की ओर चल पड़े। रास्ते में धूप और तीखी हो गई थी। मोतियाबिंद की वजह से पैर कई बार सड़क के गड्ढों में डगमगाए, लेकिन उनके भीतर का स्वाभिमान उन्हें बिना किसी सहारे के आगे बढ़ा रहा था।
घर पहुंचकर उन्होंने दरवाजे की घंटी बजाई। श्वेता ने दरवाजा खोला। हरिशंकर जी ने बिना कुछ कहे वह लिफाफा मेज पर रख दिया और बोले, “बहू, यह इस महीने का खर्च है। मयंक से कहना चीकू की फीस समय पर जमा कर दे।” श्वेता ने मुस्कुराते हुए लिफाफा उठा लिया, लेकिन उसने यह नहीं पूछा कि बाबूजी, आप इतनी धूप में पैदल चलकर आए हैं, क्या आपको एक गिलास ठंडा पानी चाहिए? हरिशंकर जी चुपचाप अपने कमरे में चले गए और पंखा चलाकर तख्त पर लेट गए। उनकी थकी हुई देह को विश्राम मिल गया था, लेकिन मन विचारों के समंदर में गोते लगा रहा था।
शाम को जब मयंक दफ्तर से लौटा, तो घर में सब सामान्य था। रात के खाने की मेज पर जब सब बैठे, तो चीकू ने अचानक अपनी नई ड्राइंग बुक दिखाते हुए कहा, “पापा, देखो! आज बाबा ने मुझे वाटर कलर्स का नया सेट और यह स्केच बुक दिला दी। मेरी क्लास में सबसे सुंदर कलर्स मेरे पास हैं!” मयंक ने बेटे के सिर पर हाथ फेरा, लेकिन तभी उसकी नजर कमरे के कोने में रखी बाबूजी की खाली चश्मे की डिब्बी और डॉक्टर की उस पर्ची पर पड़ी जो पिछले दो महीने से मेज के कांच के नीचे दबी हुई थी। उस पर्ची पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—’मोतियाबिंद सर्जरी: तत्काल आवश्यक’।
मयंक का खाना अचानक उसके गले में अटकने लगा। उसने अपनी नजरें उठाकर बाबूजी को देखा, जो अपनी कांपती उंगलियों से दाल में रोटी का टुकड़ा भिगोने की कोशिश कर रहे थे। आंखों की रोशनी कम होने के कारण उनका हाथ बार-बार थाली के किनारे से टकरा रहा था। मयंक ने अपने मन में हिसाब लगाया—बाबूजी हर महीने बारह हजार रुपये पूरे अनुशासन के साथ घर के खर्च के लिए दे देते हैं, बाकी के कुछ पैसों से वे अपनी दवाएं लेते हैं, चीकू की ख्वाहिशें पूरी करते हैं, और अपनी आंखों का ऑपरेशन महीनों से इसलिए टाल रहे हैं क्योंकि वे अपने बेटे पर बीस-पच्चीस हजार रुपयों का बोझ नहीं डालना चाहते!
उस रात मयंक को नींद नहीं आई। उसके कानों में नवीन की कही वो बात गूंज रही थी जो शाम को दूध लाते समय नवीन ने उससे कही थी, “मयंक भाई, आज दोपहर चाचा जी बैंक की सीढ़ियों पर बहुत लड़खड़ा रहे थे। वे कह रहे थे कि बच्चों से मांगना अच्छा नहीं लगता, इसलिए खुद ही पैसे निकालने आए। उनका ध्यान रखा करो भाई, वो बहुत स्वाभिमानी इंसान हैं।”
मयंक बिस्तर से उठा और दबे पांव बाबूजी के कमरे के बाहर जाकर खड़ा हो गया। कमरे में हल्की सी पीली रोशनी जल रही थी। हरिशंकर जी अपनी पुरानी संदूकची खोलकर बैठे थे। उस संदूकची में उनकी पुरानी डायरी, स्वर्गीय पत्नी की एक तस्वीर, उनकी सेवानिवृत्ति का स्मृति-चिह्न और पासबुक रखी थी। हरिशंकर जी पासबुक के पन्नों को बहुत करीब से देखने की कोशिश कर रहे थे, शायद यह देख रहे थे कि बेटी अंजलि के आने पर और अस्पताल के खर्च के लिए कितने पैसे बचे हैं। उनके चेहरे पर किसी असहायता का भाव नहीं था, बल्कि एक असीम संतोष और गंभीरता थी।
मयंक का कलेजा मुंह को आ गया। जिस पिता ने उसे अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिसने अपनी सारी खुशियां उसके भविष्य की नींव में लगा दीं, आज वही पिता अपने बुढ़ापे में अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए अपने ही आत्मसम्मान की ओट में छुपने को मजबूर था। मयंक को अपनी कमाई, अपने बड़े पैकेज और अपनी तरक्की पर अचानक बहुत शर्मिंदगी महसूस होने लगी। अगर एक बेटा अपने पिता को यह भरोसा भी न दे सके कि ‘बाबूजी, आपका सब कुछ मेरा है और मेरा सब कुछ आपका’, तो उस बेटे की सफलता का क्या मोल?
अगली सुबह जब हरिशंकर जी सोकर उठे और तुलसी के पौधे में जल चढ़ाने आंगन में आए, तो उन्होंने देखा कि मयंक पहले से ही तैयार होकर बरामदे में बैठा था। उसके हाथ में एक फाइल थी और चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी और संकल्प था।
“बाबूजी, प्रणाम,” मयंक ने आगे बढ़कर हरिशंकर जी के पैर छुए। हरिशंकर जी ने चौंकते हुए उसके सिर पर हाथ रखा, “जीते रहो बेटा। आज इतनी सुबह-सुबह कहां की तैयारी है? दफ्तर तो तुम्हारा दस बजे होता है ना?”
मयंक ने नम आंखों से पिता का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उसने देखा कि पिता के हाथों की चमड़ी सिकुड़ चुकी थी और नसें उभर आई थीं। मयंक ने अपनी जेब से वही बारह हजार रुपयों वाला लिफाफा निकाला और हरिशंकर जी की हथेलियों पर वापस रख दिया।
हरिशंकर जी हड़बड़ा गए, “यह क्या है मयंक? क्या पैसे कम हैं? या कोई और बात है बेटा? अगर चीकू की फीस ज्यादा है तो मेरे पास दो-तीन हजार और हैं, मैं दे देता हूं…”
“नहीं बाबूजी!” मयंक की आवाज भर्रा गई और उसकी आंखों से दो बूंद आंसू टपक कर पिता के हाथों पर गिर पड़े। मयंक घुटनों के बल उनके सामने बैठ गया, “बाबूजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं अपनी व्यस्तताओं और अपनी झूठी जिम्मेदारियों के अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि मुझे आपकी धुंधली होती आंखें नजर नहीं आईं। आपकी इस पेंशन ने आपको स्वाभिमान तो दिया, लेकिन मुझे एक लापरवाह और स्वार्थी बेटा बना दिया। मुझे लगा कि आप पैसे दे रहे हैं तो सब ठीक है, पर मैं यह भूल गया था कि पिता कभी बच्चों पर निर्भर होने से डरता नहीं, बल्कि बच्चों की उपेक्षा से डरता है।”
हरिशंकर जी अवाक होकर बेटे को देख रहे थे।
मयंक ने आगे कहा, “बाबूजी, यह घर, यह परिवार और मेरी यह पूरी जिंदगी आपकी ही तो बदौलत है। आज अगर मैं कमाने लायक बना हूं, तो यह आपकी तीस साल की तपस्या का फल है। यह पेंशन आपकी मेहनत का सम्मान है, यह आपका अधिकार है। आप इसे अपनी मर्जी से जहां चाहे खर्च करें, जिसे चाहे दें। घर का खर्च चलाना मेरी जिम्मेदारी है, आपका फर्ज नहीं। और आज… आज आपको कहीं पैदल या किसी के सहारे नहीं जाना है। मैंने शहर के सबसे बड़े आई हॉस्पिटल में आज ग्यारह बजे का अपॉइंटमेंट ले लिया है। आज ही आपके सारे टेस्ट होंगे और परसों आपकी आंखों का ऑपरेशन होगा। और हां, इसका एक-एक पैसा आपका यह बेटा अपनी कमाई से भरेगा, क्योंकि यह मेरा फर्ज भी है और मेरा सौभाग्य भी।”
कमरे की चौखट पर खड़ी बहू श्वेता भी यह सब देख रही थी। उसकी आंखों में भी पश्चाताप के आंसू थे। वह आगे बढ़ी और हरिशंकर जी के हाथ में चाय का कुल्हड़ देते हुए बोली, “बाबूजी, हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। हमने कभी यह समझा ही नहीं कि आप हमारी जरूरतों के लिए अपनी सेहत को नजरअंदाज कर रहे थे। अब से घर का कोई खर्च आपकी पेंशन से नहीं चलेगा। आप बस स्वस्थ रहिए और हम पर अपना आशीर्वाद बनाए रखिए।”
हरिशंकर जी की पथराई और धुंधली आंखों से आंसुओं का एक सैलाब बह निकला। उन्होंने मयंक को उठाकर अपने सीने से लगा लिया। वर्षों से उनके दिल पर जो एक भारी बोझ था, वह एक ही पल में पिघलकर बह गया था। आज उनकी पेंशन की रकम छोटी नहीं हुई थी, बल्कि उनके बेटे का दिल बहुत बड़ा हो गया था। उन्हें लगा कि उनके द्वारा दिए गए संस्कार आज ब्याज सहित उनके पास लौट आए थे।
स्वाभिमान किसी से अलग होकर जीने में नहीं है, बल्कि अपनों के बीच उस सम्मान को पाने में है जहां किसी को मांगने की जरूरत ही न पड़े और हर जरूरत बिना कहे पूरी हो जाए। उस दिन हरिशंकर जी को लगा कि उनकी आंखों का मोतियाबिंद तो डॉक्टर परसों हटाएगा, लेकिन उनके परिवार के दिलों पर जो अनजानेपन का पर्दा पड़ा था, वह आज हमेशा के लिए हट चुका था। घर के आंगन में खिली धूप अब उन्हें चुभ नहीं रही थी, बल्कि अपनों के प्यार की गर्माहट बनकर उनकी आत्मा को तृप्त कर रही थी।
एक विचार आपके लिए: माता-पिता की पेंशन उनके बुढ़ापे का सहारा और उनके आत्मसम्मान की चादर जरूर होती है, लेकिन बच्चों का यह परम कर्तव्य है कि वे उस चादर को कभी छोटा न पड़ने दें। क्या आपको भी लगता है कि बुजुर्गों को अपनी ही जरूरतों के लिए बच्चों के सामने झिझकना नहीं पड़ना चाहिए? आपके घर में बड़े-बुजुर्गों के सम्मान और उनकी आत्मनिर्भरता को लेकर आपकी क्या राय है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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