समझौता नहीं समझदारी – गीता वाधवानी

 “पल्लवी क्या हुआ बड़ी थकी थकी और उदास सी लग रही हो “अपनी टेबल पर काम कर रही पल्लवी से उसकी कलीग तारा ने पूछा। तारा उसकी फ्रेंड भी थी और कलीग भी। 

 पल्लवी-” अरे यार कुछ नहीं, बस वही रोज-रोज का समझौता,एडजेस्ट कितना करूं और कब तक करूं, ऐसे कैसे चलेगा? ” 

 तारा-” चल थोड़ी देर में लंच टाइम हो जाएगा खाना खाते-खाते बात करेंगे। ” 

 थोड़ी देर बाद दोनों कैंटीन चली गई।पल्लवी पनीर की सब्जी लाई थी और तारा लाई थी कटहल की सब्जी। 

 तारा-” चल बता अब क्या हुआ, क्यों मूड ऑफ है मैडम का? ” 

 पल्लवी- बताती हूं,पहले यह बता कि क्या मैं तेरी कटहल की सब्जी खा लूं? ” 

 तारा-” पागल है तू, यह भी कोई पूछने की बात है ” 

 ऐसा कहकर उसने अपना डिब्बा पल्लवी के सामने रख दिया। पल्लवी कटहल की सब्जी खाने लगी और कहने लगी।    गीता वाधवानी 

” मुझे कटहल की सब्जी बहुत पसंद है। आज सुबह जब मैं अजय से कहा कि मैं आज कटहल बना रही हूं तो उसने मुझे साफ मना कर दिया, उसने कहा किसी और दिन बना लेना आज तुम पनीर बना लो मसालेदार चटपटा पनीर। तारा मुझे कटहल की सब्जी खाए हुए पता नहीं कितने महीने हो गए हैं लेकिन फिर भी आज पनीर ही बनाना पड़ा। 

 हर बात में मैं ही समझौता करूं। अपनी पसंद का खा भी नहीं सकती। मैं ही हमेशा झुकती  रहूं। स रहती है पति की पसंद का ध्यान रखो। क्या मेरी कोई इच्छा नहीं, मेरी कोई पसंद नहीं। ” 

 तारा-” हां यह तो गलत है। पता नहीं तुम कैसे सहन कर रही हो। मैंने तो अपनी सास को पहले ही साफ-साफ कह दिया था मैं भी इंसान हूं अपनी पसंद का पहनूंगी और जो अच्छा लगेगा वही खाऊंगी, जहां घूमने का मन होगा वहां घूमूंगी। तब से वह चुप है। ” 

       पल्लवी- पता है तारा एक बार हमें शादी में जाना था। मैं इवनिंग गाउन और उसके साथ मैचिंग ज्वैलरी दोपहर में ही निकाल कर रख दी थी लेकिन अजय ने कहा कि साड़ी पहनो। तब मुझे मन मारकर साड़ी ही पहननी पड़ी। क्या मैं अपनी पसंद के कपड़े भी नहीं पहन सकती उसमें भी समझौता। 

 और पता है एक बार क्या हुआ, मैंने कहा मुझे खन्ना रेस्टोरेंट में एक थाली वाला भोजन खाना है और अजय मुझे किसी दूसरे रेस्टोरेंट में डोसा खिलाने ले गया। और तो और एक बार में टीवी पर मूवी देख रही थी, 15 मिनट की मूवी अभी रहती थी। सुबह जल्दी उठना है ऐसा कहकर अजय टीवी बंद करके चला गया। अरे यार कितना समझौता करूं? ” 

 तारा-” सही कह रही है इससे तो अच्छा है तू डिवोर्स के बारे में सोच, अच्छा कमाती है अपनी मनमर्जी से जीवन जी सकती है। ” 

 पल्लवी-” मुझे लगता है तू सही कह रही है सोचूंगी इस बारे में, चल अब लंच टाइम खत्म हो गया है। ” 

 दोनों अपने काम में जुट गई। एक बार पल्लवी तारा को अपने घर पर भी लेकर गई थी। लेकिन तारा ने कभी भी पल्लवी को अपने घर आने को नहीं कहा था। पल्लवी को यह बात कही अजीब लगती थी लेकिन सोचती थी की कोई बात नहीं, वैसे भी मेरे पास टाइम कहां है।     गीता वाधवानी 

 थोड़े समय बाद ऑफिस में एक नई लड़की जॉब करने आई। उसका नाम था मालती। बहुत ही मिलनसार और समझदार थी मालती। जल्दी ही वह तारा और पल्लवी की सहेली बन गई थी। लेकिन पल्लवी की तो वह बेस्ट फ्रेंड बन गई थी। तारा को मन ही मन जलन होती थी पर वह बाहर से कभी दिखाई नहीं थी। पल्लवी अपनी सारी बातें अब मालती के साथ शेयर करती थी। 

 आज पल्लवी ने मालती को बताया कि मेरे घर में मेरी इच्छा का कोई मान नहीं है। सब बस अपने बारे में सोचते हैं और मैं डिवोर्स के बारे में सोच रही हूं। 

 मालती हैरान रह गई उसने उसे समय कुछ नहीं कहा लेकिन बाद में उसने घर जाकर पल्लवी को मैसेज किया कि क्या तुम संडे को मेरे साथ कॉफी पीने चलोगी। 

 पल्लवी मैसेज देखकर हैरान हो रही थी कि मालती ने ऑफिस में यह बात क्यों नहीं कही। फिर वह मालती  के साथ कॉफी पीने गई। उसने पल्लवी से पूछा कि तुम तलाक क्यों लेना चाहती हो। 

 सारी पहले वाली बातें पल्लवी ने उसे बताई और यह भी बताया कि अभी पिछले हफ्ते की बात है। अजय ने मुझे कहा था कि   बॉस के लिए डिनर बनाना है। लेकिन मैं भूल गई। मैं थकी हुई घर पहुंची और मुझे डिनर बनाना पड़ा। मेरी थकावट से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उनके काम पूरे होने चाहिए और हर बार मुझे ही समझौता करना पड़ता है। 

 मालती -” देखो पल्लवी कुछ मत छुपाना सच-सच बताना, क्या इसमें अजय ने और तुम्हारी सास ने कोई मदद नहीं की? ” 

 पल्लवी-” नहीं, ऐसा नहीं है, मेरी सास ने सब्जियां काट कर रखी थी, और अजय ने बाहर से स्नेक्स ऑर्डर कर लिए थे। ” 

 मालती ने समझाया -” इसका मतलब है तुम उन लोगों को गलत समझ रही हो, उन्हें तुम्हारी परवाह है, तुम तारा की बातों में आकर तलाक के बारे में मत सोचो, इसीलिए मैंने आज तुम्हें यहां अकेले बुलाया है मैं उसके सामने बात नहीं करना चाहती थी। न जाने क्यों वह तुम्हारा घर खराब करना चाहती है जबकि वह खुद एक तलाकशुदा महिला है। ” 

 पल्लवी हैरान रह गई, क्या तारा का तलाक हो चुका है। उसने तो कभी नहीं बताया, वह तो अपनी सास और पति के बारे में बात करती है। 

 मालती -” वह तुम्हारी खुशी बर्दाश्त नहीं कर सकती, अगर मेरी बात पर विश्वास नहीं है तो तुम  उसे आजमा कर देखना। तुमने मुझे बताया कि तुमने नाइट गाउन निकला था और अजय ने तुमसे साड़ी पहनने के लिए कहा और तुमने साड़ी पहनने पर समझौता किया। क्या तुमने कभी सोचा है कि तुम साड़ी में ज्यादा सुंदर लगती हो इसीलिए अजय ने ऐसा कहा होगा। और सुबह ऑफिस जाने के लिए जल्दी उठना होता है शायद इसीलिए अजय ने टीवी बंद कर दिया होगा। 

 और वह तुम्हें एक बार थाली की बजाय डोसा खिलाने ले गया। हो सकता है तब कोई त्यौहार हो और खन्ना रेस्टोरेंट में बहुत भीड़ हो। 

 पल्लवी रिश्ते बैंक की तरह होते हैं, हमें उनमें प्यार और विश्वास, समर्पण डिपाजिट करना पड़ता है। जब हम डिपॉजिट करेंगे तभी तो हमें कुछ वापस मिलेगा। 

 परिवार में यह छोटे-छोटे समर्पण रिश्तो को जिंदगी देते हैं। सिर्फ तुम समझौता कर रही हो, यह सोचना सही नहीं है। यह समझौते नहीं है यह रिश्ते की उम्र लंबी करने के लिए समझदारी है। घर जाकर मेरी बातों को सोचना और समझने की कोशिश करना। रिश्ते तोड़ना बहुत आसान होता है लेकिन उन्हें बनाए रखना बहुत मुश्किल। ” 

 पल्लवी को सारी बातें समझ में आ रही थी। उसने सोच लिया था कि मैं कभी अपने रिश्ते को टूटने नहीं दूंगी। 

 अगले दिन उसने मालती को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया और उनकी दोस्ती पहले से भी ज्यादा पक्की हो गई। 

 स्वरचित अ प्रकाशित गीता वाधवानी दिल्ली

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