रिश्तों में कड़वाहट

माधवी बुआ की बात खत्म होते ही पूरा कमरा जैसे एक गहरे चिंतन में डूब गया। जिन औरतों ने जिंदगी भर खुद को एक संदूक बनाए रखा था और अपने अंदर अनगिनत दर्द और ताने छुपाए रखे थे, आज उन्हें अहसास हो रहा था कि माधवी बुआ कितने बड़े जीवन सत्य को कितनी आसानी से समझा गई थीं। ताई जी की आंखें भी नम हो गई थीं, शायद उन्हें भी अपने वो साल याद आ गए थे जब उन्होंने चुप रहकर बहुत कुछ सहा था और अंदर ही अंदर घुटती रही थीं।

आंगन में गेंदे के पीले और नारंगी फूलों की लड़ियां झूल रही थीं और घर के हर कोने से ढोलक की थाप के साथ औरतों के लोकगीत गूंज रहे थे। काव्या के हाथों में रची गहरी हरी मेहंदी से उठने वाली नीलगिरी के तेल की खुशबू ने पूरे माहौल को और भी खुशनुमा बना दिया था। काव्या की शादी में अब बस दो दिन ही बचे थे। आज मेहंदी की रस्म थी और घर में रिश्तेदारों का जमावड़ा लगा हुआ था। उसी भीड़ में एक चेहरा ऐसा भी था जो बरसों बाद इस घर में दिखाई दिया था—माधवी बुआ। माधवी बुआ काव्या के पिता की दूर की चचेरी बहन थीं, जो एक दूसरे शहर में किसी बड़े स्कूल की प्रिंसिपल पद से रिटायर हुई थीं। उनका सौम्य चेहरा, चेहरे पर एक शांत मुस्कान और आंखों में जीवन का गहरा अनुभव झलकता था।

गीत-संगीत के बीच जब ढोलक कुछ देर के लिए शांत हुई, तो बातों का सिलसिला शुरू हो गया। काव्या की माँ, रेणु, जो पिछले कई दिनों से शादी की तैयारियों में व्यस्त और थोड़ी भावुक थीं, उन्होंने सभी महिलाओं की तरफ देखते हुए कहा, “कल मेरी बच्ची पराये घर चली जाएगी। आप सब अपने-अपने जीवन के अनुभव से इसे कुछ ऐसी सीख दें, जो इसके नए सफर में, इसके वैवाहिक जीवन में एक मजबूत नींव का काम करे।”

यह सुनते ही सबसे पहले काव्या की दादी ने अपना चश्मा ठीक करते हुए कहा, “बेटा, औरत का असली जेवर उसका धैर्य होता है। ससुराल में कभी किसी बात पर पलट कर जवाब मत देना। मौन रहकर बड़े-बड़े तूफान टाले जा सकते हैं।”

तभी पास ही बैठी काव्या की ताई जी, जो हमेशा से अपने कड़क मिजाज और पारंपरिक विचारों के लिए जानी जाती थीं, उन्होंने दादी की बात में हामी भरते हुए एक लंबी सांस ली और कहा, “बिल्कुल सही कहा मां जी आपने। काव्या बेटा, मेरी एक बात हमेशा गांठ बांध लेना। ससुराल में एक लड़की को लकड़ी के एक ‘बड़े और भारी संदूक’ की तरह होना चाहिए। और साथ ही एक गहरे कुएं की तरह।”

काव्या ने सवालिया नजरों से ताई जी की तरफ देखा, मानो वह इस अजीबोगरीब तुलना का मतलब समझना चाह रही हो। ताई जी ने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा, “हां, एक बड़ा संदूक। जिस तरह एक संदूक में हम घर का सारा सामान, चाहे वह कीमती हो या बेकार, सब ठूंस कर बंद कर देते हैं और उस पर एक मजबूत ताला लगा देते हैं, उसी तरह एक बहू को भी होना चाहिए। ससुराल में तुम्हें बहुत कुछ देखने और सुनने को मिलेगा। कभी प्यार मिलेगा, तो कभी बिना बात के ताने भी सुनने पड़ेंगे। कभी तुम्हारी कोई गलती नहीं होगी, फिर भी तुम्हें गलत ठहराया जाएगा। ऐसे में तुम्हें उस गहरे कुएं और संदूक की तरह बनना है। जो भी अच्छी या बुरी बात हो, जो भी ताने या कड़वाहट हो, उसे चुपचाप अपने अंदर समा लेना और ढक्कन बंद कर लेना। कभी किसी के सामने उफ मत करना। जो औरत अपने अंदर बातों को दफनाना सीख जाती है, वही अपने घर को टूटने से बचा पाती है।”

कमरे में बैठी कई औरतों ने ताई जी की इस गूढ़ और पारंपरिक सीख पर तालियां बजाईं और सहमति में सिर हिलाया। लेकिन काव्या के चेहरे पर एक अजीब सी उलझन और घुटन के भाव तैरने लगे। काव्या बचपन से ही एक निडर, स्पष्टवादी और समझदार लड़की थी। वह गलत बात पर चुप रहना नहीं जानती थी। अभी कल ही तो हलवाई के खराब काम करने पर उसने उसे फटकार लगाई थी, जिस पर ताई जी ने उसे टोका था कि लड़कियों को इतना तेज-तर्रार नहीं होना चाहिए। ताई जी की यह ‘बंद संदूक’ वाली बात काव्या को अंदर तक चुभ गई। उसे लगा जैसे उसे अपने अस्तित्व को मिटाकर, अपनी आवाज़ को दबाकर एक बेजान डिब्बा बनने को कहा जा रहा है, जिसमें केवल दूसरों की फेंकी हुई कड़वाहट भरी जानी है।

माधवी बुआ, जो अब तक चुपचाप एक कोने में बैठी सब कुछ सुन और देख रही थीं, उन्होंने काव्या के चेहरे पर आई उस उदासी और घुटन को पढ़ लिया। उन्होंने अपना शॉल कंधे पर ठीक किया और बहुत ही शांत लेकिन गंभीर स्वर में बोलीं—

“मुझे माफ करना कमला भाभी, लेकिन मैं आपकी इस संदूक वाली बात से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखती।”

अचानक कमरे में सन्नाटा छा गया। सभी की निगाहें माधवी बुआ पर टिक गईं। ताई जी को भी अपनी बात का इस तरह काटा जाना कुछ अजीब लगा। उन्होंने पूछा, “क्यों माधवी? क्या मैंने कुछ गलत कहा? घर की शांति के लिए औरतों को बातें छुपानी और दबानी ही तो पड़ती हैं।”

माधवी बुआ हल्की सी मुस्कान के साथ काव्या के पास आकर बैठ गईं। उन्होंने काव्या के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और कमरे में बैठी सभी महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा, “भाभी, अगर हम एक संदूक में बिना सोचे-समझे, बिना छांटे हर चीज भरते चले जाएं—चाहे वह काम के कपड़े हों, या गीला कचरा, धूल हो या पत्थर—तो क्या होगा? कुछ ही दिनों में उस संदूक के अंदर दीमक लग जाएगी, बदबू आने लगेगी और जो कीमती और अच्छे कपड़े हमने उसमें रखे थे, वे भी उस कचरे की वजह से सड़ जाएंगे। और जहां तक गहरे कुएं की बात है, जिस कुएं के पानी में बहाव नहीं होता, जिसमें सब कुछ बस गिरता और सड़ता रहता है, वह कुआं एक दिन जहरीला और दलदल बन जाता है।”

औरतों के चेहरों पर अब आश्चर्य के साथ-साथ एक नई समझ के भाव उभरने लगे थे। काव्या की आंखों में भी एक चमक आ गई। माधवी बुआ ने काव्या की आंखों में देखते हुए अपनी बात आगे बढ़ाई—

“काव्या बेटा, तुम्हें ससुराल में संदूक या कुआं बनने की कोई जरूरत नहीं है। अगर तुम्हें कुछ बनना ही है, तो एक ‘सूप’ (छलनी/Winnowing Basket) बनो। संत कबीर दास जी ने कहा था न— ‘साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै, थोथा देय उड़ाय।’ तुम्हें बस अपने नए रिश्तों में इसी सूप के स्वभाव को अपनाना है।”

ताई जी ने फिर से सवाल किया, “सूप? यह सूप भला रिश्तों को कैसे जोड़ेगा?”

माधवी बुआ ने बड़ी सहजता से समझाया, “सूप का काम क्या होता है? जब उसमें अनाज डाला जाता है, तो वह उसे हवा में उछालता है। जो असली अनाज होता है, जो दाना होता है, उसे वह अपने अंदर सहेज कर रख लेता है। लेकिन जो धूल, मिट्टी, कंकड़ और भूसा (थोथा) होता है, उसे वह हवा में उड़ा कर बाहर कर देता है। ससुराल भी एक सूप की तरह होता है। वहां तुम्हें बहुत सारा प्यार, सम्मान, नए रिश्ते, अनुभव और खुशियां मिलेंगी—यह सब वह असली ‘अनाज’ है, जिसे तुम्हें अपने दिल में सहेज कर रखना है।”

माधवी बुआ ने एक पल का ठहराव लिया और फिर कहा, “लेकिन जहां लोग होते हैं, वहां कभी-कभी गुस्सा, गलतफहमियां, बिना बात के ताने या पुरानी रूढ़िवादी सोच भी हावी हो जाती है। यह सब वह ‘भूसा और कंकड़’ है। अगर तुम संदूक बनकर इन तानों, इस कड़वाहट और अन्याय को भी चुपचाप अपने अंदर भरती रहोगी, तो एक दिन तुम अंदर से टूट जाओगी, अवसाद से भर जाओगी और तब तुम्हारे अंदर पलने वाली कड़वाहट रिश्तों को ही खत्म कर देगी। इसलिए, एक सूप की तरह बनो। जब कोई गुस्से में कुछ गलत कह दे, या कोई अन्यायपूर्ण बात हो, तो उसे अपने दिल के अंदर मत उतारो। उसे अपनी समझदारी, धैर्य और स्पष्ट संवाद की हवा से उड़ा दो। जो गलत है, उसका विरोध करो, लेकिन शांति और सम्मान के साथ। अपनी बात रखना, गलत को गलत कहना कोई बुराई नहीं है। बस यह ध्यान रहे कि तुम्हारी भाषा में शालीनता हो और उद्देश्य सुधारने का हो, बिगाड़ने का नहीं।”

माधवी बुआ की बात खत्म होते ही पूरा कमरा जैसे एक गहरे चिंतन में डूब गया। जिन औरतों ने जिंदगी भर खुद को एक संदूक बनाए रखा था और अपने अंदर अनगिनत दर्द और ताने छुपाए रखे थे, आज उन्हें अहसास हो रहा था कि माधवी बुआ कितने बड़े जीवन सत्य को कितनी आसानी से समझा गई थीं। ताई जी की आंखें भी नम हो गई थीं, शायद उन्हें भी अपने वो साल याद आ गए थे जब उन्होंने चुप रहकर बहुत कुछ सहा था और अंदर ही अंदर घुटती रही थीं।

काव्या ने गहरी सांस ली। उसके चेहरे से सारी उलझन और डर के बादल छंट चुके थे। उसने माधवी बुआ के हाथ को चूम लिया। उसे समझ आ गया था कि रिश्ते निभाने का मतलब खुद को खोना या हर अन्याय को सहना नहीं है, बल्कि समझदारी से अच्छाई को चुनना और बुराई को रिश्ते से बाहर करना है। उस दिन मेहंदी की खुशबू के साथ-साथ एक नई, सशक्त और सुलझी हुई सोच की महक भी उस घर के आंगन में हमेशा के लिए बस गई।

आपको क्या लगता है, काव्या को मिली यह सीख कितनी सही है? क्या आज के दौर में लड़कियों को सच में एक संदूक बनना चाहिए या एक सूप? अपने विचार और अपने अनुभव हमें कमेंट्स में ज़रूर बताएं!

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धन्यवाद।

लेखिका : आर्या विनोद

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