बरसात की एक ठंडी रात थी। दस वर्षीय अमन अपनी बीमार माँ के सिरहाने बैठा था। घर में खाने का एक दाना भी नहीं था। माँ कई दिनों से बीमार थी और दवा के बिना उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी।
अमन हिम्मत करके गाँव की किराने की दुकान पर पहुँचा। उसने दुकानदार से कहा, “चाचा, माँ के लिए थोड़ा आटा और दवा उधार दे दीजिए। मैं बड़ा होकर एक-एक पैसा लौटा दूँगा।”
दुकानदार ने उसकी आँखों में सच्चाई देखी। उसने बिना कुछ पूछे राशन और दवा दे दी और मुस्कुराकर कहा, “बेटा, इसे उधार मत समझना, इसे भरोसा समझना।”
समय बीतता गया। अमन ने दिन-रात मेहनत की, पढ़ाई की और एक सफल डॉक्टर बन गया।
एक दिन उसी गाँव से एक बूढ़े व्यक्ति को गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया। अमन ने देखा—वह वही दुकानदार था जिसने वर्षों पहले उसकी मदद की थी। बूढ़े की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। इलाज का खर्च सुनकर उसका परिवार रोने लगा।
अमन ने चुपचाप पूरा इलाज कराया। जब छुट्टी का समय आया, तो बूढ़े ने काँपते हाथों से पूछा, “बेटा, मेरा कितना बिल हुआ?”
अमन मुस्कुराया और एक कागज़ उसके हाथ में रख दिया। उस पर लिखा था—
“आपका सारा बिल उस दिन चुक गया था, जब आपने एक भूखे बच्चे और उसकी बीमार माँ पर भरोसा करके उन्हें उधार दिया था।”
बूढ़े दुकानदार की आँखों से आँसू बह निकले। उसने अमन को गले लगा लिया। अस्पताल में मौजूद हर व्यक्ति की आँखें नम थीं।
उस दिन अमन ने महसूस किया कि पैसों का उधार एक दिन लौटाया जा सकता है, लेकिन विश्वास और दया का ऋण जीवन भर भी पूरी तरह नहीं चुकाया जा सकता। वही सच्चा नसीब है।
शिक्षा:
भलाई कभी व्यर्थ नहीं जाती। विश्वास, करुणा और समय पर की गई सहायता ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी और उसका सच्चा नसीब होती है।
विकास श्रीवास्तव