गुस्सा सबकुछ बर्बाद कर देता है – मंजू ओमर

हेलो मम्मी मैने तुम्हारा टिकट करा दिया है तुम आ रही हो ना श्रेयश बोला मम्मी से, बेटा तुमने सिर्फ हमारा टिकट करवाया है पापा का नहीं । हम उनको अकेला छोड़कर कैसे आ सकते हैं परेशानी होती है उनको समझा करो बेटा। लेकिन मम्मी आप जानती तो हो पापा को संग मेरी पटरी नहीं बैठती  है।

हर बात पर तू तू मै मैं हो जाया करती है। मैं नहीं कर पाता मैनेज।इसलिए उनको उनका टिकट नहीं करवाया । आप घर में जो काम वाली है उसको खाना वगैरा बनाने को बोल देना वह बना दिया करेगी। और फिर एक हफ्ते की ही तो बात है कर लेंगे पापा मैनेज।

बच्चों का जन्मदिन है तो आप दादी होकर नहीं आओगी तो कैसा लगेगा। वह तो ठीक है बेटा लेकिन मैं दादी हूं तो पापा भी तो दादा है । मैं अकेली  चली आऊँ पापा को छोड़कर तो बताओ उन्हें कैसा लगेगा । बेटा अब हम लोगों की उम्र हो रही है इस उम्र में बहस की नहीं समझदारी की जरूरत होती है ।।

जैसे छोटे बच्चे बचपन में जिद करते हैं वैसे बुढ़ापे में बड़े बुजुर्ग भी करने लगते हैं इसीलिए कहते हैं बच्चे बूढ़े एक समान । बेटा उन्होंने तुम्हारे लिए और बहन दिव्या के लिए बहुत कुछ किया है। इतने बड़े होकर पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी करते हो। हां मैं जानता हूं कि तुम्हारे पापा थोड़ा गुस्से के तेज हैं

और हर बात मुंह पर साफ-साफ कह देते हैं लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं है कि तुम अपनी जिंदगी से उनको बाहर कर दो। बेटा थोड़ा उनको समझा करो उनके हां मे हां मिला दिया करो। फिर चाहे अपनी मरजी की कर लिया करो । अच्छा ठीक है मम्मी करा  देता हूं उनका टिकट लेकिन आप उनको समझ लेना। 

               श्रेयश  और दिव्या दो बच्चे थे सुभाष और मीना जी के। दिव्या बड़ी थी तो उसकी शादी पहले हो चुकी थी और श्रेयश की बाद में।श्रेयश ने इंजिनियरिंग की पढ़ाई की थी और अब मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी कर रहा था । ढाई साल पहले उसकी शादी मीनल से हुई थी।

मीनल भी नौकरी करती थी । लेकिन एक साल पहले उसकी डिलीवरी हुई और मीनल ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। श्रेयश नौकरी के चक्कर में दिल्ली में रहता है और बहन हैदराबाद में सुभाष जी और मीना अपने गृहनगर में अपने घर मे रहते है। 

             सुभाष जी बड़े गुस्से वाले थे और थोड़े मुंह फट भी थे हर बात में सामने ही बोल देते थे चाहे किसी को अच्छा लगे या बुरा। लाग लपेट की आदत नहीं थी  उनकी। इस बात से पत्नी मीना भी परेशान रहती थी अक्सर पति-पत्नी में भी कहा सुनी हो जाती थी ।

बच्चे जब छोटे थे तब तो ठीक-ठाक था लेकिन श्रेयश जब बड़ा होने लगा  उसको पापा की बातें बहुत खराब लगने लगी। मम्मी  श्रेयश को समझाती थी कि कोई बात नहीं बेटा पापा है, नजर अंदाज किया करो उनकी बातों को। लेकिन श्रेयश कह  देता मम्मी आप भी तो परेशान रहती हो ,

आपकी भी तो पापा से लड़ाई हो जाती है। हां मैं जानती हूं मेरी भी लड़ाई हो जाती है लेकिन मेरी लड़ाई में और तुम्हारी लड़ाई मे फर्क है बेटा। पापा तो कह देंगे मुझे की यही संस्कार दिए हैं तुमने बेटे को,  पापा से बहस करता है बेटा। 

             श्रेयस इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए कंपटीशन की तैयारी कर रहा था।सुभाष जी पूरी नजर रखते थे  श्रेयश पर । कहाँ जा रहा है क्या कर रहा है किन लड़कों के साथ घूम रहा है । यह तो अच्छी बात थी । लेकिन एक बार श्रेयश अपने दो दोस्तों के साथ बाहर खड़ा था सुभाष जी ने उसके सामने ही कह दिया कि ज्यादा इन लड़कों के साथ मत घूमा करो

खुद तो पढ़ते नहीं तुम्हें भी पढ़ने नहीं देते। यह बात श्रेयश बहुत खराब लगी तो आकर घर पापा से भिड गया। आपने मेरे दोस्तों के सामने ही मेरी इंसल्ट कर दी, पापा आप देखो मैं बड़ा हो गया हूं अब मुझे कब पढ़ना है कब नहीं पढ़ना है आप हर समय मुझे टोक ना करें ।

इस बात पर श्रेयश कई दिनों तक पापा से गुस्सा आ रहा और बात नहीं करी । तुमने यह काम ऐसे क्यों किया वैसे क्यों किया चलता रहता था बाप बेटे का। मीना भी बहुत परेशान रहती थी । अब सुभाष जी गुस्से वाले थे श्रेयश भी उन्हीं का बेटा तो था असर तो पापा का उसमें भी आएगा ही ना। 

             अब श्रेयस इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके नौकरी कर रहा था। उसने एक लड़की पसंद कर रखी थी ।उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि घर में बताएं । फिर जब घर मे श्रेयश की  शादी बात चलने लगी  तो श्रेयश ने मम्मी को बताया कि मम्मी मैंने एक लड़की पसंद की है उसी से शादी करूंगा ।

अब आप पापा से बात कर लो। अब मीना बड़ी असमंजस थी,क्योंकि उन्होंने जहां सुभाष जी से बात की 10 बात सुना देंगे। लेकिन अब बेटी की खातिर बात तो करनी थी।

             सुभाष जी आज बेटे की शादी का इश्तिहार पेपर में देने जा रहे थे। तो मीना ने रोका, कहा सुनिए पेपर मे इश्तिहार मत दीजिए, क्यों ओ क्या है कि श्रेयश ने एक लड़की पसंद की है वही बात करने को कह रहा है  आपसे।तो अच्छा अब बरखुरदार  अब लडकी भी खुदी पसंद कर लेगें।

शादी भी खुद कर लेंगे जो लड़की पसंद कर ली है। तो आजकल के लड़कों को क्या कहें कुछ समझ नहीं आता। खुद ही बाप बन जाते हैं बाप की तो जरूरत ही नहीं है। इस बात को लेकर कई दिन घर में चुप्पी छाई रही।फिर एक दिन मीना ने कहा सुनिए वह लड़की वाले आपसे मिलना चाहते हैं, मुझसे मिलकर क्या करेंगे सुभाष जी बोले ।

अपने बेटे से कह दो खुद ही बात कर ले शादी भी कर ले। मीना ने समझाया देखो बेटे अब बड़े हो गए हैं और जमाना बदल गया है। अब अपनी मर्जी हम पर हम उन पर नहीं थोप सकते। रहना उन दोनों को ही है।संग संग।अगर एक दूसरे को पसंद करते हो तो बात करने में क्या हर्ज है। बहुत समझाने पर सुभाष जी तैयार हुए लड़की वालों से मिलने को। 

             फिलहाल लड़की वालों से मिलने पर सब कुछ ठीक था तोश्रेयश और मीनल की शादी हो गई । और अच्छे से घर की गृहस्थी चल रही है । अब उनकी जुड़वा बच्चे भी हैं। लेकिन सुभाष जी की नाराजगी किसी ने किसी बात पर बेटे से बनी रहती है वह मीना से शिकायत करते रहते हैं अब मीना जी भी उनकी बात एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देती है। 

            अब बर्थडे में जाना था बच्चों के तो मीना जी ने सुभाष जी से कहा श्रेयश ने टिकट करा दिया है चलना है ,मैं क्या करूंगा जाकर । अब मेरी बात सुनता नहीं हैअपनी  मरजी करता है।

अरे क्या सुनता नहीं है मीना जी बोली । अब बच्चे बड़े हो गए हैं और अलग भी रहते हैं हम लोगों से। उनका परिवार है तो कुछ फैसला लेने का  हक तो उनको भी है ना । छोड़ दीजिए बच्चों के जीवन में ज्यादा दखलअंदाजी करना ।  अब मीना जी के बार बार कहने पर चले तो गए सुभाष जी, क्योंकि पता है उनको की अकेले रह नहीं पाएंगे बहुत सी दिक्कतें होतीहै। 

          दूसरे दिन बच्चों का बर्थडे था सब तैयारी करने में व्यस्त थे।श्रेयश  से सुभाष जी ने कहा अरे  श्रेयश बैठकर कुछ प्लानिंग तो करो कैसे करना है क्या खिलाना है कितने लोग आएंगे। प्लानिंग क्या करना है पापा बस थोड़ी देर में सब हो जाएगा ,हो जाएगा ।

यह नहीं है कि बैठकर कुछ बात करें अरे आप क्यों परेशान हो रहे हैं करने दीजिए बच्चों को जैसा करना है  करने दिजिए मीना जी बोली। शांति से बैठे जो हो रहा है। बस चुपचाप देखिए।पता नहीं कब यह आदत आपकी जाएगी मैं तो परेशान हो गई हूँ। 

          थोड़ी देर में सब ऑनलाइन ऑर्डर बुक हो गया और सामान आ गया। करीब 20 लोग थे 2 घंटे में सारी तैयारी हो गई ।और अच्छे से जन्म दिन निपट गया। और कुछ परेशानी भी नहीं हुई । और ना ज्यादा किसी को इंतजाम करना पड़ा। रात में जब मीना और सुभाष जी अपने कमरे में लेटने गए तो मीना ने कहा देखा ना श्रेयस ने सब  कर लिया।

आजकल जमाना हमारे समय का नहीं रह गया कि कुछ घर में काम हो तो चार दिन पहले से तैयारी शुरू हो जाती थी । अब बस कुछ घंटे की जरूरत होती है सब हो जाता है । हां तुम ठीक कह रही हो मीना। अब ज्यादा गुस्सा करने की बात बाद में  जरूरत नहीं है ,छोटे-छोटे नाती पोते हैं उनके साथ खेलकर समय व्यतीत करिये  बस मीना जी ने कहा

      दोस्तों कुछ घरों में होता है कि पिता बेटों को जिम्मेदार बनेने ही नहीं देते । काम में टांग  अडाते रहते हैं। पर बात पर गुस्सा दिखाते हैं। यही सुभाष जी की आदत थी।

फिर पिता यह क्यों भूल जाते हैं कि यदि हमें गुस्सा आता है तो बेटे को भी तो गुस्सा आएगा । क्योंकि है तो वह मेरी ही औलाद मेरा असर तो आएगा ही न इसलिए ज्यादा गुस्सा ना दिखा कर समझदारी से काम ले नहीं गुस्से की वजह से कभी-कभी खूबसूरत रिश्ते बिखर जाते हैं

मंजू ओमर 

झांसी उत्तर प्रदेश

27 जुलाई

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