शहर की एक जानी-मानी एडवरटाइजिंग और डिजाइन एजेंसी की कांच वाली केबिन में आज सुबह से ही गहमागहमी का माहौल था। पच्चीस साल की नंदिनी अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर एक डिजिटल इलस्ट्रेशन और हिंदी सुविचार वाले पोस्टर को अंतिम रूप देने में पूरी तरह से मग्न थी। उसने हल्के पीले रंग का एक सादा सा सलवार सूट पहना हुआ था और उसके चेहरे पर काम की थकान के साथ-साथ एक अजीब सी शांति भी छाई हुई थी। उसके डेस्क के ठीक नीचे, एक छोटी सी चटाई पर चार साल की एक प्यारी सी बच्ची, सिया, अपने रंग-बिरंगे क्रेयॉन्स के साथ एक ड्राइंग बुक पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींच रही थी। वह कभी अपनी उँगलियों में रंग लगा लेती तो कभी मासूमियत से नंदिनी की तरफ देखकर मुस्कुरा देती।
तभी स्टूडियो की नई ब्रांच मैनेजर, सुजाता मैडम, तेज कदमों के साथ केबिन में दाखिल हुईं। वे अपनी सख्त अनुशासन नीति और उसूलों के लिए पूरे ऑफिस में जानी जाती थीं। उनकी नजर जैसे ही नीचे बैठी सिया पर पड़ी, उनके माथे पर गहरी लकीरें खिंच गईं। पिछले एक महीने से वे लगातार इस बच्ची को ऑफिस में देख रही थीं, लेकिन आज उनके सब्र का पैमाना छलक गया था।
“नंदिनी,” सुजाता मैडम की आवाज में एक स्पष्ट रुखापन और चेतावनी थी, “मुझे तुम्हारे काम से कभी कोई शिकायत नहीं रही है। तुम हमारे ऑफिस की सबसे होनहार आर्टिस्ट हो, तुम्हारे बनाए हुए पोस्टर्स और डिज़ाइन्स हमारे क्लाइंट्स को बहुत पसंद आते हैं। लेकिन तुम्हें यह समझना होगा कि यह एक प्रोफेशनल वर्कस्पेस है, कोई डे-केयर सेंटर या प्ले स्कूल नहीं। तुम लगभग हर रोज़ इस बच्ची को यहाँ अपने साथ लेकर आ जाती हो। क्या घर पर इसे संभालने वाला कोई नहीं है? या तुम इतने पैसे नहीं कमाती कि इसके लिए एक नैनी का इंतज़ाम कर सको? इस तरह से ऑफिस का डेकोरम खराब होता है।”
केबिन में अचानक गहरा सन्नाटा छा गया। आस-पास काम कर रहे बाकी कर्मचारियों की उँगलियाँ कीबोर्ड पर रुक गईं और सबकी नजरें नंदिनी पर टिक गईं। सुजाता मैडम की तेज आवाज सुनकर सिया, जो अभी तक अपनी ड्राइंग में मग्न थी, किसी अनजान डर से सहम गई। वह तुरंत उठी और अपनी छोटी-छोटी टांगों से भागकर नंदिनी की कुर्सी के पीछे छिप गई। उसने डरते हुए नंदिनी की कुर्ती का कोना अपनी छोटी सी मुट्ठी में कसकर पकड़ लिया।
नंदिनी ने कोई तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दी। उसने एक लंबी और गहरी सांस ली, अपनी कंप्यूटर स्क्रीन को सेव करके लॉक किया और फिर झुककर सिया को अपनी गोद में उठा लिया। उसने सिया के माथे को चूमा और उसे शांत करने की कोशिश की। जब नंदिनी ने अपनी आँखें उठाईं, तो उनमें कोई डर या शर्मिंदगी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी नमी थी जिसमें समंदर सा गहरा दर्द और हिमालय जैसी दृढ़ता दोनों का संगम था।
“मैम,” नंदिनी की आवाज धीमी लेकिन कमरे के सन्नाटे में बेहद स्पष्ट गूंज रही थी, “यह मेरी बड़ी बहन की इकलौती अमानत है… मेरी सिया। आज से सिर्फ आठ महीने पहले, एक भयानक सड़क हादसे में मेरी दीदी और जीजाजी दोनों एक साथ इस दुनिया को छोड़कर चले गए। उस एक मनहूस रात ने इस छोटी सी जान से उसका पूरा सुरक्षित संसार, उसका आसमान सब कुछ छीन लिया।”
नंदिनी बोलते-बोलते थोड़ा रुकी, उसका गला भर आया था। उसने सिया के उलझे हुए बालों पर प्यार से हाथ फेरा और खुद को संभालते हुए आगे कहा, “मेरे माता-पिता तो बचपन में ही गुजर गए थे, दीदी ने ही एक माँ की तरह मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया था। उन्होंने मेरे हर सपने को पूरा करने के लिए अपनी खुशियाँ कुर्बान कर दीं। और अब… अब मेरा भी आगे-पीछे इस बच्ची के सिवा इस दुनिया में कोई नहीं है। मेरी तो अभी शादी भी नहीं हुई है मैम, मैं खुद अभी जिंदगी को समझ ही रही हूँ, लेकिन जिस दिन मेरी दीदी की चिता जली थी, उसी राख के सामने मैंने यह कसम खाई थी कि सिया को जिंदगी में कभी अनाथ होने का एहसास नहीं होने दूंगी। इसके लिए चाहे मुझे कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।”
सुजाता मैडम, जो कुछ सेकंड पहले तक बेहद सख्त और गुस्से में दिख रही थीं, अब पूरी तरह से अवाक रह गई थीं। उनके चेहरे के भाव तेजी से बदल रहे थे और उनके सख्त होंठ हल्के से कांपने लगे थे।
“मैम, मैं इसे किसी अजनबी नैनी के भरोसे घर पर अकेला नहीं छोड़ सकती,” नंदिनी ने अपनी बात जारी रखी। “यह आज भी रात में कई बार डर कर चीखते हुए उठ जाती है और अपनी माँ को खोजती है। जब तक मैं इसके सामने रहती हूँ, इसे लगता है कि इसकी दुनिया सुरक्षित है। मुझे अच्छे से पता है कि ऑफिस में बच्चों को लाना कंपनी के नियमों के खिलाफ है, लेकिन यह मेरी सबसे बड़ी मजबूरी है। मैं इसका काम, इसका खाना-पीना सब कुछ खुद मैनेज करती हूँ और पूरी कोशिश करती हूँ कि मेरे काम पर या किसी और कलीग को इससे कोई परेशानी न हो। फिर भी… अगर आपको लगता है कि मेरे ऐसा करने से ऑफिस का अनुशासन टूट रहा है या कंपनी का नुकसान हो रहा है, तो मैं अभी इसी वक्त अपना इस्तीफा देने को तैयार हूँ। क्योंकि नौकरी तो मुझे कहीं और भी मिल जाएगी, लेकिन इस बच्ची को दूसरी माँ नहीं मिलेगी।”
नंदिनी की बात पूरी होने के बाद उस विशाल केबिन में सिर्फ सिया की धीमी सी सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। सुजाता मैडम की आँखें भी डबडबा गई थीं। वे एक कड़क मैनेजर होने से पहले खुद भी दो बच्चों की माँ थीं। उन्हें अपनी उस असंवेदनशीलता और कठोरता पर गहरी चोट लगी, जिसके चलते उन्होंने बिना किसी की सच्चाई और संघर्ष को जाने इतने कठोर शब्द कह दिए थे।
वे धीरे से आगे बढ़ीं और उन्होंने अपने कांपते हाथों से सिया के गालों को प्यार से छुआ। फिर उन्होंने नंदिनी के कंधे पर बहुत अपनत्व से हाथ रखते हुए कहा, “मुझे माफ कर दो नंदिनी। मैंने बिना कुछ जाने-समझे तुम पर इतने तीखे सवाल खड़े कर दिए। तुम ऑफिस का कोई नियम नहीं तोड़ रही हो, बल्कि तुम तो वो कर रही हो जो इंसानियत और प्रेम का सबसे बड़ा और पवित्र नियम है।”
सुजाता मैडम ने अपने आँसू पोंछे और एक बेहद खूबसूरत मुस्कान के साथ बोलीं, “कल से सिया के लिए इस केबिन के एक कोने में हम एक छोटा सा प्ले-एरिया अलग से बनवा देंगे। ताकि इसे खेलने में आसानी हो और तुम्हें भी काम करने में सुविधा रहे। और रही बात तुम्हारे इस्तीफे की, तो उसकी बात तो तुम सोचना भी मत। इस कंपनी को तुम्हारे जैसे बेहतरीन और रचनात्मक आर्टिस्ट की जितनी जरुरत है, उससे कहीं ज्यादा इस समाज को तुम्हारे जैसी एक मजबूत और निस्वार्थ माँ की जरुरत है।”
नंदिनी की आँखों से रुके हुए आँसू छलक पड़े। सिया ने अपने छोटे-छोटे हाथों से नंदिनी के आँसू पोंछे और अपनी तोतली आवाज में बोली, “लो मत मासी, मैं गुड गर्ल हूँ ना।”
नंदिनी ने उसे कसकर अपने सीने से लगा लिया। उस दिन ऑफिस में मौजूद हर शख्स का दिल भर आया था। एक पच्चीस साल की अविवाहित लड़की ने अपने निस्वार्थ प्रेम से न केवल एक बच्ची को नया जीवन दिया था, बल्कि समाज के सामने यह साबित कर दिया था कि मातृत्व किसी रिश्ते, शादी या उम्र का मोहताज नहीं होता। यह तो बस एक गहरा अहसास है, जो किसी भी सच्चे दिल में पनप सकता है।
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क्या आपने भी कभी अपने आस-पास किसी ऐसे रिश्ते को देखा है जो खून का न होते हुए भी दुनिया के हर रिश्ते से बढ़कर हो? एक अविवाहित लड़की का यह संघर्ष और उसका यह निस्वार्थ प्रेम आपको कैसा लगा? अपने विचार और भावनाएं हमारे साथ कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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