शशांक ने आगे बढ़कर अपने पिता के घुटनों को छुआ और धीरे से पूछा, “बाबूजी, अब जब शादी निपट गई है और रोहिणी भी हमारे साथ नीचे ही रहेगी, तो क्या ऊपर वाले उस नए फ्लोर को किसी अच्छे परिवार को किराए पर दे दिया जाए?”
ओंकारनाथ जी ने अपनी सफेद मूँछों पर हाथ फेरते हुए एक आत्मीय ठहाका लगाया। “हाँ शशांक बेटा! मेरे हिसाब से तो यही सबसे उत्तम रहेगा। कम से कम खाली पड़े रहने से तो बेहतर है कि किसी को आसरा मिले। और हाँ, एक बात हमेशा याद रखना—जब बच्चे बड़े हो जाएँ, तो उन पर अपने विचार थोपने के बजाय उनके साथ दोस्तों जैसा व्यवहार करना ही पीढ़ियों की दूरी को पाटने का सबसे सुंदर तरीका है।”
नीलिमा रसोई में खड़े होकर तवे पर फूली हुई रोटियाँ उतार रही थी। तवे की छन-छन और रसोई में महकती ताज़ा घी की खुशबू के बीच बाहर बैठक से उसके पति शशांक की आवाज़ गूँजी, “नीलिमा! किससे बातें कर रही थी इतनी देर से? ज़रा जल्दी खाना लगा दो, मुझे कुरुक्षेत्र वाले आर्किटेक्ट के पास जाना है। ऊपर की मंज़िल पर जो नई मॉडर्न किचन बननी है, उसके मॉड्यूलर कैबिनेट्स और चिमनी के कुछ डिज़ाइन्स फाइनल करने हैं। मैं कब से इंतज़ार कर रहा था कि तुम्हारा फोन कटे तो बात आगे बढ़े।”
नीलिमा ने गर्म रोटियों की थाली परोसी और मुस्कुराते हुए डाइनिंग टेबल पर रखते हुए बोली, “जी बस, रोटियाँ सिक गईं। वो पुणे से मेरी दीदी साधना का फोन था। पूछ रही थीं कि हमारे बड़े बेटे अक्षत के विवाह की तैयारियाँ कहाँ तक पहुँचीं और क्या ऊपर वाली मंज़िल का नया सेटअप पूरा हो गया? वही बता रही थी कि पेंट और फिटिंग्स का काम लगभग पूरा हो चुका है।”
शशांक ने थाली की ओर हाथ बढ़ाते हुए संतोष भरी सांस ली। पंद्रह दिन पहले ही उनके बड़े बेटे अक्षत का रिश्ता रोहिणी नाम की एक बहुत ही सुलझी हुई, संस्कारी और बैंक में काम करने वाली लड़की से पक्का हुआ था। शशांक और नीलिमा ने कोई सात साल पहले ग्राउंड फ्लोर पर एक बहुत ही सुंदर, चार बेडरूम का स्वतंत्र मकान बनवाया था। उस समय तो यही योजना थी कि एक कमरा उनका होगा, दो कमरे दोनों बेटों—अक्षत और छोटे बेटे मयंक के होंगे, और एक कमरा अतिथियों के लिए रहेगा। सब हँसी-खुशी एक साथ रहेंगे।
लेकिन यह मकान बनने की पृष्ठभूमि भी बड़ी दिलचस्प थी। शशांक अपने दोनों भाइयों—बड़े भाई हेमंत और छोटे भाई प्रशांत—के साथ अपने माता-पिता के पुराने पुश्तैनी मकान में एक ही छत के नीचे संयुक्त परिवार में रहते थे। उस पुराने तीन मंजिला पुश्तैनी मकान में बारह लोग एक साथ रहते थे। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन धीरे-धीरे वक्त का पहिया घूमा और नई पीढ़ी की सोच बदलने लगी। हर किसी को अपने ‘पर्सनल स्पेस’ और निजता की दरकार होने लगी।
बात तब शुरू हुई थी जब बड़े भाई हेमंत के बेटे नमन ने बारहवीं कक्षा के बोर्ड इम्तिहानों की तैयारी के दौरान झुंझलाकर अपनी माँ से कह दिया था, “मम्मी! मैं इस शोरगुल में पढ़ाई नहीं कर सकता। कभी बैठक में चाचा जी के दोस्त आ जाते हैं, कभी बरामदे में चाची जी मसाले कूटती हैं, तो कभी आँगन में बच्चे क्रिकेट खेलते हैं। किताबें हाथ में लिए मैं घर के एक कोने से दूसरे कोने में भटकता रहता हूँ। मेरी पढ़ाई का ध्यान ही नहीं बन पाता। अगर मेरे अच्छे नंबर नहीं आए तो सारा दोष मुझ पर ही मढ़ा जाएगा!”
उस समय तो नमन की माँ ने उसे डांट दिया था, “अरे वाह रे नवाबज़ादे! हम तो जैसे कभी पढ़े ही नहीं। हमारे जमाने में तो एक ही लालटेन के नीचे छह भाई-बहन पढ़कर अफसर बन गए, और तुझे अब एकांत का महल चाहिए? देखो तो अम्मा जी, इस लड़के के नए-नए नखरे!”
लेकिन दालान में बैठे शशांक के पिता, यानी परिवार के मुखिया ओंकारनाथ जी ने पोते की उस झुंझलाहट को बहुत गहराई से महसूस किया था। ओंकारनाथ जी पुराने खयालात के होते हुए भी अत्यंत दूरदर्शी और संवेदनशील इंसान थे। वे समझ गए थे कि आने वाले समय में जब बच्चों की शादियाँ होंगी, तो बहुओं के आने पर जगह की तंगी रिश्तों में खटास पैदा कर देगी। देवरानी-जेठानी भले ही मर्यादावश अपने ससुर के सामने मुँह न खोलें, लेकिन भीतर ही भीतर एक घुटन जन्म ले लेगी।
बस, उसी दिन ओंकारनाथ जी ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया। उन्होंने तीनों बेटों को बुलाकर समझाया और अपनी कुछ ज़मीन बेचकर तीनों को अलग-अलग घर बनाने का निर्देश दे दिया। साल भर के भीतर बड़ा बेटा हेमंत और मंझला बेटा शशांक अपने-अपने परिवारों के साथ अपने नए मकानों में बस गए।
लेकिन सबसे छोटा बेटा प्रशांत और उसकी पत्नी वंदना, अपनी दो बेटियों और एक बेटे के साथ पुराने मकान में ही माता-पिता के साथ रह गए। ओंकारनाथ जी और उनकी धर्मपत्नी यशोदा देवी का छोटे बेटे पर थोड़ा ज्यादा स्नेह था, इसलिए उन्होंने छोटे को अपने पास ही रख लिया।
शुरुआत में तो सब कुछ सहज लगा, लेकिन धीरे-धीरे वंदना के मन में एक हीनभावना और चिढ़ घर करने लगी। वंदना को लगता कि जेठ और जिठानी तो अपने-अपने नए घरों में स्वतंत्र होकर राजा-रानी की तरह जी रहे हैं—जब मर्जी सोएँ, जो मर्जी पकाएँ, जहाँ मर्जी घूमें-फिरें। और एक वह है, जो आज भी हर छोटी-बड़ी बात के लिए सास-ससुर की आज्ञा और अनुमति की मोहताज बनी बैठी है।
बात तब और बिगड़ गई जब प्रशांत की सोलह साल की बेटी रिया एक दिन कॉलेज जाने के लिए गहरे रंग की लिपस्टिक लगाकर और कटे हुए बाल खुले छोड़कर सज-धज कर निकल रही थी।
दालान में बैठी दादी यशोदा देवी ने अपनी नज़रें चश्मे के ऊपर से उठाईं और टोक दिया, “अरे रिया बिटिया! कॉलेज जा रही हो या किसी शादी की दावत में? पढ़ने तो तुम्हारी बुआ भी जाती थी, पर सादे कुर्ते और सलीके से बँधी चोटी में जाती थी। इस तरह इतना बन-ठन कर जाने की क्या तुक है?”
रिया ने पैर पटकते हुए झल्लाकर कहा, “दादी! प्लीज़, बुआ का ज़माना अस्सी के दशक का था! अब हर लड़की सलीके से और अपनी पसंद के हिसाब से तैयार होती है। आप हर बात में नुक्स निकालना बंद कीजिए!” और वह बिना नाश्ता किए बाहर निकल गई।
रसोई से वंदना भी तमतमाती हुई बाहर आ गई और यशोदा देवी से बोली, “अम्मा जी, आप भी बस मेरी ही संतानों के पीछे पड़ी रहती हैं। ज़माना बदल चुका है, सारी दुनिया की लड़कियाँ ऐसे ही रहती हैं। मेरी जेठानियों की बेटियाँ तो अपनी मर्जी से जी रही हैं, उनकी किस्मत अच्छी है कि वे यहाँ की बंदिशों से आज़ाद हो गईं। सिर्फ हमारे नसीब में ही यह ताना-बाना लिखा रह गया है!”
यशोदा देवी ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप अपनी माला फेरती रहीं। उनके दिल में एक टीस उठी थी कि जिस ममता से उन्होंने इस घर को बाँध रखा था, वही ममता आज की पीढ़ी को बेड़ी लगने लगी थी।
अगले ही दिन, शशांक और नीलिमा अपनी गाड़ी लेकर पुराने मकान पहुँचे। विवाह की पहली खरीदारी और निमंत्रण पत्र छपवाने का काम शुरू होना था।
नीलिमा ने यशोदा देवी के पैर छूते हुए कहा, “अम्मा जी, बाबूजी… आज हम आप दोनों को अपने घर ले जाने आए हैं। अक्षत की शादी का सारा काम आपके मार्गदर्शन के बिना कैसे होगा? और वैसे भी, अक्षत और रोहिणी के लिए हमने ऊपर वाली पूरी मंज़िल तैयार करवा दी है। अलग बेडरूम, अलग लिविंग एरिया और अलग किचन।”
“अलग किचन? अलग मंज़िल?” ओंकारनाथ जी ने चौंक कर चश्मा उतारा। उनकी त्योरियाँ चढ़ गईं। वे नीलिमा की तरफ देखकर बोले, “बहू! यह क्या सुन रहा हूँ मैं? शादी का अर्थ तो परिवार को जोड़ना और नया सदस्य जोड़ना होता है, तुमने तो बहू के घर की चौखट लांघने से पहले ही उसका चूल्हा अलग कर दिया?”
यशोदा देवी ने भी भारी मन से कहा, “हाँ शशांक बेटा! अगर शुरुआत से ही बच्चों को अलग रहने की आदत डाल दोगे, तो कल को वे परिवार और बुज़ुर्गों को सिर्फ एक बोझ और बंधन समझने लगेंगे। तुम तीनों भाइयों की बहुएँ बरसों तक एक ही रसोई में एक साथ हँसी-खुशी रहीं, एक-दूसरे का दुख-सुख बाँटा। और आज तुम अपनी बहू के आने से पहले ही दीवारें खड़ी कर रहे हो?”
शशांक ने थोड़ा झिझकते हुए सफाई दी, “बाबूजी, नीलिमा को किसी सहेली ने समझा दिया कि आजकल की कामकाजी लड़कियाँ अपनी स्वतंत्रता में किसी का दखल पसंद नहीं करतीं। अगर रिश्तों में मिठास रखनी है, तो उन्हें पूरी आज़ादी देनी चाहिए—वे जैसे चाहें रहें, जब चाहें पकाएँ, जब चाहें बाहर खाएँ। इसलिए हमने सोचा कि ऊपर का फ्लोर उनके हवाले कर देंगे ताकि कोई मनमुटाव न हो।”
ओंकारनाथ जी ने एक गहरी सांस ली। वे अपनी आरामकुर्सी पर सीधे होकर बैठे और बहुत ही शांत लेकिन गंभीर आवाज़ में बोले,
“नीलिमा बेटा! पड़ोसियों और परिवार में यही तो बुनियादी फर्क होता है। पड़ोसियों के साथ औपचारिकता निभाई जाती है, ‘हाय-हैलो’ किया जाता है और उनके निजी जीवन से दूरी रखी जाती है। लेकिन परिवार औपचारिकता से नहीं, आत्मीयता और साझा ज़िम्मेदारियों से चलता है। बच्चों को स्वतंत्रता देना गलत नहीं है, लेकिन स्वतंत्रता के नाम पर उन्हें एकांत के कुएँ में धकेल देना परिवार की संस्कृति को खत्म कर देता है।”
ओंकारनाथ जी ने पुराने आँगन की तरफ देखते हुए आगे कहा, “तुम्हें क्या लगता है नीलिमा, जब तुम लोग अलग मकानों में गए, तो क्या मैं ऊपर वाली मंज़िलों पर तुम्हारे लिए फ्लैट्स नहीं बनवा सकता था? मैं बनवा सकता था। लेकिन मुझे लगा कि जब तक तुम पर पूरी गृहस्थी की सीधी ज़िम्मेदारी नहीं आएगी, तुम लोग बड़े नहीं बन पाओगे। मुझे तुम पर और बड़ी बहू पर पूरा भरोसा था कि मैंने जो संस्कार और परंपराएँ तुम्हें दी हैं, तुम उन्हें अगली पीढ़ी को सिखाओगी। लेकिन तुम तो सिखाने से पहले ही मैदान छोड़ रही हो! अगर नई बहू तुम्हारे साथ बैठकर रसोई नहीं संभालेगी, तुम्हारे सुख-दुख में हाथ नहीं बँटाएगी, तो वह इस परिवार को अपना कैसे मानेगी?”
बाबूजी की ये बातें नीलिमा के दिल में तीर की तरह चुभ गईं। उसे अपनी नासमझी का अहसास होने लगा। वह जिसे ‘आधुनिक समझदारी’ मान रही थी, वह दरअसल रिश्तों को बिखराव की तरफ धकेलने वाली एक अदृश्य खाई थी।
देखते ही देखते शादी का दिन आ पहुँचा। विवाह से पंद्रह दिन पहले ही ओंकारनाथ जी और यशोदा देवी शशांक के नए घर में आकर रहने लगे थे। पूरे घर में मंगल गीतों, शहनाई की धुनों और रिश्तेदारों की चहल-पहल से एक अपूर्व उत्सव छा गया था। शशांक और नीलिमा के कुशल प्रबंधन और बुज़ुर्गों के आशीर्वाद से अक्षत और रोहिणी का विवाह अत्यंत गरिमा, भव्यता और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ।
शादी के तीसरे दिन, घर के अधिकांश दूर-दराज के मेहमान विदा हो चुके थे। केवल परिवार के करीबी सदस्य ही मौजूद थे। आज नई बहू रोहिणी की पहली रसोई का पावन दिन था। परंपरा के अनुसार आज बहू को अपने हाथों से मीठा बनाकर परिवार के सभी बड़ों का आशीर्वाद लेना था।
नीलिमा ने पहले यही तय किया था कि रोहिणी अपनी पहली रसोई ऊपर वाले नए फ्लोर के आधुनिक किचन में बनाएगी। लेकिन जब सुबह शशांक बैठक में अखबार पढ़ रहे थे, तभी नीलिमा ने आकर अपनी सास यशोदा देवी के हाथ थाम लिए।
नीलिमा ने बड़े ही विनम्र और आत्मीय स्वर में कहा, “अम्मा जी, नीचे वाली मुख्य रसोई में मैंने कड़ाही चढ़ा दी है। सूजी, शुद्ध देसी घी, मेवे और चीनी सब करीने से निकाल कर रख दिए हैं। आपकी आरामदायक कुर्सी मैंने चूल्हे के ठीक बगल में रखवा दी है। आप वहीं विराजेंगी और रोहिणी को अपने हाथों से हलवे का माप और विधि सिखाएँगी।”
शशांक ने हैरान होकर अपनी पत्नी को देखा।
नीलिमा ने मुस्कुराते हुए आगे कहा, “और सुनिए जी, रोहिणी के सूटकेस और उसका कुछ सामान गलती से ऊपर वाले फ्लोर के कमरे में रखवा दिया गया था। मैंने नौकर से कहकर वह सारा सामान नीचे ग्राउंड फ्लोर पर अक्षत के कमरे में शिफ्ट करवा दिया है। ऊपर वाले फ्लोर पर अब कोई नहीं रहेगा, मैंने वहाँ ताला लगाने को कह दिया है। अब तो सिर्फ घर के अपने लोग हैं, और हम सब एक ही छत के नीचे, एक ही आँगन में रहेंगे!”
शशांक का मुँह आश्चर्य और खुशी से खुला का खुला रह गया। उसकी आँखों में अपनी पत्नी की इस समझदारी के लिए गहरा आदर उमड़ आया।
यशोदा देवी की आँखों से खुशी के दो बूँद आँसू छलक पड़े। उन्होंने अपनी बहू नीलिमा का माथा चूम लिया।
तभी दालान के कोने में खड़ी छोटी बहू वंदना, जो पिछले पच्चीस दिनों से अपने तीनों बच्चों के साथ वहाँ मौजूद थी, धीरे-धीरे आगे आई। वंदना का चेहरा आज पूरी तरह बदला हुआ था। उसकी आँखों में वह पुरानी चिढ़ और हीनभावना कहीं नहीं थी।
वंदना ने आगे बढ़कर नीलिमा के कंधे पर हाथ रखा और बेहद भावुक होकर कहा,
“दीदी… आज शादी के सारे काम निपट गए हैं। मेरी एक विनती मान लीजिए। आज शाम को अम्मा जी और बाबूजी को वापस हमारे साथ पुराने मकान में भेज दीजिए, प्लीज़!”
नीलिमा ने चौंक कर पूछा, “अरे वंदना, इतनी जल्दी क्या है? अभी तो अम्मा-बाबूजी को यहाँ कुछ दिन और रहने दो।”
वंदना की आँखों में पश्चाताप और सच्चाई के आँसू थे। उसने हाथ जोड़ते हुए कहा, “नहीं दीदी, पिछले पच्चीस दिनों में जब अम्मा जी और बाबूजी यहाँ आप लोगों के पास थे, तब मुझे समझ आया कि घर में बुज़ुर्गों की मौजूदगी का असली मोल क्या होता है। उन बीस-पच्चीस दिनों में मेरे तीनों बच्चों ने अपनी फ़रमाइशों, अपने नखरों और अपनी मनमानियों से मेरी नाक में दम कर दिया! कोई समय पर खाना नहीं खाता था, कोई मेरी बात नहीं सुनता था। तब मुझे अहसास हुआ कि जब बाबूजी दालान में बैठते थे, तो बच्चों में एक अनुशासन रहता था। जब अम्मा जी की नज़रें आँगन पर रहती थीं, तो घर की हर चीज़ अपने सही ठिकाने पर रहती थी। घर के बड़े-बुजुर्ग कोई पहरेदार या बंधन नहीं होते, वे तो वह वटवृक्ष होते हैं जिनकी मौजूदगी ही आधी से ज्यादा समस्याओं को बिना बोले हल कर देती है। मैं अपने उस अहंकार पर बहुत शर्मिंदा हूँ दीदी।”
दालान में बैठे ओंकारनाथ जी ने अपनी छोटी बहू की यह बात सुनी, तो उनके चेहरे पर एक असीम, दिव्य संतोष की आभा फैल गई। उनकी छाती गर्व से चौड़ी हो गई। आज उनकी छोटी बहू वंदना भी जीवन के उस गूढ़ सत्य को समझ चुकी थी, जिसे उन्होंने अपनी बड़ी दोनों बहुओं को सिखाया था।
शशांक ने आगे बढ़कर अपने पिता के घुटनों को छुआ और धीरे से पूछा, “बाबूजी, अब जब शादी निपट गई है और रोहिणी भी हमारे साथ नीचे ही रहेगी, तो क्या ऊपर वाले उस नए फ्लोर को किसी अच्छे परिवार को किराए पर दे दिया जाए?”
ओंकारनाथ जी ने अपनी सफेद मूँछों पर हाथ फेरते हुए एक आत्मीय ठहाका लगाया। “हाँ शशांक बेटा! मेरे हिसाब से तो यही सबसे उत्तम रहेगा। कम से कम खाली पड़े रहने से तो बेहतर है कि किसी को आसरा मिले। और हाँ, एक बात हमेशा याद रखना—जब बच्चे बड़े हो जाएँ, तो उन पर अपने विचार थोपने के बजाय उनके साथ दोस्तों जैसा व्यवहार करना ही पीढ़ियों की दूरी को पाटने का सबसे सुंदर तरीका है।”
उसी समय रसोई से शुद्ध घी के हलवे की मनमोहक खुशबू पूरे घर में फैल गई।
अक्षत और नई बहू रोहिणी हाथ में हलवे का पहला कटोरा लिए बाहर आए। रोहिणी ने झुककर सबसे पहले ओंकारनाथ जी और यशोदा देवी के चरण छुए, फिर अपनी सास नीलिमा और चाची वंदना के पाँव छूकर आशीर्वाद लिया। जब यशोदा देवी ने हलवे का पहला निवाला चखा और रोहिणी के सिर पर अपनी सोने की चूड़ी का शगुन रखा, तो उस घर की चौखट पर किसी अलग-थलग आशियाने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई।
उस दिन उस घर ने यह साबित कर दिया था कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को काट देना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को इतना गहरा कर लेना है कि नई शाखाएँ भी उसी छाँव में सुकून से फल-फूल सकें। दीवारों को अलग कर देने से आज़ादी तो मिल सकती है, लेकिन जो आत्मीय सुरक्षा, जो संस्कार और जो सुकून एक साझी छत के नीचे मिलकर रहने में है, वह दुनिया के किसी भी आलीशान अलग फ्लैट में कभी नहीं मिल सकता।
प्रिय पाठकों,
क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में ‘पर्सनल स्पेस’ और ‘आज़ादी’ के नाम पर परिवारों का अलग-थलग हो जाना हमारे रिश्तों को खोखला कर रहा है? क्या घर के बड़े-बुजुर्ग सचमुच किसी बंधन की तरह होते हैं, या फिर उनकी छत्रछाया ही घर की समस्याओं का सबसे बड़ा समाधान होती है? इस प्रेरणादायी पारिवारिक कहानी पर अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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