“मायके का इतना भी क्या मोह कि ससुराल की कोई फ़िक्र ही नहीं! बड़ी बहन तो आराम से विदेश में रह रही है और तू यहाँ घर-द्वार छोड़कर मायके भागती रहती है।” मृणालिनी के घर घुसते ही उसकी सास नीलांजना भड़कते हुए बोलीं।
यह सुनते ही मृणालिनी को बहुत गुस्सा आया, लेकिन खुद को संयत करते हुए वह धीमे से बोली, “मम्मी जी, पापा ने कुछ ज़रूरी बात करने के लिए बुलाया था। तभी अचानक उनकी तबीयत ख़राब हो गई और उन्हें हॉस्पिटल ले जाना पड़ा। वैसे मैंने खाना तो ऑनलाइन ऑर्डर कर ही दिया था, आप लोगों ने खा ही लिया होगा?”
“हाँ, आज तो खा लिया, लेकिन रोज़-रोज़ यह बाहर का खाना हमसे नहीं खाया जाएगा,” कहकर वह अपने कमरे में चली गईं।
मृणालिनी आश्चर्य से अपनी सास को देखती रह गई। एक बार भी पापा की सेहत के बारे में नहीं पूछा! मृणालिनी का मन ख़राब हो गया, उसकी तो मानो भूख ही मर गई। पहले से ही अपने पापा की तबीयत को लेकर परेशान थी, उस पर सास की जली-कटी बातें। वह किसी तरह खुद पर काबू करते हुए अपने कमरे में पहुँची।
कमरे में पहुँचते ही उसके पति अंकुर ने औपचारिकता निभाते हुए पूछा, “कैसे हैं पापा जी?”
“ठीक हैं। वैसे तुम यदि ऑफिस से निकलते वक्त कुछ समय के लिए हॉस्पिटल आकर उनसे मिल लेते, तो उन्हें भी अच्छा लगता।”
“तुम तो थी ही, मैं वहाँ आकर क्या करता! वैसे क्या ज़रूरी बात करनी थी पापा जी को तुमसे?” अंकुर ने पूछा।
“सुबह बात करेंगे, अभी मैं बहुत थक गई हूँ,” किसी तरह अपने आँसुओं को पीते हुए उसने कहा और बाथरूम में चेंज करने चली गई। वहाँ नल खोलकर वह कितनी देर तक रोती रही, उसे खुद ही नहीं पता चला।
‘मैंने शादी से पहले ही अंकुर को साफ़-साफ़ बता दिया था कि दीदी अमेरिका में रहती हैं, तो पापा की देखभाल मेरी ज़िम्मेदारी है। फिर भी ये लोग हर बार ऐसा ही करते हैं… लेकिन चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े, मैं अपने बीमार पापा को अकेला नहीं छोड़ सकती!’ वह रोते-रोते सोचती रही।
तभी अंकुर के दरवाज़ा खटखटाने पर वह अपने ख्यालों से बाहर आई— “क्या कर रही हो इतनी देर से? पूरी टंकी का पानी ख़त्म करके निकलोगी क्या?”
यह सुनते ही वह तुरंत बाहर आई और बिना कुछ खाए-पिए ही चुपचाप बेड की अपनी साइड जाकर सो गई।
दूसरे दिन नाश्ते की टेबल पर अंकुर ने फिर वही बात छेड़ी, “वैसे मृणालिनी, तुमने बताया नहीं कि कल पापा जी ने तुम्हें क्यों बुलाया था?”
मृणालिनी ने शांत और गंभीर आवाज़ में कहा, “दीदी चाहती हैं कि पापा अपनी कोठी मेरे नाम कर दें। उनका कहना है कि वो तो अमेरिका में सेटल हैं, तो उन्हें कुछ नहीं चाहिए। पापा ने इसी सिलसिले में बात करने के लिए बुलाया था। मैंने तो बहुत मना किया, लेकिन उन्होंने मेरी एक ना सुनी और वकील अंकल को बुलाकर पापा से उस कोठी की वसीयत मेरे नाम करवा दी। ये सब बातें पूरी कर मैं निकलने ही वाली थी कि अचानक पापा की तबीयत बिगड़ गई और मुझे तुरंत उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा।”
यह सुनते ही नीलांजना की आँखें चमक उठीं। ‘पॉश इलाके में इतनी बड़ी कोठी! यह तो है ही बेवकूफ जो मना करने चली थी लेकिन भला हो इसकी बहन का जिसने पहली बार कोई समझदारी का काम किया है…’ वह तो सपनों में उड़ने लगीं। तभी मृणालिनी की आवाज़ से वह अपने ख्यालों से बाहर आईं।
“मम्मी जी, मैंने लंच बना दिया है। मैं पापा से मिलने हॉस्पिटल जा रही हूँ, लेकिन आप डिनर की चिंता मत करिए, मैं आकर बना दूँगी,” कहकर वह बाहर निकलने लगी।
“रुक बहू!” यह सुनते ही मृणालिनी के बढ़ते कदम ठिठक गए।
“जी मम्मी जी?”
“मैं कह रही हूँ कि तू डिनर और घर के कामों की चिंता छोड़, और समधी जी की देखभाल कर निश्चिंत होकर। घर के काम मैं देख लूँगी, इतनी भी बूढ़ी नहीं हूँ मैं। क्यों अंकुर?”
“बिल्कुल सही कह रही हैं मम्मी! और सुनो, तुम्हें हॉस्पिटल कैब से जाने की ज़रूरत नहीं है। चलो मैं छोड़ देता हूँ और पापा जी से भी मिल लूँगा।”
दोनों घी-शक्कर होकर मृणालिनी से बात किए जा रहे थे। उनके इस बदले हुए व्यवहार को देखकर मृणालिनी कुछ नहीं कहती और चुपचाप अंकुर के साथ कार में बैठ जाती है।
इसी तरह दिन बीतते गए। उसने अपने पापा की सेवा और इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी। रात-रात भर उनके पास अस्पताल में जगती, हर तरह से उनकी देखभाल करती। कोठी मिलने के लालच में उसकी सास और पति भी इसमें उसका बराबर साथ दे रहे थे। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद, तीन महीने बाद उसके पापा इस दुनिया को छोड़ गए।
अपने पापा के क्रिया-कर्म के बाद एक दिन मृणालिनी अपने कमरे में बैठी पापा की फ़ोटो को निहार रही थी, तभी अंकुर और उसकी सासू माँ नीलांजना उसके पास आए।
“बहू, संभालो अपने-आप को। इस ढंग से रोती रहोगी तो बीमार पड़ जाओगी।”
“लेकिन क्या करूँ मम्मी जी, पापा की बहुत याद आती है।”
“तो ऐसा करते हैं, तुम्हारे पापा ने जो कोठी तुम्हारे नाम की है, हम उसी में शिफ्ट हो जाते हैं। वहाँ तुम हर पल अपने पापा को महसूस कर पाओगी।”
यह सुनते ही मृणालिनी आँसू पोंछते हुए बोली, “हाँ मम्मी जी, आइडिया तो बहुत अच्छा है। शिफ्ट तो हो जाएँगे, लेकिन पहले लोन तो चुका दीजिए!”
“कैसा लोन? यह क्या बोल रही हो तुम?” अंकुर चिल्लाया।
“अंकुर, आवाज़ नीचे! पापा के बिज़नेस में नुकसान और उनके भारी इलाज के चलते वह कोठी बैंक में गिरवी रखी हुई है। इधर कई महीनों से उसकी ईएमआई भी नहीं भरी गई है, जिस कारण वो अब जल्द ही नीलाम होने वाली है। इसलिए यदि वहाँ शिफ्ट होना है, तो पहले लोन चुकता करो या फिर उसे भूल जाओ।”
मृणालिनी के यह कहते ही दोनों की आँखों के सामने अँधेरा छा गया।
“इसका मतलब तूने हमें धोखा…”
“धोखा नहीं माँ जी, यह तो अपने पापा की सेवा करने का रास्ता निकाला था, क्योंकि आप दोनों ने मेरे पास और कोई रास्ता छोड़ा ही नहीं था… और मैं अपने पापा को अकेला नहीं छोड़ सकती थी!” मृणालिनी ने अपनी सास को बीच में ही रोकते हुए दो-टूक जवाब दिया और वहां से चली गई।
धन्यवाद
साप्ताहिक विषय प्रतियोगिता #मायके का मोह
शीर्षक-मायके का मोह
लेखिका श्वेता अग्रवाल, धनबाद, झारखंड