सुनीता की शादी उसी मोहल्ले में हुई जहाॅं उसका मायका था। सुनीता के दो भाई थे, बड़ा भाई राजेश, और सुनीता से छोटा भाई राकेश। बारहवीं पास करते ही सुनीता की शादी हो गई।
सुनीता का मायका घर के पास ही था पर उसका मायका जाना बहुत ही कम था। तीज त्यौहार में ही जाती थी। परंतु राखी में वह अपने भाइयों को राखी बांधने जरूर जाती थी और पूरा दिन वहीं रहती थी। जब सुनीता के बच्चे हो गए वह उनके साथ व्यस्त हो गई। बड़े भाई की शादी हुई तो दूसरे शहर में जाॅब होने के कारण उसने वहीं किराये में फ्लैट ले लिया और अपनी पत्नी सीमा के साथ रहने लगा।
राकेश अपने मम्मी-पापा के साथ ही रहता। जब राकेश ऑफिस के काम से दूसरे शहर जाता तो सुनीता अपने मम्मी पापा के पास आ जाती।
मम्मी-पापा राकेश की शादी करना चाहते थे परंतु राकेश ने मना कर दिया। सुनीता ने भी उसे बहुत समझाया लेकिन वह नहीं माना। राकेश को शराब पीने की बुरी आदत थी, इस वजह से शादी नहीं करना चाहता था।
वह नहीं चाहता था किसी लड़की की जिंदगी बर्बाद हो, इसलिए उसने शादी के लिए मना कर दिया। ऐसा नहीं कि उसने शराब छोड़ने की कोशिश ना की हो। बहुत कोशिश के बाद भी उसकी शराब नहीं छूटी। अब उसे शादी करने के लिए कोई भी नहीं कहता।
सुनीता के मम्मी-पापा बुजुर्ग हो गए थे। उन्हें रात दिन राकेश की ही चिंता रहती कि हमारे बाद इसका ध्यान कौन रखेगा। वह हमेशा राजेश और सुनीता को यही कहते कि हमारे बाद राकेश का तुम दोनों ध्यान रखना।
समय के साथ उन्होंने अपनी जमीन जायदाद के भी हिस्से कर दिए। उन्होंने अपनी बेटी सुनीता को भी बराबर का हिस्सा दिया। इस पर राजेश और उसकी पत्नी ने बहुत विरोध किया और सुनीता को भी बहुत बुरा भला कहा।
सुनीता ने अपने मम्मी-पापा को साफ कह दिया कि मुझे कोई हिस्सा नहीं चाहिए, आप दोनों भाइयों को बराबर- बराबर हिस्सा दे दो । बड़े भाई ने कहा ‘राकेश को ज्यादा देने की क्या जरूरत है, वह तो अकेला है, उसके लिए थोड़ा ही बहुत है, सुनीता वाला हिस्सा हमें दे दो।’
राकेश ने साफ-साफ कह दिया ‘सुनीता का हिस्सा सुनीता को ही मिलेगा। जो मम्मी-पापा ने हिस्सा किया है बिल्कुल ठीक किया है।’
सुनीता ने अपने मम्मी-पापा और राकेश को समझाया, ‘मुझे कुछ नहीं चाहिए। इस हिस्से से मेरे मायके का रास्ता बंद मत करो। “मुझे अपने मायके का मोह है।” बस मेरा मायके का दरवाजा मेरे लिए हमेशा खुले रहे। हम सब प्यार से और मिल कर रहे। मेरा हिस्सा बड़े भाई को दे दो।’
सुनीता ने अपना हिस्सा छोड़ दिया और वह हिस्सा बड़े भाई ने अपने नाम कर लिया।
राकेश अब रात दिन नशे में रहता, उसको अपना कुछ भी होश नही रहता। सुनीता ने अपने बड़े भाई को बोला ‘आप लोग यहाॅं आ जाओ, मम्मी-पापा की देखभाल हो जाएगी और बच्चों के साथ उनका मन भी लग जाएगा।’
भाई ने मना कर दिया और बोला ‘हम अपने हिस्से का मकान बेच कर नोएडा में ही फ्लैट ले रहे हैं। मम्मी-पापा अगर हमारे साथ रहना चाहते हैं तो रह सकते हैं, वरना राकेश तो है ही उनके साथ उनकी देखभाल करने के लिए।’
‘राकेश क्या देखभाल करेगा। वह तो अपने लिए ही कुछ नहीं कर पाता मम्मी-पापा के लिए क्या करेगा आप लोग यहाॅं आ जाते तो तीनों की देखभाल हो जाती।’
राजेश ने मना कर दिया ‘हम नहीं आ सकते। तुम हो, तुम करो उनकी देखभाल।’
‘ठीक है भाई अगर आप नहीं कर सकते तो मैं ही आऊंगी उनकी देखभाल करने।’
भाई ने अपना हिस्सा बेच कर नोएडा में ही फ्लैट ले लिया।
कुछ सालों बाद सुनीता के मम्मी-पापा गुजर गए। अब सुनीता ही राकेश की देखभाल करती। राकेश ने अब नौकरी छोड़ दी थी। वह नशे का इतना आदि हो गया कि अब वह बीमार रहने लगा। सुनीता ने राकेश की बहुत सेवा की। राकेश की जीने की इच्छा ही नहीं रही। उसकी किडनी, लिवर खराब हो गये। डाक्टरों के बहुत इलाज के बावजूद वह नहीं बच पाया।
राकेश जाते-जाते अपने हिस्से का मकान अपनी बहन सुनीता के नाम कर गया और अपनी वसीयत में लिख दिया – ‘यह मकान सुनीता के नाम है और उसके बाद उसके बच्चों का, बच्चों की मर्जी इस घर को रखे या बेचें सुनीता यह मकान किसी को भी नहीं देगी’। इसी बात की कसम भी वह सुनीता को दे गया।
सुनीता के बड़े भाई भाभी ने सुनीता को बहुत खरी खोटी सुनाई ‘तुमने राकेश के नशे का फायदा उठाकर कागज में साइन करा लिया और यह घर अपने नाम कर लिया।’ दोनों उससे रोज झगड़ा करते। आए दिन के झगड़े से परेशान हो कर सुनीता के पति ने राकेश के मकान में ताला लगा दिया। उसकी एक चाबी सुनीता को और एक चाबी राजेश को दे दी और कहा ‘अब झगड़ा नहीं होना चाहिए। ये दोनों का है। तुम दोनों कुछ भी करो पर झगड़ा नहीं होना चाहिए।’
बिमला रावत जड़धारी
सुनीता हर साल राखी में मायके जाती, घर की पूरी सफाई करती और राकेश की फोटो के आगे राखी रखती। थोड़ी देर वहीं बैठकर अपना मन हल्का करती और फिर बड़े भाई के घर राखी बांधने चली जाती। उसका भाई कभी भी घर पर नहीं मिलता। भाभी कहती ‘सुनीता तुम्हारे भाई आफिस गये हैं, जब आएंगे तो बांध लेंगे।’ सुनीता थोड़ी देर बैठती फिर अपने घर आ जाती। भाई भाभी ने कभी भी उसे सम्मान नहीं दिया।
आज राकेश को गये पूरे सात साल हो गए। सुनीता तैयार हो कर राखी के लिए पहले राकेश के घर फिर भाई के जा रही थी। जब राकेश के घर पहुंची तो घर का दरवाजा खुला हुआ पाया। वह डर गयी और अपने पति अभिषेक को फोन करके बुलाया।
सुनीता और अभिषेक घर के अंदर जाते हैं। वह भाई भाभी और बच्चों को देख कर आश्चर्य चकित रह जाती है।डरती भी है कि कहीं ये दोनों गुस्सा तो नहीं होंगे, कहीं मुझसे झगड़ा करने तो नहीं आए। वो डर कर कुछ बोलने ही वाली थी कि राजेश ने आगे बढ़कर सुनीता को गले लगा लिया और माफी माॅंगने लगा। ‘सुनीता, मम्मी-पापा और राकेश के ना रहते हुए भी वो तेरे दिल के कितने पास है और एक मैं तुझसे उतना ही दूर हूॅं।’
‘भाई आप भी मेरे उतने ही पास हैं जितने मम्मी-पापा और राकेश, तभी तो मैं हर राखी में आप के पास आती थी पर आप मिलते ही नहीं थे क्योंकि मुझे आने में देर हो जाती थी।’
‘सुनीता मेरे मन में मैल था। मेरी आंखों में लालच का पर्दा था जो मैं हटा ही नहीं पाया और मुझे अपनी बहन का प्यार नहीं दिखा।
जब पापा ने तुम्हें घर में हिस्सा दिया तो मेरे और तुम्हारी भाभी के गुस्सा होने पर तुमने अपना हिस्सा मेरे नाम कर दिया। यहां सब बेच कर मैंने फ्लैट ले लिया। तुम्हें तो पता ही है मैं तुम्हें हमेशा कहता था कि मैं अपना बिजनेस करूॅंगा।’
‘हाॅं भाई, आप काॅलेज टाइम से ही कहते थे अपना बिजनेस करने के लिए।”
‘सुनीता मैंने अपने दोस्त के साथ मिलकर पानी का प्लांट लगाने का पलान बनाया। दोस्त की जमीन थी तो उसने बोला उस पर लगा लेते हैं। मैं तैयार हो गया और अपनी सारी जमा पूंजी लगा दी। शुरू में तो नुक्सान हुआ पर बाद में काम अच्छा चलाने लगा। मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी। पैसे आने लगे तो शौक भी बढ़ गए।
अब मेरे मन में दूसरा प्लांट लगाने का विचार आया पर उसके लिए जमीन नहीं थी। जमीन लेने के लिए मैंने अपना फ्लैट बेच दिया और वहीं किराए में दूसरा फ्लैट ले लिया। मुझे पूरा विश्वास था कि एक फैक्ट्री तो अच्छा मुनाफा दे रही है, जब दूसरी फैक्टरी लग जाएगी तो मुझे और अच्छा मुनाफा होने लगेगा।
उस मुनाफे से मैं अच्छा और बड़ा फ्लैट ले लूंगा। मैंने अपने दोस्त पर इतना भरोसा किया और लगभग सारा पैसा उसके कहने पर एक जमीन में लगा दिया। लेकिन मेरी करनी का फल मुझे मिलना ही था। उस दोस्त ने ऐसा धोखा दिया की मैं सड़क पर आ गया। वह मेरे सारे पैसे लेकर और फैक्ट्री बेच कर भाग गया।’
‘भाई आप के साथ इतना कुछ हो गया और आप ने हमें कुछ भी नहीं बताया।’
‘किस मुंह से बताता। मैंने तुम्हारे साथ कभी अच्छा व्यवहार नहीं किया।’
‘भाई वो सब पुरानी बातें थी। आप लोगों का रहना खाना कैसे चला रहा है?’
‘सुनीता, अभी तक तो जो पैसे थे उसी से चल रहा है। मैंने नौकरी के लिए कई कम्पनियों में फार्म भरे हैं। देखो क्या जवाब आता है। अगर तुम दोनों हमारी मदद कर दो तो हम पर बहुत अहसान होगा।’
‘भाई कैसी बात कर रहे हो। बहन हूॅं मैं आपकी पूरे हक से बोलो।’
‘सुनीता जब तक मुझे कहीं नौकरी नहीं मिल जाती क्या हम लोग यहाॅं तुम्हारे इस घर में रह सकते हैं?”
‘भाई आप कैसी बात कर रहे हो। ये मेरा नहीं हमारा घर है। आप सब पूरे हक से इस घर में रह सकते हो।’
‘सुनीता ऐसे नहीं, मैं कुछ कागज तैयार कर के लाया हूॅं। पहले इस में साइन करो फिर हम इस में रहने आएंगे।’
‘साइन! कैसे साईन? और ये कागज किस चीज के हैं?’
‘बस तुम पहले साईन करो, फिर बताता हूॅं।’
सुनीता कागज में साइन कर देती है। ‘अब बताओ भाई ये किस चीज के कागज है।’
‘सुनीता ये इस घर के कागज है। और इस में लिखा है कि ये घर तुम्हारा है। हम इस घर में किराएदार हैं। तुम जब चाहो हमें इस घर से निकाल सकती हो।’
‘भाई मुझे घर का कोई किराया नहीं चाहिए। आप यहॉं पूरे हक से रह सकते हो। मुझे तो इस बात की खुशी है कि इस घर में फिर से रौनक आ गयी।’
सब कुछ सुलझ जाने के बाद अभिषेक ने बोला ‘अरे जो हुआ उसे भूल जाओ और राखी बांध कर खुशी मनाओ। मैं भी घर जाता हूॅं। मेरी बहन आने वाली है।’
सुनीता अपने भाई को राखी बांधते हुए कहती है ‘भाई ये घर हम सब का है। मुझे “मायके का मोह है” घर का नहीं।मैं चाहती हूॅं मेरे मायके का रास्ता हमेशा खुला रहे।’
– बिमला रावत जड़धारी