निधि ने जैसे ही अपनी सासू माँ को देखा, वह अपने आंसुओं पर काबू नहीं रख सकी और उनसे लिपटकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगी, “मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिए! मैंने सब खराब कर दिया। मुझे कुछ नहीं आता मम्मी जी… मैंने शादी से पहले कुकिंग क्लास में केक, पास्ता और कोफ्ते बनाना तो सीख लिया था ताकि आप सबको खुश कर सकूं, लेकिन मैंने आज तक कभी आटा नहीं गूंथा, कभी सादी दाल नहीं बनाई। मुझे बहुत डर लग रहा है कि बाहर सब क्या सोचेंगे!”
लाडली बेटी निधि ने जब कंप्यूटर साइंस में एम.टेक पूरा किया, तो उसकी आँखों में बड़े-बड़े कॉर्पोरेट सपने तैर रहे थे। निधि जितनी तेज़ दिमाग की थी, उतनी ही स्वाभिमानी भी। लैपटॉप के की-बोर्ड पर उसकी उंगलियाँ जितनी रफ्तार से चलती थीं, रसोई के मसालों और बर्तनों से उसकी दूरी उतनी ही अधिक थी। बचपन से लेकर आज तक उसकी माँ मंजुला जी ने उसे कभी रसोई की चौखट भी नहीं लांघने दी थी। उनका हमेशा यही मानना था कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर अफसर बनेगी, चूल्हा-चौका करने के लिए तो दुनिया पड़ी है। लेकिन समय का पहिया घूमा और निधि का रिश्ता जबलपुर के एक प्रतिष्ठित, संस्कारी और भरे-पूरे संयुक्त परिवार के बेटे आदित्य के साथ तय हो गया। आदित्य खुद एक मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे पद पर था और निधि के करियर को लेकर बहुत सहयोगी विचार रखता था, लेकिन उसका परिवार पारंपरिक मूल्यों और साथ बैठकर भोजन करने की संस्कृति में गहरा विश्वास रखता था।
सगाई के कुछ दिनों बाद एक शाम जब मंजुला जी निधि के कमरे में आईं, तो उनके चेहरे पर खुशी के साथ-साथ एक हल्की सी चिंता की लकीर भी थी। उन्होंने निधि के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा निधि, आदित्य बहुत सुलझा हुआ लड़का है और तुम्हारा ससुराल भी सोने जैसा है। मुझे पता है कि शादी के बाद भी तुम अपनी नौकरी जारी रखोगी और घर के कामों के लिए वहां नौकर-चाकर भी हैं। फिर भी, मेरा मन कहता है कि तुम्हें थोड़ा-बहुत खाना बनाना जरूर सीख लेना चाहिए। संयुक्त परिवार में जब नई बहू पहली बार रसोई में कदम रखती है, तो सबकी नजरें उसी पर होती हैं। कभी किसी के मुंह से यह न निकले कि माँ ने बेटी को केवल किताबी ज्ञान दिया, गृहस्थी के संस्कार नहीं सिखाए।”
निधि ने अपनी माँ की बात को बहुत गंभीरता से लिया। उसने याद किया कि एक बार फोन पर बातचीत के दौरान आदित्य ने भी हँसते हुए जिक्र किया था कि उसके पिताजी, चाचाजी और दादीजी को नई-नई चीजें चखने का बहुत शौक है और रविवार के दिन उनके घर में किसी उत्सव जैसा माहौल होता है। निधि हर क्षेत्र में अव्वल रहने की आदी थी, चाहे वह कॉलेज का प्रोजेक्ट हो या ऑफिस की प्रेजेंटेशन। उसने मन ही मन ठान लिया कि वह ससुराल में अपनी पाक-कला का ऐसा जादू चलाएगी कि सब उंगलियाँ चाटते रह जाएंगे।
अगले ही दिन निधि ने इंदौर के सबसे महंगे और मशहूर ‘कलिनरी एंड बेकिंग इंस्टीट्यूट’ में एक महीने का क्रैश कोर्स जॉइन कर लिया। वहां शेफ की सख्त निगरानी में, नाप-तौल के सटीक पैमानों और टाइमर की मदद से उसने देश-विदेश के एक से बढ़कर एक लजीज व्यंजन बनाने सीखे। पनीर टिक्का मसाला, मैक्सिकन टैकोस, क्रीमी व्हाइट सॉस पास्ता, चीज़ बॉल्स, शाही मलाई कोफ्ता और बेल्जियन चॉकलेट लावा केक बनाने में निधि ने महारत हासिल कर ली। हर डिश में कितने ग्राम मक्खन पड़ेगा, ओवन को कितने डिग्री पर प्री-हीट करना है और प्लेटिंग करते समय धनिये की पत्ती किस कोण पर रखनी है—यह सब निधि को कंठस्थ हो गया था। कोर्स खत्म होने पर जब उसने घर में पार्टी रखी और अपने हाथों से ये सब बनाया, तो मंजुला जी की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्हें लगा कि उनकी बेटी अब ससुराल की हर कसौटी पर खरी उतरेगी।
धूमधाम से शादी संपन्न हुई और निधि दुल्हन बनकर जबलपुर के उस विशाल आंगन वाले घर में आ गई। ससुराल में उसका स्वागत फूलों की तरह किया गया। उसकी सासू माँ गायत्री देवी बहुत ही शांत स्वभाव की, सुलझी हुई और स्नेहमयी महिला थीं। ससुराल में शुरुआती दो-तीन दिन तो रस्मों-रिवाजों और मेहमानों की आवभगत में बीत गए। चौथे दिन जब रसोई छूने की रस्म हुई, तो निधि ने अपने हुनर का पिटारा खोल दिया। उसने मीठे में केसरिया शाही टुकड़ा और नमकीन में पनीर पसंदा व नर्गिसी कोफ्ते बनाए। डाइनिंग टेबल पर जब कांच के सुंदर बाउल्स में सजे हुए व्यंजन परोसे गए, तो पूरे परिवार की आँखें चमक उठीं।
ससुरजी ने पहला निवाला लेते ही कहा, “वाह गायत्री! तुम्हारी बहू के हाथों में तो फाइव स्टार होटल के शेफ जैसा जादू है।” देवर और ननद तो भाभी के फैन हो गए।
बस फिर क्या था, निधि का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुंच गया। आने वाले आठ दिनों तक उसने रसोई को अपनी प्रयोगशाला बना लिया। कभी सुबह के नाश्ते में स्टफ्ड पैनकेक और रवा इडली बनती, तो कभी शाम की चाय के साथ क्रिस्पी कॉर्न और पनीर कटलेट। रात के खाने में कभी दम बिरयानी की खुशबू महकती, तो कभी थाई ग्रीन करी और नान परोसे जाते। गायत्री देवी रसोई में आतीं, तो निधि बड़े प्यार से कहती, “मम्मी जी, आप बस बाहर बैठकर आराम कीजिए, मैं सब संभाल लूंगी।” गायत्री देवी मुस्कुरा कर रह जातीं। वह देख रही थीं कि बहू में उत्साह बहुत है और वह सबका दिल जीतने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रही है। मोहल्ले की औरतों में भी चर्चा होने लगी कि गायत्री जी की पढ़ी-लिखी बहू तो पाक-कला में निपुण अन्नपूर्णा निकली।
लेकिन कहते हैं न कि मिठाई कितनी भी स्वादिष्ट क्यों न हो, इंसान का मन आखिर में सादे नमक-रोटी के लिए तरस ही जाता है। नौवें दिन सुबह से ही मौसम थोड़ा बदला हुआ था। लगातार आठ दिनों तक मैदा, क्रीम, पनीर, मक्खन और भारी मसालों से बने पकवान खा-खाकर घर के बुजुर्गों का हाजमा जवाब देने लगा था। ससुरजी को सुबह से ही भारीपन महसूस हो रहा था और दादीजी भी अजवाइन का पानी मांग रही थीं।
दोपहर के करीब ग्यारह बजे गायत्री देवी रसोई के दरवाजे पर आईं। निधि उस वक्त अपने फोन में शाम के लिए ‘पनीर लबाबदार’ और ‘गार्लिक नान’ की रेसिपी के नोट्स देख रही थी। गायत्री देवी ने स्नेह से उसके कंधे पर हाथ रखा और बोलीं, “निधि बेटा, तुमने पिछले एक हफ्ते में हमें इतने राजसी पकवान खिलाए हैं कि अब तो पेट ने भी हाथ जोड़ लिए हैं। तुम्हारे पापाजी और दादीजी का पेट काफी भारी हो रहा है। ऐसा करो, आज दोपहर के खाने में ये होटल वाले पकवान रहने दो। आज बस एकदम सादा भोजन बना लो—पतली अरहर की दाल, जीरा राइस, तरोई की छौंकी हुई सब्जी और गरमा-गरम फुल्के। महाराज जी आज छुट्टी पर हैं, तो तुम्हें ही देखना पड़ेगा।”
“जी मम्मी जी, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए, बारह-साढ़े बारह तक खाना लग जाएगा,” निधि ने अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ तुरंत हामी भर दी।
गायत्री देवी तो निश्चिंत होकर अपने कमरे में चली गईं, लेकिन उनके जाते ही निधि के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई और माथे पर पसीने की नन्हीं बूंदें छलक आईं। रसोई के चारों तरफ नजर दौड़ाते हुए उसे सचमुच दिन में तारे नज़र आने लगे। जिस रसोई में वह पिछले एक हफ्ते से किसी महारानी की तरह हुक्म चला रही थी, वही रसोई आज उसे किसी भूलभुलैया जैसी डरावनी लग रही थी। कारण साफ था—उसके महंगे कुकिंग इंस्टीट्यूट में पास्ता उबालना और केक बेक करना तो सिखाया गया था, लेकिन प्रेशर कुकर में रोजमर्रा की सादी दाल चढ़ाना, आटा गूंथकर गोल फुल्के फुलाना और पानी छोड़ने वाली तरोई की सब्जी बनाना किसी सिलेबस का हिस्सा नहीं था! पिछले आठ दिनों में जब भी रोटियां या चावल बने थे, वह तो रसोई के महाराज जी ने बनाए थे, निधि ने तो केवल स्पेशल डिशेज बनाई थीं।
निधि ने घड़ी देखी, ग्यारह बजकर पंद्रह मिनट हो रहे थे। उसने खुद को हिम्मत बंधाई, “निधि, जब तू इतने कठिन कॉन्टिनेंटल व्यंजन बना सकती है, तो दाल-रोटी क्या चीज है? यह तो बाएं हाथ का खेल है।”
सबसे पहले उसने दाल बनाने का निश्चय किया। डिब्बे से अरहर की दाल निकाली, लेकिन पहला सवाल यही खड़ा हुआ कि छह लोगों के लिए कितनी दाल ली जाए? इंस्टीट्यूट में तो सब कुछ ग्राम और मिलीलीटर में लिखा होता था, यहाँ किससे पूछे? उसने अंदाजे से तीन बड़े कटोरे भरकर दाल कुकर में डाल दी। उसे लगा कहीं कम न पड़ जाए। फिर उसने दाल धोई और उसमें पानी डाल दिया। अब उसे यह नहीं पता था कि दाल और पानी का अनुपात क्या होना चाहिए। उसने कुकर को लगभग ऊपर तक पानी से भर दिया, हल्दी-नमक डाला और ढक्कन लगाकर गैस तेज कर दी।
जब तक दाल पकती, उसने सब्जी काटने की सोची। टोकरी से हरी-हरी तरोई निकाली। निधि ने तरोई को छीला और अपनी आदत के मुताबिक उसे बारीक-बारीक काटने के बाद एक बड़े बर्तन में पानी भरकर धोने लगी, जबकि नियम यह है कि तरोई या भिंडी जैसी सब्जियों को छीलने के बाद साबुत ही धोया जाता है, काटने के बाद नहीं। काटने के बाद धोने से तरोई के अंदर पानी भर गया। तभी अचानक प्रेशर कुकर ने जोरदार सीटी मारी और उसके साथ ही पीले रंग का दाल का पानी फव्वारे की तरह बाहर निकलकर पूरे गैस स्टोव, दीवार की टाइलों और स्लैब पर फैल गया।
निधि की चीख निकलते-निकलते बची। उसने घबराकर गैस बंद की। पूरा किचन दाल की भाप और गंदगी से भर गया था। जब प्रेशर खत्म होने पर उसने कुकर खोला, तो देखा कि दाल बहुत ज्यादा होने के कारण फूल कर ऊपर आ गई थी और नीचे से लग भी गई थी, जबकि ऊपर पानी ही पानी तैर रहा था। उसने उसे ठीक करने के लिए उसमें और गर्म पानी मिलाया और कड़छी से घोंटने लगी। घोंटते-घोंटते वह दाल कम और पीले रंग का गाढ़ा घोल ज्यादा लगने लगी, जिसमें से हल्की सी जलने की महक भी आ रही थी।
उधर दूसरी गैस पर उसने कड़ाही चढ़ाई, तेल में जीरा डाला और पानी से भीगी हुई तरोई उसमें झोंक दी। ऊपर से मसाले डाले और पकाने के लिए दो गिलास पानी और डाल दिया! उसे पनीर की ग्रेवी बनाने की आदत थी, इसलिए उसे लगा कि सब्जी गलाने के लिए पानी डालना जरूरी होता है। जबकि तरोई खुद ही इतना पानी छोड़ती है कि उसमें एक बूंद पानी भी नहीं डाला जाता। दस मिनट बाद जब उसने कड़ाही का ढक्कन हटाया, तो वहां सब्जी का नामोनिशान नहीं था, बस हरे रंग के पानी में कुछ गल चुके टुकड़े तैर रहे थे।
निधि का गला सूखने लगा। एसी वाले कमरे में रहने वाली निधि पसीने से तरबतर हो चुकी थी। अब सबसे बड़ा पहाड़ सामने था—आटा गूंथना और फुल्के बनाना। उसने परात निकाली और आटे के ड्रम से तीन-चार कटोरे आटा निकाल लिया। बीच में जगह बनाकर उसने जग से पानी उड़ेला। पानी एक बार में ही इतना ज्यादा गिर गया कि पूरा आटा दलदल की तरह गीला हो गया। निधि के दोनों हाथ कोहनी तक गीले आटे में सन गए। घबराहट में उसने सूखे आटे के डिब्बे से और आटा निकाला और परात में मिलाया। फिर भी आटा चिपचिपा रहा, तो उसने थोड़ा पानी और डाला, फिर सूखा आटा डाला। इस ‘पानी और आटे’ के खेल में देखते ही देखते पूरी परात ऊपर तक भर गई—इतना आटा गूंथ गया जितने में पूरे मोहल्ले की दावत हो जाए, लेकिन वह आटा अभी भी कहीं से पत्थर जैसा सख्त था तो कहीं से गोंद जैसा गीला।
उसने किसी तरह कांपते हाथों से एक लोई तोड़ी और चकले पर रखकर बेलने की कोशिश की। बेलन रखते ही लोई चकले से चिपक गई। उसने सूखा आटा लगाया और जोर लगाकर बेला, तो रोटी गोल बनने के बजाय भारत के नक्शे जैसी टेढ़ी-मेढ़ी बन गई—कहीं से कागज जैसी पतली, तो किनारों से मोटी। तवे पर डाला तो वह बीच से जल गई और किनारे कच्चे रह गए।
रसोई की हालत किसी युद्ध के मैदान जैसी हो चुकी थी। स्लैब पर सूखा आटा बिखरा था, गैस पर दाल का पीला झाग जमा था, कड़ाही में तरोई का सूप उबल रहा था और निधि के चेहरे, बालों और कपड़ों पर आटे के सफेद धब्बे लगे थे। घड़ी की सुई एक बजा रही थी। अपनी इस बेबसी और नाकामी पर निधि को इतना रोना आया कि उसकी आँखों से टप-टप आँसू बहने लगे। वह एम.टेक की टॉपर, बड़े-बड़े कोडिंग के सवाल चुटकियों में हल करने वाली लड़की, आज मामूली सी दाल-रोटी के आगे बुरी तरह हार गई थी। उसे डर सताने लगा कि जब घर के लोग यह खाना देखेंगे, तो उसका कितना मजाक उड़ाएंगे। सब कहेंगे कि बड़ी आई थी शेफ बनने वाली, इसे तो मामूली रोटी भी बनानी नहीं आती!
तभी बाहर से गायत्री देवी की मीठी आवाज सुनाई दी, “निधि बेटा, पापाजी और आदित्य आ गए हैं डाइनिंग टेबल पर। खाना तैयार हो तो गरम-गरम फुल्के सेकना शुरू करो, मैं परोसने में मदद करती हूँ।”
निधि के हाथ-पैर सुन्न पड़ गए। उसकी आवाज गले में ही अटक गई। उसने रुंधे हुए गले से किसी तरह धीमी आवाज में कहा, “मम्मी जी… आप एक बार अंदर आएंगी प्लीज?”
आवाज में छिपी घबराहट को भांपकर गायत्री देवी तुरंत रसोई के अंदर आईं। रसोई के भीतर का दृश्य देखकर वह एक पल के लिए तो ठिठक कर खड़ी ही रह गईं। उनकी नजर पहले परात में रखे आटे के पहाड़ पर गई, फिर तवे पर पड़ी जली हुई टेढ़ी-मेढ़ी रोटियों पर, फिर कड़ाही में तैरती तरोई और अंत में कोने में खड़ी निधि पर—जो आटे से सने हाथों से अपना चेहरा छिपाकर सिसक-सिसक कर रो रही थी।
निधि ने जैसे ही अपनी सासू माँ को देखा, वह अपने आंसुओं पर काबू नहीं रख सकी और उनसे लिपटकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगी, “मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिए! मैंने सब खराब कर दिया। मुझे कुछ नहीं आता मम्मी जी… मैंने शादी से पहले कुकिंग क्लास में केक, पास्ता और कोफ्ते बनाना तो सीख लिया था ताकि आप सबको खुश कर सकूं, लेकिन मैंने आज तक कभी आटा नहीं गूंथा, कभी सादी दाल नहीं बनाई। मुझे बहुत डर लग रहा है कि बाहर सब क्या सोचेंगे!”
गायत्री देवी ने एक पल के लिए रसोई को देखा और फिर अपनी कांपती हुई बहू को। उनके चेहरे पर गुस्से या ताने की एक भी शिकन नहीं आई, बल्कि उनकी आँखों में ममता का सागर उमड़ पड़ा। उन्होंने अपने आंचल से निधि के आँसू पोंछे, उसके गालों पर लगा सूखा आटा साफ किया और उसे गले से लगाते हुए बोलीं, “अरे पगली! इतनी सी बात पर कोई ऐसे रोता है भला? चुप हो जा मेरी बच्ची, बिल्कुल शांत हो जा।”
निधि ने भीगी पलकों से अपनी सास की ओर देखा, उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि सासू माँ डांटने के बजाय उसे प्यार कर रही हैं।
गायत्री देवी ने मुस्कुराते हुए निधि के हाथ धुलवाए और उसे रसोई के स्टूल पर बिठाकर पानी पिलाया। फिर वह बड़े ही शांत स्वर में बोलीं, “बेटा, तुमने हम सबका दिल जीतने के लिए अपनी पढ़ाई और नौकरी के बीच समय निकालकर कुकिंग क्लास जॉइन की, हमारे लिए इतने दिनों तक पसीना बहाकर तरह-तरह के पकवान बनाए—क्या तुम्हारी यह भावना और मेहनत इस जली हुई रोटी से छोटी है? बिल्कुल नहीं! निधि, बड़े-बड़े पकवान बनाना एक हुनर हो सकता है जो किताबों या क्लासों में सिखाया जाता है, लेकिन रोजमर्रा की सादी रसोई चलाना एक अनुभव है, जो किसी इंस्टीट्यूट में नहीं, बल्कि माँ और सास की उंगली पकड़कर ही सीखा जाता है।”
उन्होंने कड़ाही की तरफ इशारा करते हुए हल्के से हँसकर कहा, “यह जो आटे और पानी का अंदाजा है न, यह किसी तराजू से नहीं आता, यह तो वक्त के साथ हथेलियों को खुद महसूस होने लगता है। जब मैं बाईस साल की उम्र में इस घर में ब्याह कर आई थी, तो मैंने पहली बार चावल बनाते समय उसमें नमक की जगह चीनी डाल दी थी और खीर में हल्दी! तब मेरी सासू माँ, यानी तुम्हारी दादी सास ने मुझे डांटा नहीं था, बल्कि हँसते हुए कहा था कि रसोई में जब तक बर्तन जलेंगे नहीं, तब तक हाथ सधेंगे कैसे? वही बात आज मैं तुमसे कह रही हूँ।”
निधि का डर अब धीरे-धीरे सम्मान और कृतज्ञता में बदल रहा था।
गायत्री देवी ने आगे कहा, “परिवार का मतलब यह नहीं होता बेटा कि हम केवल तुम्हारी अच्छाइयों पर ताली बजाएं और तुम्हारी किसी कमी पर तुम्हारा मजाक उड़ाएं। परिवार का मतलब होता है एक-दूसरे की कमजोरी को थाम लेना। तुम इतनी पढ़ी-लिखी हो, कल को ऑफिस भी संभालोगी, तो क्या रसोई का यह छोटा सा गणित नहीं सीख पाओगी? मैं हूँ न तुम्हारी माँ यहाँ, कल से हम दोनों साथ में रसोई संभालेंगे। तुम मुझे अपने नए जमाने के व्यंजन सिखाना और मैं तुम्हें अपनी पुरानी रसोई के नुस्खे सिखाऊंगी।”
“लेकिन मम्मी जी, अभी बाहर पापाजी और आदित्य खाने का इंतजार कर रहे हैं, उन्हें क्या परोसेंगे?” निधि ने चिंता से पूछा।
गायत्री देवी की आँखों में एक शरारती चमक आ गई। उन्होंने तुरंत फुर्ती दिखाई। कड़ाही की तरोई और कुकर की दाल को एक बड़े बर्तन में एक साथ मिलाया, उसमें देसी घी, हींग, जीरा, लहसुन और साबुत लाल मिर्च का एक जबरदस्त तड़का लगाया, ऊपर से थोड़ा नींबू निचोड़ा और हरा धनिया डाल दिया। देखते ही देखते वह बिगड़ी हुई दाल और सब्जी एक स्वादिष्ट और पौष्टिक ‘दाल-तरोई के शोरबे’ में बदल गई। फिर उन्होंने परात के गीले आटे में थोड़ा सा सूजी, दही, बारीक कटा प्याज, हरी मिर्च और अजवाइन मिलाकर तवे पर गरमा-गरम चीले (उत्तपम) सेक दिए। मात्र पंद्रह मिनट में गायत्री देवी ने अपने अनुभव से उस बिगड़े हुए काम को एक नए स्वादिष्ट भोजन में बदल दिया।
जब डाइनिंग टेबल पर गरमा-गरम दाल-सब्जी का तड़के वाला सूप और मुलायम आटे के चीले परोसे गए, तो ससुरजी ने चखते ही कहा, “अरे वाह! आज तो वाकई पेट को आराम मिल गया। निधि बेटा, यह दाल और हरी सब्जी का सूप तो बहुत ही लाजवाब और पाचक बना है!”
आदित्य ने भी चीले का टुकड़ा तोड़ते हुए कहा, “सच में निधि, तुम्हारे पास तो हर दिन कोई न कोई नया सरप्राइज होता है।”
डाइनिंग टेबल के पास खड़ी सास और बहू ने एक-दूसरे की तरफ देखा और दोनों अपनी हँसी नहीं रोक पाईं। निधि ने आगे बढ़कर गायत्री देवी के कंधे पर अपना सिर टिका दिया और बोली, “पापाजी, आज का यह कमाल मेरा नहीं, मेरी सबसे अच्छी टीचर और मेरी मम्मी जी का है। आज से मैंने इनकी क्लास में एडमिशन ले लिया है।”
घर के सभी लोग मुस्कुरा उठे। उस दिन निधि को समझ आया कि डिग्रियां और सर्टिफिकेट हमें करियर में ऊंचाइयों पर तो ले जा सकते हैं, लेकिन जीवन की असली पाठशाला तो परिवार का साथ, बड़ों का अनुभव और अपनों का निस्वार्थ प्रेम ही होता है।
साल भर के भीतर ही निधि न केवल अपनी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर बन गई, बल्कि गायत्री देवी के सानिध्य में रहकर वह रसोई के हर छोटे-बड़े काम में भी इतनी निपुण हो गई कि उसके हाथ के बने फुल्के रुई जैसे नरम उतरने लगे। सास के धैर्य और बहू के सीखने की ललक ने उनके रिश्ते को माँ-बेटी के रिश्ते से भी कहीं अधिक गहरा और पवित्र बना दिया था।
क्या आपके साथ भी नई-नई गृहस्थी या रसोई संभालते समय कभी ऐसा कोई मजेदार या यादगार वाकया हुआ है जब काम बिगड़ते-बिगड़ते बचा हो? और आज के समय में सास-बहू के इस खूबसूरत रिश्ते के बारे में आपके क्या विचार हैं? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं!
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