रिश्तों की दहलीज पर पिसता मर्द

 सार्थक ने अपनी बाइक को घर के आंगन में खड़ा किया और एक गहरी सांस भरी। हाथ में लैपटॉप का बैग और दूसरे हाथ में सब्ज़ियों का थैला लिए जब उसने मुख्य दरवाजे की घंटी बजाई, तो उसके कदमों में वह चंचलता नहीं थी जो किसी इंसान के अपने घर लौटने पर होती है। बल्कि उसके भीतर एक अनजाना सा डर और भारीपन था—यह सोचकर कि आज दरवाजे के उस पार किसका चेहरा फूला हुआ मिलेगा।

दरवाजा उसकी पत्नी निधि ने खोला। निधि के चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं थी। उसने सार्थक के हाथ से सब्ज़ियों का थैला लगभग छीनते हुए लिया और दबी आवाज़ में ताना मारा, “आ गए आप? मैं कब से सिरदर्द से परेशान होकर बैठी हूँ कि आप आएंगे तो थोड़ी देर बात करेंगे, पर अब देखना… जैसे ही आप हॉल में कदम रखेंगे, आपकी मम्मी जी अपने घुटनों के दर्द और दिनभर की शिकायतों का पिटारा खोलकर बैठ जाएंगी। जाइए, पहले अपनी मातृभक्ति पूरी कर लीजिए।”

सार्थक कुछ बोल पाता, उससे पहले ही निधि रसोई की तरफ बढ़ गई। सार्थक ने चुपचाप जूते उतारे और जैसे ही हॉल में पहुंचा, तख्त पर बैठी उसकी माँ गायत्री देवी ने चश्मा ठीक करते हुए आवाज़ लगाई, “आ गया सार्थक? बेटा, ज़रा यहाँ मेरे पास तो बैठ। सुबह से कमर में ऐसी टीस उठ रही है कि क्या बताऊं। ऊपर से इस घर में तो किसी को मेरी परवाह है नहीं, बस अपने कमरे में बंद रहो और फोन चलाते रहो।”

सार्थक माँ के पास बैठ गया और उनके पैर दबाने लगा। अभी उसे बैठे हुए दो मिनट ही हुए थे कि रसोई से बर्तनों के ज़ोर-ज़ोर से खड़कने की आवाज़ आने लगी। यह निधि का अपना तरीका था अपनी नाराज़गी जाहिर करने का। तभी निधि ने कमरे से आवाज़ दी, “सार्थक! ज़रा यहाँ आइए, तौलिया और कपड़े निकाल दिए हैं, नहा लीजिए आकर। और हाँ, मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात भी करनी है।”

सार्थक ने जैसे ही उठने की कोशिश की, गायत्री देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया और तल्ख़ लहजे में बोलीं, “अरे बैठ ना दो घड़ी! अभी तो आया है दफ्तर से। क्या बीवी की एक आवाज़ पर दुम हिलाते हुए दौड़ पड़ता है? माँ से दो बात कर लेगा तो क्या उसकी शान घट जाएगी? आजकल के लड़कों को तो बस जोरू का गुलाम बनने में ही सुख मिलता है।”

सार्थक के कदम वहीं ठिठक गए। वह बीच हॉल में खड़ा था—एक तरफ माँ की ममता का उलाहना था, और दूसरी तरफ पत्नी के अधिकार की पुकार। उसे महसूस हुआ कि वह कोई इंसान नहीं, बल्कि तवे पर सिंकता हुआ वह ‘सैंडविच’ है, जिसे दोनों तरफ से बस दबाया जा रहा है और सेंका जा रहा है। न वह माँ को यह समझा पा रहा था कि पत्नी भी अपना सब कुछ छोड़कर उसी के भरोसे इस घर में आई है, और न वह पत्नी को यह एहसास दिला पा रहा था कि जिस माँ ने पिता के जाने के बाद अकेले संघर्ष करके उसे पाला है, उन्हें बुढ़ापे में अकेला कैसे छोड़ दे।

उस रात खाने की मेज पर सन्नाटा पसरा रहा। गायत्री देवी ने दाल चखते ही मुँह बनाया, “नमक फिर तेज़ है। पर मैं कुछ बोलूंगी तो अभी महाभारत शुरू हो जाएगी, इसलिए चुपचाप पानी डालकर खा लेती हूँ।”

निधि ने भी तुरंत पलटवार किया, “मम्मी जी, सुबह जब मैंने पूछा था कि खाना कैसा बना है, तब तो आपने कुछ नहीं कहा। सार्थक के सामने ही आपको मेरी सारी कमियाँ क्यों नज़र आती हैं?”

“हाँ-हाँ, मैं तो झूठी हूँ ना! सार्थक, तू ही देख ले, तेरे सामने ही कैसे ज़ुबान लड़ाती है ये लड़की।” माँ ने अपनी थाली सरका दी।

उधर निधि की आँखों में आंसू आ गए और वह भी अपनी रोटी अधूरी छोड़कर कमरे में चली गई। मेज पर अकेला बैठा रह गया सार्थक। उसने अपनी थाली देखी—दाल में नमक बिल्कुल ठीक था, और रोटियाँ भी नरम थीं, लेकिन रिश्तों की कड़वाहट ने निवाले को ज़हर बना दिया था। पूरे दिन दफ्तर में बॉस की डांट और काम के बोझ से जूझने वाला सार्थक, अपने ही घर में दो औरतों के अहंकार के बीच पिसकर रह गया था। उसने भी बिना खाए हाथ धो लिए।

जब वह कमरे में गया, तो निधि बिस्तर के एक कोने में मुँह फुलाए बैठी थी। सार्थक के बैठते ही वह फूट पड़ी, “मैं इस घर में घुट-घुट कर जी रही हूँ सार्थक। मैं सुबह से शाम तक काम करती हूँ, फिर भी आपकी माँ को मुझमें सिर्फ बुराइयाँ ही दिखती हैं। और आप? आप तो बस मूकदर्शक बने रहते हैं। कभी तो अपनी पत्नी के लिए स्टैंड लिया कीजिए!”

सार्थक ने बिना कुछ कहे करवट बदल ली। उसके सीने में एक अजीब सी घबराहट हो रही थी। उसे लग रहा था कि अगर वह माँ का पक्ष लेता है तो वह एक बुरा पति कहलाता है, और अगर पत्नी की बात सुनता है तो एक नालायक बेटा। इन दोनों स्त्रियों को यह क्यों नहीं समझ आता कि वे दोनों ही उसकी ज़िंदगी के दो सबसे अहम हिस्से हैं? क्या थोड़ा सा झुक जाना, थोड़ा सा समझौता कर लेना इतना मुश्किल है? वे दोनों तो अपने-अपने गुस्से को ज़ाहिर करके सो जाती थीं, लेकिन सार्थक की रातें छत के पंखे को घूरते हुए और दोनों के बीच संतुलन बनाने की नाकाम कोशिशों में बीतती थीं।

अगले कई दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा। सार्थक अब घर देर से आने लगा था। दफ्तर की छुट्टी होने के बाद भी वह पास के किसी पार्क में जाकर अकेला बैठा रहता। उसका वज़न गिरने लगा था, आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे और चेहरे की हँसी तो जैसे गायब ही हो गई थी। लेकिन न तो गायत्री देवी ने बेटे के इस बदलते रूप पर ध्यान दिया, और न ही निधि ने। दोनों अपनी-अपनी शिकायतों की गठरी सार्थक के सिर पर लादने में इतनी मशगूल थीं कि उन्हें यह दिखा ही नहीं कि जिस कंधे पर वे बोझ डाल रही हैं, वह कंधा अब टूटने की कगार पर है।

एक शनिवार की शाम को घर में फिर किसी छोटी सी बात पर बहस छिड़ गई। मुद्दा सिर्फ इतना था कि बालकनी के गमलों में पानी किसने नहीं डाला। बात गमलों से शुरू होकर मायके के संस्कारों और सास की तानाशाही तक पहुँच गई। सार्थक उस वक्त सोफे पर बैठा अपनी कोई फाइल देख रहा था। दोनों की तेज़ होती आवाज़ें उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं।

“सार्थक, आज तुम फैसला कर ही दो कि इस घर में मेरी चलेगी या तुम्हारी माँ की!” निधि ने चिल्लाकर कहा।

“हाँ सार्थक, आज बता ही दे कि तुझे अपनी वो माँ चाहिए जिसने तुझे जन्म दिया, या कल की आई ये लड़की!” गायत्री देवी ने भी अपनी आवाज़ बुलंद की।

सार्थक ने अपनी फाइल बंद की। वह कुछ बोलने के लिए खड़ा हुआ, लेकिन अचानक उसके सिर में एक तेज़ चक्कर आया। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया और वह अपने सीने को पकड़कर वहीं सोफे के पास ज़मीन पर गिर पड़ा।

“सार्थक!” निधि की चीख निकल गई।

“अरे मेरे लाल को क्या हुआ!” गायत्री देवी अपने घुटनों का दर्द भूलकर ज़मीन पर बेटे के पास दौड़ पड़ीं।

पड़ोसियों की मदद से सार्थक को तुरंत नज़दीकी अस्पताल ले जाया गया। इमरजेंसी वार्ड के बाहर का दृश्य किसी भी पत्थर दिल को पिघला देने वाला था। जो सास-बहू आधे घंटे पहले एक-दूसरे की शक्ल तक देखना पसंद नहीं कर रही थीं, वे दोनों इस वक्त अस्पताल की बेंच पर एक-दूसरे का हाथ थामे बेतहाशा रो रही थीं। गायत्री देवी अपने पल्लू से निधि के आंसू पोंछ रही थीं और निधि बार-बार अपनी सास को पानी पिलाकर ढांढस बंधा रही थी। सार्थक पर आई एक आंच ने उन दोनों के अहंकार की बर्फ को पल भर में पिघला दिया था।

करीब एक घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए। निधि और गायत्री देवी तुरंत उनकी तरफ लपकीं।

डॉक्टर ने अपने चश्मे के भीतर से उन दोनों को देखा और गंभीर स्वर में कहा, “देखिए, घबराने की बात नहीं है, यह हार्ट अटैक नहीं था। लेकिन इसे एक चेतावनी ज़रूर समझिए। सार्थक को ‘सीवियर पैनिक अटैक’ आया है और उनका ब्लड प्रेशर खतरनाक स्तर तक बढ़ा हुआ था। ऐसा तब होता है जब कोई इंसान लंबे समय से बहुत गहरे मानसिक तनाव यानी डिप्रेशन में जी रहा हो और अपनी भावनाएं किसी से कह न पा रहा हो। वे अंदर से बुरी तरह थके हुए हैं। उन्हें दवाइयों से ज़्यादा घर में शांति और सुकून की ज़रूरत है।”

डॉक्टर के शब्द हथौड़े की तरह गायत्री देवी और निधि के दिल पर लगे। दोनों की नज़रें झुकीं। वे समझ चुकी थीं कि सार्थक की इस हालत का ज़िम्मेदार कोई बाहरी नहीं, बल्कि वे दोनों खुद हैं।

थोड़ी देर बाद जब उन्हें सार्थक से मिलने की इजाज़त मिली, तो दोनों चुपचाप वार्ड में गईं। सार्थक आंखें बंद किए लेटा था, उसके हाथ में ड्रिप लगी हुई थी। निधि के हाथ में सार्थक की जैकेट थी। जब उसने जैकेट को कुर्सी पर टांगना चाहा, तो उसकी जेब से एक मुड़ी-तुड़ी डायरी नीचे गिर गई। निधि ने डायरी उठाई। उसका एक पन्ना खुला हुआ था, जिस पर सार्थक ने कुछ ही दिन पहले अपने दिल का दर्द लिखा था।

निधि ने कांपते हाथों से वह पन्ना पढ़ा और फिर गायत्री देवी को भी दिखाया। उस पन्ने पर लिखा था— “मैं थक गया हूँ रोज़ के इस इम्तिहान से। माँ को लगता है मैं बदल गया हूँ, और निधि को लगता है मैं उसका साथ नहीं देता। कोई यह क्यों नहीं पूछता कि सार्थक क्या चाहता है? मैं तो बस इतना चाहता हूँ कि जब शाम को घर लौटूं, तो दरवाजे पर मुझे दो मुस्कुराते हुए चेहरे मिलें। तुम दोनों आपस में समझौता कर नहीं पाती हो, ज़रा सा झुकना अपना अपमान बताती हो, और इस खींचतान में अपने ही बेटे और पति का जीना दुश्वार बनाती हो। मैं एक इंसान हूँ, कोई बंटवारे की ज़मीन नहीं जिस पर तुम दोनों अपना-अपना हक जताने के लिए रोज़ तलवारें खींचती हो…”

पन्ना पढ़ते-पढ़ते गायत्री देवी की आंखों से आंसू टपककर उस कागज़ पर गिरने लगे। उन्होंने सार्थक के माथे पर हाथ फेरा, जिससे सार्थक की आंखें खुल गईं। उसने देखा कि एक तरफ उसकी माँ खड़ी थीं और दूसरी तरफ उसकी पत्नी, और दोनों की आँखों में गहरा पश्चाताप था।

गायत्री देवी ने सार्थक का हाथ अपने हाथों में लिया और रोते हुए बोलीं, “मुझे माफ़ कर दे बेटा। अपनी ममता के अहंकार में मैं इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे तेरा दर्द दिखा ही नहीं। मैं भूल गई थी कि तेरी खुशी इस घर की शांति में है, मेरे अधिकार जताने में नहीं।” फिर उन्होंने निधि की तरफ देखा और उसके सिर पर हाथ रखकर बोलीं, “बहू, आज से मैं वादा करती हूँ कि मैं तुझमें कमियाँ नहीं ढूंढूंगी, बल्कि तुझे अपनी बेटी की तरह समझूंगी।”

निधि भी खुद को रोक नहीं पाई और अपनी सास के गले लगकर रो पड़ी, “नहीं मम्मी जी, गलती मेरी भी थी। मैंने भी कभी आपके अकेलेपन और आपकी भावनाओं को समझने की कोशिश नहीं की। सार्थक को पाने की ज़िद में मैं इन्हें ही खोने जा रही थी। मुझे माफ़ कर दीजिए सार्थक।”

सार्थक की आँखों के कोरों से दो बूंद आंसू बह निकले, लेकिन ये आंसू दर्द के नहीं, बल्कि उस सुकून के थे जिसकी तलाश उसे सालों से थी।

दो दिन बाद जब सार्थक अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर लौटा, तो घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। वह शाम को जब हॉल में बैठा, तो निधि और गायत्री देवी दोनों एक साथ रसोई से बाहर आईं। निधि के हाथ में अदरक वाली चाय की ट्रे थी और गायत्री देवी के हाथ में गरमा-गरम पकौड़ों की प्लेट।

गायत्री देवी ने हँसते हुए कहा, “ले बेटा, आज चाय निधि ने बनाई है और पकौड़े मैंने तले हैं। अब बता, किसके हाथ में ज़्यादा स्वाद है?”

सार्थक ने दोनों की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोला, “जब आप दोनों साथ होती हैं, तो ज़िंदगी के हर पल में स्वाद आ जाता है।”

उस दिन के बाद से सार्थक का घर सचमुच एक ‘घर’ बन गया। छोटी-मोटी नोकझोंक अब भी होती थी, पर अब उसमें अहंकार नहीं, बल्कि एक-दूसरे को मनाने का प्यार होता था। जब सास और बहू ने थोड़ा-थोड़ा झुकना सीख लिया, तो सार्थक अब ‘सैंडविच’ नहीं, बल्कि उस घर की सबसे मज़बूत और खुशहाल कड़ी बन गया था।

दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि घर की दो सबसे अहम स्त्रियों (सास और बहू) की आपसी खींचतान में अक्सर एक मर्द अपनी भावनाएं मार कर जीने को मजबूर हो जाता है? सार्थक के दर्द और इस कहानी के अंत के बारे में आपकी क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार ज़रूर साझा करें, आपके एक कमेंट से हमें और बेहतर लिखने की प्रेरणा मिलती है!

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