अनकहे फासले  

अवनि के दिल का बोझ जैसे अचानक आधा हो गया। उसने उसी दिन ऑफिस में एक लंबी छुट्टी की अर्जी डाली। घर लौटकर उसने किसी हिल स्टेशन के एक एकांत कॉटेज की बुकिंग की। शाम को जब कुणाल कमरे में आया, तो अवनि ने कोई बहस नहीं की, न ही कोई औपचारिकता दिखाई। वह चुपचाप उठी, कुणाल के दोनों हाथ अपने हाथों में थामे और उसकी आंखों में देखते हुए धीरे से बोली, “कुणाल, हम परसों बाहर जा रहे हैं। सिर्फ तुम और मैं। कोई बहाना नहीं चलेगा। मुझे अपने पति के साथ कुछ दिन बिताने हैं।”

कांच के बड़े से केबिन में बैठी अवनि अपनी उंगलियों को आपस में कसकर दबा रही थी। बाहर बारिश की हल्की बूंदें खिड़की के शीशे पर फिसल रही थीं और अंदर दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक मानो उसके दिल की धड़कनों से होड़ ले रही थी। हाथ में पकड़े टिशू पेपर के टुकड़े से वह बार-बार अपनी हथेलियों का पसीना पोंछती, जबकि वातानुकूलित कमरे की ठंडक उसके बदन को कंपा देने के लिए काफी थी। यह काउंसलिंग सेंटर शहर के सबसे शांत कोने में था, फिर भी अवनि के मन के भीतर एक बवंडर उठ रहा था। आज उसकी और कुणाल की इस क्लीनिक में तीसरी मुलाकात थी। पहली दो मुलाकातों में डॉक्टर के सवालों ने अवनि के भीतर उन परतों को कुरेद दिया था, जिन्हें वह समाज और अपनी व्यस्त दिनचर्या के पीछे छिपाए बैठी थी।

अवनि और कुणाल के वैवाहिक जीवन की शुरुआत लगभग ढाई साल पहले हुई थी। यह एक पूर्णतः पारंपरिक, पारिवारिक विवाह था। अवनि जब पहली बार कुणाल के घर वालों के सामने आई थी, तो अपनी लंबी कद-काठी, खिलते हुए गोरे रंग और स्वाभाविक रूप से खिली मुस्कान से उसने सबका दिल जीत लिया था। वह एक निजी बैंक में सीनियर रिलेशनशिप मैनेजर थी, बात करने में निपुण, व्यवहार में सहज और हर माहौल को जिंदादिल बना देने वाली। दूसरी ओर, कुणाल स्वभाव से बेहद गंभीर, मितभाषी और एकांतप्रिय था। प्रतिष्ठित सॉफ्टवेयर कंपनी में आर्किटेक्ट के पद पर कार्यरत कुणाल का जीवन कोडिंग, किताबों और अपनी बंद दुनिया तक ही सीमित था। कद में वह सामान्य था, रंग गहरा सांवला और चेहरे पर हमेशा एक गहरी सोच की लकीरें खिंची रहती थीं। कुणाल के माता-पिता का मानना था कि घर में अगर अवनि जैसी ऊर्जावान और बातूनी बहू आएगी, तो कुणाल के जीवन का नीरसपन अपने आप मिट जाएगा। दो विपरीत स्वभाव मिलकर जीवन की गाड़ी को संतुलित कर लेंगे, इसी उम्मीद से यह रिश्ता तय हुआ था।

शुरुआती कुछ महीने सामान्य बीते। दोनों अपनी-अपनी नौकरियों में व्यस्त थे और शाम को घर लौटकर एक सामान्य शिष्टाचार के साथ दिनचर्या पूरी करते। लेकिन धीरे-धीरे रिश्तों की दरार तब चौड़ी होने लगी, जब दोनों का सामाजिक दायरा आमने-सामने आया। अवनि जब भी किसी कॉरपोरेट पार्टी, पारिवारिक समारोह या रिश्तेदारों की शादी में कुणाल के साथ जाती, तो वहां लोगों की नजरें एक अजीब से कौतूहल से उन दोनों को घूरने लगतीं। अवनि का आधुनिक परिधान, आत्मविश्वास और रूप-रंग जहां सबका ध्यान खींचता, वहीं कुणाल का सांवलापन, साधारण पहनावा और किसी से न घुलने-मिलने की आदत लोगों की दबी जुबानों को खोल देती।

शुरुआत में कुणाल ने इन बातों को नजरअंदाज करने की कोशिश की, मगर समाज की फुसफुसाहटें अक्सर बंद दरवाजों को भी भेद जाती हैं। एक पारिवारिक विवाह समारोह में जब कुणाल हॉल के एक कोने में खड़ा ड्रिंक ले रहा था, तभी उसने कुछ दूर खड़े अपने ही दूर के रिश्तेदारों को अवनि की ओर इशारा करते हुए कहते सुना, “अरे भाई, किस्मत हो तो कुणाल जैसी! खुद की शक्ल-सूरत देखो और बीवी देखो, जैसे अमावस की रात में चौदहवीं का चांद निकल आया हो। अवनि जैसी लड़की ने इसमें आखिर क्या देखकर हां कर दी?”

वे शब्द कुणाल के सीने में किसी जलते हुए तीर की तरह चुभ गए। उस रात के बाद कुणाल के भीतर का आत्मविश्वास धीरे-धीरे रेत की तरह फिसलने लगा। वह जब भी आईने के सामने खड़ा होता, उसे अपने ही अक्स से एक अनकही घिन महसूस होने लगती। उसे लगता कि अवनि जब भी मुस्कुराकर उससे बात करती है, तो शायद वह उस पर दया कर रही है। जब अवनि ऑफिस के अपने खूबसूरत और स्मार्ट सहयोगियों का जिक्र करती, तो कुणाल भीतर ही भीतर सुलग उठता।

हीनभावना ने धीरे-धीरे मानसिक अवसाद का रूप ले लिया। कुणाल ने शादियों, पार्टियों और बाहर के कार्यक्रमों में जाना पूरी तरह बंद कर दिया। अवनि अगर कभी कहती कि उसके किसी कलीग की सालगिरह है या सप्ताहांत पर किसी रेस्तरां में खाना खाने चलें, तो कुणाल सीधे मना कर देता, “तुम्हें मेरे साथ चलने में शर्म आनी चाहिए, जाओ अपने उन हैंडसम दोस्तों के साथ घूम आओ।” अवनि को पहले लगा कि शायद ऑफिस के प्रोजेक्ट्स का तनाव है। उसने कई बार बात को हंसी में उड़ाने की कोशिश की, कभी प्यार से समझाने का यत्न किया कि उसे किसी की परवाह नहीं है, पर कुणाल के भीतर की कड़वाहट कम होने के बजाय रोज गहराती गई।

एक ही फ्लैट में, एक ही छत के नीचे रहते हुए दोनों के बीच मीलों की दूरी बन गई। अवनि सुबह निकल जाती, देर शाम लौटती। घर में बना-बनाया खाना नौकर रख जाता। दोनों एक ही डाइनिंग टेबल पर बैठते, मगर दोनों की आंखें अपनी-अपनी मोबाइल स्क्रीन पर गड़ी रहतीं। बातें सिर्फ “पानी देना”, “बिल भर दिया क्या” जैसी औपचारिकताओं तक सिमट गईं। वैवाहिक जीवन की अंतरंगता और भावनात्मक स्पर्श तो जैसे कहीं खो ही चुका था। जब कभी अवनि हाथ बढ़ाकर कुणाल का कंधा छूने की कोशिश करती, कुणाल झटक कर दूसरी तरफ करवट ले लेता। उसे लगता कि अवनि केवल औपचारिकता निभा रही है।

बात तब हाथ से निकल गई जब कुणाल के स्वभाव का यह तनाव उसके काम पर हावी होने लगा। चिड़चिड़ापन इतना बढ़ा कि घर के पुराने नौकर को छोटी सी बात पर उसने नौकरी से निकाल दिया। एक रात जब कुणाल लैपटॉप पर काम कर रहा था और अवनि ने सिर्फ इतना पूछा कि क्या वह चाय पिएगा, कुणाल ने जोर से कॉफी का मग फर्श पर पटक दिया। कांच के टुकड़े बिखर गए और कुणाल चिल्ला पड़ा, “मुझे अकेला छोड़ दो! मुझे किसी की हमदर्दी की जरूरत नहीं है।”

उस टूटे हुए मग के साथ अवनि का धैर्य भी टूट गया। वह पूरी रात बालकनी में बैठकर रोती रही। अगले दिन उसने अपने एक सीनियर से बात की और बिना किसी को बताए कुणाल को लेकर न्यूरोलॉजिस्ट और फिजिशियन के पास गई। सारे टेस्ट सामान्य आए। तब वरिष्ठ डॉक्टर ने अवनि को अकेले में बैठाकर समझाया कि यह समस्या शरीर की नहीं, मस्तिष्क और आहत मन की है। यह गंभीर डिप्रेशन और तीव्र हीनभावना का मामला है, जिसके लिए तुरंत किसी कुशल मनोवैज्ञानिक की मदद चाहिए।

काउंसलर डॉ. मल्होत्रा ने सबसे पहले कुणाल से तीन बार अकेले में बात की थी। कुणाल के मन के भीतर दबे उस गहरे जख्म को उन्होंने बाहर निकाला, जो समाज के तानों, रूप-रंग के अंतर और अवनि की बेपरवाही से बना था। कुणाल ने रोते हुए डॉक्टर से कहा था, “वह बहुत खूबसूरत है, बहुत काबिल है। मैं उसके लायक नहीं हूं। वह सिर्फ एक समझौता निभा रही है।”

और फिर पिछले हफ्ते जब अवनि को अकेले बुलाया गया था, तो डॉ. मल्होत्रा ने उससे सीधा सवाल किया था, “अवनि जी, आप कुणाल से शादी के इस रिश्ते को ढो रही हैं या सचमुच उससे प्रेम करती हैं?” अवनि अवाक रह गई थी। उसने कहा था, “डॉक्टर साहब, वह मेरे पति हैं। हम पढ़े-लिखे लोग हैं। भला मैं उनसे प्यार क्यों नहीं करूंगी?” तब डॉक्टर ने शांत स्वर में कहा था, “प्यार सिर्फ साथ रहने या बुनियादी जरूरतें पूरी कर देने का नाम नहीं है। क्या आपने कभी कुणाल को यह महसूस कराया कि वह आपके लिए दुनिया का सबसे खास इंसान है? क्या कभी आपने अपने व्यस्त जीवन में से वह वक्त निकाला, जहां सिर्फ आप दोनों हों, बिना किसी फोन, बिना किसी ऑफिस की बातचीत के? क्या आप दोनों कभी दिल से एक-दूसरे के करीब आए हैं?”

उन सवालों ने अवनि के पूरे वजूद को झकझोर कर रख दिया था। उसे एहसास हुआ कि उसने हमेशा कुणाल के चुप रहने को उसका स्वभाव मान लिया, कभी उसकी उस चुप्पी के पीछे छिपी पीड़ा को सुनने की कोशिश ही नहीं की। जब लोग ताने मारते थे, तब अवनि केवल हंसकर टाल देती थी, जबकि उस वक्त कुणाल को अपनी बीवी के खुले समर्थन और इस भरोसे की जरूरत थी कि वह उसके लिए क्या मायने रखता है।

दरवाजा खुलने की हल्की सी आवाज से अवनि की तंद्रा टूटी। डॉ. मल्होत्रा मुस्कराते हुए अंदर आए और अपनी कुर्सी पर बैठ गए। उनके चेहरे पर एक धीर-गंभीर संतुष्टि थी।

“कैसी हैं अवनि जी?” डॉक्टर ने अपनी डायरी खोलते हुए पूछा।

“मैं ठीक हूं डॉक्टर साहब… कुणाल कैसे हैं? आज उनकी रिपोर्ट और आपसे बातचीत के बाद क्या स्थिति है?” अवनि ने बेचैनी से पूछा।

डॉक्टर ने कलम मेज पर रखी और अवनि की आंखों में सीधे देखते हुए बोले, “अवनि जी, सबसे पहले यह समझ लीजिए कि कुणाल को किसी भारी दवा की जरूरत नहीं है। डिप्रेशन की शुरुआती स्टेज को दवाइयों से ज्यादा अपनों के स्पर्श, समय और स्वीकार्यता से ठीक किया जा सकता है। कुणाल का रोग कोई शारीरिक कमजोरी नहीं है, बल्कि यह वह खालीपन है जो आपके और उसके बीच पिछले दो सालों में पैदा हुआ है।”

अवनि की आंखें डबडबा आईं। उसने नीची आवाज में पूछा, “मुझे क्या करना होगा डॉक्टर साहब? मैं अपने घर को इस तरह बिखरते नहीं देख सकती।”

डॉ. मल्होत्रा ने आगे झुकते हुए कहा, “आपको कुणाल को वह अहसास लौटाना होगा जो उससे छिन गया है—आत्मसम्मान और आपका सच्चा प्यार। मैंने कुणाल से बात की है। वह अंदर से बहुत अकेला है और सच कहूं तो वह भी इस घुटन से बाहर निकलना चाहता है। मेरी आपको सलाह है कि आप तुरंत अपने ऑफिस से कम से कम दस-बारह दिनों की छुट्टी लीजिए। किसी शांत, प्राकृतिक जगह पर जाइए, जहां न कोई ऑफिस का काम हो, न रोजमर्रा की भागदौड़, और न ही समाज का कोई दखल। वहां कुणाल को सुनिए। उसे बताइए कि आपने उसे उसके दिल और उसकी इंसानियत की वजह से अपनाया है, न कि किसी बाहरी दिखावे के लिए। जब आप उसके साथ खड़ी होंगी, तो दुनिया का कोई भी ताना उसका हौसला नहीं तोड़ सकेगा।”

डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए अपनी बात पूरी की, “जब आप दोनों वहां से लौटें, तो मैं कुणाल को एक मरीज के रूप में नहीं, बल्कि अपने चेहरे पर खिलखिलाती मुस्कान लिए एक मजबूत पति के रूप में देखना चाहता हूं। जिस दिन आप दोनों हाथ पकड़कर यहां आएंगे, वही मेरी सबसे बड़ी फीस होगी।”

अवनि के दिल का बोझ जैसे अचानक आधा हो गया। उसने उसी दिन ऑफिस में एक लंबी छुट्टी की अर्जी डाली। घर लौटकर उसने किसी हिल स्टेशन के एक एकांत कॉटेज की बुकिंग की। शाम को जब कुणाल कमरे में आया, तो अवनि ने कोई बहस नहीं की, न ही कोई औपचारिकता दिखाई। वह चुपचाप उठी, कुणाल के दोनों हाथ अपने हाथों में थामे और उसकी आंखों में देखते हुए धीरे से बोली, “कुणाल, हम परसों बाहर जा रहे हैं। सिर्फ तुम और मैं। कोई बहाना नहीं चलेगा। मुझे अपने पति के साथ कुछ दिन बिताने हैं।”

कुणाल ने चौंककर अवनि को देखा। अवनि की आंखों में किसी तरह की औपचारिकता या दया का भाव नहीं था, वहां केवल एक सच्चा अपनापन और अधिकार था। कुणाल कुछ कहना चाहता था, लेकिन अवनि ने उसके सीने पर अपना सिर रख दिया। ढाई साल में पहली बार दोनों के बीच का सन्नाटा टूटा था, और उस सन्नाटे को कुणाल की आंखों से गिरे दो गर्म आंसुओं ने धो दिया।

सफर के दौरान वादियों की ठंडी हवाओं और एकांत ने दोनों के दिलों की दूरियों को पिघलाना शुरू किया। कॉटेज की बालकनी में बैठकर, अवनि ने पहली बार कुणाल से खुलकर बातें कीं। उसने बताया कि कैसे कुणाल की ईमानदारी, उसका शांत स्वभाव और उसकी बौद्धिक गहराई ही वह वजह थी जिसके कारण उसने शादी के लिए हां की थी। अवनि ने कहा, “कुणाल, दुनिया क्या कहती है, मुझे कभी फर्क नहीं पड़ा, लेकिन मुझे फर्क इस बात से पड़ता है कि तुम खुद को मेरी नजरों से नहीं देखते। मेरे लिए तुमसे बेहतर, तुमसे ज्यादा सुरक्षित और सच्चा इंसान कोई नहीं हो सकता।”

वे शब्द कुणाल के मन पर लगे हर ताने के घाव के लिए मरहम बन गए। धीरे-धीरे कुणाल का संकोच मिटने लगा। उसने अवनि का हाथ थामा, उसके साथ लंबी सैर पर निकला और बरसों बाद उसके चेहरे पर वह सहज और निश्चल मुस्कान लौट आई जो कहीं खो गई थी। दोनों के बीच जो भावनात्मक और शारीरिक दूरी थी, वह उस एकांत में धीरे-धीरे एक अटूट विश्वास और प्रेम के रूप में तब्दील हो गई।

दस दिन बाद, जब वे दोनों वापस लौटे, तो सबसे पहले वे डॉ. मल्होत्रा के क्लीनिक पहुंचे। केबिन का दरवाजा खुला, लेकिन इस बार कोई सहमा हुआ या पसीने से भीगा चेहरा नहीं था। कुणाल ने आत्मविश्वास से मुस्कुराते हुए डॉक्टर की तरफ हाथ बढ़ाया, और अवनि उसके कंधे से सटकर गर्व से खड़ी थी। डॉक्टर ने दोनों को देखा, उनके चेहरे की चमक देखी और बिना कुछ कहे एक संतुष्ट मुस्कान के साथ अपनी डायरी बंद कर दी। अनकहे फासले अब हमेशा के लिए मिट चुके थे।

जीवन में कई बार बाहरी लोगों की बातें और हमारी अपनी हीनभावना उन रिश्तों को खोखला कर देती है जो बहुत अनमोल होते हैं। क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों में बाहरी दिखावे और समाज के तानों से ज्यादा अहमियत आपसी संवाद, भरोसे और एक-दूसरे के प्रति सच्चे समर्पण की होती है? आपके विचार हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : माधुरी गुप्ता

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