उस रात मीरा जब सोने के लिए लेटी, तो उसका मन बहुत हल्का था। वह सोच रही थी कि हमारे समाज में सास-बहू के रिश्ते को हमेशा एक कलंक और नफरत के चश्मे से देखा जाता है। टीवी सीरियलों और समाज की बातों ने यह धारणा बना दी है कि एक सास कभी मां नहीं बन सकती। लेकिन आज उसकी सास ने यह साबित कर दिया था कि अगर एक सास ठान ले, तो वह किसी भी बहू के लिए इस दुनिया की सबसे मजबूत ढाल बन सकती है।
मीरा और रोहन की शादी को सात साल हो चुके थे। उनकी एक पांच साल की बेटी थी, अन्या। घर में रोहन की मां, सरोजिनी देवी भी साथ रहती थीं। शुरुआत में सब कुछ किसी सपने जैसा था। रोहन एक जिम्मेदार पति था और मीरा एक सुघड़ पत्नी। लेकिन जैसे-जैसे रोहन के करियर ने उड़ान भरी, उसके पास परिवार के लिए वक्त कम होता चला गया। रोहन एक बड़ी आईटी कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर बन गया था। उसकी तरक्की से घर में सुख-सुविधाएं तो बहुत आ गईं, लेकिन सुकून कहीं पीछे छूट गया था।
मीरा का दिन सुबह साढ़े पांच बजे शुरू होता था। सबसे पहले उठकर पूरे घर की साफ-सफाई करना, फिर सरोजिनी जी के लिए उनके मनपसंद अदरक और तुलसी वाली चाय बनाना। उसके बाद अन्या को जगाकर स्कूल के लिए तैयार करना, उसका टिफिन बनाना, और फिर रोहन के उठने से पहले उसके कपड़े प्रेस करके रखना। रोहन सुबह उठते ही लैपटॉप खोलकर बैठ जाता और नाश्ता भी काम करते-करते ही करता। मीरा पूरे घर को एक मशीन की तरह संभालती थी। सरोजिनी जी को गठिया की शिकायत थी, इसलिए उनके घुटनों की मालिश से लेकर उनकी दवाइयों का समय याद रखने तक की सारी जिम्मेदारी मीरा की ही थी।
मीरा ने कभी इस काम से कोई शिकायत नहीं की। उसे लगता था कि यह उसका अपना घर है और अपनों के लिए काम करने में कैसी थकान। लेकिन पिछले कुछ महीनों से रोहन का बर्ताव बहुत बदल गया था। ऑफिस के काम का दबाव बताकर वह अक्सर रात को बहुत देर से घर लौटता। कभी क्लाइंट के साथ डिनर, कभी टीम के साथ मीटिंग, तो कभी दोस्तों के साथ नेटवर्किंग के नाम पर वह रात के एक-दो बजे तक घर से गायब रहता।
मीरा की एक आदत थी जो उसने शादी के पहले दिन से नहीं बदली थी—वह बिना रोहन को खाना खिलाए खुद खाना नहीं खाती थी। शुरुआत में रोहन को मीरा का यह प्यार बहुत अच्छा लगता था, लेकिन अब उसे इसकी कोई परवाह नहीं थी। वह अक्सर बाहर से खाकर आ जाता और मीरा से बस इतना कह देता, “मैंने खा लिया है, तुम सो जाओ।” लेकिन मीरा फिर भी उसका इंतजार करती। खाली पेट, थकी हुई आंखों और एक अनकही उदासी के साथ।
आज भी कुछ ऐसा ही था। रात के पौने दो बज चुके थे। मीरा की आंखें भारी हो रही थीं। वह सोफे पर बैठे-बैठे ही ऊंघने लगी थी। तभी उसे लगा कि किसी ने उसके कंधों पर बहुत ही नरमी से एक शॉल ओढ़ा दिया है। मीरा झटके से उठी और पीछे मुड़कर देखा। सामने सरोजिनी जी खड़ी थीं। उनकी आंखों में एक अजीब सी पीड़ा और ममता का मिलाजुला भाव था।
“मां जी, आप? आप इतनी रात को क्यों उठ गईं? पैरों में दर्द है क्या? मैं अभी गर्म तेल से मालिश कर देती हूं,” मीरा ने हड़बड़ाते हुए कहा और उठने लगी।
सरोजिनी जी ने मीरा के दोनों कंधे पकड़कर उसे वापस सोफे पर बिठा दिया। उन्होंने मीरा के माथे से पसीने की कुछ बूंदें पोंछीं और अपनेपन से उसके गाल को सहलाते हुए बोलीं, “मेरे पैरों में कोई दर्द नहीं है पगली। दर्द तो इस घर की दीवारों को हो रहा है, जो रोज तेरी खामोश सिसकियां सुनती हैं। तूने अभी तक खाना नहीं खाया ना?”
मीरा ने नजरें चुराते हुए झूठी मुस्कान के साथ कहा, “नहीं मां जी, बस भूख नहीं थी। और वैसे भी रोहन बस आते ही होंगे। उनके ऑफिस में आज बहुत जरूरी प्रेजेंटेशन थी ना, इसलिए देर हो गई।”
सरोजिनी जी ने एक गहरी सांस ली। “मुझसे झूठ मत बोल मीरा। मैं पिछले एक महीने से देख रही हूं। वह लड़का अपनी मनमानी कर रहा है और तू बिना चूं-चपड़ किए खुद को इस घर की चक्की में पीस रही है। सुबह से रात तक मशीन की तरह काम करती है, और फिर रात को इस तरह भूखे पेट उसका इंतजार करती है। क्या तेरी अपनी कोई जिंदगी नहीं है? क्या तेरा शरीर लोहे का बना है?”
मीरा की आंखों में अब तक जो आंसू ठहरे हुए थे, वे सरोजिनी जी के इन प्यार भरे शब्दों को सुनकर छलक पड़े। वह फफक-फफक कर रोने लगी। सरोजिनी जी ने उसे अपने गले से लगा लिया और एक मां की तरह उसकी पीठ थपथपाने लगीं। “रो ले मेरी बच्ची, अपने मन का सारा बोझ हल्का कर ले। मैं जानती हूं कि तू कितनी अकेली पड़ गई है। लेकिन आज के बाद ऐसा नहीं होगा। आज उस नवाबजादे को आने दे घर।”
तभी बाहर कार के रुकने की आवाज आई। चाबी से दरवाजा खुलने की आवाज गूंजी। रोहन अंदर दाखिल हुआ। उसके कान में ब्लूटूथ इयरफोन लगा था और वह किसी से हंस-हंस कर बात कर रहा था। उसके हाथ में एक महंगा सा लैपटॉप बैग था और चेहरे पर थकान से ज्यादा एक लापरवाही का भाव था।
रोहन ने अंदर आकर जैसे ही मीरा और अपनी मां को हॉल में खड़े देखा, वह थोड़ा सकपका गया। उसने फोन काटा और बोला, “अरे मां, आप इतनी रात को यहां क्या कर रही हैं? आपकी तबीयत तो ठीक है ना? और मीरा, तुम भी अभी तक जगी हो? मैंने कहा था ना कि मुझे देर हो जाएगी।”
सरोजिनी जी की आंखों में गुस्सा तैर गया। उन्होंने बहुत ही शांत लेकिन सख्त आवाज में कहा, “हां बेटा, मेरी तबीयत तो ठीक है, लेकिन तेरी पत्नी की तबीयत और इस घर के हालात बिल्कुल ठीक नहीं हैं। तू जरा अपनी घड़ी की तरफ देख। रात के दो बज रहे हैं। यह कोई घर आने का समय है?”
रोहन ने कैजुअल तरीके से अपना बैग सोफे पर पटका और बोला, “ओहो मां, आप भी ना छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाती हैं। मैं कोई आवारागर्दी थोड़ी कर रहा था। मैं काम कर रहा था। मेरी पोजिशन ऐसी है कि मुझे टीम को लीड करना पड़ता है। काम का प्रेशर होता है।”
“काम का प्रेशर?” सरोजिनी जी ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए कहा, “बेटा, काम का प्रेशर क्या सिर्फ दफ्तर में होता है? कभी इस घर के काम का प्रेशर देखा है तूने? यह लड़की जो तेरे सामने खड़ी है, यह सुबह पांच बजे उठ जाती है। तेरे उठने से पहले तेरा नाश्ता, तेरे कपड़े, तेरी बेटी का स्कूल, मेरी दवाइयां—सब कुछ यह अकेली संभालती है। क्या इसकी कोई पोजिशन नहीं है? क्या इसका कोई सम्मान नहीं है?”
रोहन थोड़ा झल्ला गया। उसने मीरा की तरफ घूरते हुए कहा, “अच्छा, तो अब घर में मेरे खिलाफ शिकायतें होने लगी हैं? मैंने पहले ही कहा था मीरा कि तुम्हें कोई परेशानी है तो मुझसे सीधे कहो। मां को बीच में लाकर यह सब ड्रामा करने की क्या जरूरत थी?”
इससे पहले कि मीरा कुछ बोल पाती, सरोजिनी जी ने रोहन को डपटते हुए कहा, “खबरदार जो तूने उस पर इल्जाम लगाया! उसने मुझसे एक शब्द नहीं कहा है। वह तो बेचारी अभी भी तेरे बचाव में कह रही थी कि तेरा कोई जरूरी प्रेजेंटेशन था। लेकिन मेरी आंखें अंधी नहीं हैं। मैं रोज देखती हूं कि मेरा बेटा एक अच्छा कर्मचारी तो बन गया है, लेकिन एक अच्छा पति और अच्छा इंसान बनना भूल गया है।”
रोहन अब थोड़ा डिफेंसिव होने लगा था। “मां, मैं यह सब किसके लिए कर रहा हूं? इसी घर के लिए ना? कल को अन्या का भविष्य सुरक्षित करना है। मैं पैसे कमा रहा हूं ताकि आप लोगों को कोई तकलीफ ना हो।”
“पैसे कमा रहा है, तो क्या इस घर को धर्मशाला समझ लिया है तूने?” सरोजिनी जी की आवाज अब तेज हो गई थी। “पैसे से तू सुविधाएं खरीद सकता है रोहन, लेकिन किसी का सुकून और सम्मान नहीं। तू रोज रात को दो बजे आता है, बाहर से पेट भरकर आ जाता है, और यह लड़की यहां भूखी-प्यासी तेरा इंतजार करती है। तुझे पता भी है कि पिछले एक हफ्ते से इसने रात का खाना ठीक से नहीं खाया है? तूने एक बार भी पलट कर इससे पूछा कि ‘मीरा, क्या तुमने खाना खाया?’ नहीं! क्योंकि तुझे लगता है कि घर का काम करना और तेरा इंतजार करना तो इसकी ड्यूटी है।”
रोहन एकदम चुप हो गया। उसे उम्मीद नहीं थी कि उसकी मां इस तरह से मीरा का पक्ष लेंगी।
सरोजिनी जी ने अपनी बात जारी रखी, “बेटा, जब कोई लड़की अपना सब कुछ छोड़कर एक नए घर में आती है, तो वह यह सोचकर आती है कि उसका पति उसका सबसे बड़ा संबल होगा। लेकिन जब पति ही उसे एक ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ चीज समझ ले, तो उस लड़की का हौसला टूट जाता है। तू बाहर वालों को खुश करने में इतना मगन हो गया है कि तुझे घर के अंदर सुलगती हुई आग नहीं दिख रही। अगर तेरा यही रवैया रहा, तो मैं खुद मीरा को लेकर यहां से चली जाऊंगी। क्योंकि जिस घर में मेरी बेटी जैसी बहू की कद्र नहीं, उस घर में मुझे भी नहीं रहना।”
रोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई। मां के मुंह से निकले इन कड़वे लेकिन सच्चे शब्दों ने उसके दिमाग पर छाए हुए अहंकार के जाले को झकझोर कर रख दिया। उसने पहली बार गौर से मीरा की तरफ देखा। मीरा की आंखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे, उसका चेहरा पीला और उदास लग रहा था। वह लड़की, जो कभी पूरे घर में चहकती फिरती थी, आज एक सहमी हुई सी परछाईं मात्र लग रही थी।
रोहन को अपने किए पर गहरी शर्मिंदगी महसूस हुई। उसे याद आया कि पिछले कई दिनों से उसने मीरा से ठीक से बात तक नहीं की थी। वह भूल गया था कि काम के अलावा भी उसकी एक दुनिया है, जो उसके बिना अधूरी है।
रोहन धीरे-धीरे मीरा के पास गया। उसकी आंखें भी अब नम हो चुकी थीं। उसने मीरा के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “मुझे माफ कर दो मीरा,” रोहन की आवाज में एक कंपन था। “मैं सच में अंधा हो गया था। मैं अपने करियर और अपनी दुनिया में इतना उलझ गया कि मुझे तुम्हारी तकलीफ नजर ही नहीं आई। तुमने बिना कुछ कहे इतना कुछ साहा और मैंने तुम्हें सिर्फ एक गृहिणी समझकर नजरअंदाज कर दिया। मुझे एहसास ही नहीं हुआ कि मैं तुम्हें रोज थोड़ा-थोड़ा खो रहा था।”
मीरा ने रोहन के हाथों को जोर से पकड़ लिया और अपनी पलकें झुका लीं। उसके आंसू अब रोहन के हाथों पर गिर रहे थे, लेकिन ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि एक अजीब सी राहत के थे।
रोहन ने फिर अपनी मां की तरफ देखा और हाथ जोड़ लिए। “मां, आपने आज मेरी आंखें खोल दीं। अगर आप आज मुझे नहीं रोकतीं, तो शायद मैं बहुत बड़ी गलती कर बैठता और अपना सबसे कीमती रिश्ता खो देता। मैं वादा करता हूं कि आज के बाद ऐसा कभी नहीं होगा। मेरा परिवार हमेशा मेरी पहली प्राथमिकता रहेगा।”
सरोजिनी जी के चेहरे पर अब एक सुकून भरी मुस्कान थी। उन्होंने आगे बढ़कर दोनों के सिर पर हाथ रखा और कहा, “गलती का एहसास होना ही सबसे बड़ा सुधार है बेटा। रिश्ते किसी पौधे की तरह होते हैं, जिन्हें सिर्फ पैसों के पानी से नहीं, बल्कि समय और सम्मान की धूप से सींचना पड़ता है। चलो, अब बहुत रात हो गई है। आज हम सब मिलकर खाना खाएंगे।”
रोहन ने तुरंत अपना बैग किनारे रखा और खुद जाकर डाइनिंग टेबल पर खाना गर्म करने लगा। आज सालों बाद उसने मीरा को कुर्सी पर बिठाया और खुद अपने हाथों से उसे खाना परोसा। मीरा जब खाना खा रही थी, तो उसकी नजरें बार-बार सरोजिनी जी की तरफ उठ रही थीं। सरोजिनी जी बस मुस्कुरा रही थीं।
उस रात मीरा जब सोने के लिए लेटी, तो उसका मन बहुत हल्का था। वह सोच रही थी कि हमारे समाज में सास-बहू के रिश्ते को हमेशा एक कलंक और नफरत के चश्मे से देखा जाता है। टीवी सीरियलों और समाज की बातों ने यह धारणा बना दी है कि एक सास कभी मां नहीं बन सकती। लेकिन आज उसकी सास ने यह साबित कर दिया था कि अगर एक सास ठान ले, तो वह किसी भी बहू के लिए इस दुनिया की सबसे मजबूत ढाल बन सकती है। अगर हर घर में सरोजिनी जी जैसी समझने वाली सास हो, जो सही और गलत की पहचान कर सके और अपने बेटे की गलतियों पर पर्दा डालने के बजाय उसे आईना दिखा सके, तो शायद कभी किसी घर की नींव कमजोर ना हो, और कोई भी रिश्ता टूटने की कगार पर ना पहुंचे।
अगले दिन से रोहन का रूटीन पूरी तरह बदल गया। वह शाम को समय पर घर आने लगा। ऑफिस का काम वह ऑफिस में ही छोड़कर आता था। अब वह मीरा के कामों में हाथ बंटाता और वीकेंड पर अन्या और अपनी मां के साथ समय बिताता। घर में फिर से वही पुरानी हंसी और खुशी लौट आई थी।
मीरा जानती थी कि यह सब सिर्फ इसलिए मुमकिन हो पाया क्योंकि उस रात एक मां ने अपने बेटे से ज्यादा एक औरत के दर्द को समझा था। रिश्तों की तपती धूप में सरोजिनी जी की वह छांव मीरा के लिए किसी वरदान से कम नहीं थी।
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