पराए आँगन की छाँव

 अनन्या ने उनके दोनों पैर पकड़ लिए और सिसकते हुए बोली, “दर्द हाथ में नहीं माँ, मेरे दिल में है। मुझे माफ कर दीजिए माँ! मैं इस घर में बहू बनकर नहीं, एक दीवार बनकर आई थी। मेरे मन में आपको लेकर बहुत मैल था, मैं तो इस भरे-पूरे घर को तोड़ने का इरादा लेकर आई थी। पर आपके इस निस्वार्थ प्रेम ने मुझे मेरी ही नज़रों में गिरा दिया। आपने मुझे सिर्फ ठीक नहीं किया, मुझे एक नया जन्म दिया है। आज से आप सिर्फ मयंक की माँ नहीं हैं, आप मेरी भी माँ हैं।”

 आज त्रिवेदी निवास में एक अजीब सी खामोशी तैर रही थी। शादी के जोड़े, गहनों के डिब्बे और शगुन की थैलियों के बीच बैठी अनन्या अपनी सहेली की भेजी हुई बधाई का जवाब तक ठीक से नहीं दे पा रही थी। उसकी नज़रें बार-बार सामने दीवार पर टिकी थीं, जहाँ उसकी माँ, उर्मिला जी, अलमारी से साड़ियाँ निकालते हुए लगातार कुछ बुदबुदा रही थीं।

शादी तय हुए अभी दो महीने ही बीते थे। अनन्या का ब्याह प्रयागराज के एक संभ्रांत और प्रतिष्ठित परिवार में तय हुआ था। लड़का, मयंक, एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर था, जबकि उसका छोटा भाई निमिष अभी सिविल सेवा की तैयारी में लगा हुआ था। पिता का साया वर्षों पहले उठ चुका था। परिवार की पूरी धुरी उनकी माँ, कल्याणी देवी, थीं। कल्याणी जी ने अपने स्वर्गीय पति के अचानक चले जाने के बाद सरकारी इंटर कॉलेज में अध्यापन का कार्य संभालते हुए दोनों बेटों को केवल पाला ही नहीं था, बल्कि उन्हें ऐसे संस्कार दिए थे कि पूरे मोहल्ले में उनकी परवरिश की मिसाल दी जाती थी।

पर अनन्या के घर में चिंता का विषय कुछ और ही था। उर्मिला जी ने साड़ियों की तह जमाते हुए अनन्या के पास आकर बैठते ही धीमे, पर बेहद कड़े स्वर में कहा, “अनन्या, मेरी बात गाँठ बाँध ले। शादी के तुरंत बाद नहीं, तो कम से कम छह महीने के भीतर मयंक को समझा-बुझाकर अलग फ्लैट ले लेना। संयुक्त परिवार सिर्फ कहने की बात होती है, असल में बहू का सारा वजूद वहाँ घिसकर खत्म हो जाता है। सास चाहे कितनी भी मीठी बातें कर ले, कभी अपनी नहीं होती। दूसरा बेटा तो घर पर ही है, वह माँ को संभालेगा। तू मयंक की कमाई पर अपना घर बसाना।”

पहली बार जब माँ ने यह बात कही थी, तो अनन्या चौंक गई थी। उसे समझ नहीं आया था कि जिस घर में अभी उसने कदम भी नहीं रखा, जहाँ के लोगों के स्वभाव से वह पूरी तरह वाकिफ भी नहीं है, वहाँ से अलग होने की योजना पहले से ही क्यों बनाई जा रही है? उसने झिझकते हुए कहा भी था, “मम्मी, मयंक अपनी माँ से बहुत प्यार करते हैं। आंटी जी ने अकेले दम पर दोनों भाइयों को बड़ा किया है। ऐसे में अचानक अलग होने की बात करना क्या ठीक होगा?”

उर्मिला जी ने तुरंत अनन्या का हाथ दबाते हुए डांटने के लहजे में कहा था, “तू अभी दुनियादारी नहीं समझती। तूने सिर्फ बाहर की चमक देखी है। सासें जब तक बाहर रहती हैं, तब तक देवी बनी फिरती हैं, घर आते ही ताने कसने वाली मालकिन बन जाती हैं। आज़ादी चाहिए तो अलग रहना ही पड़ेगा। शुरुआत से ही दूरी बनाकर रखेगी तो तेरी अपनी गृहस्थी सुरक्षित रहेगी, वरना ज़िंदगी भर चूल्हा-चौका और सेवा में ही खप जाएगी।”

शादी की तारीख जैसे-जैसे नज़दीक आती गई, माँ की ये बातें अनन्या के मन में किसी धीमे ज़हर की तरह उतरती चली गईं। हर खरीदारी के साथ, हर रस्म की तैयारी के साथ उर्मिला जी अनन्या को यही घुट्टी पिलाती रहीं कि सास बहू के जीवन की सबसे बड़ी रुकावट होती है। धीरे-धीरे अनन्या का मन शंकाओं, अविश्वास और अनजाने डर से भर गया। उसके भोले मन में यह बात घर कर गई कि ससुराल जाते ही उसे अपनी रक्षा के लिए एक अदृश्य दीवार खड़ी करनी होगी।

प्रयागराज में कल्याणी देवी के घर में माहौल बिल्कुल उलट था। जब पहली बार कल्याणी जी अनन्या को देखने कानपुर पहुँची थीं, तो अनन्या की सादगी और शालीनता देखकर उनका हृदय भर आया था। उन्होंने बिना एक पल की देरी किए अपने गले का पुश्तैनी सोने का हार उतारा और अनन्या के गले में पहना दिया था। वे घंटों अनन्या के सिर पर हाथ फेरती रहीं, उसके हाथ थामे बैठी रहीं, जैसे बरसों से किसी बेटी की राह देख रही हों। विदाई से पहले उन्होंने उर्मिला जी से हाथ जोड़कर कहा था, “बहन जी, आप अपनी गुड़िया मुझे सौंप रही हैं। मैं वादा करती हूँ कि इसे कभी इस बात का अहसास नहीं होने दूँगा कि यह अपने मायके से दूर है।”

शहनाइयों की गूँज और मंत्रोच्चार के बीच अनन्या और मयंक का विवाह संपन्न हुआ। प्रयागराज के उस बड़े, खुले और रोशनी से भरे घर में अनन्या ने गृहप्रवेश किया। देवर निमिष ने भाभी के स्वागत में घर को फूलों से सजा रखा था और कल्याणी जी ने आरती उतारते समय अनन्या की आँखों में वो ममता उँडेल दी थी जिसकी कोई तुलना नहीं हो सकती थी। मयंक का व्यवहार भी बेहद प्रेमपूर्ण और सम्मानजनक था।

घर में किसी बात की कमी नहीं थी। सुबह की पहली चाय कल्याणी जी खुद बनाकर अनन्या के कमरे में भिजवातीं और कहतीं, “बिटिया अभी नई-नई आई है, सफर की थकान होगी, उसे सोने दो।” निमिष हर छोटी ज़रूरत का ध्यान रखता और मयंक अनन्या की हर पसंद-नापसंद को प्राथमिकता देते।

पर अनन्या के भीतर एक भीषण द्वंद्व चल रहा था। जब भी कल्याणी जी बड़े प्यार से उसे कोई बात समझातीं या रसोई में उसके साथ खड़ी होकर हाथ बँटातीं, अनन्या के कानों में उसकी माँ की आवाज़ गूँजने लगती—”सास की मीठी बातों में मत आना, यह सब फंसाने का जाल होता है।”

इस मानसिक उलझन के कारण अनन्या कभी भी उस घर से दिल से नहीं जुड़ पा रही थी। उसका चेहरा अक्सर खिंचा-खिंचा रहता। मयंक जब भी परिवार के साथ बैठकर हँसने-बोलने की बात करता, अनन्या कोई न कोई बहाना बनाकर अपने कमरे में चली जाती। वह हमेशा इस ताक में रहती कि कब कोई छोटी सी बात हो, जिसे वह तूल देकर मयंक के सामने अलग होने की शर्त रख सके। दिल कहता था कि यह परिवार सच्चा है, पर दिमाग पर माँ की दी हुई सीख का पहरा था। इस अंतर्द्वंद्व ने उसके स्वभाव को रूखा और चिड़चिड़ा बना दिया था।

एक दिन दोपहर के समय मयंक ऑफिस में था और निमिष अपनी लाइब्रेरी गया हुआ था। कल्याणी जी आँगन में तुलसी के पास बैठी गीता का पाठ कर रही थीं। अनन्या रसोई में अपने लिए चाय बनाने गई थी। मन में वही नकारात्मक विचार उमड़-घुमड़ रहे थे कि कैसे वह मयंक से अलग फ्लैट लेने की बात छेड़े। विचारों में इतनी उलझी थी कि उसका ध्यान फर्श पर नहीं गया, जहाँ पानी की कुछ बूँदें गिरी हुई थीं।

रसोई से बाहर निकलते ही अनन्या का पैर फिसला और वह ज़ोर से चीखते हुए संगमरमर के फर्श पर सीधे दाहिने हाथ के बल गिरी। आवाज़ इतनी भयानक थी कि कल्याणी जी अपनी किताब छोड़कर बदहवास दौड़ती हुई आईं।

“अनन्या! क्या हुआ बिटिया?” कल्याणी जी घुटनों के बल बैठ गईं।

अनन्या दर्द से तड़प रही थी, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे और उसका दाहिना हाथ पूरी तरह बेजान हो चुका था। कल्याणी जी ने बिना घबराए तुरंत पड़ोस के डॉक्टर को फोन किया और मयंक को सूचना दी। जब अस्पताल ले जाकर एक्स-रे कराया गया, तो पता चला कि कलाई और कोहनी के बीच की मुख्य हड्डी में गंभीर हेयरलाइन फ्रैक्चर था और लिगामेंट भी बुरी तरह खिंच गया था।

डॉक्टर ने साफ कह दिया, “कम से कम तीन से चार हफ्तों के लिए पूरा प्लास्टर रहेगा। हाथ बिल्कुल भी नहीं हिलना चाहिए, वरना हड्डी गलत जुड़ सकती है। इन्हें पूरी तरह बेड रेस्ट की ज़रूरत है।”

जब अनन्या अस्पताल से घर लौटी, तो उसका दाहिना हाथ भारी प्लास्टर में जकड़ा हुआ था। वह अपने हाथ से एक घूँट पानी भी नहीं पी सकती थी, कपड़े बदलना तो दूर की बात थी। वह बिस्तर पर लाचार पड़ी रोने लगी। उसे लगा कि अब सास के ताने शुरू होंगे कि आते ही आफत खड़ी कर दी।

शाम को अनन्या ने अपने मायके फोन किया। उर्मिला जी ने फोन पर बहुत हाय-तौबा मचाई। अगले दिन वे दोपहर में प्रयागराज पहुँचीं। अनन्या को उम्मीद थी कि माँ कुछ दिन रुककर उसकी देखभाल करेंगी। पर उर्मिला जी ने सिर्फ दो घंटे बैठकर औपचारिक सहानुभूति जताई, सास को दो-चार नसीहतें दीं कि ध्यान रखना चाहिए था, और फिर यह कहकर शाम की ही ट्रेन से कानपुर लौट गईं कि घर पर उनके पापा अकेले हैं और उनकी दवाइयों का समय हो जाता है। माँ के जाने के बाद अनन्या का दिल अंदर तक टूट गया।

पर इसके बाद जो हुआ, उसने अनन्या की सोच की पूरी बुनियाद हिलाकर रख दी।

अगले इक्कीस दिनों तक कल्याणी जी ने अपने घर की सारी दिनचर्या अनन्या के इर्द-गिर्द समेट ली।

सुबह पाँच बजे उठकर कल्याणी जी सबसे पहले अनन्या के लिए हल्दी वाला दूध तैयार करतीं। अपने हाथों से उसे सहारा देकर उठातीं, उसके मुँह पर गुनगुने पानी के छींटे मारकर तौलिए से पोंछतीं। अनन्या को जब बाथरूम जाना होता, तो कल्याणी जी बिना किसी संकोच या झिझक के उसे सहारा देकर ले जातीं। कपड़े बदलने से लेकर उसके उलझे बालों में कंघी करने और तेल लगाने तक, सारा काम कल्याणी जी अपने हाथों से करतीं।

दोपहर के खाने में वे खुद अनन्या के पास बैठतीं और अपने हाथों से एक-एक निवाला उसके मुँह में खिलातीं। जब कभी अनन्या दर्द से कराह उठती, तो कल्याणी जी रात-रात भर उसके सिरहाने बैठकर उसकी पीठ सहलाती रहतीं और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करतीं।

एक दिन अनन्या की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने रुंधे गले से कहा, “माँ जी, आप मेरी इतनी सेवा क्यों कर रही हैं? मैं तो आपके किसी काम भी नहीं आ पा रही, उलटा आप पर बोझ बन गई हूँ। आप थक जाती होंगी।”

कल्याणी जी ने बहुत ही ममता भरे अंदाज़ में अनन्या के आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए बोलीं, “पगली, जब बेटी बीमार पड़ती है, तो माँ थकती नहीं है, माँ का दिल दुखता है। तू इस घर की बहू बाद में है, पहले मेरी बेटी है। अगर आज मेरी जगह तेरी अपनी माँ होती, तो क्या वो थक जाती? तू पराए घर से अपना सब कुछ छोड़कर हमारे भरोसे आई है, अगर इस विपदा में हम तेरा साथ न दें, तो हमारा इंसान होना व्यर्थ है। तू बस जल्दी से ठीक हो जा, मुझे अपनी बेटी को हँसते हुए देखना है।”

कल्याणी जी के इन शब्दों ने अनन्या के भीतर की सारी कड़वाहट को एक ही झटके में धो डाला। वह बिस्तर पर पड़ी-पड़ी सोचने लगी—जिस माँ ने उसे जन्म दिया, जिसने बीसियों साल पाला, वह तो महज़ दो घंटे बैठकर, औपचारिकता दिखाकर अपने घर वापस चली गई; और जिस सासू माँ को वह अब तक खलनायिका समझ रही थी, जिससे अलग होने का षड्यंत्र उसके दिमाग में रचा जा रहा था, वही सासू माँ पिछले तीन हफ्तों से दिन-रात एक करके उसकी सेवा में लगी थीं, बिना किसी शिकायत के, बिना किसी अहसान के।

अनन्या को अपनी सोच पर इतनी आत्मग्लानि हुई कि उसका रोम-रोम काँप उठा। उसे समझ आ गया कि रिश्ते खून के मोहताज नहीं होते, रिश्ते तो नीयत, अपनत्व और समर्पण से सींचे जाते हैं। माँ की संकीर्ण सोच ने उसकी आँखों पर जो पट्टी बाँध दी थी, कल्याणी जी के निःस्वार्थ वात्सल्य ने उस पट्टी को हमेशा के लिए उतार फेंका था।

इक्कीस दिन बाद जब डॉक्टर ने प्लास्टर काटा और अनन्या ने धीरे-धीरे अपनी उंगलियाँ हिलाईं, तो कमरे में मयंक, निमिष और कल्याणी जी तीनों खड़े थे। कल्याणी जी की आँखों में खुशी के आँसू थे।

कमरे में लौटते ही अनन्या ने सबसे पहला काम यह किया कि वह सीधे कल्याणी जी के चरणों में गिर पड़ी और फूट-फूट कर रोने लगी।

कल्याणी जी घबरा गईं, “क्या हुआ बिटिया? कहीं दर्द हो रहा है क्या?”

अनन्या ने उनके दोनों पैर पकड़ लिए और सिसकते हुए बोली, “दर्द हाथ में नहीं माँ, मेरे दिल में है। मुझे माफ कर दीजिए माँ! मैं इस घर में बहू बनकर नहीं, एक दीवार बनकर आई थी। मेरे मन में आपको लेकर बहुत मैल था, मैं तो इस भरे-पूरे घर को तोड़ने का इरादा लेकर आई थी। पर आपके इस निस्वार्थ प्रेम ने मुझे मेरी ही नज़रों में गिरा दिया। आपने मुझे सिर्फ ठीक नहीं किया, मुझे एक नया जन्म दिया है। आज से आप सिर्फ मयंक की माँ नहीं हैं, आप मेरी भी माँ हैं।”

कल्याणी जी ने झुककर अनन्या को गले से लगा लिया। घर के मंदिर में जलता हुआ दीया जैसे इस बात की गवाही दे रहा था कि शक और नफरत की दीवारें ममता के एक स्पर्श से ढह चुकी थीं। मयंक और निमिष की आँखें भी नम थीं।

उस दिन के बाद अनन्या पूरी तरह बदल गई। उसने अपने हाथ से उस घर की ऐसी बागडोर संभाली कि घर सचमुच स्वर्ग बन गया। अब जब कभी कानपुर से उसकी माँ का फोन आता और वे बातों-बातों में अलग होने का ज़िक्र छेड़तीं, तो अनन्या बड़े ही आदर किंतु दृढ़ स्वर में कह देती, “मम्मी, जिस घर की छत पर माँ जैसी सासू माँ की छाँव हो, उस घर को छोड़कर कोई अलग नहीं होता। मुझे मेरा परिवार मिल गया है, और मैं यहाँ बेहद खुश हूँ।”

घर टूटने से बच चुका था, क्योंकि वहाँ एक ऐसी सास थी जिसने बहू को पराए घर की अमानत नहीं, अपने कलेजे का टुकड़ा माना था।

समाज में अक्सर सास-बहू के रिश्ते को एक जंग की तरह पेश किया जाता है, जहाँ हर कोई एक-दूसरे में खोट ढूँढने में लगा रहता है। पर सच तो यह है कि रिश्ते वही रूप लेते हैं, जो रंग हम उनमें भरते हैं। अगर हर माँ अपनी बेटी को विदा करते समय घर जोड़ने की सीख दे, और हर सास आने वाली बहू को अपनी ही कोख से जन्मी बेटी जैसा दुलार दे, तो किसी भी परिवार में कभी अलगाव की नौबत ही न आए।

आपको क्या लगता है—क्या आज के दौर में बेटियों के वैवाहिक जीवन में मायके का ज़रूरत से ज़्यादा दखल और नकारात्मक सीख ही घर टूटने की सबसे बड़ी वजह बन रही है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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