अवनि की आंखों के कोरों से एक बूंद आंसू ढुलक कर गाल पर आ गिरा, लेकिन वह आंसू किसी दुख या पछतावे का नहीं था, बल्कि मुक्ति और असीम शांति का था। अवनि ने भी हल्के से मुस्कुराकर सिर हिलाया और तन्मय का हाथ और अधिक मजबूती से थाम लिया।
उस रात घर लौटते समय अवनि ने कार की खिड़की से बाहर चमकते तारों को देखा। उसके मन का सारा बोझ, बरसों से दबा अपराधबोध और हर अधूरापन हमेशा के लिए धुल चुका था। वह समझ गई थी कि जीवन की खूबसूरती सिर्फ उन सपनों में नहीं होती जो हम अपनी बंद आंखों से देखते हैं, बल्कि उन रिश्तों की खुशहाली में होती है जिन्हें हम अपने त्याग, धैर्य और निष्ठा से सींचते हैं। उसकी कहानी अधूरी होकर भी पूरी हो चुकी थी, क्योंकि उसने टूटना नहीं, सबको जोड़कर एक सुंदर संसार बनाना सीखा था।
अवनि एक संवेदनशील, संजीदा और संस्कारों से बंधी हुई लड़की थी। उसके पिता, विश्वनाथ जी, शहर के जाने-माने कॉलेज में संस्कृत के विभागाध्यक्ष थे। सादगी, मर्यादा और समाज में अपनी निष्कलंक प्रतिष्ठा ही उनके जीवन की सबसे बड़ी जमा-पूंजी थी। विश्वनाथ जी ने अवनि को केवल पाला-पोसा नहीं था, बल्कि उसे अपने जीवन के उच्च आदर्शों में ढाला था। दूसरी ओर, अर्णव एक प्रतिभाशाली संगीतकार और गिटारवादक था। उसके पास धुनों की एक अनूठी दुनिया थी, सुरों का जादू था, लेकिन करियर के नाम पर संघर्ष और अनिश्चितता का लंबा सफर था।
अवनि और अर्णव अक्सर नर्मदा के किनारे बैठकर घंटों अपने भविष्य की बातें किया करते थे। अर्णव कहता कि एक दिन जब उसका पहला म्यूजिक एलबम रिलीज होगा, तब वह पूरे सम्मान और शान के साथ प्रोफेसर विश्वनाथ जी के सामने जाकर अवनि का हाथ मांगेगा। अवनि को भी अर्णव की प्रतिभा और उसके शब्दों पर अटूट विश्वास था। दोनों को लगता था कि प्रेम की डोर इतनी मजबूत है कि हर बाधा को पार कर लेगी। लेकिन जीवन हमेशा हमारी बनाई योजनाओं के अनुसार नहीं चलता; कभी-कभी नियति ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है जहां दोनों ही रास्ते अंगारों से भरे होते हैं।
एक दोपहर कॉलेज से लौटते समय विश्वनाथ जी अचानक बेहोश होकर गिर पड़े। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने बताया कि उनके मस्तिष्क की एक नस में गंभीर रक्तस्राव हुआ है और स्थिति बेहद चिंताजनक है। पूरा घर आंसुओं और खौफ के साए में डूब गया। अस्पताल के उस आईसीयू के बाहर अवनि की दुनिया बिखर रही थी। उसी नाजुक घड़ी में विश्वनाथ जी के बचपन के घनिष्ठ मित्र पंडित ओंकारेश्वर जी अपने बेटे तन्मय के साथ वहां पहुंचे। ओंकारेश्वर जी एक प्रतिष्ठित वास्तुकार और निर्माण कंपनी के मालिक थे, जिनका समाज में बहुत मान-सम्मान था। उनका बेटा तन्मय एक शांत, गंभीर और उच्च शिक्षित युवा था जो अपने पारिवारिक मूल्यों को हर चीज से ऊपर रखता था।
आईसीयू के भीतर जब विश्वनाथ जी को होश आया, तो उन्होंने लड़खड़ाती जुबान से अपने पुराने मित्र का हाथ थामा। ओंकारेश्वर जी ने अपने मित्र की चिंता भांपते हुए तन्मय और अवनि के रिश्ते का प्रस्ताव रख दिया। विश्वनाथ जी की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उन्होंने ऑक्सीजन मास्क के भीतर से ही हांफते हुए अवनि का हाथ पकड़ा और बेहद कमजोर आवाज में कहा, “बेटी, मेरे पास अब शायद ज्यादा समय नहीं बचा है। मैं इस दुनिया से निश्चिंत होकर तभी विदा ले सकूंगा, जब मुझे तसल्ली होगी कि तू तन्मय जैसे सुयोग्य और संस्कारी लड़के के हाथों में सुरक्षित है। तूने हमेशा मेरी हर बात मानी है, क्या अपने इस लाचार बाप की यह अंतिम इच्छा पूरी नहीं करेगी?”
अवनि के पैरों तले से जमीन खिसक गई। सीने में जैसे सैकड़ों कांच एक साथ टूटकर चुभ गए हों। एक तरफ वह प्रेम था जिसकी खुशबू उसकी सांसों में रची-बसी थी, वह अर्णव जिसके साथ उसने जिंदगी बिताने की कसमें खाई थीं; और दूसरी तरफ अस्पताल के बिस्तर पर मौत से जूझते हुए उसके पिता की डबडबाई आंखें थीं, जिनकी प्रतिष्ठा और जीवन की डोर उसकी एक ‘हां’ या ‘ना’ पर टिकी थी। उस रात अस्पताल के गलियारे में बैठकर अवनि ने अपने भीतर एक भीषण युद्ध लड़ा। अगर वह अपनी मोहब्बत को चुनती, तो शायद उसके पिता वह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाते और उनकी जान चली जाती। समाज में उनके सम्मान पर जो धब्बा लगता, उसका बोझ वह जीवन भर कैसे उठाती? और अगर वह पिता को चुनती, तो अपनी ही आत्मा का कत्ल करना पड़ता।
आखिरकार, एक बेटी के फर्ज और रक्त के संबंधों की पुकार ने एक प्रेमिका के ख्वाबों को परास्त कर दिया। अवनि ने अपनी खुशियों की बलि देने का फैसला कर लिया। अगली शाम, नर्मदा किनारे भेड़ाघाट पर जब वह अर्णव से आखिरी बार मिलने पहुंची, तो उस दिन बादलों ने पूरे आसमान को काला कर रखा था। अर्णव उसके चेहरे के पीलेपन और आंखों के सूखे आंसुओं को देखकर सिहर उठा।
अवनि ने अपना कांपता हुआ हाथ अर्णव के हाथ से छुड़ा लिया और नजरें झुकाए हुए कहा, “अर्णव, हमारे रास्ते यहीं तक थे। बाबूजी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। उनकी आखिरी सांसें मेरी रजामंदी का इंतजार कर रही हैं। मैं इतनी खुदगर्ज नहीं हो सकती कि जिस पिता ने मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उनकी सांसों की कीमत पर अपने प्यार का महल सजाऊं। मैं टूट चुकी हूं अर्णव, पर मेरे पास इसके सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। मुझे अपने जीवन से हमेशा के लिए आजाद कर दो और मुझे भूल जाओ।”
अर्णव स्तब्ध रह गया। उसके हाथ से गिटार का कवर छूटकर नीचे गिर पड़ा। उसकी आंखों में आंसुओं का एक समंदर उमड़ आया था, लेकिन वह अवनि की लाचारी को भी समझ रहा था। उसने कोई तमाशा नहीं किया, कोई चीख-पुकार नहीं मचाई। बस एक गहरी, दर्दनाक और सूनी नजर से अवनि को देखा। उस खामोशी में एक ऐसी चीख थी जिसने अवनि की रूह को झकझोर दिया। अवनि पलटकर भागी और उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उस दिन के बाद से कई महीनों तक अवनि को ऐसा लगता रहा मानो वह एक चलती-फिरती लाश बन चुकी है जिसकी धड़कनें तो चल रही हैं, लेकिन संवेदनाएं मर चुकी हैं।
विश्वनाथ जी की तबीयत में सुधार होने के कुछ ही हफ्तों बाद अवनि का विवाह तन्मय के साथ संपन्न हो गया। शादी के बाद अवनि जबलपुर से विदा होकर बिलासपुर के एक बड़े और प्रतिष्ठित परिवार में आ गई। ओंकारेश्वर जी का परिवार बहुत बड़ा था—सास-ससुर, तन्मय के बड़े भाई और भाभी, उनकी दो छोटी बेटियां, और एक छोटी ननद। एक भरा-पूरा संयुक्त परिवार, जहां हर सुबह एक नए उत्सव की तरह शुरू होती थी। शुरुआत में अवनि के लिए यह सब बेहद भारी और घुटन भरा था। वह सुबह चार बजे उठती, अपने कमरे से बाहर आती, और बिना किसी भाव के काम में जुट जाती। वह न किसी से खुलकर बात करती थी, न किसी बात पर मुस्कुराती थी।
तन्मय ने अवनि के इस खालीपन को बहुत पहले ही भांप लिया था। तन्मय एक बेहद समझदार, धैर्यवान और गरिमामयी व्यक्तित्व का इंसान था। उसने कभी भी अवनि पर पति होने का अधिकार जताने की कोशिश नहीं की। उसने कमरे में कभी ऐसी कोई बात नहीं की जिससे अवनि को असहजता महसूस हो। बल्कि वह एक सच्चे साथी की तरह अवनि के मौन को सम्मान देता रहा। उसने अवनि को पूरा समय और अपनी निजी जगह दी। तन्मय का यह मौन आदर अवनि के भीतर एक अजीब सा सम्मान पैदा करने लगा।
जैसे-जैसे दिन बीतते गए, अवनि ने समझा कि अतीत के मलबे पर बैठकर वर्तमान को बर्बाद करना व्यर्थ है। उसने अपनी उस दबी हुई पीड़ा को अपने नए परिवार की सेवा और जिम्मेदारियों में रूपांतरित करना शुरू कर दिया। अवनि ने खुद को घर के हर सदस्य के सुख-दुख से जोड़ लिया। सुबह सबसे पहले उठकर वह अपनी सास के लिए बिना चीनी की हर्बल चाय बनाती, जो गठिया के दर्द से परेशान रहती थीं। वह रोज दोपहर में अपनी सास के घुटनों पर तेल की मालिश करती और उन्हें धार्मिक ग्रंथों की कहानियां पढ़कर सुनाती। ससुर ओंकारेश्वर जी की दवाओं का पूरा चार्ट अवनि की उंगलियों पर रहता था; कब कौन सी गोली देनी है, कब बीपी चेक करना है, इसका ध्यान तन्मय से भी ज्यादा अवनि रखती थी।
जेठानी जी, जो हमेशा घर के बड़े आयोजनों और बच्चों की जिम्मेदारियों से थकी रहती थीं, अवनि के रूप में उन्हें एक सच्ची बहन मिल गई थी। अवनि ने जेठानी की दोनों बेटियों—रिया और नव्या की पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। वह उन्हें स्कूल के प्रोजेक्ट्स में मदद करती, उनके साथ खेलती और रात को उन्हें कहानियां सुनाकर सुलाती। ननद की कॉलेज की परेशानियों को वह एक सहेली बनकर सुनती और सुलझाती। रसोई में तो जैसे अवनि के हाथों का स्वाद पूरे परिवार की जुबान पर चढ़ गया था। सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक, किसकी थाली में क्या जाना है, यह सिर्फ अवनि ही जानती थी।
धीरे-धीरे, अवनि के इस निस्वार्थ समर्पण, मृदु व्यवहार और अथक परिश्रम ने पूरे परिवार का दिल जीत लिया। उसकी सास, जो मोहल्ले में अपने सख्त मिजाज के लिए जानी जाती थीं, अब बात-बात पर कहती थीं, “मेरी अवनि बहू नहीं, इस घर की रीढ़ है। भगवान ऐसी बेटी हर किसी को दे।” ससुर ओंकारेश्वर जी जब भी व्यापार या परिवार का कोई बड़ा निर्णय लेते, तो अवनि को बैठक में बुलाकर उसकी राय जरूर पूछते थे। जेठानी अक्सर कहती कि अवनि के आने से घर का आंगन सचमुच मंदिर बन गया है।
घर के इस अगाध प्रेम और सबसे बढ़कर तन्मय के मौन, अडिग और संवेदनशील साथ ने अवनि के दिल के पुराने जख्मों पर धीरे-धीरे मरहम लगाना शुरू कर दिया। तन्मय का प्यार किसी दिखावे का मोहताज नहीं था; वह अवनि की छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखता था, उसकी थकान को बिना कहे समझ जाता था और हमेशा उसके आत्मसम्मान की ढाल बनकर खड़ा रहता था। अवनि को धीरे-धीरे यह अहसास होने लगा कि प्रेम केवल किसी एक इंसान को पा लेने या अपनी ख्वाहिशों को पूरा कर लेने का नाम नहीं है। प्रेम तो वह त्याग और समर्पण है जो दूसरों के चेहरों पर मुस्कान बनकर खिलता है। जब वह अपने पिता विश्वनाथ जी को स्वस्थ, प्रसन्न और समाज में गर्व से सिर उठाकर जीते हुए देखती, तो उसका रोम-रोम ईश्वर के प्रति कृतज्ञता से भर जाता कि उसने उस दिन अपने पिता का मान बचा लिया था।
विवाह के छह साल बीत चुके थे। अवनि अब एक प्यारे से बेटे की मां भी बन चुकी थी और उसका जीवन परिवार के स्नेह से पूरी तरह तृप्त था। एक शाम तन्मय ने अवनि से कहा, “अवनि, आज शहर के सबसे बड़े ऑडिटोरियम में एक राष्ट्रीय स्तर का शास्त्रीय और फ्यूजन संगीत समारोह है। एक बहुत बड़े कलाकार अपनी प्रस्तुति देने आए हैं। चलो, आज पूरा परिवार साथ चलेगा।”
अवनि परिवार के सभी सदस्यों के साथ ऑडिटोरियम पहुंची। पूरा हॉल खचाखच भरा हुआ था। जब मंच पर रोशनी हुई और मुख्य कलाकार गिटार और सितार के फ्यूजन के साथ मंच पर आए, तो अवनि के कदम अपनी सीट पर ही जम गए। वह अर्णव था।
अर्णव अब एक ख्यातिप्राप्त और परिपक्व संगीतकार बन चुका था। उसके चेहरे पर संघर्ष की रेखाएं मिट चुकी थीं और एक दिव्य आत्मविश्वास झलक रहा था। उसने जब अपनी धुन छेड़ी, तो पूरा सभागार उस संगीत के सम्मोहन में बंध गया। धुनों में एक गहरा दर्द था, लेकिन उस दर्द के अंत में एक अद्भुत ठहराव और शांति थी, जैसे कोई भटका हुआ मुसाफिर अपनी मंजिल पा चुका हो।
प्रस्तुति समाप्त होने के बाद जब पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा, तब दर्शकों के बीच खड़े होकर तालियां बजाते हुए अवनि की नजरें मंच से नीचे उतरते अर्णव से टकरा गईं।
समय का पहिया जैसे एक क्षण के लिए ठहर गया। सभागार का सारा शोर अवनि के कानों में शांत हो गया। भेड़ाघाट की वह आखिरी शाम, नर्मदा की लहरें, वे अधूरे सपने और वह पुरानी टीस—सब कुछ एक पल में आंखों के सामने कौंध गया। लेकिन इस बार अर्णव की आंखों में वह पुराना सूनापन या शिकायत का भाव नहीं था।
अर्णव ने देखा कि अवनि के एक हाथ में उसका छोटा सा बच्चा था और दूसरे कंधे पर तन्मय का स्नेहिल हाथ रखा हुआ था। अवनि के चेहरे पर एक भरे-पूरे, सम्मानित और संतुष्ट परिवार की मालकिन होने का तेज था। अर्णव ने अपनी जगह पर खड़े होकर अवनि की तरफ देखा और दोनों हाथ जोड़कर बहुत ही आदर और कृतज्ञता के साथ सिर झुका दिया। उसकी उस शांत और गरिमामयी मुस्कान में यह संदेश साफ पढ़ा जा सकता था—’तुमने जो रास्ता चुना था, वह सही था। तुमने अपने परिवार को स्वर्ग बनाया और तुम्हारे उसी त्याग ने मुझे अपने दर्द को संगीत में बदलकर इस मुकाम तक पहुंचने की ताकत दी। मैं खुश हूं कि तुम खुश और सुरक्षित हो।’
अवनि की आंखों के कोरों से एक बूंद आंसू ढुलक कर गाल पर आ गिरा, लेकिन वह आंसू किसी दुख या पछतावे का नहीं था, बल्कि मुक्ति और असीम शांति का था। अवनि ने भी हल्के से मुस्कुराकर सिर हिलाया और तन्मय का हाथ और अधिक मजबूती से थाम लिया।
उस रात घर लौटते समय अवनि ने कार की खिड़की से बाहर चमकते तारों को देखा। उसके मन का सारा बोझ, बरसों से दबा अपराधबोध और हर अधूरापन हमेशा के लिए धुल चुका था। वह समझ गई थी कि जीवन की खूबसूरती सिर्फ उन सपनों में नहीं होती जो हम अपनी बंद आंखों से देखते हैं, बल्कि उन रिश्तों की खुशहाली में होती है जिन्हें हम अपने त्याग, धैर्य और निष्ठा से सींचते हैं। उसकी कहानी अधूरी होकर भी पूरी हो चुकी थी, क्योंकि उसने टूटना नहीं, सबको जोड़कर एक सुंदर संसार बनाना सीखा था।
एक स्त्री जब अपने व्यक्तिगत प्रेम की आहुति देकर अपने माता-पिता के सम्मान और एक नए परिवार की नींव को मजबूत बनाती है, तो उसका वह त्याग किसी तपस्या से कम नहीं होता। क्या आपको लगता है कि जीवन में कभी-कभी अपनों की खुशी और मर्यादा के लिए अपने सपनों की कुर्बानी देना सही निर्णय होता है? अपनी राय और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!
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