“और उस मां का क्या, जिसका दिल तुमने पिछले दस सालों से हर रोज छलनी किया है?” प्रणव ने गरजते हुए कहा। “तुम्हें शर्म नहीं आती अपनी उस मां को लापरवाह कहते हुए, जो अपने टूटे हुए घुटनों के बावजूद तुम्हारे बच्चे के लिए फर्श पर घिसटती हुई आई? जरा देखो उनके पैरों की तरफ! खून बह रहा है उनके घुटने से, लेकिन उन्होंने अपने दर्द की उफ तक नहीं की और तुम्हारे बच्चे का सिर अपने आंचल में छुपा रखा है। और तुम… तुम एक पत्थर दिल, खुदगर्ज औरत की तरह उन पर ही दोष मढ़ रही हो!”
दीवाली के त्योहार में अभी बमुश्किल चार दिन बाकी थे, लेकिन घर के माहौल में त्योहारी उमंग से कहीं ज्यादा एक थकी हुई खामोशी तैर रही थी। आंगन में रखे गमलों को एक तरफ सरकाते हुए पैंसठ वर्षीय विश्वंभर जी ने जब बैठक की ओर नजर दौड़ाई, तो उनका माथा ठनक गया। सोफे पर तकिए के सहारे आंखें मूंदे, कानों में हेडफोन लगाए उनकी बत्तीस वर्षीय बेटी गरिमा बड़े आराम से लेटी हुई थी। टीवी पर कोई अंग्रेजी फिल्म म्यूट पर चल रही थी और कमरे के फर्श पर उसके दोनों छोटे बच्चों के खिलौने, खाली चिप्स के पैकेट और पानी की खाली बोतलें बिखरी पड़ी थीं।
रसोई की दिशा से आ रही लगातार बर्तनों के खड़कने और भारी सांसों की आवाज सुनकर विश्वंभर जी से रहा नहीं गया। वे भारी कदमों से बैठक में दाखिल हुए और पंखे की गति थोड़ी धीमी करते हुए कड़े स्वर में बोले, “गरिमा! आंखें खोलो और देखो जरा। तुम्हारी मां सुबह पांच बजे से रसोई में खड़ी-खड़ी खट रही है। अब इस ढलती उम्र में इतना काम उसके बूते का नहीं रहा। तुम अपने दोनों बच्चों को भी उसी के मत्थे मढ़कर दिन-भर अपनी पुरानी सहेलियों के साथ बाजारों और कैफे में मटरगश्ती करती फिरती हो। तुम्हें यह बुनियादी बात समझ क्यों नहीं आती कि चार और छह साल के दो शैतान बच्चों को संभालना उस साठ साल की बूढ़ी औरत के बस की बात नहीं है? तुम्हें अच्छी तरह मालूम है कि उसके दोनों घुटनों में ऑस्टियोआर्थराइटिस है, डॉक्टर ने आधा घंटा भी लगातार खड़े रहने से सख्त मना किया है। अगर वो दिन में ज्यादा काम कर ले, तो दर्द के मारे रात भर करवटें बदलती रहती है और तुम यहां बेपरवाह सोफे पर पसरी हो!”
गरिमा ने हेडफोन का एक सिरा कान से हटाया, एक लंबी जम्हाई ली और बेहद लापरवाही से बोली, “ओह पापा! आप भी ना बिना बात का तनाव पालते रहते हैं। मैं यहां कोई मजदूरी करने या चौका-चूल्हा संभालने नहीं आई हूं। ससुराल की रोज-रोज की चिकचिक से थककर चार दिन मायके आराम करने आई हूं। अब क्या एक मां अपनी ही बेटी और नाती-पोतों के लिए इतना भी नहीं कर सकती? वैसे भी मां की तो आदत है दिन भर कुछ न कुछ रगड़ते रहने की। अगर मैं कहूंगी कि रहने दो, तो भी वो बैठेंगी थोड़ी? वो हमेशा से ही घर का सारा काम खुद करती आई हैं, अब इसमें मेरा क्या कसूर?”
विश्वंभर जी ने गहरी सांस भरी। उन्हें अपनी बेटी से किसी संवेदनशील जवाब की उम्मीद वैसे भी नहीं थी। गरिमा बचपन से ही बेहद लापरवाह और आत्ममुग्ध स्वभाव की थी। उसे केवल अपनी खुशियों, अपनी सहूलियतों और अपनी मर्जी से मतलब रहता था। जब भी कोई काम की बात होती, वह बड़ी चतुराई से पल्ला झाड़ लेती। विश्वंभर जी ने हमेशा अपनी पत्नी यशोदा को समझाने की कोशिश की थी कि वे गरिमा को बचपन से इतनी ढील न दें। वे अक्सर कहते थे, “यशोदा, गरिमा को भी घर के थोड़े बहुत काम में लगाया करो। उसे सिखाओ कि जिम्मेदारियां कैसे निभाई जाती हैं। तुम सब काम खुद अपने सिर पर ले लेती हो, यही वजह है कि वह इतनी बेपरवाह हो गई है। कल को दूसरे घर जाएगी तो कैसे निभाएगी? गृहस्थी का सलीका हर किसी को आना चाहिए।”
लेकिन यशोदा जी हमेशा अपनी ममता के आंचल में बेटी की कमियों को छुपा लेती थीं। वे पति के गुस्से को शांत करते हुए कहतीं, “अरे छोड़िए भी जी! अभी बच्ची है, चार दिन हमारे आंगन में चहक ले, अपनी मर्जी से जी ले। ससुराल जाएगी तो जिंदगी भर चूल्हा-चौका ही तो संभालना है। वहां तो अपने आप सब करना ही पड़ेगा।” लेकिन यशोदा जी के दिल के किसी कोने में यह डर भी था कि अगर वे गरिमा से कुछ कहेंगी, तो वह सुनने के बजाय उल्टा चार बातें सुनाकर मुंह फुला लेगी और पूरा घर सिर पर उठा लेगी।
विश्वंभर जी और यशोदा जी के दो बच्चे थे—बड़ा बेटा प्रणव और छोटी बेटी गरिमा। दोनों बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए विश्वंभर जी ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। कॉलेज के दिनों में दोनों हॉस्टल में रहकर पढ़े थे। वहां हॉस्टल में गरिमा अपने कपड़े धोने से लेकर कमरे की सफाई तक मजबूरी में कर लेती थी, लेकिन छुट्टी में घर आते ही उसके हाथ-पैर जैसे काम करना बंद कर देते थे। सारा दिन कमरे में बंद रहना, गाने सुनना, सहेलियों से फोन पर गप्पें लड़ाना और हुक्म चलाना ही उसकी दिनचर्या बन जाती थी। वहीं बेटा प्रणव बिल्कुल अलग था। वह जब भी छुट्टियों में घर आता, तो मां को जरा सा भी थका देखकर खुद चाय बनाने लगता, बाजार से सब्जी-राशन लाने में जुट जाता और पिता के कामों में हाथ बंटाता।
जब भी विश्वंभर जी गरिमा के इस आलस पर उसे डांटते, तो गरिमा अपनी मां पर ही बरस पड़ती, “अरे मां, दुनिया की सारी मांएं अपने बच्चों के लिए करती हैं! आपने कोई मुझ पर अहसान थोड़ी कर दिया है जो दिन-रात सुना-सुनाकर ताने दिलवाती हो। अगर इतना ही भारी पड़ता है, तो बता दो, मैं भूखी रह लूंगी।” यशोदा जी बेटी की कड़वी जबान सुनकर सहम जाती थीं और बात को रफा-दफा करने के लिए खुद ही सारा काम निबटाने लगती थीं। वे सोचती थीं कि शायद शादी के बाद जब खुद के घर की जिम्मेदारी सिर पर पड़ेगी, तो गरिमा में समझदारी आ जाएगी।
मगर शादी के बाद गरिमा सुधरने के बजाय और भी ज्यादा ढीठ और गैर-जिम्मेदार हो गई। चंडीगढ़ से कुछ ही दूरी पर अंबाला में उसका ब्याह हुआ था। ससुराल एक अच्छा-खासा, भरा-पूरा परिवार था। पति मयंक एक प्रतिष्ठित कंपनी में इंजीनियर था और सास-ससुर बेहद सीधे-सादे थे। लेकिन गरिमा को ससुराल की जरा सी भी जिम्मेदारी उठाना पहाड़ जैसा लगता था। जब भी घर में कोई पूजा-पाठ होती, मेहमान आते या काम का बोझ बढ़ता, गरिमा किसी न किसी बात पर झगड़ा खड़ा कर देती और बच्चों को लेकर मायके आकर बैठ जाती।
मायके आते ही वह पूरी तरह छुट्टियां मनाने के मूड में आ जाती। दोनों बच्चों को अपनी बूढ़ी मां के भरोसे छोड़कर वह पूरे दिन ब्यूटी पार्लर, शॉपिंग मॉल और क्लबों में वक्त बिताती। बच्चे दिन भर घर में ऊधम मचाते, कभी दूध गिराते, कभी सामान तोड़ते और यशोदा जी घुटनों का दर्द दबाए उनके पीछे-पीछे दौड़ती रहतीं। अगर यशोदा जी कभी थककर कह देतीं, “गरिमा, जरा बच्चों को संभाल ले, मेरी कमर में बहुत दर्द हो रहा है,” तो गरिमा का पारा चढ़ जाता। वह झट से ताना मार देती, “क्या मां! मैं ससुराल में खट-खट कर थक जाती हूं, इसलिए दो घड़ी चैन की सांस लेने मायके आती हूं। और आप अपना रोना लेकर बैठ जाती हो। मेरी सहेलियों की मांएं तो अपनी बेटियों के लिए पलकें बिछाकर रखती हैं, एक आप हो कि आते ही काम की लिस्ट थमा देती हो!”
विश्वंभर जी का बेटा प्रणव और बहू स्वाति बेंगलुरु में एक प्रतिष्ठित आईटी फर्म में कार्यरत थे। स्वाति बहुत ही सुलझी हुई, संस्कारी और समझदार लड़की थी। जब भी वे दोनों त्योहारों या छुट्टियों पर घर आते, तो स्वाति सीधे रसोई की कमान संभाल लेती। वह अपनी सास यशोदा जी को जबरदस्ती आराम करने भेज देती और कहती, “मां जी, जब तक मैं यहां हूं, आप रसोई में कदम भी नहीं रखेंगी। साल भर आप दोनों अकेले रहते हैं, अब कुछ दिन हमें अपनी सेवा का मौका दीजिए।”
इस बार दीवाली के मौके पर गरिमा धनतेरस से चार दिन पहले ही अपने दोनों बच्चों के साथ मायके आकर जम गई थी। उसका पति मयंक और उसकी सास अंबाला में अकेले थे, क्योंकि गरिमा ने वहां दीवाली की सफाई और पकवान बनाने के झंझट से बचने के लिए मायके का रुख कर लिया था।
अगले दिन सुबह की ट्रेन से प्रणव और स्वाति भी घर पहुंच गए। घर में कदम रखते ही जब स्वाति ने देखा कि गरिमा सोफे पर पांव फैलाए मोबाइल में व्यस्त है और रसोई में यशोदा जी पसीने से लथपथ होकर दीवाली के लिए मठरी और शकरपारे तल रही हैं, तो स्वाति का मन खट्टा हो गया।
औपचारिक कुशलक्षेम पूछने के बाद स्वाति ने बहुत ही सहज लेकिन गंभीर आवाज में गरिमा से कहा, “अरे गरिमा दीदी! आप दीवाली पर यहां आ गईं? जीजाजी और आपकी सासू मां इतने बड़े पावन पर्व पर अंबाला में अकेले हैं? दीवाली तो साल का सबसे बड़ा त्योहार होता है, इस मौके पर तो पूरे परिवार का साथ होना ही त्योहार की असली रौनक बढ़ाता है। सासू मां की भी उम्र हो गई है, अकेले इतना बड़ा घर और त्योहार कैसे संभालेंगी?”
गरिमा ने अपनी भौहें सिकोड़ीं और तुनककर बोली, “भाभी, आप मुझे गृहस्थी का पाठ मत पढ़ाइए। मयंक को पता है कि मुझे भीड़-भाड़ और दीवाली की वो फालतू की खटपट पसंद नहीं है। और सासू मां को तो आदत है अकेले सब करने की। मुझे मायके आने के लिए किसी के परमिशन की जरूरत नहीं है।”
स्वाति ने कुछ नहीं कहा, उसने चुपचाप अपना बैग कमरे में रखा, कपड़े बदले और सीधे रसोई में जाकर अपनी सास के हाथ से झंझरा ले लिया। “मां जी, बस बहुत हो गया। चलिए बाहर निकलिए और जाकर आराम से बैठिए। अब बाकी का सारा काम मैं संभालूंगी।” यशोदा जी ने राहत की सांस ली, उनकी आंखों में अपनी बहू के लिए बेपनाह प्यार उमड़ आया।
दोपहर का खाना खाने के बाद सब लोग आराम कर रहे थे। तभी अचानक बैठक से एक तेज चीख सुनाई दी।
गरिमा का छोटा बेटा सीढ़ियों से उतरते वक्त फिसल गया था और उसके सिर पर गहरी चोट लग गई थी। फर्श पर खून की बूंदें टपक रही थीं और बच्चा जोर-जोर से रो रहा था। यशोदा जी, जो उस वक्त कमरे में लेटी थीं, बच्चे की चीख सुनकर बदहवास होकर भागीं। घुटनों की तकलीफ के बावजूद उन्होंने इतनी तेजी से कदम बढ़ाए कि दहलीज से उनका पैर टकराया और वे खुद भी बुरी तरह लड़खड़ाकर गिर पड़ीं। लेकिन अपने दर्द की परवाह किए बिना वे घिसटते हुए बच्चे के पास पहुंचीं, उसे सीने से चिपकाया और आंचल से उसका बहता खून दबाने लगीं।
गरिमा जो अपने कमरे में इत्मीनान से ऑनलाइन शॉपिंग देख रही थी, हड़बड़ाकर बाहर आई। उसने जब अपने बेटे को खून से लथपथ देखा, तो उसका होश उड़ गया। लेकिन अपने बच्चे को संभालने या डॉक्टर के पास ले जाने की सुध लेने के बजाय, वह सीधे अपनी मां पर चीखने लगी, “मां! आपको एक काम सौंपा था कि बच्चों पर नजर रखना! आप से इतना सा काम भी नहीं हुआ? अगर मेरे बच्चे को कुछ हो जाता तो? आप पूरे दिन बिस्तर पर पड़ी रहती हैं, दो बच्चों को नहीं संभाल सकतीं तो कह क्यों नहीं देतीं? कितनी लापरवाह हैं आप!”
यशोदा जी के घुटने से खून रिस रहा था, उनका चेहरा दर्द से सफेद पड़ चुका था, पर वे कुछ नहीं बोलीं, बस कांपते हाथों से अपने नाती के सिर को दबाए रखी थीं।
कमरे में खड़े प्रणव का सब्र अब पूरी तरह टूट चुका था। उसने आगे बढ़कर गरिमा के हाथ से बच्चे को लिया और स्वाति को प्राथमिक उपचार का डिब्बा लाने को कहा। फिर वह मुड़ा और गरिमा की आंखों में आंखें डालकर एक ऐसी दहाड़ लगाई कि पूरा घर कांप गया।
“बस गरिमा! एक शब्द और नहीं! अपनी इस जहरीली जुबान को अब यहीं लगाम दो!” प्रणव की आंखें गुस्से से लाल थीं।
गरिमा हकबका गई, “भैया… आप मुझ पर चिल्ला रहे हैं? मेरा बच्चा घायल हुआ है!”
“और उस मां का क्या, जिसका दिल तुमने पिछले दस सालों से हर रोज छलनी किया है?” प्रणव ने गरजते हुए कहा। “तुम्हें शर्म नहीं आती अपनी उस मां को लापरवाह कहते हुए, जो अपने टूटे हुए घुटनों के बावजूद तुम्हारे बच्चे के लिए फर्श पर घिसटती हुई आई? जरा देखो उनके पैरों की तरफ! खून बह रहा है उनके घुटने से, लेकिन उन्होंने अपने दर्द की उफ तक नहीं की और तुम्हारे बच्चे का सिर अपने आंचल में छुपा रखा है। और तुम… तुम एक पत्थर दिल, खुदगर्ज औरत की तरह उन पर ही दोष मढ़ रही हो!”
विश्वंभर जी भी कमरे में आ चुके थे। उन्होंने प्रणव को शांत करना चाहा, लेकिन प्रणव आज रुकने वाला नहीं था।
प्रणव ने गरिमा के सामने आकर बहुत ही तीखे स्वर में कहा, “गरिमा, मायका बेटियों का मान होता है, उनका सुकून होता है, लेकिन तुमने इस मायके को अपनी जिम्मेदारियों से भागने का अड्डा बना लिया है! जब भी ससुराल में कोई काम होता है, तुम मुंह उठाकर यहां आ जाती हो ताकि तुम्हें हाथ न हिलाना पड़े। तुम यहां अपनी मां से मिलने या उनका सुख-दुख बांटने नहीं आतीं, बल्कि उन्हें एक मुफ्त की नौकरानी और आया समझकर इस्तेमाल करने आती हो! तुमने कभी सोचा है कि जब तुम यहां आकर सोफे पर हुक्म चलाती हो, तो इस साठ साल की बूढ़ी मां पर क्या बीतती है?”
गरिमा की नजरें झुकने लगीं, लेकिन उसका अहंकार अभी भी जिंदा था। उसने दबी आवाज में कहा, “भैया, बेटियां तो मायके में लाडली होती हैं…”
“लाडली वो होती हैं गरिमा, जो मायके आकर मां का सहारा बनती हैं, उनका बोझ नहीं!” स्वाति ने बच्चे की पट्टी करते हुए बहुत ही सधे हुए अंदाज में बात काटी। स्वाति की आवाज में कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक ऐसी सच्चाई थी जो सीधे अंतरात्मा को चीरती थी।
स्वाति आगे आई और उसने बहुत आदर से गरिमा से कहा, “दीदी, एक बात का जवाब दीजिए। आज आपके दो बच्चे हैं। आपने उन्हें नौ महीने कोख में रखा है, उनकी हर तकलीफ पर आपका कलेजा कांपता है। अगर कल को आपकी बेटी बड़ी हो जाए, उसकी शादी हो जाए, और वो आपके बुढ़ापे में, जब आपके हाथ-पैर कांप रहे हों, अपने बच्चों को आपके सिर पर पटककर खुद मौज-मस्ती करने निकल जाए… और जब आप थककर बैठें तो वो आप पर चिल्लाए कि ‘आपने मेरे लिए किया ही क्या है’, तो उस दिन आपके दिल पर क्या गुजरेगी दीदी?”
स्वाति का यह सवाल गरिमा के सीने में किसी बरछी की तरह उतर गया। उसके कानों में स्वाति के शब्द गूंजने लगे—’कल को जब आपकी बेटी आपके साथ ऐसा करेगी…’
गरिमा की नजरें अचानक अपनी मां की ओर उठ गईं।
फर्श पर बैठी यशोदा जी दर्द से कराह रही थीं, उनके चेहरे पर पसीने की बूंदें थीं, उनके घुटने से खून रिस रहा था, लेकिन उनकी आंखें अभी भी अपने नाती की मरहम-पट्टी की तरफ लगी हुई थीं। उस चेहरे पर न अपनी बेटी के लिए कोई गुस्सा था, न कोई शिकायत। उस चेहरे पर सिर्फ और सिर्फ एक अंतहीन, निस्वार्थ ममता का समंदर था जो अपनी नालायक बेटी के हर जहर को अमृत समझकर पी चुका था।
गरिमा के सामने उसका पूरा अतीत एक चलचित्र की तरह घूमने लगा।
उसे याद आया कि जब वह दसवीं क्लास में थी और रात को पढ़ती थी, तो मां कैसे बिना मांगे गर्म दूध का गिलास लेकर उसके सिरहाने बैठ जाती थीं। जब उसकी शादी तय हुई थी, तो मां ने अपनी बरसों पुरानी सोने की चूड़ियां बेच दी थीं ताकि बेटी को एक सुंदर हार पहना सकें। जब वह पहली बार मां बनने वाली थी, तो यही मां दो महीने तक उसके ससुराल में एक कोने में बैठकर उसकी सेवा करती रही थी ताकि बेटी को कोई तकलीफ न हो। और बदले में उसने अपनी मां को क्या दिया? सिर्फ तिरस्कार, ताने, उपेक्षा और अपने आलस का बोझ!
गरिमा के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसके अहंकार का मजबूत किला भरभराकर ढह गया। उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।
वह लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ी और सीधे अपनी मां के चरणों में गिर पड़ी। उसने अपने दोनों हाथों से यशोदा जी के घायल घुटनों को थाम लिया और अपना सिर उनकी गोद में रखकर बच्चों की तरह बिलख-बिलख कर रोने लगी।
“मां… मुझे माफ कर दो मां! मैं बहुत पापिनी हूं… मैंने तुम्हें कभी समझा ही नहीं मां!” गरिमा की सिसकियों से पूरा कमरा भर गया। “मैं कितनी खुदगर्ज, कितनी अंधी हो गई थी। मैंने अपनी ममता की खातिर तुम्हारी ममता का गला घोंट दिया। मैं तुम्हें सुकून देने के बजाय तुम्हारी बची हुई सांसों को भी निचोड़ती रही। मुझे सजा दो मां, मुझे मारो, पर प्लीज मुझे इस तरह मत देखो… मैं तुम्हारे लायक बेटी नहीं बन पाई मां!”
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। विश्वंभर जी की आंखें भी डबडबा आईं।
यशोदा जी ने अपने कांपते हाथों से अपनी बेटी का सिर उठाया। मां की ममता का दिल कितना विशाल होता है, यह उस पल उस कमरे में मौजूद हर इंसान ने देखा। यशोदा जी ने अपनी साड़ी के पल्लू से गरिमा के आंसू पोंछे और उसे खींचकर अपनी छाती से लगा लिया।
“अरे मेरी लाडो… मां भी कभी अपनी बच्ची से नाराज होती है क्या? तू तो मेरा कलेजा है। बस तू सुखी रहे, अपने घर को संवार कर रखे, मेरे लिए इससे बड़ा कोई सुख नहीं है। रो मत पगली, दीवाली के दिन लक्ष्मी के कदम पड़ते हैं, ऐसे आंसू नहीं बहाते।”
प्रणव और स्वाति ने एक-दूसरे की ओर देखा। स्वाति की आंखें भी नम थीं, पर उसके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी।
गरिमा ने उठकर अपनी भाभी स्वाति के हाथ पकड़ लिए, “भाभी, आज आपने मुझे एक बहुत बड़े पाप के दलदल में धंसने से बचा लिया। अगर आज आपने मुझे यह आईना न दिखाया होता, तो मैं कभी अपनी गलती नहीं समझ पाती। आपने मुझे सिखाया कि एक बहू होकर भी बेटी का फर्ज कैसे निभाया जाता है, जबकि मैं सगी बेटी होकर भी पराई बनी रही।”
स्वाति ने गरिमा को गले से लगाते हुए कहा, “दीदी, मायका हमेशा आपका है और रहेगा। लेकिन जब हम अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समझ लेते हैं, तभी रिश्तों की मिठास हमेशा बनी रहती है।”
उस शाम ‘आनंद कुटीर’ का रंग-ढंग पूरी तरह बदल चुका था।
गरिमा ने अपने हाथ से अपनी मां के घुटने पर दवा लगाई और उन्हें बिस्तर पर लिटाकर जबरदस्ती आराम करने को कहा। फिर उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और स्वाति के साथ मिलकर पूरे घर की सफाई, पकवान बनाने और दीवाली की तैयारियों में जुट गई। बच्चों को प्यार से समझाकर उसने उन्हें अपनी देखरेख में रखा।
अगले दिन धनतेरस की सुबह, गरिमा ने अपने पति मयंक को फोन मिलाया।
“मयंक, आप और मां जी आज शाम की गाड़ी से चंडीगढ़ आ रहे हैं। इस बार की दीवाली हम सब मिलकर एक साथ यहीं आनंद कुटीर में मनाएंगे। और हां, दीवाली के बाद मैं आपके साथ अंबाला चलकर मां जी के साथ मिलकर पूरे घर की नई शुरुआत करूंगी।”
मयंक ने जब फोन पर गरिमा की आवाज में वह अनोखा ठहराव, मिठास और आदर सुना, तो उसे अपनी कानों पर यकीन नहीं हुआ।
दीवाली की रात जब दीयों की जगमगाहट से पूरा आंगन नहा उठा, तो उस घर में केवल मिट्टी के दीये ही नहीं जले थे, बल्कि एक भटकी हुई बेटी की चेतना में संस्कारों और ममता की वह पावन लौ भी जल उठी थी, जो कभी बुझने वाली नहीं थी। विश्वंभर जी और यशोदा जी के चेहरों पर बरसों बाद एक सच्चा, निश्चिंत और स्वर्गीय सुकून तैर रहा था।
मायका हर बेटी का हक और उसका सबसे सुरक्षित आशियाना होता है, लेकिन क्या बेटियों को यह नहीं समझना चाहिए कि बुढ़ापे में माता-पिता को सेवा और आराम की दरकार होती है, न कि अतिरिक्त जिम्मेदारियों के बोझ की? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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