रिश्ते कभी खून के मोहताज नहीं होते

 उस दिन वंदना ने पूरे मोहल्ले में, हर एक घर में जाकर शुद्ध देसी घी के मोदक और मिठाइयां बांटीं। जब पड़ोसनों ने पूछा, “अरे वंदना, आज किस बात की इतनी खुशी है? सतीश भाई साहब के ठीक होने की या किसी और बात की?”

तो वंदना ने गर्व से सिर उठाकर, नम आँखों से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मेरी नानी कहती थीं कि बेटा पैदा होने पर कभी मिठाई मत बांटना, शादी होने पर भी मत बांटना, मिठाई तब बांटना जब घर में एक अच्छी बहू आ जाए। आज मैं अपनी नानी की उस बात को पूरा कर रही हूँ। आज मैं अपनी बहू के मान, उसके संस्कारों और उसके बेटी जैसे प्यार के नाम की मिठाई बांट रही हूँ!”

  वंदना को जब स्ट्रेचर पर लिटाकर लेबर रूम की ओर ले जाया जाने लगा, तो उसके चेहरे पर प्रसव पीड़ा के साथ-साथ एक गहरा मानसिक द्वंद्व भी साफ दिखाई दे रहा था। उसके माथे पर पसीने की ठंडी बूंदें चमक रही थीं। स्ट्रेचर के पहियों की खड़खड़ाहट जैसे उसके दिल की धड़कनों से ताल मिला रही थी।

अस्पताल की मुख्य स्त्री रोग विशेषज्ञ, डॉक्टर नीरजा, अपने हाथों में दस्ताने चढ़ाते हुए वंदना का हौसला बढ़ाने के लिए उसके करीब आईं। डॉक्टर नीरजा का स्वभाव बेहद आत्मीय था। मरीजों के डर को भगाना और उनके चेहरे पर मुस्कान लाना उनका रोज़ का काम था। वंदना के पसीने से भीगे बालों को सहलाते हुए उन्होंने एक हल्की सी मुस्कान बिखेरी और बात का रुख मोड़ने के लिए मज़ाकिया लहजे में पूछा, “हिम्मत रखो वंदना, बस कुछ ही पलों की बात है। वैसे मन में क्या चल रहा है? घर में किसकी आमद की दुआएं मांगी जा रही हैं? नन्हा राजकुमार या फिर कोई नन्हीं राजकुमारी?”

वंदना ने दर्द से अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। उसने अपनी थकी हुई, भीगी आँखों से डॉक्टर नीरजा की ओर देखा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था, कोई हड़बड़ाहट नहीं थी। वह धीमी मगर साफ आवाज़ में बोली, “डॉक्टर साहिबा, अगर ऊपर वाला मेरी सुने, तो मेरी गोद में बस एक बेटी डाल दे। मुझे सिर्फ और सिर्फ लड़की चाहिए।”

डॉक्टर नीरजा को उसकी बात सुनकर गहरा अचरज हुआ। आज के दौर में भी जब अस्पताल के बाहर खड़े परिवार अक्सर कान लगाकर बेटे की किलकारी सुनने को बेताब रहते हैं, वहाँ एक माँ का इतने दृढ़ विश्वास से केवल बेटी मांगना सचमुच चौंकाने वाला था। डॉक्टर नीरजा ने कौतूहल से पूछा, “अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी सोच है, लेकिन तुम्हारे चेहरे पर खुशी से ज्यादा एक दर्द दिखाई दे रहा है। आमतौर पर लोग कहते हैं कि जो भी हो स्वस्थ हो, पर तुम इतनी जिद से बेटी ही क्यों मांग रही हो? कोई खास वजह?”

वंदना की आँखों के कोर से एक बूंद फिसलकर तकिए में समा गई। उसने एक गहरी सांस ली और अपने भीतर उमड़ रहे दर्द को लफ़्ज़ों में ढालते हुए कहा, “मैडम, यह जिद नहीं है, यह एक डर है जो मैंने अपने इर्द-गिर्द की दुनिया को देखकर अपने सीने में पाला है। जब तक इंसान के हाथ-पैर चलते हैं, शरीर में खून का दौरा रहता है और जेब में ताकत होती है, तब तक तो दुनिया साथ खड़ी रहती है। पर बुढ़ापे की जो लाचारी होती है ना डॉक्टर साहिबा, वह इंसान को तिल-तिल कर मारती है। कल को अगर बेटा हुआ, उसकी शादी हुई, तो बहू मुझे बुढ़ापे में दो घूंट पानी पूछेगी या नहीं, इसका कोई भरोसा नहीं है। लेकिन अगर एक बेटी होगी, तो चाहे वह सात समंदर पार भी ब्याही जाए, अपने बूढ़े माँ-बाप का हाल पूछने के लिए दिन में एक बार फोन ज़रूर घुमाएगी।”

डॉक्टर नीरजा चुपचाप उसकी बातें सुन रही थीं। वंदना आगे बोली, “आज का जमाना कितना बदल चुका है मैडम। बेटी की शादी करो, तो दस-बीस लाख रुपये में हँसी-खुशी अपनी हैसियत के हिसाब से इंसान उसका कन्यादान कर देता है, उसका घर बसा देता है। पर बेटों के मामले में क्या हो रहा है? आजकल की शादियों में लाखों-करोड़ों बहाने के बाद भी गारंटी नहीं है। छोटी-छोटी बातों पर, अहं के टकराव में, लड़कियाँ तुरंत मायके भाग जाती हैं, तलाक और कोर्ट-कचहरी की धमकियाँ देने लगती हैं। झूठे मुकदमों और पुलिस की चौखट के जो चक्कर लगते हैं, वो शादी के खर्चे से कहीं ज्यादा महंगे और रूह को तोड़ देने वाले दुखदाई होते हैं। पूरा का पूरा खानदान तिल-तिल कर जलता है।”

वंदना ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसकी स्मृति में अपनी नानी का चेहरा घूम गया। उसने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, “बचपन में जब मैं अपने ननिहाल जाती थी, तो मेरी नानी हमेशा एक बात कहा करती थीं। वह कहती थीं—’अरी वंदना, इस दुनिया की रीत बड़ी अजीब है। अगर घर में बेटा पैदा हो, तो कभी गाँव भर में मिठाई मत बांटना। जब उस बेटे की धूमधाम से शादी करो, तब भी मिठाई मत बांटना। अपनी खुशी का ढिंढोरा केवल उस दिन पीटना जब उस बेटे की बहू तुम्हारे घर की दहलीज पर कदम रखे और वह सच में एक अच्छी, संस्कारी और घर को जोड़ने वाली साबित हो। अगर बहू अच्छी निकल आई, तभी मिठाई बांटना, क्योंकि वही तुम्हारे बुढ़ापे की असली ढाल बनेगी।’ नानी की वह बात आज मेरे कानों में गूंजती है मैडम। जमाना इतना स्वार्थी हो गया है कि अब माँ-बाप के लिए बेटियाँ, बेटों और बहुओं से कहीं ज्यादा भरोसेमंद सहारा बन गई हैं।”

डॉक्टर नीरजा ने वंदना के कांपते हाथों को अपने हाथों में थामा। उन्होंने एक गहरी सांस ली और बोलीं, “वंदना, तुम्हारा डर बेबुनियाद नहीं है। समाज के कड़वे अनुभवों ने तुम्हारी सोच को यह रूप दिया है। लेकिन हर तस्वीर का सिर्फ एक ही पहलू नहीं होता। इंसान की परवरिश और उसके भीतर बोए गए संस्कार ही अंततः उसकी तकदीर और उसके रिश्तों की दिशा तय करते हैं। तुम शांत हो जाओ, ऊपर वाला जो भी देगा, बहुत सुंदर और उत्तम देगा।”

कुछ ही पलों बाद वंदना को ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया। दवाइयों के असर, डॉक्टरों की मेहनत और कुदरत के करिश्मे के बीच, करीब पैंतालीस मिनट बाद कमरे में एक नन्ही किलकारी गूंज उठी।

डॉक्टर नीरजा ने बच्चे को साफ़ करके जब वंदना के चेहरे के सामने किया, तो मुस्कुराते हुए कहा, “बधाई हो वंदना! तुम्हारी गोद में एक बहुत ही सुंदर, स्वस्थ बेटा आया है।”

वंदना ने उस मासूम से लाल चेहरे को देखा। बच्चे की नन्हीं-नन्हीं उंगलियाँ हवा में हिल रही थीं। वंदना के सीने में मातृत्व का अथाह सागर उमड़ पड़ा, पर उस वात्सल्य के साथ ही उसके ज़हन में वही पुराना खौफ फिर से सर उठाने लगा। उसने बच्चे को सीने से तो लगाया, लेकिन मन ही मन एक अनजाना सन्नाटा छा गया। क्या यह वही बेटा है जो कल को पराया हो जाएगा? क्या इसका भविष्य भी कोर्ट-कचहरी और रिश्तों की तल्खियों की भेंट चढ़ जाएगा? क्या बुढ़ापे में मैं भी उसी लाचारी का शिकार बनूँगी जिसका डर मुझे सताता रहा है?

दिन बीतते गए, महीनों ने सालों का रूप ले लिया। वंदना और उसके पति सतीश ने अपने बेटे का नाम रखा ‘अथर्व’। वंदना ने अपने दिल के डर को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसे एक सबक की तरह लिया। उसने यह ठान लिया कि वह अथर्व को सिर्फ पढ़ा-लिखाकर एक बड़ा अफसर या पैसे कमाने की मशीन नहीं बनाएगी, बल्कि उसे एक संवेदनशील, रिश्तों की कद्र करने वाला इंसान बनाएगी।

अथर्व जैसे-जैसे बड़ा हुआ, उसने अपने घर में माँ-बाप का त्याग देखा। उसने देखा कि कैसे उसके पिता सतीश ने अपनी पुरानी मोटरसाइकिल पर जिंदगी गुजार दी ताकि उसकी स्कूल की फीस भरी जा सके। उसने देखा कि कैसे उसकी माँ वंदना ने फटी हुई साड़ियों के पल्लू सी-सीकर अपनी ख्वाहिशों को दबाए रखा ताकि घर में कभी किसी चीज़ की कमी न हो। अथर्व केवल किताबों का कीड़ा नहीं बना, वह माँ के साथ रसोई में हाथ बंटाता, पिता की थकी हुई पीठ पर तेल की मालिश करता और घर के हर छोटे-बड़े फैसले में परिवार के मान-सम्मान को सबसे ऊपर रखता।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। अथर्व ने अपनी मेहनत के दम पर भोपाल की एक प्रतिष्ठित आईटी कंपनी में एक शानदार मुकाम हासिल कर लिया। अब वह पच्चीस वर्ष का एक सुलझा हुआ, शालीन और संस्कारी युवक बन चुका था। घर के हालात बदल चुके थे। टूटा हुआ मकान अब एक पक्के, खूबसूरत आशियाने में तब्दील हो चुका था, लेकिन वंदना के मन का वह कोना आज भी पूरी तरह शांत नहीं था जो पच्चीस साल पहले अस्पताल के उस स्ट्रेचर पर थरथराया था।

अब घर में अथर्व के विवाह की चर्चाएँ शुरू हो गईं। रिश्ते आने लगे। सतीश जी चाहते थे कि किसी बड़े और रसूखदार घराने में रिश्ता किया जाए ताकि समाज में नाम हो। लेकिन वंदना के कान में आज भी अपनी नानी की वही पुरानी सीख गूंज रही थी—’मिठाई तब बांटना जब बहू अच्छी निकले।’

वंदना ने साफ कह दिया, “सतीश जी, हमें कोई दौलत, कोई गाड़ी या दहेज नहीं चाहिए। हमें बस एक ऐसी बेटी चाहिए जो इस घर को अपना समझे, जिसके दिल में रिश्तों का आदर हो। अगर घर की लक्ष्मी अहंकारी निकल आई, तो यह आलीशान मकान एक पल में नरक बन जाएगा।”

काफी खोजबीन के बाद, जबलपुर के एक साधारण, शिक्षक परिवार की लड़की ‘अन्वेषा’ का रिश्ता सामने आया। अन्वेषा सादगी पसंद, पढ़ी-लिखी और बड़ों का लिहाज करने वाली लड़की थी। जब पहली मुलाकात में अन्वेषा ने बिना किसी झिझक के वंदना के घुटने छूकर आशीर्वाद लिया और अपनी मीठी बोली से सबका दिल जीत लिया, तो वंदना को लगा जैसे उसके दिल का बोझ कुछ हल्का हो रहा है। रिश्ता तय हो गया।

शादी बेहद सादगी और पारिवारिक गरिमा के साथ संपन्न हुई। विदाई के वक्त अन्वेषा के पिता ने रोते हुए वंदना के हाथ जोड़ लिए और कहा, “बहन जी, हमने अपनी फूल जैसी बच्ची को बहुत नाज़ों से पाला है। आज से यह आपकी अमानत है। अगर इससे कोई भूल हो जाए, तो अपनी बेटी समझकर माफ कर दीजिएगा।”

वंदना ने उनके हाथ थाम लिए और कहा, “भाई साहब, आप निश्चिंत होकर जाइए। यह आपके घर से बहू बनकर विदा हो रही है, पर मेरी चौखट पर यह बेटी बनकर ही कदम रखेगी।”

शादी के शुरुआती दिन बहुत अच्छे बीते। अन्वेषा ने बहुत कम समय में पूरे घर को संभाल लिया। वह सुबह उठकर सबके लिए चाय-नाश्ता बनाती, सतीश जी की दवाइयों का ख्याल रखती और अथर्व के काम में उसका पूरा सहयोग करती। लेकिन वंदना के मन की गहराई में अविश्वास की वह पुरानी गांठ अभी भी पूरी तरह खुली नहीं थी। उसके ज़हन में बार-बार समाज की वे खबरें कौंधती थीं जहाँ शादी के कुछ महीनों बाद ही बहुएं अलग रहने की जिद करने लगती हैं, संपत्ति में हिस्सा मांगती हैं या झूठे मुकदमों की धमकी देकर परिवार को तोड़ देती हैं। वंदना अक्सर अनजाने ही अन्वेषा की हर छोटी बात को परखने लगती। अगर अन्वेषा कभी चुप रहती, तो वंदना को लगता कि शायद वह कोई षड्यंत्र रच रही है या उसका मन इस घर से उचट रहा है।

शादी को अभी छह महीने ही हुए थे कि अचानक एक दिन परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। सतीश जी की तबीयत अचानक बिगड़ी और उन्हें दिल का बहुत बड़ा दौरा पड़ा। आनन-फानन में उन्हें अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि उनकी दोनों मुख्य धमनियों में भारी ब्लॉकेज है और तुरंत एक जटिल ओपन-हार्ट सर्जरी करनी होगी। सर्जरी का खर्च और दवाइयों का बजट करीब बारह से पंद्रह लाख रुपये आंका गया था।

यह सुनते ही वंदना के पैरों तले से जमीन खिसक गई। अथर्व ने अपनी सारी बचत अस्पताल के शुरुआती दाखिले में लगा दी थी। उसके पास इतने पैसे तुरंत जुटाने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। रिश्तेदार जो शादी में बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे, अस्पताल का नाम सुनते ही फोन पर केवल सांत्वना देकर पल्ला झाड़ने लगे।

उस रात वंदना अस्पताल के वेटिंग रूम के ठंडे फर्श पर बैठकर सुबक-सुबक कर रो रही थी। उसका रोम-रोम कांप रहा था। उसके भीतर का वह पुराना डर फिर जाग उठा था। उसने मन ही मन सोचा—”बस, आ गया वह वक्त। अब देखना, नई बहू इस मुसीबत को देखकर अपने हाथ पीछे खींच लेगी। वह कहेगी कि यह तो आपके घर की मुसीबत है, मैं अपनी नई जिंदगी क्यों बर्बाद करूँ? कल को वह अपने मायके भाग जाएगी और कहेगी कि मैं ऐसे कंगाल और बीमार घर में नहीं रह सकती। अगर आज मेरी अपनी कोई बेटी होती, तो शायद वह मेरा कंधा बनती, पर यह तो बहू है…”

वंदना इन्हीं नकारात्मक विचारों के भंवर में डूब रही थी कि तभी किसी ने उसके कांधे पर एक गर्म शॉल डाल दी। वंदना ने चौंककर सिर उठाया। सामने अन्वेषा खड़ी थी। उसकी आँखें जागी हुई थीं, पर उसके चेहरे पर एक गजब का हौसला और दृढ़ता थी।

अन्वेषा ने बिना एक पल गंवाए अपने दोनों हाथों से एक मखमली थैली निकाली और वंदना की गोद में रख दी। वंदना ने कांपते हाथों से थैली खोली, तो उसकी आँखें फटी रह गईं। उसमें अन्वेषा के सारे सोने के गहने रखे हुए थे—वे सारे कंगन, हार और पाजेब जो उसके माता-पिता ने जीवन भर की पूंजी जोड़कर अपनी इकलौती बेटी को शादी में दिए थे।

वंदना हक्की-बक्की रह गई। उसने रुंधे गले से कहा, “यह… यह क्या है अन्वेषा? यह तेरे गहने हैं, तेरी स्त्रीधन की अमानत हैं। तू यह मुझे क्यों दे रही है?”

अन्वेषा तुरंत घुटनों के बल फर्श पर बैठ गई और उसने वंदना के दोनों कांपते हाथों को अपने सीने से लगा लिया। अन्वेषा की आँखों से आँसू बह निकले, पर उसकी आवाज़ में चट्टान जैसी मजबूती थी।

अन्वेषा ने कहा, “माँ जी, यह सिर्फ धातु के टुकड़े हैं। इनकी कीमत तब है जब यह परिवार सुरक्षित है। अगर बाबूजी की सांसें ही नहीं रहेंगी, अगर आपका सुहाग और इस घर की छत ही डगमगा जाएगी, तो मैं इन सोने की चूड़ियों का क्या करूँगी? क्या मैं इन्हें पहनकर अपनी खुशियों का ढोंग रचूँगी?”

वंदना अवाक होकर अपनी बहू का चेहरा देख रही थी।

अन्वेषा ने आगे कहा, “माँ, मैं जानती हूँ कि आप अक्सर मुझे देखकर एक अजीब से असमंजस में पड़ जाती थीं। मुझे पता है कि आज के समाज ने आपके दिल में बहुओं के प्रति कितना खौफ भर दिया है। आप हमेशा सोचती थीं कि बहुएं पराए घर से आती हैं, वे केवल सुख की साथी होती हैं और ज़रा सी मुसीबत आते ही घर तोड़कर अलग हो जाती हैं। पर माँ, हर लड़की एक जैसी नहीं होती। मेरी माँ ने मुझे विदा करते वक्त सिर्फ एक ही बात सिखाई थी—’बेटी, जिस घर की चौखट पर तुम्हारा सिंदूर सजे, उस घर के दुख को अपना दुख और उनके आंसुओं को अपना फर्ज समझना।’ बाबूजी सिर्फ अथर्व के पिता नहीं हैं माँ, वो मेरे भी पिता हैं। अगर आज उनके इलाज के लिए मुझे अपने सारे गहने, अपनी नौकरी की जमा-पूँजी, यहाँ तक कि खुद को भी गिरवी रखना पड़े, तो मैं पीछे नहीं हटूंगी। आप हिम्मत मत हारिए माँ, जब तक आपकी यह बहू ज़िंदा है, इस घर की चौखट पर कोई आंच नहीं आने देगी।”

अन्वेषा की बातें सुनकर वंदना का दिल दहल उठा। पच्चीस साल पहले लेबर रूम के स्ट्रेचर पर बोला गया उसका एक-एक शब्द उसके अपने ही कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूंजने लगा। उसने जिस बहू को केवल एक पराई लड़की, एक संभावित खतरा और कोर्ट-कचहरी की धमकी देने वाला अजनबी समझा था, आज वही बहू अपने सारे ज़ेवर उतारकर उसके पति की ज़िंदगी बचाने के लिए ढाल बनकर खड़ी थी।

वंदना की आँखों से पश्चाताप और कृतज्ञता के आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। उसने अन्वेषा को खींचकर अपने सीने से लगा लिया। उसने अपनी बहू के सिर को चूमते हुए फफक कर रोना शुरू कर दिया।

“मुझे माफ कर दे बेटी… मुझे माफ कर दे अन्वेषा!” वंदना रोते हुए बोली, “मैंने उम्र भर समाज के तानों और डर के साए में जीकर सिर्फ यह सोचा कि बुढ़ापे की लाठी केवल कोख से जन्मी औलाद हो सकती है। मैं भूल गई थी कि जो बेटी दिल से अपनाई जाती है, वह कोख से जन्मी बेटी से भी बढ़कर होती है। आज तूने मेरी आँखें खोल दीं। तू बहू नहीं है मेरी बच्ची, तू तो साक्षात अन्नपूर्णा और दुर्गा बनकर मेरे घर की लाज बचाने आई है।”

अगले ही दिन अन्वेषा के गहनों और अथर्व के दफ्तर से मिले कर्ज की बदौलत सतीश जी का सफल ऑपरेशन हुआ। डॉक्टरों ने कहा कि अगर सर्जरी में दो घंटे की भी देरी होती, तो अनर्थ हो सकता था।

आईसीयू के बाहर जब डॉक्टर नीरजा एक दूसरे केस के सिलसिले में उसी कॉरिडोर से गुजरीं, तो उन्होंने वंदना को देखा। डॉक्टर नीरजा पहचान गईं और मुस्कुराते हुए पास आकर बोलीं, “अरे वंदना जी! सब ठीक तो है ना? आप यहाँ कैसे?”

वंदना ने डॉक्टर नीरजा के हाथ पकड़ लिए। उसने पास ही अपने ससुर के लिए सूप का थर्मस संभाले खड़ी अन्वेषा की ओर इशारा किया और नम आँखों से मुस्कुराते हुए कहा, “डॉक्टर साहिबा, याद है पच्चीस साल पहले मैंने आपसे स्ट्रेचर पर क्या कहा था? मैंने कहा था कि मुझे बेटा नहीं, सिर्फ बेटी चाहिए क्योंकि बहुएं बुढ़ापे में नहीं पूछतीं और रिश्ते तोड़ देती हैं। आज मैं अपनी उस सोच पर शर्मिंदा भी हूँ और ऊपर वाले की शुक्रगुजार भी। ईश्वर ने मुझे बेटा देकर भी कोई कमी नहीं छोड़ी, क्योंकि उसने मुझे बेटे के साथ-साथ यह बहू रूपी ऐसी बेटी दी है, जिसने अपनी सारी खुशियाँ दांव पर लगाकर मेरे सुहाग की जान बचा ली।”

डॉक्टर नीरजा ने अन्वेषा के सिर पर हाथ रखा और भावुक होकर बोलीं, “सच कहा वंदना जी। कोख से तो केवल शरीर जन्म लेता है, लेकिन रिश्ते संस्कारों और प्यार से जन्म लेते हैं। अगर घर में ऐसी बहुएं हों, तो किसी माँ-बाप को बुढ़ापे का खौफ कभी सता ही नहीं सकता।”

दो हफ्ते बाद जब सतीश जी पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौटे, तो घर का माहौल किसी त्योहार जैसा था। दहलीज पर कदम रखते ही सतीश जी ने सबसे पहले अन्वेषा के सिर पर हाथ रखा।

उस दिन वंदना ने पूरे मोहल्ले में, हर एक घर में जाकर शुद्ध देसी घी के मोदक और मिठाइयां बांटीं। जब पड़ोसनों ने पूछा, “अरे वंदना, आज किस बात की इतनी खुशी है? सतीश भाई साहब के ठीक होने की या किसी और बात की?”

तो वंदना ने गर्व से सिर उठाकर, नम आँखों से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मेरी नानी कहती थीं कि बेटा पैदा होने पर कभी मिठाई मत बांटना, शादी होने पर भी मत बांटना, मिठाई तब बांटना जब घर में एक अच्छी बहू आ जाए। आज मैं अपनी नानी की उस बात को पूरा कर रही हूँ। आज मैं अपनी बहू के मान, उसके संस्कारों और उसके बेटी जैसे प्यार के नाम की मिठाई बांट रही हूँ!”

उस दिन उस घर की हर दीवार में एक नई ऊर्जा, एक नया विश्वास और एक अटूट प्यार की महक भर गई थी। समाज की बनाई हुई कड़वाहट और अविश्वास की दीवारें प्रेम और सम्मान के आगे पूरी तरह ढह चुकी थीं।

रिश्ते कभी खून के मोहताज नहीं होते, वे उस पवित्र भावना के मोहताज होते हैं जो एक इंसान दूसरे के प्रति दिल में रखता है। आज के दौर में जब बहुओं और सास के रिश्तों को केवल तकरार और मुकदमों के चश्मे से देखा जाता है, तब अन्वेषा जैसी बेटियां यह साबित करती हैं कि अगर दिल में अपनापन और त्याग हो, तो बहू कभी पराई नहीं होती, बल्कि वही पूरे परिवार की सबसे मजबूत ढाल बन जाती है।

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मुख्य लेखक : एमपी सिंह

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