पराई अमानत का अपनापन

  तन्वी की शादी को अभी महज़ छह महीने ही तो बीते थे, लेकिन अनुराधा जी का मन हर पल उसी में अटका रहता था। एक मां का दिल भी बड़ा अजीब होता है; जब तक बेटी घर में रहती है, तब तक उसे सहेजने और संवारने में सांसें खटती रहती हैं, और जब वह विदा होकर पराए घर चली जाती है, तो उसकी सलामती और मान-मर्यादा की फिक्र में रातें करवटें बदलते कटती हैं।

तन्वी अपने मायके की सबसे चंचल, बेपरवाह और अल्हड़ लड़की थी। जिसे कभी सुबह आठ बजे से पहले जगाना पहाड़ तोड़ने जैसा लगता था, जिसकी अलमारी के कपड़े हमेशा तितर-बितर रहते थे और जिसे एक कप चाय तक ठीक से बनानी नहीं आती थी। अनुराधा जी अक्सर उसे डांटते हुए कहती थीं, “तन्वी, थोड़ा गृहस्थी का सलीका सीख ले बेटी! ससुराल जाएगी तो चार बातें सुननी पड़ेंगी। वहां कौन तेरे नखरे उठाएगा? सास पूछेगी कि मां ने कुछ सिखाकर नहीं भेजा क्या?” तब तन्वी खिलखिलाकर मां के गले में बाहें डाल देती और कहती, “मेरी प्यारी मां, जहां जाऊंगी, वहां भी अपने प्यार से सबका दिल जीत लूंगी, तुम देखना!” उस वक्त तो अनुराधा जी उसकी बात पर हंस देती थीं, लेकिन भीतर एक अनजाना डर हमेशा सुलगता रहता था।

ससुराल का माहौल बिल्कुल अलग था। तन्वी के ससुर जी का देहांत कई साल पहले हो चुका था। उसकी सास मनोरमा जी ने अकेले ही अपने दो बेटों को पाल-पोसकर बड़ा किया था। घर में सिर्फ पुरुषों का आना-जाना, वही नपा-तुला अनुशासन, वही रूखा सा माहौल जहां भावनाएं तो थीं, मगर उन्हें जताने का कोई सलीका नहीं था। मनोरमा जी स्वभाव से बहुत शांत, गंभीर और थोड़ी सख्त मानी जाती थीं। उनके केवल दो बेटे थे—अक्षत और निशांत। घर में कोई बेटी नहीं थी, इसलिए उस घर की दीवारों ने कभी चूड़ियों की खनक, मेहंदी के रंग और बेटियों की खिलखिलाहट का मौसम देखा ही नहीं था।

आज सुबह जब अनुराधा जी ने घर का काम निबटाया, तो अचानक उनका हाथ मोबाइल की ओर बढ़ गया। कल मनोरमा जी का जन्मदिन था। तन्वी ने दो दिन पहले फोन पर कहा था कि वह कुछ सोच रही है, लेकिन कल दिन भर अनुराधा जी की समधन जी से बात नहीं हो पाई थी। अनुराधा जी के मन में हल्की सी हिचक और घबराहट थी। कहीं तन्वी से कोई चूक तो नहीं हो गई? कहीं उसने कुछ ऐसा तो नहीं कर दिया जिससे मनोरमा जी नाराज हो गई हों? मन में तरह-तरह के विचार लिए उन्होंने आखिरकार कांपती उंगलियों से नंबर मिला ही दिया।

दो-तीन घंटियों के बाद फोन उठ गया। अनुराधा जी ने बहुत संकोच और अदब से अपनी आवाज को सहेजते हुए कहा, “प्रणाम समधन जी! कैसी हैं आप?”

उधर से जो आवाज आई, उसने अनुराधा जी के दिल की सारी धड़कनें एक पल के लिए थाम दीं। वह कोई औपचारिक या गंभीर आवाज नहीं थी, बल्कि उसमें एक असीम तृप्ति, उमंग और छलकती हुई खुशी की खनक थी। मनोरमा जी चहकते हुए बोलीं, “अरे समधन जी! सदा सुहागन रहिए! पूछिए मत, मैं तो बिल्कुल मस्त हूँ, अपनी बहू की बदौलत इन दिनों सचमुच महारानियों जैसी मौज काट रही हूँ!”

अनुराधा जी ने राहत की सांस लेते हुए थोड़ा झिझक कर पूछा, “सब कुशल-मंगल तो है ना समधन जी? कल आपका जन्मदिन था, मैं दिन में फोन नहीं कर पाई, बस इसी संकोच में थी कि आप व्यस्त होंगी।”

मनोरमा जी हंस पड़ीं, उनकी हंसी में बरसों का सूखा मिट जाने जैसी ताज़गी थी। वे बोलीं, “अरे समधन जी, कल जो मेरे साथ हुआ, उसे बयां करने के लिए तो मेरे पास शब्द ही कम पड़ रहे हैं। सच मानिए, मेरी कोई बेटी नहीं थी, इसलिए जिंदगी के कई छोटे-छोटे, मासूम और सुखद अनुभवों से मैं हमेशा वंचित ही रही। मेरे दोनों बेटे मुझे बहुत प्यार करते हैं, मेरी हर जरूरत का ध्यान रखते हैं, लेकिन पुरुष तो बस चीजें लाकर रख देते हैं, भावनाएं जताना उन्हें कहां आता है! कल सुबह जब मेरी नींद खुली और मैंने अपनी आंखें खोलीं, तो मुझे लगा जैसे मैं किसी दूसरे ही संसार में आ गई हूँ।”

अनुराधा जी कौतूहल से बोलीं, “अच्छा! ऐसा क्या हुआ समधन जी?”

मनोरमा जी का गला अचानक भर आया, उनकी आवाज में ममता का सागर उमड़ पड़ा। वे कहने लगीं, “समधन जी, कल जैसे ही मैंने सुबह अपने कमरे का दरवाजा खोला, पूरे आंगन और दालान में रंग-बिरंगे गुब्बारे महक रहे थे। सामने टेबल पर हाथ से सजाया हुआ मखमली केक रखा था, जिसके ऊपर लिखा था—’मेरी प्यारी मां को जन्मदिन मुबारक’। और तो और, जब मैं अपनी कुर्सी पर बैठी, तो तन्वी मेरे सामने आई। उसके एक हाथ में भाप उड़ती हुई अदरक वाली चाय थी और दूसरे हाथ में गेंदे और गुलाब के ताजे फूलों का गुलदस्ता। उसने झुककर मेरे पैर छुए और इतनी जोर से मुझे गले लगा लिया कि मेरी आंखों से आंसू छलक पड़े।”

मनोरमा जी एक पल रुकीं, जैसे उस पल को दोबारा जी रही हों। फिर बोलीं, “समधन जी, इतने सालों में मुझे कभी किसी ने ऐसा सरप्राइज नहीं दिया था। बेटे तो बस सुबह उठकर बोल देते थे—’मां, हैप्पी बर्थडे, बताओ क्या चाहिए।’ पर इस बच्ची ने रात भर जागकर मेरे लिए अपने हाथों से एक ग्रीटिंग कार्ड बनाया था, जिसमें उसने मेरी और अपनी तस्वीरें लगाई थीं और नीचे लिखा था कि इस घर में आने के बाद उसे कभी अपनी सगी मां की कमी महसूस नहीं हुई। उसके बाद उसने मुझे एक सुंदर सी जामुनी रंग की बनारसी साड़ी भेंट की। मुझे ताज्जुब हुआ कि इसे कैसे पता चला कि मुझे जामुनी रंग पसंद है! तब अक्षत ने बताया कि दो महीने पहले जब हम सब एक शादी में जा रहे थे, तब मैंने बातों-बातों में बस इतना कहा था कि मेरी शादी के जोड़े का रंग जामुनी था और मुझे वह रंग बेहद भाता है। सोचिए, जिस छोटी सी बात को मेरे अपने भूल गए थे, उस बात को इस बच्ची ने अपने दिल में संजोकर रखा था।”

अनुराधा जी की आंखें यह सुनते ही डबडबा गईं। वे अवाक होकर सुन रही थीं। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह वही तन्वी है जो मायके में अपने जन्मदिन पर भी दोपहर तक मुंह फुलाकर सोती रहती थी और मां से फरमाइशें करती थी।

मनोरमा जी आगे बोलीं, “समधन जी, कल दिन भर उसने मुझे रसोई की चौखट तक नहीं लांघने दी। बोली—’मां जी, आज आपका दिन है, आज आप सिर्फ आराम करेंगी।’ उसने मेरी पसंद की कढ़ी-कचौड़ी बनाई, सारे रिश्तेदारों को घर बुलाकर छोटा सा उत्सव रचाया और शाम को जब सब चले गए, तो मेरे थके हुए पैरों में तेल लगाकर मालिश करने बैठ गई। मैंने लाख मना किया कि बहू, ये क्या कर रही हो, पाप लगेगा मुझे! पर उसने मेरा हाथ थामकर कहा—’मां, बेटी अगर मां के पैर दबाए तो क्या पाप लगता है? आप मुझे सिर्फ बहू क्यों समझती हैं?’ समधन जी, कल मुझे पहली बार अहसास हुआ कि एक बेटी के होने का सुख क्या होता है। जो सूनापन मेरे आंगन में पिछले पच्चीस सालों से पसरा था, उसे आपकी इस बेटी ने एक ही झटके में भर दिया। वो अल्हड़ सी, चंचल, मस्त मौला बिटिया बहू बनते ही इतनी समझदार और संवेदनशील हो जाएगी, यह मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।”

फोन के इस पार बैठी अनुराधा जी के गालों पर खुशी के आंसू बह निकले। एक मां के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी उसका धन या गहने नहीं होते, बल्कि यह सुनना होता है कि उसकी बेटी ने पराए घर को अपना बनाकर वहां के लोगों का दिल जीत लिया है। बेटी से बहू तक के इस सफर में जाने कितने उतार-चढ़ाव आते हैं, कितनी आशंकाएं होती हैं, लेकिन जब ससुराल से, और वह भी सासू मां के मुख से अपनी बच्ची के संस्कारों और प्रेम की ऐसी प्रशंसा सुनने को मिले, तो मां की कोख धन्य हो जाती है। अनुराधा जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था और मन का सारा डर कपूर की तरह उड़ गया था।

अनुराधा जी ने भीगे स्वर में कहा, “समधन जी, यह सिर्फ तन्वी का बड़प्पन नहीं है, यह आपका विशाल हृदय है। अगर पेड़ को खाद और पानी अच्छा न मिले, तो वह कभी फल नहीं दे सकता। आपने उसे बहू नहीं, बेटी बनाकर अपनाया, तभी वह अपने सारे संकोच छोड़कर आपके प्रति अपना हक जता पाई। अगर सास मां बन जाए, तो किसी भी बेटी को बहू बनने में कभी कोई तकलीफ नहीं होती।”

मनोरमा जी ने भावुक होकर कहा, “सच कह रही हैं समधन जी। आज के समाज में लोग सास-बहू के रिश्ते को न जाने किस तराजू में तौलते हैं। टीवी सीरियलों और दुनिया भर की बातों ने इस रिश्ते में सिर्फ जहर और शक भर दिया है। लोग कहते हैं कि बहू कभी बेटी नहीं बन सकती और सास कभी मां नहीं हो सकती। लेकिन मेरी तन्वी ने मुझे सिखा दिया कि अगर हम अपनी हथेलियां खुली रखें और दिल के दरवाजे खोल दें, तो पराई कोख से जन्मी बच्ची भी अपनी जान से ज्यादा प्यारी हो सकती है। अब तो मैंने दोनों बेटों से कह दिया है कि इस घर का असली मालिक अब मैं और तन्वी हैं, तुम दोनों तो बस मेहमान हो!”

दोनों समधिनें फोन पर ही खिलखिलाकर हंस पड़ीं। उस हंसी में दो परिवारों का अटूट विश्वास और एक अटूट आत्मीयता घुल चुकी थी।

जब फोन कटा, तो अनुराधा जी ने भगवान के मंदिर के सामने हाथ जोड़ लिए। उनका मन कृतज्ञता से भर गया था। उन्होंने मन ही मन अपनी बेटी को ढेरों दुआएं दीं। तन्वी ने यह साबित कर दिया था कि घर केवल ईंट-पत्थरों से या महंगे सामानों से नहीं बनते, बल्कि घर बनते हैं प्रेम, समर्पण और एक-दूसरे की छोटी-छोटी खुशियों का मान रखने से।

रिश्ते कभी खून के मोहताज नहीं होते; जहां अपनेपन की छांव, थोड़ा सा आदर और बिना शर्त प्यार मिल जाए, वहीं पराया भी अपना बन जाता है। एक अल्हड़ बेटी जब ससुराल की चौखट लांघकर अपने संस्कारों की सुगंध से पूरे परिवार को महका देती है, तो वह केवल दो परिवारों को नहीं जोड़ती, बल्कि समाज के उस खोखले डर को भी हमेशा के लिए मिटा देती है जो कहता है कि ससुराल कभी मायका नहीं हो सकता।

दोस्तों, आज के समय में जहां चारों तरफ सास-बहू के झगड़ों, तानों और कड़वाहट की कहानियां सुनने को मिलती हैं, वहीं यह कहानी हमें सिखाती है कि अगर सास अपनी बहू में बेटी की तलाश करे और बहू अपनी सास में मां का अक्स देख ले, तो कोई भी घर स्वर्ग बन सकता है।

क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों में मिठास घोलने के लिए पहल दोनों तरफ से होनी चाहिए? क्या एक समझदार बहू और ममतामयी सास मिलकर समाज की इस पुरानी सोच को बदल सकती हैं? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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