अपनापन

जानकी जी ने वात्सल्य से उसके बालों को सहलाया और बोलीं, “पगली, ससुराल कोई पराया घर नहीं होता। जब तुम अपने मां-बाप, अपना बचपन और अपनी सारी पहचान पीछे छोड़कर हमारे घर को अपना बनाने आती हो, तो यह हमारा फर्ज बनता है कि हम तुम्हें सिर्फ बहू बनाकर तिजोरी की चाबियां न सौंपें, बल्कि बेटी बनाकर अपने दिल में जगह दें। जिम्मेदारी केवल तुम्हारी नहीं है कि तुम इस घर को संभालो, 

 शादी को अभी मुश्किल से छह महीने ही बीते थे। मायके के खुले, बेपरवाह माहौल से निकलकर एक नए परिवार की मर्यादाओं और जिम्मेदारियों को संभालने में उसने अपनी पूरी जान झोंक दी थी। हर किसी की पसंद-नापसंद, चाय का वक्त, नाश्ते की मेज पर सबका इंतजार—वह हर काम में एकदम सटीक रहना चाहती थी।

लेकिन आज की सुबह बाकी दिनों जैसी बिल्कुल नहीं थी। रोहिणी का बदन तेज बुखार से तप रहा था। सिर में इतनी भयानक टीस उठ रही थी कि जैसे हथौड़े चल रहे हों। आंखों की कोरों से गर्म भाप जैसी निकल रही थी और पैरों में इतनी भी ताकत नहीं थी कि वह ठीक से वजन संभाल सके। रात भर वह करवटें बदलती रही थी। ठंड लगकर कंपकंपी छूट रही थी, मगर उसने अपने पति मयंक को भी नहीं जगाया। उसने सोचा कि सुबह उठकर दो घूंट गर्म पानी पी लेगी तो शायद तबीयत संभल जाएगी। अगर सबको पता चला कि वह बीमार है, तो सब क्या सोचेंगे? नई बहू आते ही बिस्तर पकड़ लेगी तो सास क्या कहेंगी? इन्हीं अनगिनत संकोचों और डरों ने उसके बीमार शरीर को जबरन बिस्तर से खींचकर रसोई के ठंडे फर्श पर ला खड़ा किया था।

उसने कंपकपाते हाथों से माचिस जलाई और गैस पर चाय का पतीला चढ़ाया। अदरक कूटने के लिए जब उसने ओखली उठाई, तो उसका हाथ कांप गया और ओखली स्लैब पर जोर से टकराई। एक जोरदार चक्कर आया और उसने गिरते-गिरते दीवार का सहारा लिया। उसकी आंखें धुंधला रही थीं। सांसें भारी हो चुकी थीं। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से माथे पर आया ठंडा पसीना पोंछा और खुद को संभाला। “बस थोड़ी देर की बात है… सबके लिए चाय और नाश्ता बना लूं, फिर थोड़ा लेट जाऊंगी,” उसने अपने आप से फुसफुसाकर कहा।

तभी रसोई के दरवाजे पर आहट हुई। घर की बड़ी, यानी रोहिणी की सास, जानकी जी सुबह की सैर के लिए निकलने से पहले रसोई की तरफ बढ़ी थीं। उन्होंने देखा कि रोहिणी चूल्हे के सहारे झुककर खड़ी है, उसका चेहरा एकदम पीला पड़ा हुआ है और होंठ सूखे हैं।

जानकी जी की नजरें अनुभवी थीं। वे एक पल में सब भांप गईं। वे तेज कदमों से रसोई के भीतर आईं और बिना कुछ कहे रोहिणी के माथे पर अपना हाथ रख दिया।

माथा आग की तरह जल रहा था।

जानकी जी की भौहें तन गईं। उन्होंने तुरंत चूल्हे की आंच बंद की और एक कड़क आवाज में कहा, “यह क्या तमाशा है रोहिणी? फौरन गैस बंद करो और चुपचाप अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट जाओ!”

रोहिणी सहम गई। उसे लगा कि शायद जल्दी काम न करने या ठीक से खड़े न हो पाने की वजह से सास नाराज हो रही हैं। नई-नवेली बहू के मन का डर उसकी जुबान पर तैर आया। वह हाथ जोड़ते हुए हकलाकर बोली, “म…मां जी, बस चाय बन ही गई है। अभी बाबूजी के लिए काढ़ा भी बनाना है और मयंक के दफ्तर का टिफिन… मैं बस दस मिनट में सब निपटा लूंगी। थोड़ी सी हरारत है, अभी ठीक हो जाएगी…”

“मैंने कहा न, कोई अगर-मगर नहीं!” जानकी जी ने आवाज में थोड़ी और सख्ती लाते हुए रोहिणी की कलाई पकड़ ली और उसे चूल्हे से दूर किया। “तबीयत खराब है और यहां खड़ी होकर रोटियों की चिंता कर रही हो? आंखें देखी हैं अपनी आईने में? सुर्ख लाल हो रही हैं और बदन तवे की तरह तप रहा है। तुम क्या सोचती हो कि इस घर में किसी को तुम्हारी तकलीफ नहीं दिखती?”

“नहीं मां जी, मेरा वो मतलब नहीं था… बस मैं सोच रही थी कि सुबह का काम रुक जाएगा। आप अकेले कैसे सब करेंगी? मुझे अच्छा नहीं लगेगा कि मैं सोती रहूं और आप…” रोहिणी की आंखों में पानी भर आया। उसे लगा कि वह अपनी जिम्मेदारी से भागती हुई दिख रही है।

जानकी जी ने उसकी कंपकपाती देह को देखा, फिर उनकी कड़क आवाज अचानक पिघलकर शहद जैसी मीठी हो गई। उन्होंने रोहिणी के कंधे पर हाथ रखा और बेहद अपनेपन से कहा, “रोहिणी, तुम्हारे आने से पहले भी तो यह रसोई चलती थी न? जब मेरी बेटी तान्या यहां थी और कभी इम्तिहान के दिनों में या मौसम बदलने पर बीमार पड़ जाती थी, तो क्या मैं उससे चूल्हा फुकवाती थी? तब भी तो मैं ही सारा घर, बाहर और रसोई संभालती थी। आज अगर एक दिन मैं अपनी रसोई दोबारा संभाल लूंगी, तो कौन सा आसमान टूट पड़ेगा?”

रोहिणी ने अचरज से अपनी सास की तरफ देखा। उसके कानों को अपने ही सुने शब्दों पर यकीन नहीं हो रहा था।

जानकी जी ने आगे कहा, “बहू बनकर आई हो तो क्या अपनी देह और जान पर तुम्हारा कोई हक नहीं रहा? यह घर जितना मयंक और तान्या का है, उतना ही तुम्हारा भी है। और इस घर की औरत होने के नाते, चाहे बेटी हो या बहू, दोनों की सेहत और खुशियों का ख्याल रखना मेरी पहली जिम्मेदारी है। बहू कोई दूसरे ग्रह से आई मशीन नहीं होती कि बीमार पड़ने पर भी उसे खटना पड़े। चलो, चुपचाप कमरे में चलो।”

जानकी जी ने रोहिणी का हाथ पकड़ा और सहारा देते हुए उसे धीरे-धीरे उसके कमरे तक ले गईं। उन्होंने खुद आगे बढ़कर बिस्तर की चादर ठीक की, तकिया लगाया और रोहिणी को उस पर लिटा दिया। फिर अलमारी से एक भारी कंबल निकालकर उसके ऊपर अच्छी तरह ओढ़ा दिया ताकि उसे ठंड न लगे।

रोहिणी लेटी-लेटी सिर्फ अपनी सास को देख रही थी। उसकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली थी। यह आंसू किसी दर्द या डर के नहीं थे, बल्कि उस असीम तृप्ति और सुकून के थे, जिसकी उम्मीद उसने एक नए घर में कभी नहीं की थी। मायके में जब बुखार आता था, तो मां ऐसे ही डांटकर सुला देती थी और सिर पर पट्टी रखती थी। आज ससुराल के आंगन में वही मां का रूप देखकर उसके मन का सारा संकोच और परायापन एक झटके में धुल गया था।

जानकी जी ने उसके गालों पर बहते आंसुओं को अपने आंचल से पोंछा और मुस्कुराते हुए बोलीं, “पगली, रो क्यों रही है? सांस फूल रही है और ऊपर से रोना भी है। आराम से आंखें बंद करके सो जा। मैं जब तक तेरे लिए तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा बनाकर लाती हूं।”

जानकी जी कमरे से बाहर निकल गईं।

थोड़ी ही देर में घर के बाकी सदस्य भी जाग गए। ससुर ओंकार नाथ जी जब अखबार पढ़ने के लिए बैठक में आए, तो उन्होंने देखा कि जानकी जी रसोई में बड़े इत्मीनान से काम कर रही हैं। वे चौंक गए। उन्होंने चश्मा ठीक करते हुए पूछा, “अरे जानकी, आज तुम सुबह-सुबह चूल्हे पर? बहू कहां है? उसकी तबीयत तो ठीक है ना?”

जानकी जी ने अदरक कूटते हुए कहा, “नहीं, बच्ची को रात से बहुत तेज बुखार है। बेचारी चुपचाप खड़ी चाय बना रही थी। मैंने डांटकर उसे सुला दिया है। आप जरा डॉक्टर शर्मा को फोन लगा दीजिए, वे आकर देख लें और दवा दे जाएं। कमजोरी बहुत लग रही है उसे।”

ओंकार जी ने तुरंत फोन उठाया और डॉक्टर को बुलाने का प्रबंध करने लगे। उसी वक्त मयंक भी तैयार होकर कमरे से बाहर आया। जब उसने सुना कि रोहिणी बीमार है और रसोई में मां काम कर रही हैं, तो वह झेंप गया। वह तेजी से अपनी मां के पास आया और बोला, “मां, मुझे रोहिणी ने बताया ही नहीं। मैं अभी दफ्तर की छुट्टी ले लेता हूं और…”

जानकी जी ने उसे डांटते हुए कहा, “तुझे छुट्टी लेने की जरूरत नहीं है। अभी जाकर पहले अपनी पत्नी का हाल पूछ, उसे थोड़ा पानी पिला। और दफ्तर जाते वक्त डॉक्टर की लिखी दवाइयां लाकर रख जाना। बाकी घर और रोहिणी को संभालने के लिए मैं यहां बैठी हूं। कोई आफत नहीं आई है।”

जानकी जी ने थोड़ी ही देर में गरम-गरम काढ़ा तैयार किया और एक कटोरी में हल्का दलिया बनाकर रोहिणी के कमरे में पहुंचीं। रोहिणी कंबल ओढ़े लेटी हुई थी, उसकी आंखें मूंदी हुई थीं लेकिन बुखार के कारण वह हल्की कराह रही थी।

जानकी जी ने उसके सिरहाने बैठकर प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। “रोहिणी बेटा, उठो। थोड़ा सा काढ़ा पी लो और दो चम्मच दलिया खा लो, तभी दवा असर करेगी।”

रोहिणी ने धीरे से आंखें खोलीं। उसने देखा कि उसकी सास अपने हाथों में कटोरी और चम्मच लिए बैठी हैं। उसने उठने की कोशिश की, तो जानकी जी ने खुद तकिया उसके पीछे लगाकर उसे सहारा दिया।

“मां जी, आप क्यों तकलीफ कर रही हैं? मैं खुद ले लेती…” रोहिणी ने धीरे से कहा।

“चुपचाप खाओ। जब तान्या को बुखार होता था, तो वो नखरे दिखाती थी। तुम तो बहुत सीधी हो, इसलिए ज्यादा बतकही मत करो,” जानकी जी ने मुस्कुराते हुए चम्मच से दलिया रोहिणी के मुंह के करीब किया।

रोहिणी का गला भर आया। हर एक निवाले के साथ उसके दिल में अपनी सास के प्रति सम्मान और गहरा होता जा रहा था। समाज में सास और बहू के रिश्ते को लेकर न जाने कितनी कड़वाहटें और कहानियां गढ़ी जाती हैं। टीवी सीरियलों और पड़ोस की बातों में हमेशा यही सुनने को मिलता था कि सास कभी मां नहीं बन सकती और बहू कभी बेटी नहीं हो सकती। लेकिन आज जानकी जी ने अपने निस्वार्थ प्रेम और ममता से उन तमाम खोखले दावों को एक ही पल में झुठला दिया था।

दोपहर होते-होते डॉक्टर आए, उन्होंने जांच की और बताया कि वायरल बुखार है। उन्होंने आराम करने और समय पर दवा लेने की सलाह दी। पूरा दिन जानकी जी एक पल के लिए भी चैन से नहीं बैठीं। उन्होंने न सिर्फ घर का सारा काम संभाला, बल्कि हर घंटे रोहिणी के कमरे में जाकर उसका बुखार नापा, ठंडे पानी की पट्टियां उसके माथे पर रखीं और उसे समय-समय पर फलों का रस और सूप पिलाती रहीं।

शाम ढलते-ढलते रोहिणी का बुखार काफी उतर चुका था। पसीने से भीगने के बाद उसका शरीर अब हल्का महसूस कर रहा था। उसने उठकर कपड़े बदले और धीरे-धीरे चलकर बैठक में आई। वहां जानकी जी सोफे पर बैठी माला जप रही थीं।

रोहिणी ने बिना कोई आवाज किए जाकर जानकी जी के चरण छू लिए।

जानकी जी ने चौंककर देखा और फौरन माला एक तरफ रखकर रोहिणी को दोनों हाथों से उठाकर अपने सीने से लगा लिया। “अरे, तू नीचे क्यों आई? अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुई है। कमजोरी होगी, जाकर आराम कर।”

रोहिणी की आंखें फिर छलक आईं। उसने जानकी जी के सीने में अपना सिर छुपाते हुए रुंधे गले से कहा, “मां जी, आज आपने मुझे जो दिया है, उसका कर्ज मैं जिंदगी भर नहीं चुका सकती। जब मैं शादी के बाद इस घर में आई थी, तो मेरे मन में बहुत डर था कि पता नहीं ससुराल में मुझे समझा जाएगा या नहीं। मुझे लगता था कि यहां मेरी एक गलती भी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लेकिन आज आपने मुझे जिस तरह संभाला है, मुझे लगा ही नहीं कि मैं अपनी मां से दूर किसी पराए घर में हूं।”

जानकी जी ने वात्सल्य से उसके बालों को सहलाया और बोलीं, “पगली, ससुराल कोई पराया घर नहीं होता। जब तुम अपने मां-बाप, अपना बचपन और अपनी सारी पहचान पीछे छोड़कर हमारे घर को अपना बनाने आती हो, तो यह हमारा फर्ज बनता है कि हम तुम्हें सिर्फ बहू बनाकर तिजोरी की चाबियां न सौंपें, बल्कि बेटी बनाकर अपने दिल में जगह दें। जिम्मेदारी केवल तुम्हारी नहीं है कि तुम इस घर को संभालो, हमारी भी जिम्मेदारी है कि हम तुम्हें संभालें। जिस घर में बहू को बेटी का दर्जा नहीं मिलता, उस घर की दीवारों में कभी बरकत और शांति नहीं रह सकती।”

उस वक्त दरवाजे पर खड़े मयंक और ओंकार जी भी यह दृश्य देखकर भावुक हो गए। घर का कोना-कोना एक असीम शांति, आत्मीयता और प्रेम की महक से भर उठा था। उस दिन रोहिणी ने जाना कि रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते, बल्कि वे समझदारी, सहानुभूति और एक-दूसरे के सम्मान से सींचे जाते हैं। एक सास के संवेदनशील रवैये ने उस पूरे घर को एक अटूट धागे में पिरो दिया था, जहां अब डर की कोई जगह नहीं थी, बस अथाह विश्वास और प्यार था।

आज के दौर में जब संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं और रिश्तों में औपचारिकताएं हावी होती जा रही हैं, ऐसी समझदारी हर घर के लिए एक मिसाल है। क्या आपको भी लगता है कि अगर हर सास अपनी बहू में बेटी और हर बहू अपनी सास में मां का अक्स देखने लगे, तो हमारे समाज से वृद्धाश्रम और टूटे परिवारों की कड़वी हकीकत हमेशा के लिए खत्म हो सकती है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर साझा करें।

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