क्योंकि मैं मर्द हूँ – अर्चना सिंह

मैं गोपाल ….! उम्र पैंसठ साल । बहुत जमाने बाद आज पूरे परिवार के लोग एक साथ मेरे घर में इकट्ठा हुए हैं । कारण ये कि आज मेरी धर्म पत्नी मनोरमा जी का स्वर्गवास हो गया है , क्रिया कर्म से लौटने के बाद कुछ रस्मों रिवाज कराए गए और फिर खाकर सोने की बारी आई। हमारे घर का रिवाज ये कहता है

कि काज करने वाले को कम्बल बिछाकर सोना चाहिए । दरी पर कम्बल बिछाकर बरामदे में लगा दिया है, कोशिश कर रहा हूं सोने की लेकिन नींद आँखों से कोसों दूर है । रात में सोने के समय अजीब सी बेचैनी, घबराहट भरा दिल ऐसा पहली बार हो रहा है । समझ नहीं आ रहा ये दर्द किससे कहूँ । लग रहा है शरीर से किसी ने जान निकाल लिया हो ..।

जरा सा पलक झपकने की कोशिश करता हूं तो रह रह के किसी न किसी के रोने की आवाज किसी के बात करने की आवाज और सर्दियों की रात में चारों ओर  पसरा सन्नाटा सब कुछ बहुत भयावह लग रहा था । मनोरमा जी की सारी बातें घूम घूमकर ख्याल आ रही थीं और मुझे कमजोर बना रही थीं। कितना मुश्किल होता है जीवन संगिनी के बगैर जीना । 

 ऐसे ही देखते देखते तेरहवीं बीत गया । बच्चों ने कहा..पापा ! आज से आपको अपने कमरे में सोना  है । 

हिम्मत नहीं हो रही मुझे उस पलंग पर जाकर सोने की जहां अपनी पत्नी के साथ सुख – दुःख के सारे पल बिताए और जहां हमने सोकर, कभी खट्टी मीठी नोक झोंक और तकरार के साथ रातें बिताई हैं ।जो भी आ रहे हैं सब मेरे बेटे बेटी और बहू से गले मिलकर मनोरमा जी को याद कर करके रो रहे हैं ।

कहने को तो बीत गए इतने दिन कि अब आँखों से आँसू कम हो जाने चाहिए लेकिन ये मर्द रूपी शरीर को मजबूत भी तो दिखाना है । और तो और घर के बच्चों को सांत्वना भी देना है कि चाची, माई, भौजी , मौसी , बुआ आदि प्रेम रिश्तों को एक सुंदर आधार व आकार देने वाली सबसे सम्बन्ध तोड़कर चली गई। फिर भी मुझे थोड़ा दुःख है ज्यादा नहीं कह सकता क्योंकि मैं मर्द हूँ, अपने गम को छोड़कर औरों को मजबूती से संभालना है ।

लोग कहते हैं मर्द को दर्द नहीं होता, पर ये बिल्कुल गलत है । बचपन से ही मर्द को कठोर बनाकर पाला गया इसका मतलब ये नहीं कि दर्द नहीं होता । औरतों के मुकाबले दर्द तो मर्द में भी होता है पर कमजोर ना पड़े इसलिए छिपाना पड़ता है , औरतें तो तकलीफें बांटकर और रोकर हर दर्द हल्का कर लेती हैं । कल आँगन में कुर्सी पर बैठा था। धीरे धीरे फुसफुसाने की आवाज आ रही थी…मेरी भाई की पत्नी प्रभा

अपनी सहेलियों और चाची जी से बोल रही थी…”भैया व्यस्त हैं पौधों को पानी देने में कभी लोगों के लिए बक्से से कुछ सामान निकालकर देने में । हमलोग को दुख हो रहा है क्योंकि हमलोग औरत हैं, भैया जी को क्या फर्क पड़ेगा । तभी बुआ जी बोलीं फर्क तो पड़ता ही है जीवन संगिनी के चले जाने से, औरतें रोकर हल्का कर लेती हैं पुरुष अंदर अंदर घुट कर दुःख पालते हैं बस उन्हें आँसू बहाना नहीं होता वरना लोग समझेंगे अभी भी पत्नी के पीछे पागल हुए जा रहा है ।

उम्र हुई तो क्या हुआ…सुख दुःख की साथी थी वो । काश ! किसी को अपना दिल चीर के दिखा सकता । कल तक जो पलंग सुकून देता था आज मानो काँटों सा चुभ रहा है । आँखों के आगे मानो चलचित्र सा घूम गया । मनोरमा जी जब शादी करके मेरे इस घर में कदम रखी थीं तब लोग कमरे में भेजने के लिए हंसी ठिठोली कर रहे थे, बहनें, बुआ द्वार छेकाई के लिए खड़ी थीं । शादी जैसा ही तो ये घर  गुलज़ार था । आज वही माहौल कितना गमगीन सा है पर मन पुराने दौर में ही खिंचा चला जा रहा है । बुआ, बहनें बेटी सब दरवाजे पर खड़ी तो हैं लेकिन इस ज़िद के लिए कि मेरी उम्र हो गई है इधर उधर कैसे नींद आएगी । ये पत्नियाँ भी ना..!अगर अच्छी मिल जाएं तो उम्र बढ़ा देती हैं , अंदाज ही नहीं लगता उम्र का । आज वो चली गईं तो सब आभास दिलाने में लगे हैं, अकेला पड़  गया ना इसलिए । ऐसी ही मनोरमा जी थीं । मेरे इतने लंबे चौड़े परिवार को इतने प्रेम से एक सूत्र में पिरोकर रखती थीं कि समझना मुश्किल होता था इस घर में कौन किसका बच्चा है । 

सुबह हो गई । जल्दी से उठकर रसोई में गया आदतानुसार । पूछने ही वाला था मनोरमा जी आज क्या बना रही हैं तो मेरी आँखें फिर से याद करके नम हो गईं । देखा तो पाया मेरी बहू निष्ठा और बेटी चित्रा खाना बना रही थी । छत पर गया सोचा थोड़ा धूप सेक लूं और मनोरमा जी से अखबार भी माँग लूँगा । जैसे ही चटाई बिछाकर चश्मा लगाया तो वहां किसी को न पाकर खूब आँसू बहाया । आसमान में भगवान को देखकर शिकायत किए बगैर नहीं रहा गया …ईश्वर !  कितना निर्दयी है तू, मैं तो नादान इंसान हूँ, तेरी लीला तू ही जाने पर जब आप साथ बनाते हो जोड़ियां लगाते हैं तो जिंदगी किसी के बगैर किसी की इतनी दूभर क्यों बना देते हो । ये सब तो कुछ दिनों का मेला था , अब तो सब चले जाएँगे कोई नहीं दिख रहा जो मुझे पूछे । एक बेटा वो भी , पूछेगा या नहीं क्या पता.. उसे व्यावहारिक ज्ञान है बहुत अच्छे से पर मां  के गम में बिल्कुल पत्थर सा हो गया है । बेटी भी तो बड़े परिवार में ब्याही है, अब मनोरमा जी की यादों के साथ इसी घर में मेरा अंत लिखा है ।बुआ , चाची , चाचा बहनें सबके घर यहीं आस पास हैं कोई मेरे लिए नहीं रुक सकता, सबके तो अब अपने परिवार बच्चे शादी शुदा और बड़े हो गए ।

“लीजिए पापा जी ! अखबार …अचानक नींद से जागा जैसे, ध्यान से चश्मा लगाया और कहा…निष्ठा ! आओ बेटा, चित्रा भी सामने आकर मुस्कुराने सी हुई । निष्ठा ने मुस्कुराते हुए कहा…”आप हमारे साथ भिलाई चल रहे हैं पापा जी ! “कहीं नहीं जाऊँगा, यहीं इस घर में बहुत सी यादें बसती हैं मैने मायूसी से कहा । बहुत ज़िद करते हुए चित्रा ने कहा जब भाभी भैया की इच्छा है तो जाइये ना पापा । आपको भी सहारे की जरूरत है । नहीं की जिद पर अड़ते हुए रहा..फिर बुआ ,बहनें ,बेटी, चाची सबने जिद की इस घर में उसकी यादों के सहारे मरना आसान नहीं जीना कठिन होगा । समझ बात को , अब तेरे बच्चों को तेरी जरूरत है । सबके जिद के आगे मेरी एक ना चली । खुशी हुई इस बात की थोड़ी सी जैसे मनोरमा जी थीं उनका प्रतिरूप मेरी बहू निष्ठा में भी है । सबने स्टेशन आकर विदा किया अगले दिन हम बेटा बहू और प्यारी पोती के साथ प्रयागराज से भिलाई पहुँचे । जल्दी से बहू ने चाय और नमकीन दिया । खाकर कप रखने आया रसोई में तो देखा बाजार से बड़ी सी मुस्कुराते हुए फोटो मनोरमा जी की फ्रेम करा के निष्ठा ने मुख्य द्वार के सामने वाले दीवार पर लगा दी और दीपक जलाकर प्रणाम किया फिर मुझसे मुस्कुराते हुए बोली…पापाजी ! मम्मी जी की कमी आपको नहीं खलेगी वो हम सबके साथ अब इसी रूप में मौजूद हैं । यही जीवन की सच्चाई है और इसे स्वीकारना पड़ेगा । आँखें नम हो गईं फिर से थोड़ा दुःख से और थोड़ी खुशी से । 

कहानी लिखने में जो त्रुटि हुई हो उसके लिए क्षमा चाहूंगी । अगर आपको कहानी पसंद आती है तो कृप्या लाईक शेयर और कमेंट करना न भूलें ।

मौलिक, स्वरचित

(अर्चना सिंह)

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