ससुराल की लाज

 शकुंतला बुआ ने जैसे ही गौरी को देखा, वे पान चबाते हुए मुस्कुराईं और बोलीं, “अरे आ गई बहू! तेरा भाई तो बड़ा छुपा रुस्तम निकला रे! पहले खुद खाली हाथ सा आकर हम सबकी परीक्षा ले गया और पीछे से जौहरी की दुकान के मुनीम और नौकरों के हाथ ये सारा सामान भिजवा दिया। कह गया कि जब सारी रस्म के थाल सजें, तभी खोला जाए। मुझे माफ कर दे बहू, मैंने अनजाने में तेरे पीहर वालों को बहुत भला-बुरा कहा।”

  हलवाई की कड़ाही से उठती देसी घी की मिठाइयों की खुशबू पूरे मोहल्ले को न्योता दे रही थी। घर के बीचों-बीच बड़े से दरीचे पर बैठी औरतें बन्ना-बन्नी गा रही थीं, हंसी-ठिठोली चल रही थी, और बच्चे नए कपड़े पहने इधर से उधर दौड़ लगा रहे थे। आज इस घर की लाडली बेटी और सबकी चहेती मानसी की शादी जो थी।

इतने शोरगुल, हंसी-मजाक और रौनक के बीच भी घर की बड़ी बहू गौरी के चेहरे पर एक अजीब सी उदासी की परछाईं थी। वह रसोई से लेकर आँगन तक दौड़-दौड़ कर सारा काम संभाल रही थी, मेहमानों को चाय-नाश्ता पूछ रही थी, लेकिन उसका मन कहीं और ही भटक रहा था। पहली नजर में देखने वालों को यही लग रहा था कि अपनी प्यारी ननद मानसी की विदाई के ख्याल से भाभी का दिल भारी है।

यह सच भी था कि पिछले डेढ़ साल में गौरी और मानसी के बीच ननद-भाभी से ज्यादा सहेलियों जैसा रिश्ता बन गया था। मानसी के चले जाने के बाद यह बड़ा सा घर एकदम सूना हो जाने वाला था। हालांकि, एक औरत होने के नाते गौरी इस दस्तूर को बखूबी समझती थी कि बेटियां तो पराई अमानत होती हैं, उन्हें एक न एक दिन अपने पिया के घर जाना ही होता है। और फिर, घर का सूनापन भी कितने दिन रहता? कुछ ही महीनों बाद तो उसके देवर अमन की भी शादी होने वाली थी, जिसके बाद देवरानी के कदमों से घर फिर से चहक उठता।

असल में, गौरी के सीने में जो फांस चुभ रही थी, वह मानसी की विदाई नहीं, बल्कि शाम को होने वाली ‘मायके की पहरावनी’ की रस्म थी। उसे रह-रहकर एक ही डर खाए जा रहा था कि आज शाम जब भरी सभा में उसके मायके से आए नेग और तोहफों का थाल खुलेगा, तब क्या होगा? इस घड़ी का इंतजार गौरी से कहीं ज्यादा उसकी बुआ सास, शकुंतला देवी को था। सुबह से ही शकुंतला बुआ अपनी तीखी नजरों के तीर गौरी पर छोड़ रही थीं और दबी जुबान में दो-तीन बार कह भी चुकी थीं, “देखते हैं, ब्याह में तो पल्ला झाड़ लिया था, आज ननद के मंडप में मायके वाले अपनी बेटी की नाक रखते हैं या फिर से हमारी बिरादरी में भद्द पिटवाते हैं!”

बस यही सोच-सोचकर गौरी का कलेजा मुंह को आ रहा था और हाथ-पैर ठंडे पड़ रहे थे।

गौरी एक बेहद शांत, संस्कारी और मिलनसार लड़की थी। जब से वह इस घर में कदम रखकर आई थी, उसने अपनी मीठी वाणी और सेवा-भाव से हर किसी का दिल जीत लिया था। ससुर केशव प्रसाद जी और सास गायत्री देवी तो अपनी बहू की तारीफ करते नहीं थकते थे। देवर अमन अपनी हर छोटी-बड़ी बात, यहाँ तक कि अपनी नौकरी और भविष्य की उलझनें भी अपनी भाभी से ही साझा करता था। और ननद मानसी तो जैसे गौरी की परछाईं थी—बिना भाभी की राय लिए वह अपने लिए एक रुमाल तक नहीं खरीदती थी।

लेकिन इस खुशहाल तस्वीर के पीछे एक बहुत गहरा दर्द छुपा था। आज से ठीक डेढ़ साल पहले, जब गौरी की शादी केशव प्रसाद जी के बड़े बेटे अनुराग से तय हुई थी, तब गौरी के पिता ने बड़े अरमानों से अपनी इकलौती बेटी का रिश्ता जोड़ा था। उन्होंने वादा किया था कि वे अपनी लाडली को सोने-चांदी से लादकर और गृहस्थी का सारा सामान देकर विदा करेंगे।

किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। शादी की तारीख से ठीक डेढ़ महीने पहले, उज्जैन से लौटते वक्त एक भीषण सड़क हादसे ने गौरी से उसके सिर का साया छीन लिया। एक ही झटके में माता-पिता दोनों इस दुनिया से चले गए। जिस घर में शहनाई बजने वाली थी, वहां मातम पसर गया।

ऐसे कठिन समय में, जहाँ दुनिया के लोग अनाथ लड़की से झट से रिश्ता तोड़ लेते हैं, वहीं केशव प्रसाद जी और गायत्री देवी ने इंसानियत की एक अद्भुत मिसाल पेश की। उन्होंने गौरी के भाई विकास के कंधे पर हाथ रखकर कहा था, “बेटा, मुसीबत की इस घड़ी में हम तुम्हारे साथ हैं। हमें तुम्हारी बहन के रूप में अपने घर की लक्ष्मी चाहिए, दहेज का एक तिनका भी नहीं।” और सचमुच, बिना किसी बैंड-बाजे और तामझाम के, केवल एक जोड़े कपड़े और मंदिर के आशीर्वाद के साथ वे गौरी को ब्याह कर अपने घर ले आए थे।

पति अनुराग ने भी गौरी को इतना सम्मान और प्यार दिया कि उसे कभी अपने अनाथ होने का एहसास नहीं हुआ। लेकिन कहते हैं न, हर घर में कोई न कोई ऐसा कोना होता है जहाँ से ठंडी हवा के झोंके आकर कांपने पर मजबूर कर देते हैं। इस घर में वह कोना थीं केशव जी की बड़ी बहन, यानी शकुंतला बुआ।

शकुंतला बुआ का इस परिवार पर बहुत बड़ा एहसान था। जब केशव जी महज बारह साल के थे, तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। शकुंतला बुआ ने अपने ससुराल के साथ-साथ अपने छोटे भाई केशव को भी मां बनकर पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया और काबिल बनाया था। यही कारण था कि केशव जी और गायत्री देवी अपनी दीदी के आगे कभी एक शब्द नहीं बोलते थे। उनकी हर कड़वी बात को भी वे बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद समझकर पी जाते थे।

शकुंतला बुआ दिल की पूरी तरह बुरी नहीं थीं, लेकिन पुरानी सोच और समाज के दिखावे में आकंठ डूबी हुई थीं। उन्हें हमेशा से यह मलाल रहा कि उनके भतीजे अनुराग की शादी में एक रुपया भी दहेज नहीं आया। गौरी के पिता ने जो गहने, नकदी और सामान देने की बात पक्की की थी, उनके गुजर जाने के बाद गौरी के भाई विकास और भाभी मोनिका ने उस पर कुंडली मार ली। विकास ने एक बार भी अपनी बहन को उसके हिस्से का स्त्रीधन या माता-पिता की रखी हुई अमानत देने का नाम नहीं लिया।

इसी बात को लेकर शकुंतला बुआ जब भी घर आतीं, गौरी को ताने देने का कोई मौका नहीं छोड़तीं। “बिन मां-बाप की लड़की के नाम पर भाई ने अपनी तिजोरी भर ली और हमारे पल्ले खाली हाथ बहू बांध दी,” यह वाक्य गौरी ने पिछले डेढ़ साल में न जाने कितनी बार सुना था। सास-ससुर और पति हमेशा गौरी को समझाते कि बुआजी की बातों को दिल पर मत लिया करो, उनकी तो आदत ही ऐसी है। गौरी भी मुस्कुरा कर टाल देती, पर अंदर ही अंदर अपने सगे भाई के इस पराएपन पर खून के आंसू रोती थी।

दोपहर के करीब तीन बज रहे थे। आँगन में हलचल मची हुई थी, तभी मुख्य द्वार से देवर अमन की आवाज गूंजी, “भाभी! ओ भाभी! जरा बाहर आइए, देखिए उज्जैन से विकास भैया और मोनिका भाभी आए हैं!”

यह सुनते ही गौरी के हाथ से चाय की ट्रे छूटते-छूटते बची। उसने जल्दी से अपने पल्लू से चेहरे का पसीना पोंछा और तेज कदमों से बाहर की ओर भागी।

बरामदे में विकास और मोनिका खड़े थे। मोनिका ने भारी सी जरी की साड़ी पहन रखी थी और गले में वही पुश्तैनी सोने का हार चमक रहा था, जो कभी गौरी की मां ने अपनी बेटी की शादी के लिए बनवाया था। उसे देखकर गौरी के सीने में एक टीस सी उठी, पर उसने खुद को संभाला। इतने महीनों बाद अपने सगे भाई को देखकर एक बहन के मन में जो उमंग और लाड़ उमड़ना चाहिए था, वह आज गौरी के मन में बिल्कुल नहीं था। उसकी निगाहें तो बस विकास के हाथ में पकड़े हुए उस एकमात्र भूरे रंग के सफर वाले बैग पर टिकी थीं।

उसके मन में बस एक ही प्रार्थना चल रही थी—’हे भगवान! भैया ने मेरी शादी में तो अनाथ होने का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लिया, कम से कम आज मेरी ननद के ब्याह में तो मेरी थोड़ी सी लाज रख लें। चार लोगों के बीच शकुंतला बुआ के तानों से मुझे बचा लें।’

“आइए भैया, आइए भाभी… सफर में कोई दिक्कत तो नहीं हुई?” गौरी ने आगे बढ़कर दोनों के पैर छूने चाहे, तो विकास ने औपचारिकता निभाते हुए पीछे हटकर हाथ जोड़ लिए।

अभी गायत्री देवी और केशव जी बाहर आकर उनसे कुशल-क्षेम पूछ ही रहे थे कि मोनिका ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखते हुए मुंह बनाया, “गौरी, हम लोग अभी बैठेंगे नहीं। वो क्या है न, यहाँ विजय नगर में मेरी मौसी की बेटी का नया मकान बना है, वहां भी आज छोटा सा गेट-टुगेदर है। तुम्हारे भैया ने कहा कि पहले गौरी के ससुराल में बैग रख आते हैं, फिर हाथ-मुंह धोकर सीधा शाम को मैरिज गार्डन में ही फंक्शन में पहुंच जाएंगे।”

विकास ने भी तुरंत पत्नी की हां में हां मिलाई, “हाँ गौरी, ये हमारा बैग तुम्हारे कमरे में रखवा दे। इसमें मानसी की शादी का नेग भी रखा है। हम लोग शाम को सीधा बारात के स्वागत के वक्त ही मिलेंगे।”

इतना कहकर दोनों ने केशव जी के हाथ से पानी का गिलास तक नहीं लिया और जैसे आए थे, वैसे ही हवा के झोंके की तरह फुर्र से कार में बैठकर निकल गए।

आँगन में बैठी शकुंतला बुआ ने अपने पानदान से सुपारी निकालते हुए जोर से ताना मारा, “लो भई! सगे समधी के घर ब्याह है और भाई-भाभी को मौसी की बेटी के घर की दावत सूझ रही है! अरे, जब देने-दिलाने के नाम पर हाथ तंग हो, तो इंसान ऐसे ही मुंह छुपाकर भागता है। देखना गायत्री, इस बैग में भी सवा सौ रुपये के लिफाफे के सिवा कुछ न निकलेगा!”

बुआ के इन जहरीले शब्दों ने गौरी को सिर से पांव तक झुलसा दिया। रिश्तेदारों की औरतें एक-दूसरे को देखकर दबी हंसी हंसने लगीं। गौरी से वहां एक पल भी खड़ा नहीं रहा गया। उसने चुपचाप वह भूरा बैग उठाया और अपने कमरे में जाकर अंदर से कुंडी लगा ली।

कमरे के सन्नाटे में गौरी की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। आज अपनी ही आंखों में गिरकर उसने वह काम किया जो उसने जीवन में कभी नहीं सोचा था। उसने किसी चोर की भांति कांपते हाथों से अपने भाई के बैग की चेन खोली और उसका एक-एक कोना खंगाल डाला।

बैग में ऊपर विकास और मोनिका के बदलने के कपड़े रखे थे। उनके नीचे एक पॉलिथीन में मिठाई का आधा किलो का एक सस्ता सा डिब्बा था, और सबसे नीचे एक चमकीले कागज में लिपटा हुआ एक पैकेट। गौरी ने धड़कते दिल से उस पैकेट को थोड़ा सा कोने से फाड़कर देखा। अंदर एक बेहद साधारण सी, तीन-चार सौ रुपये वाली सिंथेटिक की साड़ी थी, और उसके साथ लगा हुआ एक खाली लिफाफा, जिसमें सौ का एक नोट पड़ा था।

बस! यही था उसके मायके का नेग!

गौरी के हाथों से वह पैकेट छूटकर बिस्तर पर गिर गया। वह वहीं फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूटकर रोने लगी। उसने अपने मुंह पर पल्लू दबा लिया ताकि उसकी सिसकियों की आवाज कमरे से बाहर न जाए। ‘जो भाई अपनी सगी बहन के हक का हिस्सा खा गया, जिसने अपने मृत माता-पिता की आत्मा तक को धोखा दिया, वह भला मेरी ननद के लिए क्या करता?’ यही सोच-सोचकर गौरी का कलेजा फटा जा रहा था। उसे अब शाम का वह मंजर साफ दिखाई दे रहा था जब भरी बिरादरी के सामने शकुंतला बुआ इस तीन सौ की साड़ी को उछाल-उछाल कर उसकी और उसके स्वर्गीय माता-पिता की परवरिश की धज्जियां उड़ाएंगी।

वह करीब आधे घंटे तक ऐसे ही गुमसुम और आंसुओं में डूबी बैठी रही। तभी अचानक बाहर आँगन से शकुंतला बुआ की जोर-जोर से बोलने की आवाज उसके कानों में पड़ी।

“अरे केशव! अरे गायत्री! जरा अपनी आंखें तो खोलो! इस बार तो कमाल ही हो गया! अरे, मैं तो यूं ही बहू के मायके वालों को कोस रही थी, यहाँ तो पूरा छप्पर फाड़ के सामान आया है बहू के पीहर से!”

गौरी ने चौंककर अपने आंसू पोंछे। उसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। बुआजी की आवाज में ताना नहीं, बल्कि अचंभा और खुशी की खनक थी।

“अरे देखो तो सही! चांदी के चार बड़े-बड़े थाल, चार सोने की अंगूठियां—दूल्हे के लिए, मानसी के लिए, केशव और अनुराग के लिए! मानसी के लिए दो तोले का जड़ाऊ सोने का हार और पूरे खानदान की औरतों के लिए प्योर चंदेरी और महेश्वरी सिल्क की पंद्रह साड़ियां! साथ में इक्यावन हजार रुपये नकद! वाह भई वाह, आज तो बहू के भाई ने पूरे इंदौर में हमारी नाक ऊंची कर दी!”

गौरी का दिमाग सुन्न पड़ गया। भाई का लाया हुआ बैग तो अभी भी उसके सामने बिस्तर पर खुला पड़ा था, और उसमें वह सस्ती सी साड़ी मुंह चिढ़ा रही थी। तो फिर बाहर आँगन में यह सोने-चांदी और चंदेरी साड़ियों का अंबार कहाँ से आया?

गौरी ने जल्दी से अपना चेहरा धोया, साड़ी का पल्लू ठीक किया और दरवाजा खोलकर बाहर बरामदे में आई।

आँगन का नजारा ही बदला हुआ था। बीचों-बीच रखे तख्त पर लाल मखमली कपड़ों से ढके चार बड़े-बड़े चांदी के थाल सजे थे, जिनमें गहनों के लाल डिब्बे, सिल्क की साड़ियां और सूखे मेवों के पैकेट जगमगा रहे थे। मोहल्ले और रिश्तेदारी की सारी औरतें उन तोहफों को छू-छूकर देख रही थीं और गौरी के मायके वालों की रईसी और दरियादिली के कसीदे पढ़ रही थीं।

शकुंतला बुआ ने जैसे ही गौरी को देखा, वे पान चबाते हुए मुस्कुराईं और बोलीं, “अरे आ गई बहू! तेरा भाई तो बड़ा छुपा रुस्तम निकला रे! पहले खुद खाली हाथ सा आकर हम सबकी परीक्षा ले गया और पीछे से जौहरी की दुकान के मुनीम और नौकरों के हाथ ये सारा सामान भिजवा दिया। कह गया कि जब सारी रस्म के थाल सजें, तभी खोला जाए। मुझे माफ कर दे बहू, मैंने अनजाने में तेरे पीहर वालों को बहुत भला-बुरा कहा।”

गौरी बुत बनी खड़ी थी। उसके होंठ कांप रहे थे, पर शब्द नहीं निकल रहे थे। उसने भीड़ के पार नजर दौड़ाई, तो देखा कि खंभे के पास उसके ससुर केशव प्रसाद जी, सास गायत्री देवी और पति अनुराग खड़े हैं। तीनों के चेहरे पर एक शांत, गहरी और रहस्यमयी मुस्कान थी।

गायत्री देवी ने आगे बढ़कर गौरी के कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा, “जाओ बहू, मानसी को तैयार होने में मदद कर दो, बारात आने का वक्त हो रहा है। और हाँ, अपने कमरे में जो विकास का बैग रखा है, उसे अलमारी के अंदर बंद कर दो।”

सास की इस एक बात ने गौरी के सामने जैसे सारा आईना साफ कर दिया।

जब सारी औरतें थाल देखने में मशगूल हो गईं, तो गौरी चुपचाप अपनी सास को कोने वाले कमरे में ले गई और उनके हाथ पकड़कर रो पड़ी, “माँ जी… ये सब क्या है? मुझे सच बताइए, ये सामान भैया ने नहीं भेजा है न? भैया के बैग में तो सिर्फ एक…”

गायत्री देवी ने तुरंत अपनी हथेली गौरी के होंठों पर रख दी। तभी ससुर केशव प्रसाद जी और पति अनुराग भी वहां आ गए।

केशव प्रसाद जी ने बड़े ही स्नेह से गौरी के सिर पर हाथ फेरा और बोले, “रोते नहीं हैं बेटा। आज तुम्हारी ननद की शादी का दिन है। हम कोई अंधे या नासमझ थोड़े ही हैं गौरी। जिस दिन तुम्हारे माता-पिता के जाने के बाद हम तुम्हें ब्याह कर लाए थे, उसी दिन हमने तुम्हारे भाई विकास और उसकी पत्नी की आंखों में स्वार्थ पढ़ लिया था। हम जानते थे कि जो भाई अपनी अनाथ बहन के हक पर डाका डाल सकता है, वह हमारी बेटी मानसी की शादी में तुम्हारी लाज रखने कभी नहीं आएगा।”

अनुराग ने आगे बढ़कर गौरी के आंसू पोंछे और कहा, “गौरी, पिछले एक हफ्ते से मैं देख रहा था कि तुम रात-रात भर करवटें बदलती हो। बुआजी के तानों के डर से तुम्हारा चेहरा सूखता जा रहा था। मैंने पापा और मम्मी से बात की। तब पापा ने कहा कि जिस दिन से गौरी इस घर की देहरी लांघकर आई है, वह सिर्फ हमारी बहू नहीं, बल्कि हमारी बड़ी बेटी है। और अगर बड़ी बेटी का मायका सूना हो गया है, तो अब से हम ही उसके मायके वाले भी हैं और ससुराल वाले भी।”

गायत्री देवी ने मुस्कुराते हुए बात पूरी की, “बस फिर क्या था! तुम्हारे पापा ने अपनी पेंशन की जमा-पूंजी निकाली, अनुराग ने अपनी सेविंग्स मिलाई, और हमने तीन दिन पहले ही सराफा बाजार जाकर यह सारा सामान खरीद लिया था। आज जब विकास और मोनिका केवल दिखावे के लिए बैग रखकर भागे, तो हमें समझते देर नहीं लगी कि अंदर क्या होगा। हमने पहले से ही दुकानदार के आदमी को बाहर तैयार रखा था। जैसे ही विकास की गाड़ी मुड़ी, हमने तुम्हारे मायके के नाम से यह सारे थाल अंदर मंगवा लिए।”

गौरी की आंखों से गंगा-जमुना बह रही थी। वह झुककर अपने सास-ससुर के चरणों में गिर पड़ी, “बाबूजी, माँ जी… मैं किस जन्म के पुण्य से आप लोगों के घर आई हूँ? आज आपने मुझे दुनिया की नजरों में ही नहीं, मेरी अपनी नजरों में भी गिरने से बचा लिया। पर जब भैया शाम को आएंगे और उन्हें पता चलेगा, तब?”

केशव प्रसाद जी ने उसे कंधों से पकड़कर उठाया और गंभीर स्वर में बोले, “इसकी चिंता तुम मत करो बेटा। विकास को यह सबक सिखाना भी बहुत जरूरी है कि रिश्ते पैसों से नहीं, दिल से निभाए जाते हैं।”

शाम को जब मैरिज गार्डन दुल्हन की तरह सजा हुआ था और बारात का स्वागत हो रहा था, तभी विकास और मोनिका सज-धज कर वहां पहुंचे। वे लोग थोड़े सकुचाते हुए एक कोने में जाने लगे, क्योंकि उन्हें पता था कि बैग में रखी उस सस्ती साड़ी को देखकर अब तक घर में बवाल मच चुका होगा।

लेकिन जैसे ही शकुंतला बुआ की नजर विकास पर पड़ी, वे लपक कर उसके पास गईं और उसकी बलैयां लेने लगीं, “अरे आओ-आओ विकास बेटा! अरे तुमने तो आज पूरे समाज में अपनी बहन का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया! चार-चार सोने की अंगूठियां, हीरे जैसा हार, और पंद्रह सिल्क की साड़ियां! मोनिका बहू, तुम्हारी पसंद की तो दाद देनी पड़ेगी, एक-एक साड़ी लाजवाब है!”

विकास और मोनिका के पैरों तले जमीन खिसक गई। दोनों का मुंह खुला का खुला रह गया। वे एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे कि आखिर यह माजरा क्या है?

तभी केशव प्रसाद जी और अनुराग उनके पास आए। केशव जी ने विकास के कंधे पर हाथ रखा और बेहद शांत लेकिन सधे हुए शब्दों में धीरे से उसके कान में कहा, “विकास बेटा, तुम्हारा लाया हुआ बैग और वह तीन सौ की साड़ी अभी भी गौरी के कमरे की अलमारी में सुरक्षित रखी है। बाहर जो थाल सजे हैं, वह एक पिता ने अपनी बेटी की लाज बचाने के लिए सजाए हैं। तुम्हारे माता-पिता ने ऊपर से अपनी बेटी को जो आशीर्वाद भेजा था, उसे तो तुमने अपनी तिजोरी में बंद कर लिया, लेकिन हम अपनी बेटी को भरी सभा में शर्मिंदा नहीं होने दे सकते थे। अब अंदर जाओ और चुपचाप भाई होने का झूठा सेहरा अपने सिर पर बांध लो, ताकि हमारी गौरी के चेहरे की मुस्कान बनी रहे।”

केशव प्रसाद जी के एक-एक शब्द ने विकास के अहंकार और लालच को भीतर तक चीर कर रख दिया। मोनिका शर्म के मारे जमीन में गड़ गई, उसकी नजरें अपने ही गले में पड़े उस हार पर गईं जो उसने गौरी के हक से छीना था। आज बिना एक भी अपशब्द कहे, गौरी के ससुराल वालों ने उन दोनों के मुंह पर इंसानियत का ऐसा तमाचा मारा था जिसकी गूंज उन्हें जिंदगी भर सुनाई देने वाली थी।

जब मंच पर पहरावनी की रस्म शुरू हुई और शकुंतला बुआ ने माइक पर चिल्ला-चिल्लाकर गौरी के मायके से आए तोहफों का बखान किया, तब विकास की आंखों से पछतावे के आंसू बह निकले। उसने मंच पर जाकर सबके सामने अपनी बहन गौरी के हाथ जोड़ लिए और फुसफुसाते हुए बोला, “मुझे माफ कर दे गुड़िया… मैं लालच में अंधा हो गया था। तेरे ससुराल वालों ने आज मुझे दिखा दिया कि असली खानदानी लोग कौन होते हैं। मैं कल ही तेरे बाबूजी की रखी हुई एक-एक पाई और माँ के सारे गहने तेरे कदमों में लाकर रख दूंगा।”

गौरी ने अपने भाई के आंसू पोंछे और मुस्कुराकर अपने सास-ससुर की ओर देखा। उसने कहा, “भैया, मुझे अब किसी गहने या पैसे की जरूरत नहीं है। जिस लड़की को ससुराल में माता-पिता से बढ़कर सास-ससुर और इतना चाहने वाला पति मिल जाए, उसके लिए वही दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है। बस, आज से अपनी इस बहन से भाई का सच्चा रिश्ता निभा लेना, मेरे लिए इतना ही काफी है।”

मानसी की विदाई बहुत ही धूमधाम और खुशी के माहौल में संपन्न हुई। जिस घर में तानों की आशंका थी, वहां आज प्रेम, सम्मान और अपनत्व की ऐसी सुगंध फैली थी जिसने हर रिश्ते को पवित्र कर दिया था। केशव प्रसाद जी और गायत्री देवी ने यह साबित कर दिया था कि यदि सास-ससुर बहू को सचमुच अपनी बेटी मान लें, तो दुनिया की कोई भी ताकत उस घर की खुशियों को नजर नहीं लगा सकती।

दोस्तों, क्या आपके हिसाब से केशव प्रसाद जी और गायत्री देवी ने अपनी बहू की इज्जत बचाने के लिए जो कदम उठाया, वह सही था? क्या आज के समाज में भी ऐसे सास-ससुर मिलते हैं जो बहू के मायके की कमजोरी को उसका ताना बनाने के बजाय उसकी ढाल बन जाते हैं? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें, आपके विचारों का हमें इंतजार रहेगा!

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद .

error: Content is protected !!