रोहन से अब और नहीं रहा गया। उसने आगे बढ़कर अपने सिर को अपने बूढ़े पिता के सीने से लगा दिया और फफक-फफक कर रो पड़ा। उसने रोते हुए कहा, “नहीं बाबूजी, ऐसा मत कहिए! मुझसे मेरी गलतियाँ भूल जाइए, बस आप ठीक हो जाइए। माँ तो चली गई, अब अगर आपको भी कुछ हो गया तो यह बेटा पूरी तरह अनाथ हो जाएगा।”
कमरे के दरवाजे पर खड़ी सारिका और छोटा कान्हा भी इस दृश्य को देखकर अपनी आँखें नहीं रोक पाए। वह पल उन दोनों पिताओं और पुत्रों के बीच की बरसों पुरानी बर्फ को पिघलाने के लिए काफी था।
कमरे के भीतर अस्सी के करीब पहुँच चुके विश्वनाथ जी एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर झुके हुए बैठे थे। उनके बाल पूरी तरह बर्फ जैसे सफेद हो चुके थे और आँखों पर चढ़ा मोटा चश्मा उनकी नम आँखों को छिपा नहीं पा रहा था।
तभी कमरे का दरवाज़ा हल्के से खुला और उनके सात साल के पोते कान्हा ने अंदर झाँकते हुए अपने दोनों छोटे हाथ आगे बढ़ाए। उसने उत्साह से अपने नाना-दादा—यानी विश्वनाथ जी—का कुर्ता पकड़ते हुए कहा, “दादू! आप भी चलिए न हमारे साथ बाहर डिनर पर… होटल में बहुत मज़ा आएगा, हम सब साथ में पिज्जा और आइसक्रीम खाएंगे।”
विश्वनाथ जी ने अपने कांपते हाथों से कान्हा के मखमली गालों को छुआ और एक हल्की सी, फीकी मुस्कान लाते हुए बोले, “नहीं बेटा कान्हा! तुम लोग जाओ, मैं घर पर ही ठीक हूँ। मेरे पैरों में आज थोड़ा दर्द है, तुम लोग मजे से घूमकर आओ।”
ठीक उसी समय, कमरे की चौखट पर खड़ी उनकी बहू सारिका ने बड़े ही आग्रह भरे लहजे में कहा, “बाबूजी, चलिए न! आप घर में बंद-बंद घुट जाते हैं। कान्हा के साथ बाहर चलेंगे तो आपका भी मन बहल जाएगा। आपको इस शहर में आए हुए महीनों हो गए, लेकिन आज तक आपने इस कमरे की चारदीवारी से बाहर कदम तक नहीं रखा है। ऐसे अकेले कब तक घुटन भरी जिंदगी जीते रहेंगे?”
विश्वनाथ जी ने अपनी बहू की तरफ देखा, जिनकी आँखों में बुजुर्गों के प्रति अगाध सम्मान और चिंता साफ झलक रही थी। उन्होंने बेहद सरल और धीमे स्वर में कहा, “नहीं बहु, तुम लोग जाओ। मेरा सचमुच बिल्कुल मन नहीं है। और मेरे लिए रात के खाने की कोई चिंता मत करना, सुबह की थोड़ी सी दाल-रोटी रखी है, मैं वही गर्म करके खा लूँगा। तुम लोग जाओ और कान्हा को भी खुश रखो।”
सारिका जानती थी कि बाबूजी की जिद के आगे बहस करना बेमानी होगी। उसने बिना किसी अतिरिक्त जिद के, एक लंबी सांस लेते हुए कहा, “ठीक है बाबूजी, जैसा आपको ठीक लगे।” कहकर वह पीछे हट गई। उनके पीछे-पीछे छोटा कान्हा भी उदास मन से बाहर आ गया।
जैसे ही कमरे का भारी दरवाजा बंद हुआ और सन्नाटा फिर से छा गया, विश्वनाथ जी के संयम का बाँध टूट गया। उनकी झुकी हुई पलकों से दो मोटे, गर्म आंसू टपककर उनके झुर्रियों से भरे गालों पर बह निकले। ये आंसू केवल उम्र के ढलने का दर्द नहीं थे; ये उस अंतहीन अपराध-बोध और प्रायश्चित की आग की बूंदें थीं, जो पिछले कई सालों से उनके भीतर सुलग रही थी।
जब से उनकी जीवनसंगिनी, स्वर्गीय शांता जी इस दुनिया को छोड़कर गई थीं, तब तक का हर एक दिन विश्वनाथ जी के लिए किसी जेल की सजा से कम नहीं था। आज जब वे पीछे मुड़कर देखते थे, तो उन्हें अपनी पूरी जिंदगी एक रेगिस्तान जैसी वीरान और क्रूर नजर आती थी। उन्होंने अपनी पूरी जवानी और गृहस्थी के दौरान कभी भी शांता को वह सम्मान, वह मान-सम्मान और स्नेह नहीं दिया जिसकी वह असल हकदार थी। कौन सा ऐसा दिन था जब विश्वनाथ जी ने छोटी-छोटी बातों पर शांता जी को खरी-खोटी न सुनाई हो? उनके गुस्से के आगे घर की चारदीवारी हमेशा सहमी रहती थी, और एक शांता थी जो हर कड़वी बात को चुपचाप पीकर, अपना पत्नी-धर्म निभाती हुई घर को सहेजने में लगी रहती थी।
विश्वनाथ जी का अहंकार इतना बढ़ा हुआ था कि वे हर बात पर अपना रोष प्रकट करते थे। यहाँ तक कि कई बार भरे घर में या रिश्तेदारों के सामने भी वे शांता जी को नीचा दिखाने से नहीं चूकते थे। यही कड़वाहट और अपमानजनक व्यवहार वह मुख्य कारण था जिसके चलते उनका इकलौता बेटा रोहन अपने पिता से भीतर तक नफरत करने लगा था। रोहन ने अपनी माँ के आंसुओं को बहुत करीब से देखा था, और यही कारण था कि माँ के जाने के बाद भी रोहन के दिल में अपने पिता के प्रति बर्फ सी जमी हुई थी।
विश्वनाथ जी पुराने दिनों की उधेड़बुन में डूबे ही थे कि तभी बाहर से सारिका की आवाज गूंजी, “बाबूजी! हम लोग निकल रहे हैं, आपका खाना किचन के काउंटर पर ढककर रख दिया है, समय पर खाकर सो जाइएगा।”
सारिका ऐसा कहकर अपने बेटे कान्हा के साथ घर के मुख्य दरवाजे से बाहर निकल आई। घर के बाहर ही रोहन अपनी गाड़ी स्टार्ट करके उनका इंतजार कर रहा था। सारिका और कान्हा पिछली सीट पर बैठ गए और गाड़ी मुख्य सड़क की तरफ बढ़ गई।
गाड़ी को शहर की भीड़भाड़ से निकलते हुए थोड़ा ही वक्त हुआ था कि खामोशी को चीरते हुए सारिका ने थोड़ा झिझकते हुए, डरते-डरते रोहन से कहा, “रोहन… मुझे आज भी लगता है कि आपको एक बार बाबूजी से और आग्रह करना चाहिए था। अगर आप थोड़ा सा प्यार से बुला लेते, तो शायद वो हमारे साथ चल पड़ते। वे अकेले उस कमरे में घुटते रहते हैं, और सच कहूँ तो मुझसे उनकी यह हालत देखी नहीं जाती। आखिर वे आपके पिता हैं… आप उनसे इतनी दूरी क्यों बना कर रखते हैं?”
सारिका के इतना कहते ही स्टेयरिंग पर रोहन के हाथ अचानक कड़े हो गए। उसके चेहरे की नसें तन गईं और उसकी आँखों में वर्षों पुराना गुस्सा और आक्रोश एक बार फिर उभर आया। उसने गाड़ी को किनारे रोकते हुए तीखी और कठोर आवाज में कहा, “सारिका! मैंने तुमसे कितनी बार यह बात स्पष्ट शब्दों में कही है कि तुम मेरे और उस आदमी के बीच की दीवार को गिराने की कोशिश मत करो। जिस इंसान ने मेरी माँ को जीते जी तिल-तिल कर मारा, जिसके हर एक शब्द ने मेरी माँ की रूह को छलनी किया, आज बुढ़ापा आने पर यदि उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा है, तो इसमें मेरी कोई सहानुभूति नहीं है। जो जैसा बोएगा, वह वैसा ही काटेगा!”
सारिका सहम कर चुप हो गई। वह जानती थी कि रोहन के घाव बहुत गहरे थे, जिन्हें भरने में शायद पूरी उम्र कम पड़ जाए।
घर के उस शांत कमरे में बैठे विश्वनाथ जी को शायद अपने बेटे की इस नफरत का पूरा अहसास था। उन्होंने अपनी कांपती उंगलियों से उस फ्रेम की हुई तस्वीर को छुआ, जिसमें शांता जी हल्की सी मुस्कान के साथ उन्हें देख रही थीं। उन्होंने तस्वीर से धीरे से फुसफुसाते हुए कहा, “शांता, मैंने तुम्हें ताउम्र रुलाया, आज मेरा बेटा मुझे रुला रहा है… शायद यही मेरे कर्मों का सही न्याय है।”
लेकिन समय किसी के लिए नहीं रुकता। वक्त अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता गया। रोहन और सारिका ने कई बार कोशिश की कि घर का माहौल सामान्य हो जाए, लेकिन रोहन का दिल पत्थर की तरह कठोर हो चुका था। वह बाबूजी की दवाइयां और जरूरत का सामान चुपचाप भिजवा देता था, लेकिन उनसे बात करने से हमेशा कतराता था।
महीनों बीत गए। एक दिन अचानक मौसम ने करवट ली। आसमान में काले बादल छा गए और झमाझम बारिश शुरू हो गई। उस शाम रोहन अपने ऑफिस के किसी जरूरी काम से शहर से बाहर गया हुआ था। घर पर केवल सारिका, छोटा कान्हा और बुजुर्ग विश्वनाथ जी थे। मूसलाधार बारिश के कारण शहर के कई इलाकों में बिजली कट गई थी और चारों तरफ अंधेरा छा गया था।
अचानक रात के करीब दो बजे, विश्वनाथ जी के सीने में एक तेज और असहनीय चुभन उठी। दर्द इतना तीव्र था कि उनके मुँह से चीख निकल गई। वे किसी तरह अपनी कुर्सी से उठने की कोशिश करते हुए जमीन पर गिर पड़े। उनके हाँफने की आवाज सुनकर सारिका तुरंत नींद से जाग गई। उसने टार्च जलाई और दौड़कर बाबूजी के कमरे में पहुँची।
सामने का दृश्य देखकर सारिका के होश उड़ गए। विश्वनाथ जी दर्द से छटपटा रहे थे और उनका पूरा शरीर ठंडे पसीने से भीग चुका था। सारिका घबरा गई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने तुरंत अपने पति रोहन को फोन लगाया। फोन लगते ही रोहन ने घबराते हुए पूछा, “सारिका, इतनी रात को फोन? सब ठीक तो है?”
सारिका की आवाज कांप रही थी, उसने रोहंते हुए कहा, “रोहन… जल्दी घर वापस आओ! बाबूजी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है, उनके सीने में तेज दर्द है और वे बेहोश हो रहे हैं। हमारे पास एम्बुलेंस बुलाने का भी समय नहीं है!”
फोन दूसरी तरफ से कट गया। महज़ पंद्रह मिनट के भीतर रोहन हाँफते हुए, बारिश में भीगा हुआ घर के अंदर आ गया। उसने बिना एक पल गंवाए अपने पिता को अपनी मजबूत बाहों में उठाया और गाड़ी की तरफ भागा।
अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के बाहर सन्नाटा था। डॉक्टर अंदर विश्वनाथ जी का इलाज कर रहे थे। बाहर बेंच पर रोहन अपने सिर को दोनों हाथों में थामे गुमसुम बैठा था। उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी और खौफ था। वह मन ही मन खुद से लड़ रहा था—वही पिता, जिनसे उसने वर्षों से ठीक से बात तक नहीं की थी, आज जब मौत के मुहाने पर थे, तो उसका दिल क्यों ऐसे धड़क रहा था मानो उसका सब कुछ उजड़ने वाला हो?
तभी डॉक्टर बाहर आए। रोहन और सारिका तुरंत उठकर उनके पास गए। डॉक्टर ने राहत की सांस लेते हुए कहा, “समय रहते आप इन्हें ले आए, वरना बड़ा हादसा हो सकता था। इन्हें माइल्ड हार्ट अटैक आया है। अभी इनकी स्थिति खतरे से बाहर है, लेकिन इन्हें पूरी तरह मानसिक तनाव से दूर रखना होगा और बहुत देखभाल की जरूरत है।”
सुबह की पहली किरण के साथ जब विश्वनाथ जी की आँख खुली, तो उन्होंने खुद को अस्पताल के सफेद बिस्तर पर पाया। उनके ठीक पास वाली कुर्सी पर रोहन सिर झुकाए बैठा था। रोहन की आँखों में रातभर जागने के कारण लालिमा छाई हुई थी और उसके बाल बिखरे हुए थे।
विश्वनाथ जी ने बेहद कमजोर और कांपती हुई आवाज में फुसफुसाया, “रो… रोहन…”
रोहन ने चौंककर ऊपर देखा। उसने तुरंत आगे बढ़कर अपने पिता का वह हाथ अपने हाथों में थाम लिया, जो कभी उसके बचपन में उसे उंगली पकड़कर चलना सिखाता था। रोहन की आंखें भर आईं और उसका गला रुंध गया। उसने अपने आंसुओं को रोकते हुए कहा, “बाबूजी… आप चुप रहिए, कुछ मत बोलिए। डॉक्टर ने कहा है आपको आराम की जरूरत है।”
विश्वनाथ जी की आँखों से आंसू बह निकले। उन्होंने रोहन के हाथों को हल्का सा दबाते हुए टूटे हुए शब्दों में कहा, “मुझे माफ कर दे बेटा… मैंने तुम्हारी माँ को भी बहुत दुख दिया और तुझे भी कभी एक अच्छा पिता बनकर प्यार नहीं दे पाया। मेरे भीतर का अहंकार सब कुछ खा गया… अब और जीने की इच्छा नहीं है, बस चैन से मर सकूँ, इसलिए मुझे माफ कर दे।”
रोहन से अब और नहीं रहा गया। उसने आगे बढ़कर अपने सिर को अपने बूढ़े पिता के सीने से लगा दिया और फफक-फफक कर रो पड़ा। उसने रोते हुए कहा, “नहीं बाबूजी, ऐसा मत कहिए! मुझसे मेरी गलतियाँ भूल जाइए, बस आप ठीक हो जाइए। माँ तो चली गई, अब अगर आपको भी कुछ हो गया तो यह बेटा पूरी तरह अनाथ हो जाएगा।”
कमरे के दरवाजे पर खड़ी सारिका और छोटा कान्हा भी इस दृश्य को देखकर अपनी आँखें नहीं रोक पाए। वह पल उन दोनों पिताओं और पुत्रों के बीच की बरसों पुरानी बर्फ को पिघलाने के लिए काफी था। उस अस्पताल के छोटे से कमरे में न तो कोई शिकायत बची थी, न कोई ताना और न ही कोई कड़वाहट—बचा था तो केवल एक अटूट रिश्ता, क्षमा का प्रकाश और प्यार का नया सवेरा।
एक हफ्ते बाद जब विश्वनाथ जी अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर लौटे, तो घर का नक्शा ही बदल चुका था। जिस कमरे में वे अकेले अपनी तन्हाई और पछतावे के साथ घुटते थे, आज उस कमरे की खिड़कियाँ पूरी तरह खुली थीं, जिन पर ताजी हवा के झोंके आ रहे थे। रोहन अब रोज शाम को ऑफिस से जल्दी लौटकर अपने बाबूजी के पास बैठता, उन्हें उनके पुराने दिनों की बातें सुनाता और कान्हा अपने दादाजी की गोद में बैठकर लूडो खेलता।
विश्वनाथ जी के चेहरे पर अब वह उदासी और अपराध-बोध नहीं था, बल्कि एक सुकून भरी मुस्कान थी। उन्होंने समझ लिया था कि इंसान चाहे कितनी भी बड़ी भूल क्यों न कर ले, यदि वह सच्चे दिल से प्रायश्चित कर ले और परिवार के अपने लोग उसे माफ कर दें, तो जीवन की शाम भी किसी सुंदर सुबह से कम खूबसूरत नहीं होती।
शीर्षक: क्षमा की छांव और रिश्तों की नई सुबह
हूक लाइन: जिस पिता ने जिंदगी भर अपनों को रुलाया, जब खुद कातनों पर आफत आई तो क्या एक बेटे का दिल उस पत्थरदिल अतीत को भुला पाएगा?
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