रेशम की खुशबू – लक्ष्मी कानोडिया

अलमारी का सबसे ऊपर वाला खाना खोलते ही मीरा के हाथ ठिठक गए। सामने हल्के आसमानी रंग की बनारसी सिल्क साड़ी बड़े करीने से रखी थी। उसने साड़ी को धीरे से बाहर निकाला और हथेलियों पर फैला लिया। रेशम की मुलायम चमक जैसे वर्षों पुरानी यादों को फिर से जीवंत कर गई।

“मम्मी, आप फिर वही साड़ी देख रही हैं?”

सत्रह वर्षीय अनुष्का कमरे में आकर बोली।

मीरा ने मुस्कुराकर साड़ी को अपने गाल से लगा लिया, “हाँ, पता नहीं क्यों, इसे देखते ही मन कहीं दूर चला जाता है।”

“लेकिन आप इसे पहनती क्यों नहीं? मैंने आपको कभी इस साड़ी में नहीं देखा।”

मीरा ने गहरी साँस ली। “क्योंकि यह सिर्फ एक साड़ी नहीं है, बेटा… यह मेरी जिंदगी का एक हिस्सा है।”

अनुष्का उत्सुकता से माँ के पास बैठ गई। “तो फिर मुझे भी सुनाइए न इसकी कहानी।”

मीरा कुछ देर चुप रही। फिर उसकी आँखें जैसे बीस साल पीछे लौट गईं।

मीरा तब कॉलेज में पढ़ती थी। पिता की एक छोटी-सी कपड़े की दुकान थी। घर में सुख-सुविधाएँ बहुत नहीं थीं, लेकिन प्यार बहुत था।

एक दिन माँ बाजार से लौटते हुए बोली थीं, “मीरा, शर्मा जी के बेटे के लिए तुम्हारा रिश्ता आया है। लड़का बैंक में नौकरी करता है।”

मीरा ने शर्माते हुए सिर झुका लिया था।

कुछ महीनों बाद उसकी शादी तय हो गई। शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं। घर में उत्सव जैसा माहौल था।

एक शाम वह माँ के साथ बाजार गई। दुकानों में साड़ियों की जगमगाती दुनिया देखकर उसकी आँखें चमक उठीं।

एक दुकान में उसकी नजर आसमानी रंग की एक बनारसी सिल्क साड़ी पर जाकर ठहर गई। उस पर चाँदी के धागों से बेहद सुंदर बेल-बूटे बने थे।

“माँ, यह कितनी सुंदर है!” उसके मुँह से अनायास निकला।

माँ ने कीमत पूछी।

“बारह हजार रुपए।”

उस समय बारह हजार रुपए उनके लिए बहुत बड़ी रकम थी।

माँ ने तुरंत साड़ी वापस रख दी।

“चल बेटी, और भी बहुत काम हैं।”

मीरा ने कुछ नहीं कहा। लेकिन जाते-जाते उसने एक बार फिर मुड़कर उस साड़ी को देखा था।

शायद माँ उसकी आँखों की भाषा पढ़ चुकी थीं।

शादी से दो दिन पहले माँ ने उसे कमरे में बुलाया।

“आँखें बंद कर।”

मीरा ने आँखें बंद कर लीं।

माँ ने उसके हाथों में कुछ रखा।

आँखें खोलते ही मीरा चौंक गई।

वही आसमानी सिल्क साड़ी!

“माँ…!” उसकी आँखें भर आईं।

“पसंद थी न तुझे?”

“लेकिन इतने पैसे…?”

माँ मुस्कुरा दीं, “कुछ बचत थी। सोचा, मेरी बेटी अपनी पसंद की साड़ी के बिना विदा कैसे होगी?”

मीरा माँ के गले लगकर रो पड़ी थी।

उस दिन उसे पहली बार समझ आया कि माँ का प्यार दुनिया की सबसे अनमोल दौलत है।

शादी के बाद मीरा अपने नए घर आ गई।

ससुराल में सभी अच्छे थे। पति नीरज बेहद समझदार और स्नेही थे।

विदाई के बाद जब उसने पहली बार वह सिल्क साड़ी पहनी, नीरज उसे देखते ही रह गए।

“तुम बहुत सुंदर लग रही हो।”

मीरा शरमा गई।

“यह मेरी माँ ने दी है,” उसने गर्व से कहा।

उस दिन उसने पहली बार महसूस किया कि एक साड़ी सिर्फ कपड़ा नहीं होती। उसमें भावनाएँ भी बुनी होती हैं।

समय बीतता गया।

जीवन में सुख भी आए और संघर्ष भी।

शादी के तीन साल बाद नीरज की नौकरी चली गई।

घर की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी।

बचत खत्म हो गई।

एक-एक कर मीरा ने अपने कई गहने बेच दिए।

एक दिन नीरज ने उदास होकर कहा, “मुझे बहुत बुरा लगता है, मीरा। तुम्हारे लिए कुछ कर नहीं पा रहा।”

मीरा ने उनका हाथ थाम लिया।

“हम साथ हैं, बस यही बहुत है।”

कुछ दिन बाद उसने अलमारी खोली।

नजर फिर उसी सिल्क साड़ी पर पड़ी।

उसने साड़ी बाहर निकाली।

कुछ पल उसे देखती रही।

फिर मन में एक विचार आया।

वह साड़ी लेकर बाजार चली गई।

दुकानदार ने साड़ी देखी।

“बहुत अच्छी बनारसी सिल्क है। बेचनी है?”

मीरा ने होंठ भींच लिए।

उसे माँ का चेहरा याद आया।

वह दिन याद आया जब माँ ने अपने सपने काटकर उसके लिए यह साड़ी खरीदी थी।

उसकी आँखें भर आईं।

अचानक उसने साड़ी वापस मोड़ ली।

“नहीं… यह नहीं बेचूँगी।”

वह घर लौट आई।

नीरज ने पूछा, “कहाँ गई थीं?”

मीरा ने सारी बात बता दी।

नीरज कुछ देर चुप रहे।

फिर बोले, “तुमने सही किया। कुछ चीजों की कीमत पैसे से नहीं लगाई जा सकती।”

धीरे-धीरे समय बदला।

नीरज को नई नौकरी मिल गई।

आर्थिक स्थिति फिर से संभलने लगी।

फिर घर में अनुष्का का जन्म हुआ।

उसके आने से घर में खुशियाँ लौट आईं।

एक दिन छोटी-सी अनुष्का अलमारी खोलकर बैठी थी।

उसने साड़ी निकाल ली।

“मम्मी, परी वाली साड़ी!”

मीरा हँस पड़ी।

तब से वह साड़ी घर में “परी वाली साड़ी” कहलाने लगी।

हर त्योहार पर अनुष्का जिद करती, “मम्मी, यही पहन लो।”

लेकिन मीरा उसे बहुत संभालकर रखती।

उसे लगता था, यह साड़ी केवल रेशम के धागों से नहीं, माँ की ममता से बुनी गई है।

कुछ वर्षों बाद एक दिन फोन आया।

माँ अचानक बहुत बीमार हो गई थीं।

मीरा भागी-भागी मायके पहुँची।

माँ बिस्तर पर थीं।

उन्होंने मीरा को देखकर मुस्कुराने की कोशिश की।

“आ गई तू?”

मीरा उनके पास बैठ गई।

माँ ने उसका हाथ पकड़ा।

“एक बात पूछूँ?”

“हाँ माँ।”

“वह आसमानी साड़ी… अभी भी है?”

मीरा की आँखें भर आईं।

“हाँ माँ, बिल्कुल संभालकर रखी है।”

माँ संतोष से मुस्कुरा दीं।

“अच्छा किया। चीजें पुरानी होती हैं, लेकिन उनसे जुड़ी यादें कभी पुरानी नहीं होतीं।”

यह माँ की उससे आखिरी लंबी बातचीत थी।

कुछ दिनों बाद माँ चली गईं।

उस दिन पहली बार मीरा ने वह सिल्क साड़ी पहनकर माँ को अंतिम विदाई दी थी।

साड़ी का आँचल आँसुओं से भीग गया था।

लेकिन उसे लग रहा था, जैसे माँ अब भी उसे अपने आँचल में छिपाए हुए हैं।

“फिर क्या हुआ, मम्मी?”

अनुष्का की आवाज सुनकर मीरा वर्तमान में लौट आई।

उसने देखा, उसकी बेटी की आँखें भी नम थीं।

“फिर कुछ नहीं बेटा… बस यह साड़ी मेरी सबसे कीमती चीज बन गई।”

अनुष्का ने साड़ी को हाथ लगाया।

“सच में, यह बहुत सुंदर है।”

मीरा मुस्कुरा दी।

“सुंदर इसलिए नहीं कि यह सिल्क की है। सुंदर इसलिए है क्योंकि इसमें मेरी माँ का प्यार है, मेरे जीवन की यादें हैं, मेरे संघर्ष हैं और मेरी खुशियाँ भी।”

अनुष्का कुछ देर सोचती रही।

फिर बोली, “मम्मी, जब मेरी शादी होगी, तब क्या आप मुझे यह साड़ी देंगी?”

मीरा चौंकी।

उसने बेटी को देखा।

उसे लगा, समय जैसे एक पूरा चक्र पूरा कर रहा है।

उसने साड़ी को प्यार से सहलाया।

“हाँ बेटा, एक दिन यह साड़ी तुम्हारी होगी।”

“लेकिन मैं इसे कभी नहीं बेचूँगी।”

मीरा हँस पड़ी।

“मैं भी यही सोचती थी।”

दोनों खिलखिला उठीं।

मीरा ने साड़ी को वापस मोड़कर अलमारी में रखा।

लेकिन इस बार उसने उसे सबसे ऊपर नहीं रखा।

उसने साड़ी निकालकर अनुष्का के हाथों में दे दी।

“संभालकर रखना… इसमें सिर्फ रेशम नहीं, तीन पीढ़ियों का प्यार रखा है।”

अनुष्का ने साड़ी को सीने से लगा लिया।

खिड़की से आती धूप उस आसमानी सिल्क पर पड़ रही थी।

रेशम चमक रहा था।

ठीक वैसे ही, जैसे यादें चमकती हैं—वर्षों बाद भी, कभी फीकी नहीं पड़तीं

स्वरचित मौलिक व अप्रकाशित रचना

                          लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका ‘

खुर्जा 203131

जि० बुलंदशहर 

उत्तर प्रदेश

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