संस्कारों की कद्र

“सुषमा जी, देखिए हमारे पंडित जी ने कहा है कि अगले महीने की पंद्रह तारीख का मुहूर्त सबसे उत्तम है। इसके बाद तो सीधा छह महीने तक कोई शुभ मुहूर्त नहीं है। हम चाहते हैं कि शादी इसी मुहूर्त में हो जाए। आखिर हमें भी तो अपने रिश्तेदारों को जवाब देना होता है।” फोन के दूसरी तरफ से शहर के जाने-माने व्यापारी घराने की मालकिन, सुमित्रा देवी की भारी और रौबदार आवाज़ गूंज रही थी।

सुषमा जी के चेहरे पर पसीना आ गया। उन्होंने किसी तरह घबराहट को छुपाते हुए कहा, “जी.. जी सुमित्रा जी। मैं अंजलि के पापा से बात करके आपको बताती हूँ।” फोन कटते ही सुषमा जी ने राहत की सांस ली लेकिन उनके माथे की लकीरें गहरी हो गई थीं। उन्होंने पास ही बैठे अपने पति, रामनाथ जी की तरफ देखा। रामनाथ जी एक सरकारी स्कूल से रिटायर शिक्षक थे और अब पेंशन के पैसों से घर का खर्च चलता था।

“क्या कह रही थीं सुमित्रा जी?” रामनाथ जी ने अपना चश्मा उतारते हुए पूछा। सुषमा जी ने घबराते हुए जवाब दिया, “सुनिए, वे लोग चाहते हैं कि शादी बस बीस दिन के अंदर, अगले महीने की पंद्रह तारीख को ही हो जाए। पंडित जी ने वही मुहूर्त निकाला है।” रामनाथ जी यह सुनते ही सन्न रह गए। “बीस दिन? सुषमा, तुम जानती हो ना हम लोग किस स्थिति में हैं? इतने बड़े घर में हम अपनी अंजलि दे रहे हैं, वे लोग कोई छोटी-मोटी शादी तो चाहेंगे नहीं। बीस दिन में मैं बैंक्वेट हॉल, गहने, कपड़े, और उनके स्तर के मेहमानों की खातिरदारी का इंतज़ाम कैसे कर पाऊंगा? मेरे पास तो रिटायरमेंट का जो थोड़ा बहुत पैसा बचा है, वह भी आधा ही पड़ेगा।”

सुषमा जी ने समझाने वाले स्वर में कहा, “देखिए, हमारी अंजलि के भाग्य अच्छे हैं जो इतना बड़ा और संपन्न परिवार मिला है। लड़का, विक्रम, खुद अपनी आईटी कंपनी चलाता है। उन्होंने अंजलि को एक ही नज़र में पसंद कर लिया था। अगर हमने मुहूर्त की बात नहीं मानी, तो कहीं वे रिश्ता ही ना तोड़ दें। आप किसी तरह इंतज़ाम कर लीजिए। रिश्तेदार और जान-पहचान वालों से कुछ उधार मांग लीजिए, बाद में धीरे-धीरे चुका देंगे।” रामनाथ जी एक गहरी सांस छोड़कर अपनी डायरी और पेन लेकर हिसाब लगाने बैठ गए।

तभी दरवाजे की घंटी बजी। अंजलि ऑफिस से आ गई थी। अंजलि एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर मैनेजर थी। वह न केवल बेहद खूबसूरत और समझदार थी, बल्कि बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल रही थी। नौकरी लगते ही उसने घर की आधी जिम्मेदारियां अपने मजबूत कंधों पर उठा ली थीं। घर का राशन हो या पिता की दवाइयां, अंजलि बिना कहे सब संभाल लेती थी। सुमित्रा देवी ने अंजलि की इसी सादगी, सुंदरता और आत्मविश्वास को देखकर उसे अपने इकलौते बेटे विक्रम के लिए चुना था।

घर में घुसते ही अंजलि ने अपने माता-पिता के चेहरों पर छाई चिंता को भांप लिया। “क्या हुआ पापा? आप इतने परेशान क्यों लग रहे हैं?” अंजलि ने पानी का गिलास मेज पर रखते हुए पूछा। सुषमा जी ने खुशी और चिंता के मिले-जुले भाव से सारी बात बता दी। “बेटा, विक्रम के घरवाले चाहते हैं कि शादी बीस दिन में हो जाए। तेरे पापा बस उसी के इंतज़ाम का हिसाब लगा रहे हैं।”

अंजलि के चेहरे की मुस्कान फीकी पड़ गई। वह जानती थी कि उसके पिता के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वे सुमित्रा देवी के रुतबे के हिसाब से एक आलीशान शादी कर सकें। उस रात अंजलि सो नहीं पाई। रात के करीब दो बजे जब वह पानी पीने उठी, तो उसने देखा कि रामनाथ जी के कमरे की लाइट अभी भी जल रही है। वह दबे पांव वहां गई। रामनाथ जी फोन पर अपने किसी पुराने दोस्त से बात कर रहे थे, “भाई, मुझे पता है कि रकम बड़ी है, लेकिन मुझे अपनी बेटी के हाथ पीले करने हैं। तुम बस मुझे पांच लाख रुपये का इंतज़ाम करवा दो, मैं तुम्हें पांच प्रतिशत महीने के ब्याज के साथ लौटा दूंगा। मेरी पेंशन से किश्तें कटवा लेना। बस मेरी इज्जत बचा लो।”

यह सुनकर अंजलि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पांच प्रतिशत महीने का ब्याज! इसका मतलब था कि उसके पिता अपनी बाकी की पूरी ज़िंदगी कर्ज के बोझ तले सिसकते हुए गुजार देंगे। एक पिता अपनी बेटी को खुश देखने के लिए अपनी रातों की नींद और अपना आत्मसम्मान सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार था। अंजलि की आँखों से आंसू बहने लगे। वह बिना कुछ कहे अपने कमरे में लौट आई, लेकिन उस रात उसने एक बहुत बड़ा फैसला कर लिया था।

अगले दिन अंजलि ने ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी ली और विक्रम को फोन किया। विक्रम एक सुलझा हुआ और आधुनिक विचारों वाला युवा था। अंजलि ने उसे एक कॉफी शॉप में मिलने के लिए बुलाया। विक्रम जब वहां पहुंचा तो अंजलि का उतरा हुआ चेहरा देखकर हैरान रह गया। “क्या हुआ अंजलि? तुम ठीक तो हो? सब कुछ ठीक है ना?”

अंजलि ने एक गहरी सांस ली और सीधे मुद्दे पर आते हुए कहा, “विक्रम, मैं तुमसे कुछ छिपाना नहीं चाहती। कल तुम्हारी मां का फोन आया था और वे बीस दिन में शादी करना चाहती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि मेरा परिवार इस स्थिति में नहीं है। मेरे पिता एक रिटायर्ड टीचर हैं। तुम्हारी मां की उम्मीदों के मुताबिक एक ग्रैंड वेडिंग करने के लिए मेरे पिता को बहुत भारी कर्ज लेना पड़ रहा है। मैंने रात उन्हें ब्याज पर पैसे मांगते हुए सुना है। मैं एक बेटी हूँ विक्रम, मैं अपने नए जीवन की शुरुआत अपने पिता की बर्बादी की कीमत पर नहीं कर सकती।”

विक्रम अंजलि की स्पष्टवादिता और ईमानदारी से स्तब्ध रह गया। उसे अपनी मां की जिद के बारे में पता था, लेकिन उसे यह अंदाज़ा नहीं था कि इसका अंजलि के परिवार पर क्या असर पड़ रहा है। विक्रम ने अंजलि का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “मुझे इस बात का बिल्कुल भी इल्म नहीं था अंजलि। मां ने बस मुझसे कहा था कि पंडित जी ने मुहूर्त निकाला है। मुझे माफ कर दो। तुम्हें क्या लगता है, मुझे तुमसे शादी करनी है या तुम्हारे पैसों और एक आलीशान पार्टी से? तुम चिंता मत करो, मैं मां से बात करूंगा।”

उसी शाम विक्रम ने घर पहुंचकर अपनी मां सुमित्रा देवी से साफ-साफ बात की। जब सुमित्रा देवी को पता चला कि अंजलि ने विक्रम को सारी सच्चाई बता दी है, तो उनका अहंकार आहत हो गया। “उस लड़की की इतनी हिम्मत कि वह मेरे बेटे को हमारे ही खिलाफ भड़काए? अगर उनकी हैसियत नहीं थी तो उन्होंने हमारा रिश्ता कुबूल ही क्यों किया? हम शहर के नामी लोग हैं, अगर हम एक सादे समारोह में शादी करेंगे तो समाज क्या कहेगा? लोग हंसेंगे हम पर!” सुमित्रा देवी गुस्से से आग बबूला हो गईं।

अगले दिन सुबह-सुबह सुमित्रा देवी बिना बताए रामनाथ जी के घर पहुंच गईं। उनके साथ विक्रम भी था, जो अपनी मां को समझाने की कोशिश कर रहा था। सुमित्रा देवी को दरवाजे पर देखकर सुषमा जी और रामनाथ जी घबरा गए। रामनाथ जी ने हाथ जोड़कर कहा, “आइए समधन जी, आप अचानक? कोई भूल हो गई क्या?”

सुमित्रा देवी ने तीखे स्वर में कहा, “भूल तो आपने की है रामनाथ जी! जब आपकी हैसियत नहीं थी तो आपने यह रिश्ता क्यों जोड़ा? आपकी बेटी मेरे बेटे को मिलकर सिखा-पढ़ा रही है कि हम शादी का खर्च कम कर दें। क्या हम भिखारियों की तरह शादी करेंगे? अगर आप लोग हमारी बराबरी नहीं कर सकते, तो यह रिश्ता यहीं खत्म समझिए।”

रामनाथ जी की आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने कांपते हाथों से कहा, “सुमित्रा जी, ऐसा मत कहिए। मैं इंतज़ाम कर रहा हूँ। मैंने कर्ज ले लिया है, मैं आपकी हर शर्त पूरी करूंगा। मेरी बेटी का रिश्ता मत तोड़िए।”

तभी अंजलि कमरे से बाहर आई। उसकी आँखों में आंसू नहीं, बल्कि एक दृढ़ संकल्प था। वह अपनी पिता के सामने आकर खड़ी हो गई और सुमित्रा देवी की आँखों में आँखें डालकर बोली, “माफ कीजिएगा आंटी, लेकिन मेरे पिता किसी से कोई कर्ज नहीं लेंगे। मैं मानती हूँ कि आप बड़े लोग हैं, आपके लिए समाज और दिखावा बहुत मायने रखता होगा। लेकिन मेरे लिए मेरे पिता का आत्मसम्मान और उनका सुकून सबसे ऊपर है। जिसने मुझे जन्म दिया, मुझे पढ़ा-लिखा कर इस काबिल बनाया कि आज मैं आपके बेटे के बराबर खड़ी हो सकूं, मैं उन पिता को अपनी शादी के लिए दर-दर की ठोकरें खाने नहीं दे सकती। अगर आपको एक ऐसी बहू चाहिए जो सिर्फ पैसों के दिखावे के साथ आपके घर आए, तो शायद मैं आपके घर के लायक नहीं हूँ। रिश्ता जोड़ना या तोड़ना आपका फैसला है, लेकिन मेरे पिता अब किसी के सामने हाथ नहीं फैलाएंगे।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। रामनाथ जी और सुषमा जी डर से कांप रहे थे कि अब सुमित्रा देवी क्या कहेंगी। लेकिन सुमित्रा देवी कुछ बोल पातीं, उससे पहले ही विक्रम ने आगे बढ़कर अंजलि के पिता रामनाथ जी के पैर छू लिए।

विक्रम ने मुस्कुराते हुए अपनी मां की तरफ देखा और कहा, “मां, आप हमेशा कहती थीं ना कि मुझे एक ऐसी जीवनसाथी चाहिए जो घर को जोड़ कर रखे, जो हर मुश्किल में ढाल बनकर खड़ी रहे। आज देखिए, अंजलि ने साबित कर दिया कि वह सिर्फ एक अच्छी बेटी ही नहीं, बल्कि एक बहुत मजबूत इंसान है। जो लड़की अपने पिता के सम्मान के लिए इतने बड़े घराने के रिश्ते को भी ठुकराने की हिम्मत रखती है, सोचिए वह कल को हमारे परिवार की इज्जत के लिए क्या कुछ नहीं करेगी। मुझे अंजलि जैसी ही जीवनसाथी चाहिए। और शादी कोई दिखावा नहीं, दो दिलों का मिलन होता है। शादी बीस दिन बाद ही होगी, लेकिन एक सादे मंदिर में। कोई फिजूलखर्ची नहीं होगी।”

सुमित्रा देवी अपने बेटे की बात सुनकर अवाक रह गईं। उन्होंने अंजलि की तरफ देखा। अंजलि की आँखों में अपने परिवार के लिए जो प्रेम और समर्पण था, उसने सुमित्रा देवी के अंदर की मां को झकझोर दिया। उन्हें याद आ गया कि कैसे सालों पहले, जब उनके पति का व्यापार डूब गया था, तब उन्होंने भी अपने जेवर बेचकर अपने परिवार की इज्जत बचाई थी। आज वही स्वाभिमान उन्हें अंजलि में नजर आ रहा था।

सुमित्रा देवी का गुस्सा शांत हो गया। उनकी आँखों में नमी आ गई। उन्होंने आगे बढ़कर अंजलि को गले से लगा लिया। “मुझे माफ कर दो बेटी। मैं समाज के दिखावे में अंधी हो गई थी। मुझे पैसों और रुतबे का घमंड हो गया था। तुमने आज मेरी आँखें खोल दीं। मुझे कोई आलीशान शादी नहीं चाहिए, मुझे बस अपने घर के लिए यह सोने जैसी बेटी चाहिए।”

यह दृश्य देखकर रामनाथ जी और सुषमा जी फूट-फूट कर रोने लगे, लेकिन ये खुशी और सम्मान के आंसू थे। रामनाथ जी के दिल से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया था।

ठीक बीस दिन बाद, विक्रम और अंजलि की शादी शहर के एक प्राचीन मंदिर में बेहद सादगी और पवित्रता के साथ संपन्न हुई। दोनों परिवारों के करीबी रिश्तेदारों की मौजूदगी में जब अंजलि ने विक्रम के साथ फेरे लिए, तो रामनाथ जी ने गर्व से अपनी बेटी को विदा किया। उन्हें इस बात का सुकून था कि उनकी बेटी एक ऐसे घर जा रही है, जहां पैसों से ज्यादा संस्कारों की कद्र है। अंजलि ने सिर्फ अपना घर नहीं बचाया था, बल्कि उसने यह साबित कर दिया था कि एक बेटी बोझ नहीं, बल्कि पिता का सबसे बड़ा अभिमान होती है।

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लेखिका : आभा सक्सेना

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