अलार्म की तीखी आवाज़ ने काव्या की नींद तोड़ दी। उसने फोन की स्क्रीन पर समय देखा—सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड में रजाई से बाहर निकलने का बिल्कुल मन नहीं था, लेकिन रसोई की जिम्मेदारियां उसे पुकार रही थीं। काव्या की शादी को अभी महज़ आठ महीने ही हुए थे, लेकिन उसे लगने लगा था जैसे उसकी ज़िंदगी की सारी आज़ादी छिन गई हो। भारी कदमों से वह उठी और सीधे रसोई की तरफ चल दी। दूध उबालना, सास-ससुर के लिए चाय बनाना, पति के लिए नाश्ता तैयार करना और सबसे बढ़कर अपनी ननद, श्रुति के लिए उसका मनपसंद सैंडविच बनाना। श्रुति अभी कॉलेज में पढ़ती थी और सुबह आठ बजे से पहले कभी नहीं उठती थी। जब भी काव्या श्रुति को आराम से सोते हुए देखती, उसके मन में एक अजीब सी चिढ़ पैदा होती। वह बुदबुदाते हुए चाय छान रही थी, “मैं भी तो किसी की बेटी हूँ। मेरे घर में तो मुझे कभी किसी ने इतनी सुबह नहीं उठाया। यहाँ तो जैसे मैं कोई मशीन हूँ, जिसका काम सिर्फ सबकी फरमाइशें पूरी करना है।”
काव्या की सास, सुमित्रा देवी, एक सख्त मिज़ाज लेकिन सुलझी हुई महिला थीं। वह काव्या को काम सिखाने की कोशिश करती थीं, लेकिन काव्या को हर बात में ताना नज़र आता था। उसे लगता था कि सुमित्रा देवी उसे कभी अपनी बेटी नहीं मान सकतीं। एक दिन दोपहर में जब सब अपने-अपने काम पर चले गए, काव्या ने अपनी माँ, जानकी को फोन लगाया। फोन उठते ही काव्या की आँखों से आँसू छलक पड़े। “माँ, मुझे यहाँ बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। यहाँ कोई मुझे बेटी नहीं समझता। सास हर वक्त काम निकालती रहती हैं, पति अपने ऑफिस में व्यस्त रहते हैं, और वो श्रुति… वो तो महारानी की तरह दस बजे तक सोती है और मैं नौकरानी की तरह उसके लिए नाश्ता बनाती हूँ। मुझे लगता है मैं यहाँ सिर्फ रोटियां सेंकने आई हूँ।” जानकी ने बेटी की पूरी बात बहुत शांति से सुनी। उन्होंने बीच में एक बार भी काव्या को नहीं टोका। जब काव्या रो-रोकर शांत हो गई, तो जानकी ने प्यार से कहा, “बेटा, तू ऐसा कर, इस वीकेंड दो-चार दिन के लिए घर आजा। थोड़ा मन हल्का हो जाएगा। तेरे पापा भी तुझे बहुत याद कर रहे हैं।” काव्या को जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया। उसने तुरंत हामी भर दी।
शुक्रवार की शाम काव्या अपने मायके पहुँची। घर के दरवाज़े पर कदम रखते ही उसे वह पुरानी हवा महसूस हुई, जिसमें कोई बंदिश नहीं थी, कोई सुबह साढ़े पाँच बजे का अलार्म नहीं था। उसके भाई रोहन की शादी को दो साल हो चुके थे और उसकी भाभी, प्रेरणा ने बहुत अच्छे से घर संभाल लिया था। काव्या के आते ही प्रेरणा ने मुस्कुराकर उसका स्वागत किया, उसका बैग उठाया और उसे उसके पुराने कमरे में ले गई। रात को काव्या ने अपनी मनपसंद सब्ज़ी खाई जो प्रेरणा ने खास उसके लिए बनाई थी। अपनी माँ की गोद में सिर रखकर वह बहुत देर तक अपनी ससुराल की बुराइयां करती रही और जानकी सिर्फ उसके बालों में हाथ फेरते हुए सुनती रही।
अगली सुबह काव्या की नींद खुली तो धूप कमरे में आ चुकी थी। उसने घड़ी देखी, सुबह के दस बज रहे थे। वह चैन की अंगड़ाई लेते हुए उठी। उसे याद आया कि कैसे ससुराल में इस वक्त तक वह आधे घर का काम निबटा चुकी होती थी। वह मुस्कुराती हुई बाहर आई। डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगा हुआ था। प्रेरणा रसोई में पसीने से लथपथ होकर दोपहर के खाने की तैयारी कर रही थी, और जानकी बाहर बरामदे में बैठकर अख़बार पढ़ रही थीं। काव्या ने चाय का कप उठाया और एक घूंट पीकर मुँह बना लिया। “भाभी! चाय में चीनी कम है, और यह ठंडी भी हो गई है।” प्रेरणा ने रसोई से बाहर आकर माफ़ी माँगते हुए कहा, “सॉरी काव्या, मैं अभी दूसरी बना देती हूँ। दरअसल, सुबह से कपड़े धोने और नाश्ते की तैयारी में लगी थी, तो ध्यान नहीं रहा।”
काव्या को प्रेरणा का यह जवाब थोड़ा अजीब लगा। उसने बरामदे में जाकर अपनी माँ से कहा, “माँ, आप भाभी को कुछ कहती क्यों नहीं? मैं इतने दिनों बाद आई हूँ, और उन्हें मेरे लिए एक कप चाय ढंग से बनानी नहीं आती। और आप यहाँ आराम से बैठी हैं, आपने क्यों नहीं बना ली चाय?” जानकी ने अख़बार नीचे रखा और काव्या को अपने पास कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। जानकी का चेहरा अब कल रात जैसा नर्म नहीं था, उसमें एक गंभीरता थी।
“काव्या,” जानकी ने शांत लेकिन भारी आवाज़ में कहना शुरू किया, “तूने अभी कहा कि मैं आराम से क्यों बैठी हूँ, मैंने चाय क्यों नहीं बना ली? बेटा, जब तू इस घर में थी, शादी से पहले, तब तू भी तो दस बजे तक सोती थी। तब तेरे उठने से पहले मैं नाश्ता बनाती थी, तेरी चाय तेरे बिस्तर पर आती थी। बाकी सारे काम मेड कर देती थी और कभी तेरा मन हुआ तो तू थोड़ा बहुत हाथ बंटा देती थी। तब तूने कभी मुझसे कहा कि माँ आप आराम करो, मैं सुबह पाँच बजे उठकर पूरा घर संभाल लूंगी?” काव्या चुप रही। जानकी ने आगे कहा, “बेटा, अगर मैं भी अपनी जवानी में अपनी सास के सामने यही ज़िद पकड़ कर बैठ जाती कि मैं भी ससुराल में बेटी की तरह रहूंगी, मुझे भी सुबह देर तक सोना है, मुझे भी कोई ज़िम्मेदारी नहीं उठानी, तो क्या तुझे वो ऐशो-आराम मिल पाता जो तुझे इस घर में मिला? शादी से पहले बेटियां माँ-बाप की ज़िम्मेदारी होती हैं, इसलिए हम तुम्हारी हर गलती, हर नादानी, हर आलस को नज़रअंदाज़ करते हैं। लेकिन शादी के बाद एक नया परिवार, एक नई पीढ़ी तुम्हारे कंधों पर आती है। तब तुम्हारे ऊपर भी वही ज़िम्मेदारी आती है, जो कल तक तुम्हारी माँ के ऊपर थी। हमने अपनी शादी से पहले की ज़िंदगी खूब ऐश के साथ काटी है बेटा, अब जब ज़िम्मेदारी का वक़्त आया तो घबराना क्यों? शिकायत क्यों?”
काव्या की आँखें झुक गईं थीं। वह अपनी माँ की बातों का गहराई से विश्लेषण कर रही थी। जानकी ने काव्या का हाथ अपने हाथों में लिया और रसोई की तरफ इशारा करते हुए बोली, “अब मुझे एक बात का जवाब दे। आज तू यहाँ आई है। अगर तेरी भाभी प्रेरणा भी रोज़ सुबह तेरी तरह दस बजे तक सोती रहे, और मैं इस बुढ़ापे में रसोई में खटती रहूँ, तो क्या तू अपनी भाभी की तारीफ करेगी? क्या तू कहेगी कि हाँ, भाभी तो हमारे घर की बेटी है, इसे सोने दो, मेरी बूढ़ी माँ सब कर लेगी? नहीं ना? तू सबसे पहले मुझसे कहेगी कि माँ आप क्यों काम कर रही हैं, भाभी को करने दिया करो। तो फिर बेटा, जब तेरी सास तुझसे वही उम्मीद करती है जो मैं प्रेरणा से करती हूँ, तो वो बुरी कैसे हो गई?”
काव्या के पास कोई जवाब नहीं था। उसके अंदर का वह अहम जो उसे ससुराल में खुद को पीड़िता महसूस करवाता था, अब दरकने लगा था।
जानकी अभी रुकी नहीं थीं। उन्होंने उस आखिरी शिकायत को भी सुलझाने का फैसला किया जो काव्या ने अपनी ननद को लेकर की थी। “तू कल कह रही थी न कि तू सिर्फ सास-ससुर और पति का काम करेगी, ननद का नहीं? तुझे श्रुति का काम करना खलता है। अब सोच, तेरे भाई रोहन की शादी हो चुकी है। तेरी भाभी प्रेरणा यहाँ आ गई है। कल को तू अपने पति और बच्चों के साथ मायके रहने आए, और प्रेरणा कहे कि मैं सिर्फ सास-ससुर और पति का काम करूंगी, ननद का और उसके बच्चों का नहीं। वो तेरा खाना बनाने से मना कर दे, तो क्या तुझे या मुझे सहन होगा? बिल्कुल नहीं। तुझे लगेगा कि मायके में तेरा कोई सम्मान नहीं बचा। बेटा, अगर तू चाहती है कि तेरी भाभी मायके में तेरा और तेरे परिवार का स्वागत करे, तुझे सम्मान दे, तो तुझे भी अपनी ननद को वही प्यार देना होगा। अगर तुझे अपनी ननद का तेरे घर में रहना और आराम करना बुरा लगता है, तो सोच ले, तेरी भाभी भी तेरे यहाँ आने से खुश नहीं होगी।”
काव्या की आँखों से अब पछतावे के आँसू बहने लगे थे। जानकी ने उसके आँसू पोंछे और बहुत ही मुलायम आवाज़ में कहा, “कभी सोचा है काव्या, क्या तूने कभी मुझे मेरे ससुराल (तेरे दादा-दादी के घर) में पीहर जैसा आराम महसूस करवाया? नहीं न! क्या मैंने कभी शिकायत की कि मुझे जल्दी उठना पड़ता है, काम करना पड़ता है? सिर दर्द होने पर भी मैंने तुम सबके लिए खाना बनाया। क्योंकि मुझे पता था कि वो मेरा घर है और मेरी मेहनत से ही वह घर चलेगा। हर रिश्ते का, हर जगह का अपना एक अलग महत्व होता है। बेटी होने का अपना सुख है और बहू बनकर एक नए घर की नींव बनने का अपना गौरव। दोनों को उनका सही महत्व दे। जो लड़कियां इस चक्र को समझ जाती हैं, वे ताउम्र राज करती हैं और तारीफ के काबिल होती हैं।”
काव्या को अब सब कुछ शीशे की तरह साफ नज़र आ रहा था। उसने हमेशा अपने अधिकारों की बात की थी, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ा था। उसने तुरंत रसोई में जाकर प्रेरणा के हाथों से काम लिया और कहा, “भाभी, आप बहुत थक गई हैं, अब आप जाकर बैठिए, मैं सब संभाल लूंगी।” प्रेरणा हैरान थी, लेकिन काव्या की आँखों में एक नई समझ देखकर मुस्कुरा दी।
दो दिन बाद जब काव्या ससुराल वापस लौटी, तो वह वह लड़की नहीं थी जो रोते हुए मायके गई थी। अगली सुबह जब साढ़े पाँच बजे का अलार्म बजा, तो उसने चिढ़कर नहीं, बल्कि एक मुस्कान के साथ उसे बंद किया। उसने रसोई में जाकर खुशी-खुशी सबके लिए नाश्ता बनाया। जब श्रुति सोकर उठी, तो काव्या ने खुद उसे चाय लाकर दी और प्यार से कहा, “उठ जा कुंभकरण, देख तेरा फेवरिट सैंडविच बनाया है।” श्रुति, जो हमेशा काव्या के रूखेपन से दूर-दूर रहती थी, आज भाभी का यह रूप देखकर गले लग गई।
सुमित्रा देवी भी काव्या के इस बदलाव को देख रही थीं। जब काव्या ने उन्हें चाय दी, तो सुमित्रा देवी ने काव्या के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “आज चाय में बिल्कुल वही स्वाद है, जो मेरी माँ के हाथ की चाय में हुआ करता था।” काव्या ने अपनी सास की आँखों में देखा, वहाँ ताने नहीं, बल्कि एक माँ का प्यार और स्वीकृति थी। काव्या समझ गई थी कि बहू को बेटी बनने के लिए पहले घर की ज़िम्मेदारी को एक माँ की तरह अपनाना पड़ता है। उस दिन के बाद से उस घर में कभी सास-बहू या ननद-भाभी की दीवारें नहीं रहीं, बल्कि एक ऐसा परिवार बन गया जिसकी नींव एक-दूसरे के प्रति सम्मान और समझ पर टिकी थी।
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