तिरस्कार कब तक – नीलम शर्मा : Moral Stories in Hindi

हरवंश चौधरी जी का फोन लगातार बजता ही जा रहा था। पर क्योंकि दो दिन पहले ही उन्होंने अपनी बेटी श्रेया की शादी की थी। तो उसकी थकान की वजह से वह नींद से जाग नहीं पा रहे थे। पर जब लगातार फोन की घंटी बजती रही तो मिसेज चौधरी उठी। उनकी आंखें भी नींद … Read more

हाय राम। मेरी तो तकदीर ही फूट गई जो ऐसी बहू आई : डॉ. इन्दुमति सरकार : Moral Stories in Hindi

गोपाल प्रसाद की आँखें उस दिन भीग गईं जब बहू मेघना ने उनके हाथ से छीनकर पूजा की थाली उलट दी। “ये ढकोसला बंद करो बाबूजी! मैं इस घर को 21वीं सदी में ले जाऊँगी” वह चिल्लाई।   मेघना आईआईटीयन थी – उसके लिए संस्कार ‘मिथ’, पूजा ‘टाइम वेस्ट’ और सास-ससुर ‘आउटडेटेड सॉफ्टवेयर’ थे। गोपाल प्रसाद … Read more

तिरस्कार कब तक – सुनीता माथुर : Moral Stories in Hindi

सुनैना को लगा कब तक तिरस्कर, अपमान और बेज्जती, सहन करनी पड़ेगी!— आखिर मेरा कसूर क्या है? मैंने अपने बच्चे को पढ़ा लिखा कर बड़ा किया और इतने संघर्ष के बाद भी उसकी  पसंद की शादी की जब तक पति जिंदा थे अपने बेटे आकाश को अच्छी परवरिश दी बेटे की नौकरी भी अच्छी लग … Read more

दूसरी विदाई (अर्चना सिंह) : Moral Stories in Hindi

निरुपमा जैसे ही ससुराल की दहलीज पर पहुँची वहाँ के रंग रौनक और शान-ओ- शौकत देखकर दंग थी । उसकी उम्र यही कोई बाइस – तेईस के लगभग होगी । पहली शादी तो बीस वर्ष होते ही हो गयी थी , वहाँ भी धनी सम्पन्न परिवार ही था लेकिन पति के साथ निरुपमा की निभ … Read more

उस जमाने की लड़कियां – रवीन्द्र कान्त त्यागी

सर्दियों का मौसम और गुनगुनी धूंप में बैठकर मूंफली कुड्कूड़ाने का मजा एक फोन ने खराब कर दिया था। शहर के एक बड़े ट्रांसपोर्टर मेरे एक अनन्य मित्र थे। उनका फोन आया कि गुड़गांव (तब यही नाम था) से उनका ट्रक चोरी हो गया है। लछमन यादव नाम का ड्राइवर अभी जॉब पर रखा था। … Read more

तिरस्कार अब और नही – संगीता अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

” तुम होती कौन हो मुझे रोकने वाली मुझे जो करना है वही करूंगा !” पांच साल के आदित्य के मुंह से ये शब्द सुन सकते मे आ गई निशा। ” क्या बोल रहे हो ये मम्मा से ऐसे बात करते है क्या ? कहाँ से सीखे हो ये सब ?” निशा बेटे को डांटते … Read more

दूर के ढ़ोल सुहावने – विभा गुप्ता  : Moral Stories in Hindi

  ” चल भाग यहाँ से…।” डाँटते हुए रुक्मिणी जी अपनी चार वर्षीय पोती वंशिका के हाथ से खिलौना छीनकर अपने पोते मनु को देते हुए बोलीं,” ले खेल मेरे लाल…अपनी दादी के बाल-गोपाल..।वंशिका रोने लगी।तभी उसकी अंजू बुआ आ गई और उसके हाथ में चाॅकलेट देकर उसे पुचकारती हुई बोली,” कल मैं अपनी लाडो के … Read more

घूंघट के पट खोल – लतिका श्रीवास्तव : Moral Stories in Hindi

जब से नए पड़ोसी आए थे लोगों की जिंदगी में झांकने की मेरी दिलचस्पी को जैसे नए पंख लग गए थे।वैसे तो कुल पांच जने थे उनके घर में लेकिन चार कहना ज्यादा उचित होगा क्योंकि घर की लक्ष्मी  मतलब उनके घर की बहू लक्ष्मी अदिति  हमेशा अदृश्य अवस्था में ही रहती थी।नहीं नहीं नई … Read more

निर्णय – निभा राजीव”निर्वी” : Moral Stories in Hindi

श्रद्धा दृष्टि झुकाए मेज पर पड़े प्लेट में खाने से चम्मच से जैसे खेल भर रही थी। वह ऊपर से शांत थी परंतु अंतस में जैसे कोलाहल मचा हुआ था। झुकी दृष्टि से भी सम्मुख बैठे अजय की गहरी दृष्टि जैसे उसे अंतर को भेदती हुई प्रतीत हो रही थी।  अजय ने फिर एक-एक शब्द … Read more

हाय राम, मेरी तो तकदीर ही फूट गई जो ऐसी बहू आई। – मधु वशिष्ठ : Moral Stories in Hindi

पाखी बेटा, परसों जमाई जी तुझे लेने आ रहे हैं। बेटा बिट्टू के और अपने जो कपड़े सिलवाए थे वह ले आना। तेरे भाई को कहकर थोड़े लड्डू भी मंगवा दूंगी जाने के बाद ससुराल में सबको बांटने जो होंगे। अपनी बहन रानी और मालती के साथ आराम से मूंगफली खाती हुई पाखी का मूंह … Read more

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