यह सुनकर मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई। मेरे दिल में जो पच्चीस सालों से एक शिकायत थी कि इन्होंने मुझे क्यों ठुकराया, वह शिकायत एक ही पल में कपूर की तरह उड़ गई और उसकी जगह एक अथाह करुणा और पश्चाताप ने ले ली। जिन बुजुर्गों को मैं कठोर और बेपरवाह समझ रहा था, वे तो अंदर से पूरी तरह उजड़ चुके थे, तिल-तिल कर घुट रहे थे। मेरी आँखों से आंसू बहकर गालों पर आ गए। मेरी वाणी मूक हो गई थी, होंठ कांप रहे थे। मैं उन्हें क्या सांत्वना देता? जिस घर के सारे चिराग बुझ चुके हों, वहाँ तसल्ली के शब्द भी बेमानी लगते हैं।
जबलपुर रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही नम हवाओं ने चेहरे को छुआ, तो सीने के किसी कोने में दबी एक पुरानी टीस अचानक ताज़ा हो उठी। टैक्सी की पिछली सीट पर बैठी मेरी बारह साल की बेटी आरूषी खिड़की से बाहर देखते हुए लगातार सवाल पूछ रही थी। उसने अचानक मेरी पत्नी माधवी का हाथ पकड़कर पूछा, “मम्मी, पापा कहते हैं कि इस शहर में मेरे एक और दादू-दादी रहते हैं… सच में? हम उनसे मिलने क्यों नहीं जाते कभी?”
माधवी ने कुछ पल के लिए मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अनकहा संकोच और सवाल था। फिर उसने बहुत प्यार से आरूषी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “हाँ बेटा, रहते तो हैं। आज हम तुम्हारी नई स्कूल और हॉस्टल के एडमिशन के सिलसिले में आए हैं, पर तुम्हारे पापा से पूछो कि क्या हम वहाँ जा रहे हैं?”
मैंने आरूषी की बातों का कोई जवाब नहीं दिया, बस खामोशी से खिड़की के बाहर तेजी से पीछे छूटते पेड़ों को देखने लगा। मन के भीतर स्मृतियों का एक बवंडर उठ खड़ा हुआ था। जबलपुर… यह वही शहर था जहां से मेरा एक ऐसा रिश्ता जुड़ा था, जो जुड़कर भी वक्त के थपेड़ों में बिखर गया था।
आज से लगभग पच्चीस साल पहले, मैं इसी शहर में अपनी बारात लेकर आया था। मेरी पहली शादी अवनि से हुई थी। वह किसी चंचल झरने की तरह थी, जिसकी हंसी से पूरा घर गूंज उठता था। हमारी शादी बड़े धूमधाम से हुई थी। अवनि के पिता हरिशंकर जी और माँ सावित्री देवी ने अपनी इकलौती बेटी को विदा करते वक्त मेरा हाथ पकड़कर कहा था, “अनुराग बेटा, हमारी पूरी दुनिया अब तुम्हारे हाथों में है।” मैंने भी उस दिन उन्हें माता-पिता का ही दर्जा दिया था।
लेकिन किस्मत के पन्नों पर शायद हमारी खुशियों की स्याही बहुत कम थी। हमारा साथ सिर्फ छह महीने ही रहा। शादी के पाँचवें महीने में जब अवनि गर्भवती हुई, तो रस्मों और देखभाल के नाम पर हरिशंकर जी उसे कुछ दिनों के लिए अपने घर ले आए थे। विदा होते वक्त रेलवे स्टेशन पर भीड़भाड़ के बीच वह ट्रेन की खिड़की से झुकी थी। मैंने उसका हाथ थामकर धीरे से पूछा था, “अवनि, तुम दुनिया में सबसे ज्यादा किससे प्यार करती हो?”
उसने अपनी बड़ी-बड़ी कजरारी आँखों से मुझे देखा, उसके होठों पर एक शरारती मुस्कान खिली थी। उसने मेरे कान के पास झुककर हौले से कहा था, “आपको… और…”
“और कौन अवनि?” मैंने उत्सुकता से पूछा था।
तभी ट्रेन ने सीटी बजाई और पहिए धीरे-धीरे सरकने लगे। वह हाथ हिलाती रही, मुस्कुराती रही, लेकिन उसका वह वाक्य अधूरा ही छूट गया था। वह अधूरा जवाब हवा में तैरता रह गया।
उसके जाने के ठीक पंद्रह दिन बाद, आधी रात को एक फोन कॉल ने मेरी पूरी दुनिया उजाड़ दी। बताया गया कि मंदिर से लौटते वक्त एक बेकाबू ट्रक की चपेट में आने से अवनि की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई। जब तक मैं पागलों की तरह भागता हुआ अस्पताल पहुँचा, अवनि और उसकी कोख में पल रहा हमारा बच्चा इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे। मेरा पहला प्यार, मेरा पहला संसार एक ही पल में मिट्टी में मिल गया। मैं उससे आखिरी बार बात तक नहीं कर पाया। स्टेशन पर उसकी कही वह आखिरी बात—”आपको… और…” मेरे कानों में गूंज-गूंजकर मुझे लहूलुहान करती रही।
उस भयानक हादसे के बाद, मैंने खुद को संभाला। मैंने कोशिश की कि अवनि के न रहने पर भी उसके माता-पिता से मेरा नाता बना रहे। मैं हर महीने हरिशंकर जी को फोन करता, त्योहारों पर जबलपुर जाने की कोशिश करता। लेकिन समय बीतने के साथ उनका रवैया अजीब तरह से बदलने लगा। वे मेरे फोन उठाने से कतराने लगे। अगर कभी बात होती भी, तो वे बहुत औपचारिक और रूखे स्वर में जवाब देते, जैसे मेरा अस्तित्व उन्हें चुभता हो।
कुछ सालों बाद जब अवनि के छोटे भाई मयंक की शादी हुई, तो मुझे कोई निमंत्रण तक नहीं भेजा गया। मुझे एक रिश्तेदार से यह खबर मिली, तो मेरे स्वाभिमान को गहरी चोट पहुँची। फिर जब सात साल बाद मेरे परिवार के दबाव में मेरी शादी माधवी से हुई, तो मैंने एक बार फिर बड़प्पन दिखाते हुए हरिशंकर जी को कार्ड भेजा था। पर उनकी तरफ से न कोई आशीर्वाद आया, न कोई संदेश।
उस दिन मैंने भारी मन से मान लिया कि उन्होंने मुझे अपने जीवन से हमेशा के लिए बेदखल कर दिया है। शायद वे मुझे अपनी बेटी की मौत का मनहूस कारण मानते थे, या फिर वे मेरे साथ पुराना कोई दर्द दोहराना नहीं चाहते थे। मैंने भी धीरे-धीरे संपर्क साधना बंद कर दिया। फिर भी, दिल के किसी तहखाने में उनके लिए आदर और चिंता हमेशा दबी रही।
आज पच्चीस साल बाद, जब आरूषी के एडमिशन के सिलसिले में हम इसी शहर में थे, तो मेरा मन बेचैन हो उठा। एडमिशन की औपचारिकताएं दोपहर तक पूरी हो गईं। जब हम टैक्सी में वापस स्टेशन की ओर लौट रहे थे, तो शास्त्री नगर का वह मोड़ आते ही मेरी धड़कनें तेज हो गईं।
“गाड़ी रोको,” मैंने अचानक ड्राइवर से कहा।
माधवी ने चौंककर मुझे देखा। “क्या हुआ अनुराग?”
“माधवी… अवनि के माता-पिता का घर इसी गली में है। पच्चीस साल हो गए हैं। मुझे नहीं पता वे मुझसे बात करेंगे या दरवाज़ा बंद कर लेंगे, पर इस शहर में आकर बिना उनका हाल जाने मैं यहाँ से नहीं जा सकता। मेरा दिल नहीं मान रहा।” मेरी आवाज में एक भारीपन था।
माधवी ने एक पल सोचा, फिर प्यार से मेरा हाथ दबाते हुए कहा, “अगर दिल कह रहा है, तो हमें ज़रूर जाना चाहिए। जो भी हुआ, वे बुजुर्ग हैं। चलिए।”
हम तीनों उस परिचित मगर बदले हुए रास्ते पर चल पड़े। मकान नंबर 42 के सामने जाकर मेरे कदम ठिठक गए। कभी इस घर के बाहर सजी हुई गाड़ियां, रोशनी और खुशियों की महक हुआ करती थी। बारात लेकर जब मैं यहाँ आया था, तो फूलों की बारिश हुई थी और हरिशंकर जी ने मुझे गले से लगा लिया था। आज उस घर के सामने सन्नाटा पसरा था। दीवारें सीलन से बदरंग थीं, बगीचे में घास-फूस उग आई थी और खिड़कियाँ बंद थीं।
मेरे मन में असमंजस था कि कहीं हमारे आने से उन्हें बुरा न लगे। मैं अभी सोच ही रहा था कि आरूषी ने आगे बढ़कर दरवाजे की पुरानी घंटी बजा दी।
टन-टन की आवाज के बाद काफी देर तक अंदर कोई हलचल नहीं हुई। फिर धीमी कदमों की चाप सुनाई दी। कुंडी खुलने की चरमराहट हुई और भारी लकड़ी का दरवाजा थोड़ा सा खुला।
दरवाजे के पीछे जो चेहरा दिखा, उसे देखकर मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं।
सामने हरिशंकर जी खड़े थे। लेकिन यह वह रोबीले और हँसमुख इंसान नहीं थे जिन्हें मैं जानता था। उनके बाल पूरी तरह बर्फ जैसे सफेद हो चुके थे, शरीर झुक गया था, आँखें अंदर धंस चुकी थीं और चेहरे पर असीम लाचारी व बीमारी की गहरी लकीरें थीं। उन्होंने धुंधली आँखों से पहले आरूषी को देखा, फिर माधवी को, और अंत में जब उनकी नजरें मुझ पर टिकीं, तो उनके होंठ कांपने लगे।
“अ… अनुराग?” उनकी कांपती, लड़खड़ाती आवाज निकली।
“बाबूजी…” मेरे मुंह से बरबस निकला और मैं झुककर उनके पैर छूने लगा। माधवी ने भी तुरंत झुककर प्रणाम किया।
हरिशंकर जी ने कांपते हाथों से मेरे कंधों को छुआ। उनके चेहरे पर कोई क्रोध या बेरुखी नहीं थी, बल्कि एक ऐसा गहरा दर्द था जो शब्दों से परे था। उन्होंने बहुत धीमे से कहा, “अंदर आ जाओ बेटा… अंदर आ जाओ।”
घर के अंदर का सन्नाटा बाहर से भी ज्यादा डरावना था। बैठक में पुरानी, फटी हुई चादर वाले सोफे बिछे थे। धूल की एक पतली परत हर चीज पर जमी थी। हरिशंकर जी ने अंदर की ओर आवाज दी, “सावित्री… देखो कौन आया है… अनुराग आया है।”
अंदर के कमरे से एक लाठी की टेक पर चलती हुई सावित्री माँ बाहर आईं। वे इतनी कमजोर हो चुकी थीं कि पहचानना मुश्किल था। उनकी आँखों में मोतियाबिंद का जाला साफ दिख रहा था। मुझे देखते ही उनकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। हम दोनों ने उनके भी चरण स्पर्श किए। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा, पर उनके मुंह से एक शब्द नहीं फूटा।
हम सब सोफे पर बैठ गए। कमरे में एक अजीब सी खामोशी छा गई थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि बात कहाँ से शुरू करूँ। तभी मेरी नजर सामने की दीवार पर पड़ी।
दीवार पर अवनि की वही पुरानी मुस्कुराती हुई तस्वीर टंगी थी, जिस पर सूखा हुआ हार चढ़ा था। लेकिन मेरी नजर जैसे ही उस तस्वीर के बगल में गई, मेरा दिल दहल उठा।
वहां दो और तस्वीरें टंगी थीं, जिन पर ताजे चंदन का लेप और सूखे फूल चढ़े थे। एक तस्वीर मयंक की थी—अवनि के छोटे भाई की, और दूसरी तस्वीर एक युवा महिला और एक चार साल की मासूम बच्ची की थी।
यह देखकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरे सीने में एक भयानक आशंका कौंध गई। मैं सोफे से उठा और कांपते कदमों से उन तस्वीरों के पास गया।
“बाबूजी… यह… यह मयंक और उसकी…?” मेरी आवाज गले में ही अटक गई। मैंने मुड़कर हरिशंकर जी की ओर देखा।
मेरा इतना पूछना था कि सत्तर साल के उस बूढ़े इंसान का सब्र का बांध टूट गया। हरिशंकर जी अपने चेहरे को दोनों हाथों में छुपाकर फफक-फफक कर रो पड़े। सावित्री माँ सोफे पर बैठकर अपनी साड़ी के पल्लू से मुंह ढककर सिसकने लगीं।
मैं तुरंत उनके पास गया और घुटनों के बल बैठकर हरिशंकर जी के हाथ थाम लिए। “बाबूजी, मुझे बताइए, यह सब क्या है? मयंक कहाँ है? यह तस्वीरें कैसी हैं?”
हरिशंकर जी ने रोते हुए मेरा हाथ अपने माथे से लगा लिया। उनकी हिचकियाँ बंध गई थीं। “अनुराग बेटा… हम पापी हैं। हमने तुम्हारे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया। जब अवनि गई, तो हमने तुम्हें मनहूस और अभागा समझ लिया था। हमें लगा कि तुम्हारी वजह से हमारी फूल जैसी बेटी चली गई। हमने तुमसे मुँह मोड़ लिया, तुम्हारा फोन उठाना बंद कर दिया, तुम्हारी दूसरी शादी में भी नहीं आए… हम सोचते थे कि तुमसे दूर रहकर हम अपने परिवार को बचा लेंगे।”
वे कुछ पलों के लिए रुके, उनका गला रुंध गया था। फिर उन्होंने छाती पीटते हुए कहा, “पर अभागे तो हम खुद थे बेटा! हमारी किस्मत ही फूटी थी। चार साल पहले मयंक, उसकी पत्नी और हमारी नन्हीं पोती कार से एक शादी से लौट रहे थे… एक भयानक सड़क हादसे ने तीनों को एक साथ हमसे छीन लिया। एक ही रात में हमारा पूरा वंश, हमारा बुढ़ापे का सहारा सब खत्म हो गया।”
कमरे में सन्नाटा चीरती हुई सावित्री माँ की चीख गूंज उठी, “भगवान ने हमें ऐसी सजा दी है अनुराग कि हम न जी पा रहे हैं, न मर पा रहे हैं! पहले बेटी गई, फिर बेटा, बहू और पोती भी चले गए। इस विशाल घर में हम दोनों जिंदा लाश बनकर रह गए हैं। कोई पानी का घूंट देने वाला नहीं है, कोई दवा पूछने वाला नहीं है। हम बिल्कुल अकेले हो गए हैं… बिल्कुल अकेले!”
यह सुनकर मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई। मेरे दिल में जो पच्चीस सालों से एक शिकायत थी कि इन्होंने मुझे क्यों ठुकराया, वह शिकायत एक ही पल में कपूर की तरह उड़ गई और उसकी जगह एक अथाह करुणा और पश्चाताप ने ले ली। जिन बुजुर्गों को मैं कठोर और बेपरवाह समझ रहा था, वे तो अंदर से पूरी तरह उजड़ चुके थे, तिल-तिल कर घुट रहे थे। मेरी आँखों से आंसू बहकर गालों पर आ गए। मेरी वाणी मूक हो गई थी, होंठ कांप रहे थे। मैं उन्हें क्या सांत्वना देता? जिस घर के सारे चिराग बुझ चुके हों, वहाँ तसल्ली के शब्द भी बेमानी लगते हैं।
तभी, कमरे की उस असहनीय पीड़ा के बीच एक कोमल स्पर्श हुआ।
मेरी बारह साल की बेटी आरूषी धीरे-धीरे आगे बढ़ी। उसने हरिशंकर जी के आंसू बहते गालों पर अपने नन्हे हाथ रखे और उनकी गोद में अपना सिर रख दिया।
“दादू… आप रो क्यों रहे हो? आप अकेले कहाँ हो? मैं हूँ ना आपकी पोती!” आरूषी ने अपनी मासूम, भोली आवाज में कहा।
हरिशंकर जी ने चौंककर उस नन्ही बच्ची को देखा। उनके कांपते हाथों ने आरूषी को कसकर अपनी छाती से चिपका लिया। वर्षों के सूखे बंजर में जैसे किसी ने अमृत की बूंदें गिरा दी हों।
उसी वक्त माधवी उठी। उसने अपनी आँखों के आंसू पोंछे और सावित्री माँ के पास जाकर उनके चरणों में बैठ गई। उसने माँ जी के दोनों कांपते हाथ अपने हाथों में ले लिए और बहुत ही भरे हुए गले से कहा, “माँ जी… अवनि दीदी तो नहीं रहीं, पर क्या आप मुझे अपनी बेटी नहीं मान सकतीं? मयंक भैया चले गए, तो क्या हुआ, अनुराग जी तो आपके ही बेटे हैं ना? आज तक जो हुआ सो हुआ, पर अब आप दोनों अकेले नहीं रहेंगे। एक बेटी के जाने से रिश्ते खत्म नहीं होते माँ।”
सावित्री माँ ने चौंककर माधवी का चेहरा देखा। उस चेहरे में ममता थी, समर्पण था और एक सच्चा अपनापन था। सावित्री माँ ने माधवी को खींचकर अपने सीने से लगा लिया और दोनों फफक कर रो पड़ीं। यह रोना दर्द का नहीं था, यह बरसों से दबे उस बोझ के उतरने का रोना था।
मैंने उठकर हरिशंकर जी के कंधे पर हाथ रखा। “बाबूजी, आज के बाद आप कभी खुद को अकेला मत कहिएगा। अवनि भले ही इस दुनिया में न हो, पर उसने जो रिश्ता मुझे इस घर से दिया था, वह आज भी उतना ही सच्चा है। मेरी बेटी आरूषी का एडमिशन इसी शहर के एक स्कूल में हुआ है। अब हम हर महीने यहाँ आएंगे। और जैसे ही आरूषी की छुट्टियां होंगी, आप दोनों हमारे साथ भोपाल चलेंगे। अब हम आपको इस अकेलेपन के अंधेरे में कभी नहीं छोड़ेंगे।”
हरिशंकर जी ने हाथ जोड़ लिए, पर मैंने तुरंत उनके हाथ पकड़कर अपने सीने से लगा लिए। उनके आंसुओं से भीगे चेहरे पर एक ऐसी सुकून भरी मुस्कान तैर गई, जो शायद बरसों बाद उनके होठों पर आई थी।
उस पल कमरे का माहौल पूरी तरह बदल गया था। माधवी ने तुरंत उठकर रसोई का रुख किया, “माँ जी, आप बैठिए, मैं आप दोनों के लिए पहले काढ़ा और दलिया बनाती हूँ।” आरूषी हरिशंकर जी की लाठी पकड़कर उन्हें पुरानी कहानियाँ सुनाने का आग्रह करने लगी। घर की वह बदरंग और खामोश दीवारें अचानक एक नई जिंदगी से भर उठी थीं।
मैं धीरे-धीरे चलकर अवनि की तस्वीर के सामने खड़ा हुआ।
तस्वीर में अवनि के चेहरे पर वही पुरानी, शरारती मुस्कान थी। ऐसा लगा जैसे उसकी आँखें मुझे देखकर संतोष से चमक रही हों। पच्चीस साल पहले जबलपुर स्टेशन की खिड़की से उसने मुझसे जो अधूरा वाक्य कहा था, वह अचानक मेरे कानों में दिव्य संगीत की तरह गूंज उठा:
“आपको… और… अपने इस पूरे परिवार को!”
उसने उस दिन यही कहा होता, यह पहेली आज पच्चीस साल बाद सुलझ गई थी। उसका वह अधूरा प्यार आज पूरा हो चुका था।
रिश्ते सिर्फ खून के नहीं होते, रिश्ते निभाने की नीयत और दिल की गहराई से बनते हैं। जो दरवाजे वक्त और गलतफहमियों ने बंद कर दिए थे, उन्हें प्यार, क्षमा और अपनत्व ने एक बार फिर हमेशा के लिए खोल दिया था।
कभी-कभी ज़िंदगी में दूरियाँ अपनों की नफ़रत की वजह से नहीं, बल्कि उनके असहनीय दर्द और अपराधबोध की वजह से आ जाती हैं। क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा रिश्ता है जो किसी गलतफहमी या खामोशी के कारण छूट गया है? अगर हाँ, तो क्या आपको नहीं लगता कि एक बार पहल करके बंद दरवाज़ों को खटखटाना चाहिए? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें अपनी प्रतिक्रिया लिखकर ज़रूर बताएं।
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