गर्दिश के सितारे  

मैंने जब उसके सिर पर हाथ रखा, तो मुझे लगा कि आज मेरी तीस साल पुरानी तपस्या का फल मुझे मिल गया है। जिस बेटे को कभी मैले कपड़ों में देखकर जमाना ताने मारता था, आज वही बेटा देश के सबसे बड़े महकमे में एक जिम्मेदार पद पर बैठकर देश की सेवा कर रहा था। जीवन के रास्ते सचमुच बड़े अजीब और खूबसूरत होते हैं; गर्दिश के घने बादलों के पीछे भी सफलता का सूरज हमेशा अपनी बारी का इंतजार कर रहा होता है।

पटना के जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के वातानुकूलित लाउंज में बैठा मैं खिड़की के पार रनवे पर उतरते-चढ़ते विमानों को देख रहा था। लाउंज के कोनों में सलीके से सजाए गए मनीप्लांट और एरिका पाम के गमलों से निकलती हल्की भीनी-भीनी सी प्राकृतिक महक वहां के वातावरण में एक अजीब सा ठहराव और शांति घोल रही थी। यह शांति केवल उस कमरे की नहीं थी, बल्कि मेरे अंतर्मन की थी, जहां जिंदगी के थपेड़ों से जूझने के बाद अब जाकर एक सुखद संतोष ने डेरा डाला था। आज मेरा छोटा बेटा अनिकेत अपने गृह नगर लौट रहा था। वह भारतीय रेल सेवा में राजपत्रित अधिकारी के पद पर कार्यरत था और पिछले सप्ताह ही पदोन्नत होकर सीनियर डिवीजनल मैनेजर बना था। इस गौरवमयी पद को संभालने के बाद वह पहली बार घर आ रहा था। उसके स्वागत के लिए हाथ में फूलों का गुलदस्ता लिए जब मैं यहां बैठा था, तो अचानक स्मृतियों का एक झोंका मुझे आज से करीब साढ़े तीन दशक पीछे ले गया।

जिंदगी भी किसी बहती नदी की तरह होती है, जिसमें कितने ही मोड़ आते हैं, कई घाट छूट जाते हैं और अनगिनत मुसाफिर मिलकर बिछड़ जाते हैं। मेरे जीवन की रंगभूमि पर भी कई इंसानों ने प्रवेश किया, अपने हिस्से का अभिनय पूरी शिद्दत से निभाया और फिर वक्त की धुंध में ओझल हो गए। मुंगेर के पास जमालपुर के उस छोटे से कस्बे में बीता मेरा अल्हड़ लड़कपन आज भी मेरी आंखों के सामने किसी रंगीन रील की तरह घूमने लगा।

उस दौर में मेरे दो जिगरी यार हुआ करते थे—रोहित और मयंक। हम तीनों की दोस्ती पूरे कस्बे में मशहूर थी। जब हम तीनों घर से बाहर निकलते, तो दुनिया की कोई फिक्र हमारे माथे पर शिकन नहीं ला पाती थी। मेरी जेब में कभी फूटी कौड़ी भी न होती, मगर इसका असर हमारे हंसी-मजाक या आवारागर्दी पर कभी नहीं पड़ा। रोहित के पिता का कपड़े का थोक कारोबार था और मयंक के घर में अनाज की बड़ी आढ़त थी, जबकि मेरे बाबूजी एक छोटी सी स्टेशनरी की दुकान चलाते थे, जिससे बमुश्किल घर का चूल्हा जल पाता था। लेकिन रोहित और मयंक ने कभी अमीरी-गरीबी की खाई को हमारी दोस्ती के बीच नहीं आने दिया। वे दोनों दिल खोलकर मुझ पर पैसे खर्च करते थे।

चाहे सीताकुंड के माघी मेले में घूमना हो, तारापुर के दंगल में जाकर तालियां पीटना हो या फिर भागलपुर जाकर नई लगी फिल्म का पहला शो देखना हो, टिकट काउंटर पर कभी मुझे अपना बटुआ टटोलने की नौबत ही नहीं आई। जब भी कोई नया नाटक मंचित होता या सर्कस का तंबू लगता, वे दोनों जबरन मेरी साइकिल पकड़ लेते और कहते, “चल रमन, आज का दिन अपने नाम है। पैसों का हिसाब रखने के लिए मुंशी नहीं, दोस्त हैं हम तेरे।” उस कच्ची उम्र में मैं अक्सर सोचता था कि क्या यह उनकी मेरे प्रति उपजी कोई हमदर्दी थी, या फिर पत्रिकाओं में छपने वाली मेरी कविताओं और लेखों के प्रति उनका आदर था, अथवा बस जवानी की चार-यारी का बेपरवाह जोश था? कारण चाहे जो भी रहा हो, पर उन दोनों का साथ मेरे आत्मसम्मान पर कभी आंच नहीं आने देता था।

दशहरा में रामलीला के लिए बांस और बल्लियां ढोने का काम हो, दिवाली की रात पूरी बस्ती के अंधेरे कोनों में दीये कतारबद्ध करने की होड़ हो, या फागुन में ढोलक की थाप पर धूल उड़ाते हुए हुरदंग मचाना हो, हम तीनों हमेशा सबसे आगे रहते थे। कस्बे के बुजुर्ग हमें स्नेह और कभी-कभार चिढ़कर ‘त्रिमूर्ति’ कहा करते थे। हम जिस काम को हाथ में लेते, उसे अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लेते थे। कभी-कभार मोहल्ले के लफंगों से जब किसी सीधे-सादे आदमी की सुरक्षा को लेकर विवाद होता, तो रोहित अपनी मजबूत कद-काठी के साथ सीना तानकर खड़ा हो जाता था। उसकी दिलेरी के आगे बड़े-बड़े पीछे हट जाते थे। मेरे जीवन के पहले अंक में इन दोनों मित्रों का अभिनय बेहद शानदार, निष्कपट और खुशियों की सौगात देने वाला था।

पर वक्त कभी एक सा नहीं ठहरता। मैंने गणित प्रतिष्ठा के साथ बी.एससी. की पढ़ाई पूरी की, जबकि रोहित और मयंक अपने-अपने पुश्तैनी व्यापार की गद्दी संभालने लगे। देखते ही देखते तीन-चार वर्षों के भीतर दोनों का कारोबार फलने-फूलने लगा और उनके सिर पर सेहरे भी सज गए। उनके जीवन की दिशा बदल गई, वे पारिवारिक जिम्मेदारियों के घेरे में बंध गए और धीरे-धीरे हमारी मुलाकातों का सिलसिला औपचारिकता की भेंट चढ़ गया।

असली इम्तिहान तो अब मेरी चौखट पर दस्तक दे रहा था। बी.एससी. की डिग्री हाथ में लिए मैं जब कस्बे की गलियों में निकलता, तो बेरोजगारी का विशालकाय दैत्य मुझे चिढ़ाता हुआ प्रतीत होता था। घर के हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे थे। बाबूजी की सेहत ढल चुकी थी, उनकी आंखों में मोतियाबिंद उतर आया था और दुकान की आमदनी लगातार घट रही थी। मेरे बड़े भाई एक निजी ट्रांसपोर्ट कंपनी में क्लर्क थे, लेकिन उनकी अपनी पत्नी और दो बच्चों का खर्च ही उनसे नहीं संभल रहा था। नतीजतन, उन्होंने अपनी रसोई का चूल्हा हमसे अलग कर लिया था। घर के बंटवारे की उस लकीर ने बाबूजी की कमर ही तोड़ दी थी।

ऐसी घोर तंगहाली के बावजूद, बाबूजी की एकमात्र जिद थी कि वे अपनी सांसें टूटने से पहले मेरा ब्याह देखना चाहते थे। वे जब भी शादी की बात छेड़ते, मैं झुंझला पड़ता, “बाबूजी, पहले मुझे कहीं चार पैसे कमाने लायक तो बनने दीजिए। जब खुद की थाली में रोटी नहीं है, तो किसी दूसरे की बेटी को लाकर क्या फाके करवाऊंगा?” पर इस बात पर घर में रोज कलह होती, जिसे मां हमेशा अपनी आंचल की छांव और आंसुओं से शांत कराने की कोशिश करतीं।

ना-नुकर करते हुए भी एक दिन एक अगुआ हमारे घर आ धमका। पास के ही एक गांव से रिश्ता आया था। सब कुछ तय हो गया, शगुन की रस्म भी करीब आ गई। लेकिन शादी से ठीक पंद्रह दिन पहले लड़की के फूफा और भाइयों ने जब हमारे खपरैल वाले कच्चे मकान, टपकती छत और बिखरी हुई आर्थिक स्थिति को अपनी आंखों से देखा, तो उनके होश उड़ गए। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि वे अपनी बेटी को ऐसे कंगाल घर में नहीं ब्याह सकते। रिश्ता टूट गया। उस दिन मुझे अपने कुंवारे रहने से ज्यादा बाबूजी के टूटे हुए दिल की फिक्र हुई। समाज और जात-बिरादरी में अपनी पगड़ी नीची होते देख बाबूजी मानो भीतर से रीढ़विहीन हो गए। उनके चेहरे का तेज गायब हो गया और वे चारपाई पकड़कर चुपचाप छत को ताकते रहते।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। इस घटना के हफ्ते भर बाद ही एक दूसरा बिचौलिया हमारे घर पहुंचा। न जाने किसने उसके दिमाग में यह बात ठूंस दी थी कि लड़का साइंस ग्रेजुएट है, आज नहीं तो कल किसी सरकारी दफ्तर में बड़ा अफसर जरूर बनेगा। उसने लड़की वालों को ऐसा पट्टी पढ़ाया कि बिना किसी दान-दहेज के, सादे समारोह में मेरा विवाह शांति से संपन्न हो गया। शांति घरेलू, शांत स्वभाव की और बहुत कम पढ़ी-लिखी लड़की थी। उस दौर में छोटे शहरों और देहातों में बेटियों की तालीम पर कोई खास तवज्जो नहीं दी जाती थी।

शादी होते ही मेरी जिंदगी की नाव मझधार में हिचकोले खाने लगी। अब मैं अकेला नहीं था, मेरे साथ एक और बेकसूर जिंदगी जुड़ चुकी थी। बेरोजगारी की कालिख मेरे चेहरे पर पुत चुकी थी। मैंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दिन-रात एक कर दिया। सिर पर कफन बांधकर निकलने वाले सिपाही की तरह मैं सुबह से शाम तक कभी रेलवे, कभी बैंक, तो कभी सचिवालय की परीक्षाओं के फॉर्म भरता और परीक्षा देने भागता। न चिलचिलाती धूप की परवाह थी, न हाड़ कंपाने वाली ठंड की। पर हर जगह से सिर्फ असफलता और निराशा ही हाथ लगती।

काफी दौड़-धूप और एक परिचित की सिफारिश के बाद, कस्बे से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर एक अर्ध-सरकारी उच्च विद्यालय में मुझे गणित और विज्ञान के तदर्थ शिक्षक के तौर पर रख लिया गया। वेतन तय हुआ मात्र साढ़े चार सौ रुपये महीना। उस वक्त लगा कि शायद अंधेरी सुरंग के मुहाने पर कोई दीया जला है। पूरे घर में एक नई उम्मीद जगी। पर हाय री बदकिस्मती! वह उम्मीद भी रेगिस्तान की मृगतृष्णा साबित हुई। स्कूल के प्रबंधक और प्रधानाचार्य ने पहले दो महीने तो किसी तरह वेतन दिया, उसके बाद फंड न आने का रोना रोकर वेतन रोकना शुरू कर दिया।

महीने बीतते गए, पर पैसे का एक रुपया भी हाथ नहीं आया। मैं बिना वेतन के रोज पंद्रह किलोमीटर साइकिल चलाकर स्कूल जाता, बच्चों को पूरी निष्ठा से पढ़ाता, इस आस में कि अगले महीने सब ठीक हो जाएगा। लेकिन पूरे साल भर में केवल तीन महीने का वेतन मिला। घर में भुखमरी की नौबत आ गई। शांति फटी हुई साड़ियों में पैबंद लगाती, रसोई में डिब्बों को खंगालकर बचे हुए दानों से पानी जैसी पतली दाल बनाती। उसकी सूखी कलाई और आंखों के नीचे पड़े काले घेरे मुझे अंदर तक छलनी कर देते थे। कॉलेज के दिनों में मैंने नाटकों में हरिश्चंद्र और सुदामा के कई किरदार निभाए थे, लेकिन असल जिंदगी में गरीबी का यह नंगा नाच मुझे अंदर तक तोड़ रहा था।

उस दौर में मन की घुटन को मिटाने के लिए मैं रात के सन्नाटे में लालटेन की रोशनी में कहानियां और लेख लिखा करता था। मेरी कुछ कहानियां पटना और दिल्ली से छपने वाली प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। स्थानीय लोग कभी-कभार तारीफ कर देते, कुछ साहित्यिक संस्थाओं से मुझे डाक के जरिए प्रशंसा-पत्र भी मिलते। पर सूखे पत्तों जैसी तारीफों से पेट की आग नहीं बुझती। कस्बे के कुछ लोग पीठ पीछे ताने मारते, “बड़ा आया लेखक बनने वाला! बी.एससी. करके भी साइकिल घिस रहा है। इससे अच्छा तो वह फलां हलवाई का अनपढ़ लड़का है, जो रोज सैकड़ों रुपये गल्ले में समेटता है।” इन तानों को सुनकर मैं खून का घूंट पीकर रह जाता और मन ही मन ईश्वर से पूछता कि आखिर मेरी परीक्षा कब खत्म होगी?

एक रविवार की दोपहर, जब मैं तपती धूप में स्कूल से लौटकर आया, तो थकावट और भूख से मेरा शरीर कांप रहा था। शांति ने एक फटा हुआ अंतर्देशीय पत्र मेरे हाथ में थमाते हुए कहा, “डाकिया यह पत्र दे गया है, अंग्रेजी में लिखा है, शायद किसी का है।”

मैंने खीझकर पत्र एक पुरानी किताब के पन्नों के बीच दबा दिया और कहा, “पहले एक गिलास ठंडा पानी दो शांति, बाद में देखूंगा किसका पत्र है। किसी रिश्तेदार ने अपनी शादी का बुलावा भेजा होगा।”

पानी पीने और थोड़ा सुस्ताने के बाद जब मैंने वह पत्र निकाला और पढ़ना शुरू किया, तो मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। वह पत्र धनबाद के प्रतिष्ठित राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अरविंद सहाय का था। प्रोफेसर सहाय हमारे ही कस्बे के एक संभ्रांत और प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखते थे। वे स्वभाव से अत्यंत गंभीर, अंतर्मुखी लेकिन आधुनिक और सुलझे हुए विचारों के धनी व्यक्ति थे। उन्होंने पत्र में लिखा था कि उन्होंने ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में छपी मेरी दो कहानियां पढ़ी हैं। उन्हें मेरी भाषा और दृष्टिकोण बहुत पसंद आया था।

पत्र में आगे उन्होंने एक बेहद व्यावहारिक और कड़वी सच्चाई लिखी थी—”रमन, सिर्फ साधारण डिग्री और साहित्य के भरोसे तुम अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण सम्मानपूर्वक नहीं कर पाओगे। अगर तुम्हें सच में एक स्थायी और सम्मानित शिक्षक बनना है, तो तुम्हें विधिवत बी.एड. करना ही होगा। बिना इसके तुम जीवन भर शोषण का शिकार होते रहोगे। तुम तुरंत बोरिया-बिस्तर बांधकर धनबाद चले आओ। तुम्हारे नामांकन और यहां रहने-खाने की सारी व्यवस्था मैं देख लूंगा। संकोच मत करना, यह तुम्हारा हक है।”

वह पत्र मेरे जीवन का वह मोड़ साबित हुआ, जिसे लोग ‘टर्निंग प्वाइंट’ कहते हैं। प्रोफेसर अरविंद सहाय जैसे ज्ञानी और बड़े ओहदे वाले व्यक्ति का ध्यान मुझ जैसे एक विपन्न और गुमनाम युवक पर था, यह सोचकर ही मेरी आंखों से कृतज्ञता के आंसू बह निकले। उन्होंने मुझे डूबने से पहले तिनके का नहीं, बल्कि एक मजबूत नाव का सहारा दिया था।

मैंने शांति और मां से विदा ली और धनबाद पहुंच गया। प्रोफेसर साहब ने मुझे किसी पराए की तरह नहीं, बल्कि अपने छोटे भाई की तरह अपने सरकारी आवास में एक कमरा दिया। वे स्वयं वहां अकेले रहते थे और अपनी दूसरी शोध पुस्तक पर काम कर रहे थे। उन्होंने न केवल टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में मेरा प्रवेश करवाया, बल्कि मेरे रोजमर्रा के खर्च और घर पर कुछ पैसे भेजने के लिए शहर के दो संभ्रांत परिवारों के बच्चों की ट्यूशन भी दिलवा दी।

एक वर्ष तक मैं उनके सानिध्य में रहा। मैंने जी-तोड़ मेहनत की, दिन में कॉलेज और रात में ट्यूशन के साथ-साथ देर रात तक पढ़ाई। एक वर्ष का कठिन प्रशिक्षण समाप्त हुआ और मैंने बी.एड. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली।

जिस दिन मेरा परीक्षा परिणाम आया, उस दिन शाम को प्रोफेसर सहाय अपने कमरे से निकले। उनका चेहरा बेहद गंभीर था। उन्होंने मेरी ओर देखते हुए कड़े स्वर में कहा, “रमन, अब बहुत हो गया। आज के बाद तुम मेरे इस घर में एक दिन भी नहीं ठहरोगे।”

उनकी यह बात सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मेरा कंठ सूख गया, मैंने हाथ जोड़कर कांपती आवाज में कहा, “मुझसे कोई अपराध हो गया क्या सर? अगर कोई भूल हुई हो तो मुझे माफ कर दीजिए, पर इस तरह बेगाना मत कीजिए।”

प्रोफेसर सहाय के चेहरे की गंभीरता अचानक एक आत्मीय और वात्सल्य भरी मुस्कान में बदल गई। उन्होंने आगे बढ़कर मुझे गले से लगा लिया और बोले, “पगले, गलती नहीं, तुमने कमाल कर दिया है! अब तुम्हारा यहां रहने का वक्त खत्म हो गया है क्योंकि तुम्हारी स्थायी नौकरी का बंदोबस्त हो गया है। जमशेदपुर के पास एक नया सरकारी सहायता प्राप्त सीनियर सेकेंडरी स्कूल खुला है, जिसे जल्द ही पूर्ण सरकारी दर्जा मिलने वाला है। वहां भौतिकी और गणित के योग्य शिक्षक की सख्त आवश्यकता थी। मैंने वहां के ट्रस्टी और शिक्षा उप-निदेशक को तुम्हारी योग्यता और निष्ठा का अनुशंसा-पत्र भेज दिया है। यह लो तुम्हारा नियुक्ति पत्र। कल सुबह की पहली ट्रेन से तुम्हें वहां कार्यभार संभालना है।”

उस नियुक्ति पत्र को हाथों में लेते हुए ऐसा लगा मानो ईश्वर ने स्वयं उतरकर मेरे हाथों में कुबेर का खजाना रख दिया हो। मेरी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली, जिसे पोंछते हुए मैं उनके चरणों में झुक गया। उन्होंने मुझे उठाया और पीठ थपथपाते हुए कहा, “मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती रमन। जब नियत साफ हो, तो रास्ते अपने आप बनते चले जाते हैं।”

उस रात जब मैं ट्रेन में बैठा, तो मेरे मन में एक ही पंक्ति गूंज रही थी—‘कैसी है यह विधाता की माया, कहीं कड़ी धूप तो कहीं शीतल छाया।’

“अटेंशन प्लीज… दिल्ली से आने वाली फ्लाइट संख्या 402 रनवे पर लैंड कर चुकी है…”

हवाई अड्डे के लाउडस्पीकर से गूंजी इस घोषणा ने मुझे वर्तमान के धरातल पर ला पटका। मैंने अपनी नम आंखों को रूमाल से पोंछा, चश्मे को ठीक किया और अपनी छड़ी संभालते हुए अराइवल लाउंज के मुख्य द्वार की ओर बढ़ चला। चंद मिनटों बाद ही, नीले रंग के सलीकेदार सूट में, चेहरे पर आत्मविश्वास और आंखों में बचपन जैसी वही चमक लिए अनिकेत बाहर निकलता दिखाई दिया। मुझे देखते ही उसने अपनी भारी ब्रीफकेस एक तरफ रखी और दौड़कर मेरे चरण स्पर्श कर लिए।

मैंने जब उसके सिर पर हाथ रखा, तो मुझे लगा कि आज मेरी तीस साल पुरानी तपस्या का फल मुझे मिल गया है। जिस बेटे को कभी मैले कपड़ों में देखकर जमाना ताने मारता था, आज वही बेटा देश के सबसे बड़े महकमे में एक जिम्मेदार पद पर बैठकर देश की सेवा कर रहा था। जीवन के रास्ते सचमुच बड़े अजीब और खूबसूरत होते हैं; गर्दिश के घने बादलों के पीछे भी सफलता का सूरज हमेशा अपनी बारी का इंतजार कर रहा होता है।

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 मूल लेखक : मुकुंद लाल 

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